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Tuesday, April 8, 2008

पालीवालों के प्राचीन-रहस्‍यमय गांव कुलधरा की तस्‍वीरें और इतिहास ।

तरंग पर मैं अपनी जैसलमेर यात्रा की डायरी लिख रहा हूं । जो लगातार अनियमित होती जा रही है । निजी और पेशेवर जिंदगी की व्‍यस्‍तताएं उस तरह का सुकून नहीं दे पा रही हैं जिनमें एक एक लम्‍हे को याद करके डायरी पर उतारा जा सके । पिछली पोस्‍ट थी जैसलमेर के किले के बारे में । जिसमें मैंने आपको बताया था कि किस तरह सारा शहर किले में बसा है ।

अब आपको बता दूं कि हड़बड़ी में जैसलमेर का किला देखने के बाद हम सीमा सुरक्षा बल के जैसलमेर परिसर में पहुंचे और वहां युद्ध में विधवा हुई स्त्रियों तथा फौजियों के परिवार की अन्‍य महिलाओं की रिकॉर्डिंग की गयी । चूंकि महिलाओं की तादाद ज्‍यादा थी इसलिए सखियों के अलावा हमें भी..यानी हम पुरूषों को भी इस कार्यक्रम का संचालन करना पड़ गया । बहरहाल । यहां से एक बहुत ही अहम ठिकाना था हमारा और वो था कुलधरा । कुलधरा पालीवालों का गांव था और पता नहीं क्‍या हुआ कि एक दिन अचानक यहां फल-फूल रहे पालीवाल अपनी इस सरज़मीं को छोड़कर अन्‍यत्र चले गये । उसके बाद से कुलधरा पर कोई बस नहीं सका । कोशिशें हुईं पर नाकाम हो गयीं । कुलधरा के अवशेष आज भी विशेषज्ञों और पुरातत्‍वविदों के अध्‍ययन का केंद्र हैं । कई मायनों में पालीवालों ने कुलधरा को वैज्ञानिक आधार पर विकसित किया था । इसलिए आज मैं आपको कुलधरा के इतिहास के बारे में तो बताऊंगा की साथ ही उसके अनमोल तस्‍वीरें भी दिखलाऊंगा ।

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कुलधरा जैसलमेर से तकरीबन अठारह किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है । सबने कहा था कि जैसलमेर जाएं तो कुलधरा जरूर जाना । कहते हैं कि पालीवाल समुदाय के इस इलाक़े में चौरासी गांव थे और ये उनमें से एक था । मेहनती और रईस पालीवाल ब्राम्‍हणों की कुलधार शाखा ने सन 1291 में तकरीबन छह सौ घरों वाले इस गांव को बसाया था । पालीवालों का नाम दरअसल इसलिए पड़ा क्‍योंकि वो राजस्‍थान के पाली इलाक़े के रहने वाले  थे । पालीवाल ब्राम्‍हण होते हुए भी बहुत ही उद्यमी समुदाय था । अपनी बुद्धिमत्‍ता, अपने कौशल और अटूट परिश्रम के रहते पालीवालों ने धरती पर सोना उगाया था । हैरत की बात ये है कि पाली से कुलधरा आने के बाद पालीवालों ने रेगिस्‍तानी सरज़मीं के बीचोंबीच इस गांव को बसाते हुए खेती पर केंद्रित समाज की परिकल्‍पना की थी । रेगिस्‍तान में खेती । पालीवालों के समृद्धि का रहस्‍य था जिप्‍सम की परत वाली ज़मीन को पहचानना और वहां पर बस जाना । पालीवाल अपनी वैज्ञानिक सोच, प्रयोगों और आधुनिकता की वजह से उस समय में भी इतनी तरक्‍की कर पाए थे ।

पालीवाल समुदाय आमतौर पर खेती और मवेशी पालने पर निर्भर रहता था । और बड़ी शान से जीता था । इतिहास के झरोखों में आगे झांकने से पहले ज़रा कुछ तस्‍वीरों पर एक नज़र डाल लीजिए । कुलधरा के मुख्‍य द्वार पर अपने गाइड के इंतज़ार में बैठे हम तरंगित ।

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कुलधरा के मुख्‍य द्वार पर बंजारा समुदाय का एक वृद्ध बटलोई में खिचड़ी पका रहा था । और पास में बैटरी से चलने वाला रेडियो चल रहा था । हमारे क्‍लीनर ने उसे बताया कि विविध भारती की टोली कुलधरा देखने आई है । और एक फोटो-सेशन हो गया उस बंजारे के साथ । इस तस्‍वीर में बांईं ओर अशोक सोनावने, फिर हम 'तरंगित', महाशय 'बंजारे', 'जिप्‍सी' कमल शर्मा और फिर 'रेडियोसखी' ममता सिंह ।

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दोपहर-ऐ-इंतज़ार में क्‍या क्‍या ना कर बैठे । कभी बस के भीतर लेटे, कभी बस की छत पर बैठे ।

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दरअसल हमारे गाइड पेशे से टीचर और लेखक हैं और आकाशवाणी जैसलमेर के सौजन्‍य से वो हमारे लिए जैसलमेर शहर से पधार रहे थे इसलिए उनके इंतज़ार में इतने पापड़ बेलने पड़े हमें । पालीवालों के इतिहास के बारे में ज्‍यादातर जानकारी हमारे गाइड महोदय ने ही दी है और बाक़ी जानकारियां आपके इस तरंगित लेखक ने इंटरनेटी छानबीन से जमा की हैं । अब तक मैंने आपको बताया कि पालीवाल खेती और मवेशियों पर निर्भर रहते थे और इन्‍हीं से समृद्धि अर्जित करते थे । दिलचस्‍प बात ये है कि रेगिस्‍तान में पालीवालों ने सतह पर बहने वाली पान या ज़मीन पर मौजूद पानी का सहारा नहीं लिया । बल्कि रेत में मौजूद पानी का इस्‍तेमाल किया । पालीवाल ऐसी जगह पर गांव बसाते थे जहां धरती के भीतर जिप्‍सम की परत हो । जिप्‍सम की परत बारिश के पानी को ज़मीन में अवशोषित होने से रोकती और इसी पानी से पालीवाल खेती करते । और ऐसी वैसी नहीं बल्कि जबर्दस्‍त फसल पैदा करते । पालीवालों के जल-प्रबंधन की इसी तकनीक ने थार रेगिस्‍तान को इंसानों और मवेशियों की आबादी या तादाद के हिसाब से दुनिया का सबसे सघन रेगिस्‍तान बनाया । पालीवालों ने ऐसी तकनीक विकसित की थी कि बारिश का पानी रेत में गुम नहीं होता था बल्कि एक खास गहराई पर जमा हो जाता था ।

