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Tuesday, February 7, 2012

ग्‍लोबल पोज़ीशनिंग.....

मुझे हमेशा लगता रहा है और अपने अनुभव की बात है कि बहुत उदास हों या बहुत खुश भी हों तो कविताएं और गीत-संगीत के ज़रिये अपने भीतर के दरिया को ख़ाली किया जा सकता है, जो कभी उफनता है तो कभी इतना धूसर और मलिन हो जाता है....जैसे एक नाउम्‍मीद और तटस्‍थ बुजुर्ग। फिल्‍मी गीत, ग़जलें और अलबम, कविताएं.....अतीत के किसी एक बिंदु की तरफ एक सीधी रोशन लकीर खींचते हैं। मानो मन का ग्‍लोबल पोज़ीशनिंग सिस्‍टम हों या कोई लाईट-हाउस हो जो भटके हुए जहाज़ को दिखाते हों कि ये है तुम्‍हारा गंतव्‍य।

इस मायने में कविताएं और गीत अचानक बेशक़ीमती बन जाते हैं। रात के सर्द सन्‍नाटे में अचानक चली आई कोई आवारा याद जब मन की खिड़की के कांच से नाक सटाए मुंह चिढ़ा रही होती है तो उस लम्‍हे को कोई कैसे व्‍यक्त करे।  भला हो कि कभी मन्‍ना डे तो कभी येसुदास तो कभी रहमान भी ऐसे मौक़ों पर साथ आ जाते हैं। कभी साईं ज़हूर, तो कभी रेशमा, कभी बीटल्स, कभी भूपेन हजारिका तो कभी फरीद-अयाज़....जाने कितने कितने स्‍वर। ऐसे ही मौक़ों पर साथ आते हैं जाने कितने कितने कवि। महादेवी कभी कहती हैं--'चिर सजग आंखें उनींदी आज कैसा व्‍यस्‍त बाना' तो कभी 'प्रसाद' याद दिलाते हैं--'सब जीवन बीता जाता है/ धूप छांह के खेल सदृश्‍य/ सब जीवन बीता जाता है'। कभी यूं भी होता है कि केदारनाथ सिंह की पंक्ति बताती है कि तुम यही तो कहना चाहते थे--'तुम दिखीं कि जैसे कोई बच्‍चा सुना रहा हो कहानी/ तुम हंसीं जैसे तट पर बजता हो पानी'।

कह नहीं सकते कि कब कौन सी कविता या कौन से गीत की पंक्तियां आपको सहला कर या कोंच कर चली जायेंगी। ज़रा सोचिए कितना भला अहसास होता है जब अचानक कैफी का लिखा जुमला ज़ेहन में कौंध जाता है --'ओ सजनी सुख रजनी' 'ओ रसिया मन बसिया'। या अभी-अभी ज़ेहन पर उकेरा इरशाद कामिल का जुमला--'हो मुझपे करम सरकार तेरा/ कर दे मुझे मुझसे ही रिहा'। और ये भी कि--'क्‍यूं सच का सबक़ सिखाए/ जब सच सुन भी ना पाए/ सच कोई बोले तो तू / नियम क़ानून बताए/ तेरा डर/ तेरा प्‍यार/ तेरी वाह/ तू ही रख'। 

कभी भी कहीं भी पढ़ी पंक्तियां मन के किसी कोने में 'स्‍टोर' हो जाती हैं। और फिर 'रिट्रीव' कब हों कुछ पता नहीं। आसकरण शर्मा का कोई गीत कभी विविध भारती पर सुना था और अब अकसर झांक जाता है--'दुख चंदन होता है/ जिसके माथे पर लग जाये/ वो पावन होता है'। यूं ही जयपुर के दुष्यंत का एक शेर अचानक ज़ेहन में कौंध जाता है--' बड़े शहरों में अक्‍सर ख्‍वाब छोटे टूट जाते हैं... बड़े ख्‍वाबों की खातिर शहर छोटे छूट जाते हैं'। सुरैया तो अकसर ही गूंजती