कुलधरा की वास्‍तुकला के बारे में हमारे गाइड ने कुछ दिलचस्‍प तथ्‍य बताए । उनका कहना था कि कुलधरा में दरवाज़ों पर ताला नहीं लगता था । गांव का मुख्‍य-द्वार और गांव के घरों के बीच बहुत लंबा फ़ासला था । लेकिन ध्‍वनि-प्रणाली ऐसी थी कि मुख्‍य-द्वार से ही क़दमों की आवाज़ गांव तक पहुंच जाती थी । दूसरी बात उन्‍होंने ये बताई कि गांव के तमाम घर झरोखों के ज़रिए आपस में जुड़े थे इसलिए एक सिरे वाले घर से दूसरे सिरे तक अपनी बात आसानी से पहुंचाई जा सकती थी । घरों के भीतर पानी के कुंड, ताक और सीढि़यां कमाल के हैं । कहते हैं कि इस कोण में घर बनाए गये थे कि हवाएं सीधे घर के भीतर होकर गुज़रती थीं । कुलधरा के ये घर रेगिस्‍तान में भी वातानुकूलन का अहसास देते थे । 

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ऐसा उन्नत और विकसित गांव एक दिन अचानक खाली कैसे हो गया । ये एक रहस्‍य ही है ।

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कहते हैं कि जैसलमेर की राजा सालम सिंह को कुलधरा की समृद्धि बर्दाश्‍त नहीं हो रही थी । उसने कुलधरा के बाशिंदों पर भारी कर/टैक्‍स लगा दिये थे । पालीवालों का तर्क था कि चूंकि वो ब्राम्‍हण हैं इसलिए वो ये कर नहीं देंगे । जिसे राजा ने ठुकरा दिया । ये बात स्‍वाभिमानी पालीवालों को हज़म नहीं हुई और मुखियाओं के विमर्श के बाद उन्‍होंने इस सरज़मीं से जाने का फैसला कर लिया । इस संबंध में एक कथा और है । कहते हैं कि जैसलमेर के दिलफेंक दीवान को कुलधरा की एक लड़की पसंद आ गयी थी । ये बात पालीवालों को बर्दाश्‍त नहीं हुई और रातों रात वो यहां से हमेशा हमेशा के लिए चले गये । अब सच क्‍या है ये जानना वाक़ई बेहद मुश्किल है । लेकिन कुलधरा के इस वीरान खंडहर में घूमकर मुझे बहुत अजीब- सा लगा । इन घरों, चबूतरों, अटारियों को देखकर पता नहीं क्‍यों ऐसा लग रहा था कि अभी कोई महिला सिर पर गगरी रखे निकल पड़ेगी या कोई बूढ़-बुजुर्ग चबूतरे पर हुक्‍का गुड़गुड़ाता दिखेगा । बच्‍चे धूल मिट्टी में लिपटे खेलते नज़र आएंगे । पगड़ी लगाए पालीवाल अपने खेतों पर निकल रहे होंगे । पर सच ये है कि सदियों से पालीवालों का ये गांव पूरी तरह से वीरान है ।

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कुलधरा के बारे में एक बात और कहनी है । कुलधरा अभी भी चर्चित पर्यटन-स्‍थल नहीं है । जब हम वहां पहुंचे तो दक्षिण की एक फिल्‍म यूनिट अपनी चर्चित पौराणिक फिल्‍म की शूटिंग कर रही थी । एक बंदा राक्षस बना था जिसने अपनी तस्‍वीरें खिंचाने से इंकार कर दिया । लेकिन विविध भारती के लोगों से बातचीत करके उसे बड़ा मज़ा आया । हमें ये भी पता चला कि कुछ विदेशी पर्यटक यहां इस उम्‍मीद में आते हैं कि पालीवालों ने जो सोना यहां दबा रखा था शायद वो उन्‍हें मिल जायेगा । इसलिए कुलधरा में जगह जगह खुदाई हुई पड़ी है । इसके अलावा शायद चोरी छिपे या घोषित रूप से यहां से पत्‍थरों को खींचकर निकाला जा रहा है और शहर के निर्माण स्‍थलों में इस्‍तेमाल किया जा रहा है । ऐसे वीरान गांवों को देखकर मन बेचैन हो जाता है । शायद कुलधरा का सही डॉक्‍यूमेन्‍टेशन हो सके और सरकार इसे एक पुरातात्‍विक धरोहर का दर्जा दिलवा पाए । अफ़सोस के पालीवालों के वैज्ञानिक रहस्‍य कुलधरा के अवशेषों के साथ ही गुम हो जाएंगे ।

Tuesday, March 25, 2008

जैसलमेर यात्रा छठी कड़ी: किले में कोला, कैफ़े और काऊ । कुछ दिलचस्‍प तस्‍वीरें ।

तरंग पर जैसलमेर की यात्रा का विवरण चल रहा है । जैसलमेर यात्रा की अब तक पांच कडि़यां हो चुकी हैं । ज़रा यहां उन कडियों के लिंक्‍स दे दिये जाएं ।

पिछली कड़ी थी पांचवीं--जिसमें हमने लोंगेवाला पोस्‍ट की शौर्यपूर्ण दास्‍तान का विवरण पढ़ा था ।

चौथी कड़ी में सीमा पर बी एस एफ के सिपाहियों के बीच की गयी रिकॉर्डिंग का‍ ब्‍यौरा था ।

तीसरी कड़ी थी--तन्‍नोट : सीमा प्रहरियों के विश्‍वास का केंद्र

दूसरी कड़ी में जैसलमेर रामगढ़ में संगीत संध्‍या का ब्‍यौरा था ।

और पहली कड़ी में था रामदेवरा का ब्‍यौरा ।

दरअसल जैसलमेर यात्रा इतने व्‍यापक अनुभवों वाली है कि इसके एक एक पहलू को अपनी इस ट्रैवल-डायरी में समेटे बिना चैन नहीं आने वाला । तो चलिए इस यात्रा डायरी को आगे बढ़ाया जाए । दरअसल जैसलमेर रामगढ़ में अपनी सारी रिकॉर्डिंग्‍स और संगीत संध्‍या करने के बाद हम निकल  पड़े जोधपुर की ओर । रामगढ़ से जोधपुरा का रास्‍ता तकरीबन चार सौ किलोमीटर का है । और हम थे अपनी विशेष बारह सीटों वाली बस में । ज़ाहिर है कि जैसलमेर रास्‍ते में पड़ने वाला था । जैसलमेर आकाशवाणी केंद्र के अधिकारियों ने पहले ही कह दिया था कि विविध-भारती की टोली चुपके से जैसलमेर पार ना करे । इसलिए हम सीधे जा पहुंचे जैसलमेर आकाशवाणी केंद्र । सुंदर सा केंद्र है ये, जोधपुरी पत्‍थरों से बना । रास्‍ते में फिर से इतनी सारी पवनचक्कियां मिलीं । जिन्‍हें बस के बोनट पर बैठकर किसी तरह मैंने अपने कैमरे में कैद कर लिया । 

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यहां से हम सीधे जैसलमेर की सरज़मीं पर जा पहुंचे । आईये जैसलमेर कि़ले पर चलने से पहले आपको बताया जाए इसका इतिहास । जैसलमेर के किले को यहां के भाटी राजपूत शासक रावल जैसल ने सन 1156 में बनवाया था । यानी आज से तकरीबन साढ़े आठ सौ साल पहले । मध्‍य युग में जैसलमेर ईरान, अरब, मिस्‍त्र और अफ्रीक़ा से व्‍यापार का एक मुख्‍य केंद्र था । दिलचस्‍प बात ये है कि इसकी पीले पत्‍थरों से बनी दीवारें दिन में तो शेर जैसे चमकीले पीले-भूरे रंग की नज़र आती हैं और शाम ढलते ही इनका रंग सुनहरा हो जाता है । इसलिये इसे सुनहरा कि़ला कहा जाता है । आपको बता दें कि महान फिल्‍मकार सत्‍यजीत रे का एक जासूसी उपन्‍यास 'शोनार किला' इसी किले की पृष्‍ठभूमि पर लिखा गया है ।  त्रिकुट पहाड़ी पर बने इस कि़ले ने कई लड़ाईयों को देखा और झेला है । तेरहवीं शताब्‍दी में अलाउद्दीन खि़लजी ने इस कि़ले पर आक्रमण कर दिया था और नौ बरस तक कि़ला उसकी मिल्कियत बना रहा । इसके बाद सन 1541 में मुग़ल बादशाह हुमायूं ने इस कि़ले पर हमला किया था ।

जैसलमेर किला दुनिया का ऐसा अकेला किला है जहां शहर की एक चौथाई जनता निवास करती है । हालांकि किसी ज़माने में पूरा जैसलमेर शहर ही इस किले के भीतर बसा हुआ था । जैसलमेर के इस किले को देखने के लिए वैसे तो दो दिन चाहिए । लेकिन हमारे पास थे दो घंटे । इसलिए बहुत सरसरी तौर पर ही हम इस कि़ले को देख सके । पर यहां के कुछ दिलचस्‍प दृश्‍य मैंने अपने कैमेरे में क़ैद करने का प्रयास किया है । जो बदलते वक्‍त के साथ किले की बदलती तस्‍वीर आपके सामने पेश करेंगे । आईये तस्‍वीरें देखें ।

ये है जैसलमेर के कि़ले का एक दृश्‍य जो पहाड़ी के नीचे से लिया गया है । जो लोग पहाड़ी पर पैदल नहीं जा सकते उन्‍हें ऑटो रिक्‍शा वाले बहुत थोड़े पैसों में अपनी कलाबाज़ी दिखाते हुए किले के भीतर ले जाते हैं । दिलचस्‍प बात ये है कि पूरा का पूरा शहर है किले में, साईबर कैफे से लेकर रेस्‍टोरेन्‍ट तक सब कुछ । और आप इसे पार करते हुए किले में टहलते हैं ।

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ज़रा यहां नज़र डालिए । जैसलमेर किले की दीवार पर नन्‍हे जैसलमेर फिल्‍म का पोस्‍टर नज़र आ रहा है । जो किसी मनचले के फाड़ने के बावजूद कुछ हद तक सही-सलामत बचा है । नन्‍हे बॉबी देओल जैसलमेर की दीवारों पर भले विराजमान हैं, अरे भाई, फिल्‍म कहां गयी, किसी को कुछ पता है क्‍या ।

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ये किले के भीतर मौजूद एक मुख्‍य चौराहे पर ली गयी तस्‍वीर है । किले के भीतर मौजूद हवेली की तस्‍वीर ।

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जैसा कि मैंने कहा कि किले में पूरा शहर है, देखिए किले में दर्जी और दर्जी की चाय ।

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अगर दर्जी चाय पी सकता है तो क्‍या ठंडा नहीं पी सकता । इस चित्र का शीर्षक है-'किले में कोला'

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किले में कोला होगा, चाय होगी, दर्जी होगा तो क्‍या गौ माता नहीं होगी । चलिए गौ माता को रोटी खिलाईये और नमस्‍ते कीजिए । 'किले में काऊ'

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ये है जैसलमेर किले से शहर का विहंगम दृश्‍य । शहर कभी किले के भीतर ही हुआ करता था । अब शहर किले के भीतर भी है और बाहर भी ।

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किले में सब कुछ है । अगर ये साइन बोर्ड ठीक से पढ़ने में नहीं आ रहा है तो मैं बता दूं, इस पर लिखा है -द चाय बार: साइबर कैफे । यानी किले में काउ और किले में कोला के बाद किले में साइबर कैफे ।

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जैसलमेर और जोधपुर यात्रा की छठी कड़ी जैसलमेर किले की तस्‍वीरें लेकर आई । अगली कड़ी में थार रेगिस्‍तान में ऊंटों की सवारी

Thursday, March 6, 2008

जैसलमेर-यात्रा पांचवी-कड़ी: भारत पाकिस्‍तान युद्ध 1971 और लोंगेवाला-पोस्‍ट की शौर्यपूर्ण दास्‍तान ।

जैसलमेर यात्रा का विवरण अब एक रोचक मोड़ पर आ गया है । और ये मोड़ है लोंगेवाला या लोंगेवाल । इस जगह का नाम हमने पहले ही बहुत सुन रखा था । दरअसल फिल्‍म 'बॉर्डर' में भी लोंगेवाल की जंग को दिखाया गया है । लेकिन फिल्‍मी-कथानक और हक़ीक़त के बीच का अंतर लंबा होता है । सीमा-सुरक्षा-बल के अधिकारियों ने हमें लोंगेवाल के बारे में जो बताया उससे इस जगह के बारे में और जानकारियां जमा करने की इच्‍छा बढ़ गयी थी । मुंबई लौटकर आने के बाद मैंने इंटरनेट पर लोंगेवाल की बारे में ज्‍यादा छानबीन की । और कुछ दिलचस्‍प बातें पता चलीं । आईये आज जानें कहानी लोंगेवाला की

विकीपीडिया पर लोंगेवाला के बारे में एक पूरा अध्‍याय मौजूद है । जिसके मुताबिक़ थार रेगिस्‍तान में लोंगेवाला की लड़ाई पांच और छह दिसंबर 1971 को लड़ी गयी थी । इस लड़ाई के दौरान 23 वीं पंजाब रेजीमेन्‍ट के 120 भारतीय सिपाहियों की एक टोली ने पाकिस्‍तानी सेना के दो से तीन हज़ार फौजियों के समूह को धूल चटा दी थी । भारतीय वायु सेना ने इस लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी ।

शायद आपको जानकारी हो कि 1971 की भारत पाकिस्‍तान लड़ाई का मुख्‍य-फोकस था सीमा का पूर्वी हिस्‍सा । पश्चिमी हिस्‍से की निगरानी सिर्फ इसलिए की जा रही थी ताकि याहया खान के नेतृत्‍व में लड़ रही पाकिस्‍तानी सेना इस इलाक़े पर क़ब्‍ज़ा करके भारत-सरकार को पूर्वी सीमा पर समझौते के लिए मजबूर ना कर दे ।

.... पाकिस्‍तान के ब्रिगेडियर तारिक मीर ने अपनी योजना पर विश्‍वास प्रकट करते हुए कहा था--इंशाअल्‍लाह हम नाश्‍ता लोंगेवाला में करेंगे, दोपहर का खाना रामगढ़ में खाएंगे और रात का खाना जैसलमेर में होगा । यानी उनकी नज़र में सारा खेल एक ही दिन में खत्‍म हो जाना था ।

1971 में नवंबर महीने के आखिरी हफ्ते में भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्‍तान के सिलहट जिले के अटग्राम  में पाकिस्‍तानी सीमा पोस्‍टों और संचार-केंद्रों पर जोरदार हमला कर दिया था ।  मुक्ति वाहिनी ने भी इसी दौरान जेसूर पर हमला कर दिया था । पाकिस्‍तानी सरकार इन हमलों से घबरा गयी थी । क्‍योंकि ये तय हो चुका था कि पूर्वी पाकिस्‍तान अब सुरक्षित नहीं रहा । पाकिस्‍तान को बंटवारे से बचाने के लिए याहया ख़ान ने  मो. अयूब ख़ान की रणनी‍ति को आज़माया  जिसके मुताबिक़ पूर्वी पाकिस्‍तान को बचाने की कुंजी थी पश्चिमी पाकिस्‍तान । उनकी कोशिश यही थी कि भारत के पश्चिमी हिस्‍से में ज्‍यादा से ज्‍यादा इलाक़े को हड़प लिया जाये ताकि जब समझौते की नौबत आए तो भारत से पाकिस्‍तान के 'नाज़ुक-पूर्वी-हिस्‍से' को छुड़ावाया जा सके ।

पाकिस्‍तान ने पंजाब और राजस्‍थान के इलाक़ों में अपने जासूस फैला रखे थे । उनकी योजना किशनगढ़ और रामगढ़ की ओर से राजस्‍थान में घुसपैठ करने की थी । पाकिस्‍तान के ब्रिगेडियर तारिक मीर ने अपनी योजना पर विश्‍वास प्रकट करते हुए कहा था--इंशाअल्‍लाह हम नाश्‍ता लोंगेवाला में करेंगे, दोपहर का खाना रामगढ़ में खाएंगे और रात का खाना जैसलमेर में होगा । यानी उनकी नज़र में सारा खेल एक ही दिन में खत्‍म हो जाना था ।

उन दिनों लोंगेवाल पोस्‍ट पर तेईसवीं पंजाब रेजीमेन्‍ट तैनात थे जिसके मुखिया थे मेजर के एस चांदपुरी बाक़ी बटालियन यहां से सत्रह किलोमीटर उत्‍तर-पूर्व में साधेवाल में तैनात थी । जैसे ही तीन दिसंबर को पाकिस्‍तानी वायुसेना ने भारत पर हमला किया, मेजर चांदपुरी ने लेफ्टीनेन्‍ट धरम वीर के नेतृत्‍व में बीस फौजियों की टोली को बाउंड्री पिलर 638 की हिफ़ाज़त के लिए गश्‍त लगाने भेज दिया । ये पिलर भारत पाकिस्‍तान की अंतर्राष्‍ट्रीय सीमा पर लगा हुआ था । इसी गश्‍त ने पाकिस्‍तानी सेना की मौजूदगी को सबसे पहले पहचाना था ।

....night vision उपकरण नहीं लगे थे इसलिए दिन का उजाला होने तक वायुसेना हमला नहीं कर सकती थी । बहरहाल दोपहर तक भारतीय हवाई हमले ने पाकिस्‍तानी सेना के चालीस टैंकों और सौ गाडि़यों को तबाह कर दिया और उसकी कमर तोड़ दी ।

पांच दिसंबर की सुबह लेफ्टिनेन्‍ट धरमवीर को गश्‍त के दौरान सीमा पर घरघराहट की आवाज़ें सुनाई दीं । जल्‍दी ही इस बात की पुष्टि हो गयी कि पाकिस्‍तानी सेना अपने टैंकों के साथ लोंगेवाला पोस्ट की तरफ बढ़ रही है । फौरन मेजर चांदपुरी ने बटालियन के मुख्‍यालय से संपर्क करके हथियार और फौजियों की टोली को भेजने का निवेदन किया । इस समय तक लोंगेवाला पोस्‍ट पर ज्‍यादा हथियार नहीं थे । मुख्‍यालय से निर्देश मिला कि जब तक मुमकिन हो भारतीय फौजी डटे रहें, पाकिस्‍तानी सेना को आगे ना बढ़ने दिया जाए । मदद भेजी जा रही है ।

लोंगेवाला पोस्‍ट पर पहुंचने के बाद पाकिस्‍तानी टैंकों ने फायरिंग शुरू कर दी और सीमा सुरक्षा बल के पांच ऊंटों को मार गिराया । इस दौरान भारतीय फौजियों ने पाकिस्‍तान के साठ में से दो टैंकों को उड़ाने में कामयाबी हासिल कर ली । संख्‍या और हथियारों में पीछे होने के बावजूद भारतीय सिपाहियों ने हिम्‍मत नहीं हारी । सबेरा हो गया, लेकिन पाकिस्‍तानी सेना लोंगेवाल पोस्‍ट पर क़ब्‍ज़ा नहीं कर सकी । भारतीय वायुसेना के हॉकर हंटर एयरक्राफ्ट में night vision उपकरण नहीं लगे थे इसलिए दिन का उजाला होने तक वायुसेना हमला नहीं कर सकती थी । बहरहाल दोपहर तक भारतीय हवाई हमले ने पाकिस्‍तानी सेना के चालीस टैंकों और सौ गाडि़यों को तबाह कर दिया और उसकी कमर तोड़ दी । इस बीच थल-सेना की मदद भी आ पहुंची और पाकिस्‍तान को यहां से पीछे हटना पड़ा ।

विकीपीडिया के बाद अब लोंगेवाल की लड़ाई की कहानी सुनिए एयरमार्शल एम एस बावा की ज़बानी-- ये लेख भी मुझे इंटरनेटी छानबीन के बाद ही हासिल हुआ है । पढिये इसके संपादित अंशों का अनुवाद:

तीन दिसंबर 1971 को जब पाकिस्‍तानी वायुसेना ने अमृतसर, अवंतीपुर, पठानकोट, उत्‍तरलई, अंबाला, आगरा, नल और जोधपुर पर हवाई हमले कर दिए थे । पाकिस्‍तानी सेना का फोकस था लोंगेवाला पोस्‍ट पर । वो भारतीय सरज़मीं का ज्‍यादा से ज्‍यादा हिस्‍सा हड़प लेना चाहते थे । पांच दिसंबर की सुबह बेस कमान्‍डर को एक रेडियो-संदेश आया कि पाकिस्‍तानी सेना टैंकों के साथ रामगढ़ की तरफ बढ़ रही है । जितनी जल्‍दी हो सके छानबीन की जाए । भारतीय वायुसेना के पहले दो हंटर विमानों ने जब उड़ान भरी तो लोंगेवाला पर पाकिस्‍तानी सेना का हमला जारी था, हालांकि वो बहुत ज्‍यादा कामयाबी नहीं हासिल कर पाई थी । फ्लाईट लेफ्टिनेन्‍ट डी.के.दास और फ्लैग ऑफीसर आर.सी.गोसाईं अपने विमान को काफी कम ऊंचाई पर लेकर आए और पाकिस्‍तान के T-59 टैंकों पर निशाना साधा । अब लड़ाई भारतीय वायुसेना और पाकिस्‍तान तोपख़ाने के बीच थी । हमारे हवाई जांबाज़ पाकिस्‍तानी टैंकों को ध्‍वस्‍त कर रहे थे । पर पाकिस्‍तानी सेना लोंगेवाल की ओर बढ़ती चली जा रही थी । एक के बाद एक भारतीय वायुसेना के विमान उड़ान भर रहे थे और हमले कर रहे थे । आखिरकार पांच और छह दिसंबर को लगातार हमले करने के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्‍तानी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर ही दिया । पूरी कहानी यहां पढ़ें ।

लोंगेवाल की लड़ाई के अनुभव भारतीय वायुसेना के विंग कमान्‍डर कुक्‍के सुरेश ने भी लिखी है । जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं । कुल मिलाकर रामगढ़ जैसलमेर की यात्रा के दौरान भारत और पाकिस्‍तान के बीच हुई 1971 की लड़ाई के इस अध्‍याय की वो रोमांचक कहानियां सुनने मिलीं, जिनके बारे में मुझे ज्‍यादा नहीं पता था । आपको बता दें कि इस लड़ाई के ठीक एक साल बाद अपन इस दुनिया में आए थे । बहरहाल इन इलाक़ों में जाना और इनके सामरिक महत्‍त्‍व को समझना अपने आप में एक रोमांचक अनुभव रहा । आईये कुछ तस्‍वीरें दिखा दी जाएं । 

 

बार्डर पिलर 638 जो अब एक स्‍मारक है ।

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लोंगेवाल-युद्ध का स्‍मारक, जिस पर इस लड़ाई में हिस्‍सा लेने वाले सभी सैनिकों के नाम लिखे हैं । और रूडयार्ड किपलिंग की ये उक्ति भी लिखी है:

HOW BETTER CAN A MAN DIE THAN FACING FEARFUL ODDS FOR THE ASHES OF HIS FATHERS AND TEMPLES OF HIS GODS: KIPLING

WE REMEMBER

 

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168 फील्‍ड रेजीमेन्‍ट युद्ध सम्‍मान लोंगेवाला ।

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इस श्रृंखला की अन्‍य कडि़यां--

1.पहला भाग--रामदेवरा

2.दूसरा भाग--रामगढ़ में संगीत-संध्‍या

3.तीसरा भाग-सीमा प्रहरियों के विश्‍वास का केंद्र तन्‍नोट

4.चौथा भाग-सीमा, सिपाही और सनसनी

अपनी प्रतिक्रियाएं बताते रहिए । अगली कड़ी में की जाएगी थार रेगिस्‍तान में ऊंटों की सैर ।

Sunday, March 2, 2008

जैसलमेर यात्रा चौथी कड़ी--सीमा, सिपाही और सनसनी.....

तरंग पर इन दिनों मैं अपनी जैसलमेर यात्रा का ब्‍यौरा लिख रहा हूं । जैसलमेर-जोधपुर की ये यात्रा अनुभवों से इतनी संपन्‍न रही है कि अभी दो दिन पहले मैं सोच रहा था कि ये श्रृंखला तो बड़ी लंबी हो जाएगी । क्‍या लंबी श्रृंखलाओं में रस बना रहता है । इस माथापच्‍ची को सिर झटककर इसलिए भी भुला दिया कि मैं स्‍वयं अपनी इस यात्रा का डॉक्‍यूमेन्‍टेशन कर लेना चाहता हूं ताकि सनद रहे । स्‍मृति पर समय की दूसरी परतों के चढ़ने से पहले अच्‍छा है कि उनका बैकअप ले लिया जाए । Happy

आपको याद होगा कि पिछली कड़ी में हम तन्‍नोट तक पहुंच गये थे । अब यहां से भारत-पाक सीमा की ओर जाना है । फिर हम लोंगेवाल में रची गयी भारतीय सेना की शौर्य गाथा को दोहराएंगे ।

.... दो सगे मुल्कों के बीच एक सरहद है....ढेर सारी जि़द है....अपार राजनीति है...नफ़रत है...और साझा संस्कृंति की बीच कंटीली बाड़ है...।

अपनी इस कड़ी में मैं भारत पाक सीमा पर बनी सीमा सुरक्षा बल की उन पोस्‍टों के नाम नहीं दे रहा हूं जहां हम गए थे । आज तकरीबन एक महीने बाद भी रोमांच का वो अहसास बिल्‍कुल वैसा का वैसा है, जो भारत-पाक सीमा पर जाने पर हुआ था । फिर ये भी लगा कि जहां सिविलियन्‍स नहीं जा सकते, वहां अपने काम के सिलसिले में जा पहुंचना हमारा सौभाग्‍य ही तो था ।

भारत-पाकिस्‍तान की सीमा को लेकर मुझे हमेशा से तकलीफ़ होती रही है । अफ़सोस है कि इतिहास की करवट ने इस विशाल देश के दो टुकड़े कर दिये और सरहद के उस पार वाला हिस्‍सा हमारे लिए एक कहानी बनकर रह गया । मुझे याद है कि बचपन से ही मैं अपने परिवार में दादाजी के भाई के विभाजन के वक्‍त पाकिस्‍तान चले जाने की कहानियां सुना करता था । दादी बताती थीं कि कैसे मेरे पैतृक गांव हिन्‍डोरिया से मेरे परदादा सभी को लेकर विभाजन के दौरान जबलपुर चले गये थे । वहां से एक भाई पाकिस्‍तान की ओर चले गये और बाक़ी सभी अपने गांव लौट आए । इसके अगले साल मेरे पिताजी का जन्‍म हुआ । अस्‍सी के दशक में हमारे ख़ानदान के उस हिस्‍से से कुछ लोग भारत के दौरे पर आए । बड़ी दिलचस्‍प यादें हैं वो...मेरी पीढ़ी के लोग थे । ख़ानदान की दो शाखाओं के लोग...एक दूसरे से अपरिचित । कौतुहल से इस देस-परदेस को देखते । मिथुन चक्रवर्ती को मिथन पुकारते...उसकी फिल्‍मों के फैन । हालांकि उसके बाद हमारा ज्‍यादा संपर्क नहीं रहा । एक सपना है उस ओर जाकर उन तमाम लोगों से मिलने का ।

जब मैं रामगढ़ में भारत-पाकिस्‍तान की सीमा पर गया तो उस कंटीली बाड़ को देखकर पहला अहसास यही हुआ कि यहां से वो शहर कुछ ही घंटों की दूरी पर होगा । लेकिन दो सगे मुल्‍कों के बीच एक सरहद है....ढेर सारी जि़द है....अपार राजनीति है...नफ़रत है...और साझा संस्‍कृति की बीच कंटीली बाड़ है...। बहरहाल......इस दास्‍तान से बाहर आता हूं और आपको दिखाता हूं एकदम सरहद पर लहराता तिरंगा.... 

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सीमा पर पहुंचते ही हमें अजीब-सी सनसनी का अहसास हुआ । ये भी लगा कि किन मुश्किल हालात में सीमा सुरक्षा बल के सिपाही सीमाओं की हिफ़ाज़त करते हैं । इस पोस्‍ट के युवा-कमांडर ने हमें यहां की कार्यप्रणाली के बारे में बताया । यहीं पर पैंतालीस फुट ऊंचा ये वॉच-टावर भी था, जिस पर चढ़ने का लोभ-संवरण मैं और मेरे कुछ इंजीनियर नहीं कर पाए । इस पर चढ़ने के बाद कुछ नज़र नहीं आया सिवाय बंजर सरज़मीं के । दोनों तरफ़ वीराना...कहते हैं कि ऐसे हालात में सीमा-सुरक्षा-बल के सिपाही रायफल और रेडियो के सहारे अपना समय काटते हैं ।

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यहां गर्मियों में तापमान तकरीबन पचास डिग्री सेल्सियस और सर्दियों में दो डिग्री सेल्सियस से भी कम हो जाता है । ज़रूरत का हर सामान दूर से लाना पड़ता है । यानी दिक्‍कतें ही दिक्‍कतें । अपनी आम जिंदगी में कभी हमें ये अहसास भी नहीं होता कि हम जिस बेफिक्री से अपना जीवन जीते हैं, देश का कामकाज चलता है, उसमें कहीं ना कहीं इन सिपाहियों का ज़बर्दस्‍त योगदान है । इन सिपाहियों से बातें करना एक दिव्‍य-अनुभव था ।

.... ख़ानदान की दो शाखाओं के लोग...एक दूसरे से अपरिचित । कौतुहल से इस देस-परदेस को देखते । मिथुन चक्रवर्ती को मिथन पुकारते...उसकी फिल्मों के फैन ...।

हम आपको बता दें कि यहां हमने इन फौजियों के साथ 'जयमाला संदेश' और 'मनचाहे गीत' कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग की । 'जयमाला संदेश' का कन्‍सेप्‍ट है फौजियों के संदेश उनके परिवार वालों के नाम और उनके परिवार वालें के संदेश फौजियों के नाम । और 'मनचाहे गीत' का कंसेप्‍ट तो आप जानते ही हैं--फ़रमाईशी फिल्‍मी गीत । यहां कोई मणिपुर का था, तो कोई उड़ीसा का, कोई बंगाल का तो कोई झारखंड, बिहार, राजस्‍थान, म.प्र., कर्नाटक और तमिलनाडु का । दिलचस्‍प थीं इन फौजियों की फ़रमाईशें । मैं हमेशा से कहता हूं कि कौन सा गाना किसे और किस तरह रिलेट करे कह नहीं सकते । ज़रूरी नहीं है कि मशहूर फिल्‍में और उनके गीत ही लोगों पर असर डालें । ज्‍यादातर फ़रमाईशें थीं कम मशहूर फिल्‍मों की--जैसे 'सैनिक', 'पाले खां', 'जान' जैसी फिल्‍मों के गीत । किसी ने अपनी फेवरेट हीरोईन करीना कपूर बताई तो किसी ने बताया कि उन्‍हें सन्‍नी देओल पसंद हैं क्‍योंकि वो दमदार हीरो हैं ।

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साल में एक या दो बार छुट्टियों में घर जाना, परिवार को याद करते हुए गाने गाना, चिट्ठियों की बजाय महीने में एक बार फोन पर बातें करना...कितनी कितनी बातें बताई गयीं हमें । ये वो लोग थे जिनके लिए विविध भारती सबसे ज्‍यादा महत्‍त्‍वपूर्ण थी, जिन्‍होंने हमसे सबसे ज्‍यादा प्‍यार किया । और जो हमें देखकर फूले नहीं समाए । मेरे कैमेरे की नज़र से देखिए उन ऊंटों को जिन पर सीमा सुरक्षा बल के प्रहरी सरहद पर गश्‍त लगाते हैं । 

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सीमा-सुरक्षा-चौकी पर जाकर रिकॉर्डिंग करने के इस दिव्‍य अनुभव को शायद शब्‍दों में ठीक ठीक नहीं उतारा जा सकता । आज एक महीने बाद भी जब-तब ज़ेहन में उस अनुभव की छबियां तैर जाती हैं ।

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पिछली पोस्‍ट पर 'विखंडित' जी की टिप्‍पणी थी जिसमें उन्‍होंने तन्‍नोट के पास रेत की टीले और तन्‍नोट मंदिर में घूमते मीठा खाने के शौकीन काले बकरे का जिक्र था । लंबी होती पोस्‍ट की वजह से ये तस्‍वीरें ग़ायब कर दी थीं । लीजिए ये रहीं वो तस्‍वीरें--- 

इस बकरे ने ममता से अच्‍छी दोस्‍ती कर ली और लगातार उसके पीछे पीछे घूमता रहा ।  

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और ये उस टीले से इलाक़े का जायज़ा लेते हम....

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अगली कड़ी में पढि़ये लोंगेवाल की शौर्यगाथा ।

इस श्रृंखला की अन्‍य कडि़यां--

1.पहला भाग--रामदेवरा

2.दूसरा भाग--रामगढ़ में संगीत-संध्‍या

3.तीसरा भाग-सीमा प्रहरियों के विश्‍वास का केंद्र तन्‍नोट

Saturday, February 23, 2008

जैसलमेर यात्रा: तीसरा भाग-- सीमा-प्रहरियों के विश्‍वास का केंद्र--तन्‍नोट

जैसा कि आप जानते हैं कि तरंग पर इन दिनों फ़रवरी के प्रथम सप्‍ताह में हुई मेरी जैसलमेर यात्रा की कहानी चल रही है । पिछली पोस्‍ट में मैंने आपको बताया कि किस तरह से हमने सीमा सुरक्षा बल की रामगढ़ चौकी पर स्‍थल रिकॉर्डिंग की और साथ में एक संगीत-संध्‍या भी आयोजित की ।

....दुश्‍मन जो देखे बुरी नज़र से आंखें निकाल लाएंगे.....तिरंगा प्‍यारा देश का हर जगह फहराएंगे ।।

अगला दिन काफी रोमांचक था । सोचा ये गया था कि इस दिन हमारी दो टीमों भारत-पाकिस्‍तान सीमा पर बनी सीमा सुरक्षा बल की पोस्‍टों पर जाकर वहां तैनात प्रहरियों से बातें करेंगी । सो सुबह-सवेरे नाश्‍ता करके हम सीमा सुरक्षा बल की टोली के साथ निकल पड़े । सबसे पहले रास्‍ते में हमारी गाडियां रूकीं इंदिरा गांधी नहर पर जाकर । सीमा सुरक्षा बल के अधिकारियों ने हमें बताया कि इंदिरा गांधी नहर परियोजना ने राजस्‍थान के बंजर में फूल खिला दिये हैं । हरियाली की पूरी पट्टी तैयार हो गयी है इस नहर परियोजना के आसपास । भारत का शायद दूसरा सबसे बड़ा जिला है जैसलमेर । और इंदिरा गांधी नहर परियोजना जैसलमेर में काफी बदलाव ला रही है । HappyIMG_1087

यहां से आगे बढ़ने पर रणऊ नामक एक गांव से ठीक पहले एक पेड़ आया । हमें बताया गया कि जिस किसी को भी मोबाइल पर अपने ज़रूरी कॉल करने हों, फौरन कर लिये जाएं । क्‍योंकि यहां से आगे दिन भर नेटवर्क नहीं मिलने वाला है । हम पाकिस्‍तान की सीमा के क़रीब पहुंचने वाले हैं । 

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रणऊ में ही एक स्‍थान पर फौजियों के पानी का टैंकर गांव में पानी पहुंचा रहा था । विविध भारती की टोली की महिलाओं को जो शरारत सूझी वो आपके सामने है ।

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इन्‍हें पहचानिए । सबसे बांई ओर हमारी शरीके-हयात और विविध भारती की उद्घोषिका रेडियोसखी ममता सिंह, फिर शकुंतला पंडित और सबसे दाहिनी तरफ कमलेश पाठक ।

यहां से थोड़ा आगे बढ़ने पर माता का एक मंदिर नज़र आया, जिसे बी.एस.एफ. के लोग ही संभालते हैं । इस तस्‍वीर में देखिए-मंदिर की दीवार पर ये पंक्तियां लिखीं हैं-

दुश्‍मन जो देखे बुरी नज़र से आंखें निकाल लाएंगे

तिरंगा प्‍यारा देश का हर जगह फहराएंगे ।।

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यहां से हमें भारत पाकिस्‍तान की सीमा पर बनी पोस्‍टों पर जाना था । जिसके बारे में ज्‍यादा कुछ नहीं बताया जा सकता । अगली पोस्‍ट में उस अनुभव की चर्चा 'इशारों' इशारों में की जाएगी । फिलहाल तन्‍नोट की गौरवा गाथा सुनिए, तन्‍नोट इस इलाक़े की ऐसी जगह है जहां सिविलियनों को जाने की इजाज़त है । दरअसल यहां देवी का एक विख्‍यात मंदिर है । 

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फौजियों का कहना है कि सन 1965 की लड़ाई में यहां एक ज़बर्दस्‍त चमत्‍कार हुआ था । इसे फौजी देवी दुर्गा का चमत्‍कार मानते हैं । तन्‍नोट की इसी जगह पर पाकिस्‍तानी फौजियों की विशाल टोली ने तीन ओर से भारतीय सिपाहियों को घेर लिया था । जैसलमेर शहर यहां से तकरीबन एक सौ तीस किलोमीटर दूर था । मदद पहुंचने में तीन दिन लगने वाले थे । भारतीय फौजियों ने इस मंदिर में डेरा डाल रखा था । दिलचस्‍प बात ये है कि पाकिस्‍तानियों ने तकरीबन तीन हज़ार गोलियों और मोर्टार की बारिश कर दी तन्‍नोट के इस मंदिर पर । लेकिन इनमें से एक भी कोई नुकसान नहीं कर पाई । हां केवल एक गोली ऐसी थी जिसने एक ऊंट को धराशाई कर दिया था । फौजी मानते हैं कि ये सब तन्‍नोट राय देवी की कृपा थी । कैसे गोलियों और मोर्टार की इस बारिश का कोई असर नहीं हुआ--इस सवाल के आगे वैज्ञानिक-तर्क भी ख़ामोश नज़र आते हैं । आप सोचेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है । देखिए इस तस्‍वीर में, तन्‍नोट के मंदिर में उस गोला-बारूद को सजाकर रखा गया है । यहां 1965 की जंग में शामिल फौजियों की तस्‍वीरें भी लगी हुई हैं । 

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जीवन में पहली बार मैंने ऐसा मंदिर देखा जिसे सीमा सुरक्षा बल के लोग ही संभालते हैं । भारत-पाक सीमा पर जाने से पहले जल्‍दी में मोबाईल कैमेरे से खींची गयी इस तस्‍वीर को देखिए, तस्‍वीर की क्‍वालिटी भले ठीक ना हो लेकिन यहां आप देखेंगे कि वर्दी में फौजी हारमोनियम पर संभाले भजन गा रहे हैं । मंदिर का पुजारी भी बी.एस.एफ. के स्‍टाफ़ में से ही है ।

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यहां फौजियों का तांता लगा रहता है । राजस्‍थान के इस मुश्किल हिस्‍से में तैनात फौजी तन्‍नोट में माता के इस मंदिर को बहुत मानते हैं । उनका कहना है कि माता के रहते उनका बाल भी बांका नहीं हो सकता । यहां वो और उनकी टोली सुरक्षित है । यहां की एक ख़ासियत है जनता के बीच प्रचलित एक मान्‍यता । कहते हैं कि तन्‍नोट माता के दरबार में अपनी मन्‍नत मांगते हुए एक रूमाल बांध देना चाहिए । आपकी इच्‍छा ज़रूर पूरी होती है । देखिए लोगों ने किस तरह रूमालों का अंबार लगा रखा है ।

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इस मंदिर के ठीक सामने तन्‍नोट विजय स्‍मारक भी है । सीमा सुरक्षा बल और सेना के लिए इसका अपना महत्‍त्‍व है । ये रहीं तन्‍नोट विजय स्‍मारक की तस्‍वीरें ।   

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अगली पोस्‍ट में पढि़ये भारत-पाकिस्‍तान सीमा पर फौजियों से हुई बातचीत के दिलचस्‍प अनुभव । और उसके बाद होगी लोंगेवाल-बॉर्डर-पोस्‍ट की शौर्य-गाथा ।

पिछली पोस्‍ट पर विकास का कहना था कि यात्रा-विवरण की पोस्‍टें लंबी हो रही हैं, ज़रा छोटी कीजिए । दिक्‍कत ये है कि एक बार में अगर एक अध्‍याय निपटाना है और वो भी तस्‍वीरों के साथ, तो इतनी लंबाई तो हो ही जाएगी । इस बारे में आपका क्‍या कहना है ।

Saturday, February 16, 2008

जैसलमेर यात्रा दूसरा भाग-- रामगढ़ में संगीत संध्‍या और स्‍थल रिकॉर्डिंग ।

यात्राएं मुझे हमेशा से पसंद रही हैं । बचपन में सबसे मज़ेदार होती थी नानी के घर जाने की यात्रा जिसमें भोपाल से दमोह जाया जाता था । वो भी भोपाल-बिलासपुर एक्‍सप्रेस से । सुबह डिपारचर और शाम तक मंजि़ल पर पहुंच जाना । बचपन की ये यात्राएं इन अद्भुत यात्राओं का ब्‍यौरा आगे कभी तरंग पर दिया जाएगा । लेकिन फिलहाल तो मैं आपको अपनी जैसलमेर-जोधपुर यात्रा के बारे में बता रहा हूं । और ये इस यात्रा-प्रसंग की दूसरी कड़ी है । आपको याद होगा कि पिछली पोस्‍ट में मैंने आपको रामदेवरा के बारे में बताया था । जहां रामदेव पीर की समाधि है । रामदेवरा से पोखरन होते हुए हम रामगढ़ पहुंच गये ।

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रामगढ़ एक छोटा-सा क़स्‍बा है, जिसके एक हिस्‍से से आगे सिविलियन्‍स / आम नागरिकों को जाने की इजाज़त नहीं है । ये सीमा सड़क संगठन की बनाई सड़क है जो भारत पाकिस्‍तान की सीमा पर जाती है । इस वीरान इलाक़े में सीमा सुरक्षा बल ने अपना एक क़स्‍बा जैसा बसा रखा है । बंजर-बयाबान में एक शानदार जगह । यहीं था हमारा ठिकाना ।

.... कहते हैं कि बी.एस.एफ. या सेना के सीमाओं पर तैनात इन प्रहरियों के दो अभिन्न: मित्र होते हैं---एक रायफल और दूसरा रेडियो

जिस शाम हम वहां पहुंचे तापमान दो डिग्री के आसपास था । मारे ठंड के कुल्‍फी सी जम गयी । लेकिन टोली बनाकर यात्रा करने में एक सनसनी होती है, एक जोश होता है । आप सब कुछ सहन कर लेने की स्थिति में होते हैं । हमारा शेड्यूल ऐसा था कि जाते ही काम पर जुट जाना था । जैसा कि आपको पहली कड़ी में बताया कि हमें बी.एस.एफ़. के लिए एक संगीत-संध्‍या का आयोजन भी करना था और साथ में कई फौजियों की सिलसिलेवार रिकॉर्डिंग भी करनी थी । यानी पर्यटन और काम का पेचीदा-संयोजन था ये सफ़र ।

सबसे पहले संगीत संध्‍या की रिहर्सल शुरू हुई । इसके समानांतर दो अलग अलग टोलियां अपनी अपनी रिकॉर्डिंग्‍स के लिए निकल पड़ीं । जब मैं अपनी रिकॉर्डिंग्‍स करके रिर्हसल हॉल में पहुंचा तो बशीर बद्र की ग़ज़ल का ये शेर सुनाई पड़ा ।

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे

बहुत तलाश किया कोई आदमी ना मिला ।।

रिहर्सल के बाद की वो रात थोड़ी गप्‍पों और शरारतों में बीती । और अगली सुबह जब हम टहलने निकले तो ये नज़ारा था ।

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इस शाम संगीत-संध्‍या होनी थी । बी एस एफ की टोली और हमारी टोली के कुछ लोग लगातार रिहर्सलों में बिज़ी थे । और बाक़ी लोगों को अपनी अपनी तयशुदा रिकॉर्डिंग्‍स करनी थी । इसलिए मैं पहुंचा बी.एस.एफ़ के नौजवानों के बीच 'यूथ एक्‍सप्रेस' कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग करने के लिए । जिस हॉल में हमें रिकॉर्डिंग करनी थी वहां आवाज़ काफी गूंज रही थी इसलिए मैंने इन नौजवानों से कहा कि चलो खुले मैदान में रिकॉर्डिंग की जाए । फटाफट सारी टोली गुनगुनी धूप से नहाए इस मैदान में जमा हो गयी ।

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दिलचस्‍प बात ये थी कि अभी तक हमारा आपसी परिचय नहीं हुआ था । लेकिन जैसे ही सभी को कार्यक्रम का स्‍वरूप समझाने के लिए मैंने 'ब्रीफ' करते हुए अपना परिचय दिया तो कुछ आंखों में परिचय की चमक नज़र आई । कहते हैं कि बी.एस.एफ. या सेना के सीमाओं पर तैनात इन प्रहरियों के दो अभिन्‍न मित्र होते हैं---एक रायफल और दूसरा रेडियो । ये वो बंदे हैं जो रेडियो की हर आवाज़ को पहचानते हैं । उससे मुहब्‍बत करते हैं, उसके साथ अपने सुख-दुख बांटते हैं । मैं आपको बता दूं कि विविध भारती के जयमाला और जयमाला संदेश कार्यक्रमों में अगर कहीं से सबसे ज्‍यादा चिट्ठियां आती हैं तो वो बी.एस.एफ. की बटालियनें ही हैं । images

दूर तक फैली वीरान बंजर सरज़मीं पर कोई साथी नहीं होता, बैरक में लौटें तो वही वही चेहरे, वही वही बातें....थोड़े दिन में तो बातचीत के विषय भी खत्‍म हो जाते हैं । ऊपर से मौसम की मार । सर्दियों में हड्डियां जमा देने वाली ठंड और गर्मी में पचास डिग्री पर तपता रेगिस्‍तान । बिजली की समस्‍या अलग । छुट्टी साल में एक बार । कड़क अनुशासन ।

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मैंने देखा कि इन हालात में भी ये लोग जिंदगी को जीना जानते हैं । जब मौक़ा आता है तो जमकर नाच-गाना होता है । स्‍पोर्ट्स का जुनून है बी एस एफ के इन जवानों में । मैंने जिन जवानों से बातें की उनमें से कई तो बी एस एफ के साथ साथ भारत की राष्‍ट्रीय टीम में भी खेल चुके हैं । फुटबॉल, वॉलीबॉल, जिम्‍नास्टिक्‍स और तैराकी के खिलाड़ी मिले मुझे वहां पर । बी.एस.एफ. में खेलों के कोटे में भर्तियां भी खू़ब होती हैं ।

दिलचस्‍प बात ये थी कि वहां एक मिनी-भारत नज़र आया । कुछ जवान सुदूर कश्‍मीर से थे तो कुछ बंगाल और उड़ीसा से, कुछ मेघालय और मणिपुर से...तो कुछ थे म.प्र. उत्‍तरप्रदेश और बिहार और राजस्‍थान के । सबने अपने अपने इलाक़े के गीत सुनाए । सबने अपनी पसंद के गानों की फ़रमाईश की ।

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फिर बीच में पता नहीं कैसे होड़ लग गयी रेसिपीज़ बताने की, फिर तो किसी ने बंगाली रसगुल्‍ला बनाना सिखाया तो किसी ने माछेर झोल । बड़ा हंसी-ठट्ठा हुआ । कुछ लोगों ने अपने परिवार के नाम कुछ संदेस भी रेडियो के ज़रिए दिए । और जैसे ही हमने रिकॉर्डिंग खत्‍म करने की घोषणा की फौजयों ने हमारी टोली को घेर लिया तस्‍वीरों के लिए ।

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उन्‍होंने हमें ये भी बताया कि किस तरह रेडियो इस वीराने में उनकी जिंदगी का अहम हिस्‍सा है । रेडियो पर वो क्‍या-क्‍या सुनना चाहते हैं । हां कईयों ने मुझसे कहा कि आपकी आवाज़ से हम आपकी जो तस्‍वीर बनाते थे वो आपकी शख्सियत से ज़रा भी मैच नहीं करती । हमने तो सोचा था कि यूनुस ख़ान कोई मोटे-से, काले से, बुजुर्ग से व्‍यक्ति होंगे ।

जब हम वापस अपने गेस्‍ट हाउस लौटे तो पाया कि संगीत संध्‍या वाली टोली धूप सेंकते हुए रिहर्सल कर रही है । रिहर्सल करती रेडियोसखी ममता ।

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जब सूरज ढला तो हुआ संगीत संध्‍या का आग़ाज़ ।

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और ये रहे संगीत संध्‍या के चुनिंदा चित्र । कमल शर्मा और ममता सिंह संचालन करते हुए

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हमारे रिकॉर्डिंग इंजीनियर्स ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग करते हुए ।

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बी.एस.एफ. के सदस्‍यों की प्रस्‍तुति

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यथा नाम तथा रूप: शाहनवाज़

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एक तरफ शाहनवाज़ दूसरी तरफ एक कश्‍मीरी फौजी बीच में क़द-मिलाते-अपन ।

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अगले दिन हमें जाना था रणऊ होते हुए तन्‍नोट और वहां से आगे सीमा पर । इन जगहों से जुड़ी कुछ अमर दास्‍तानें हैं ।

जिनका ब्‍यौरा अगली कड़ी में ।

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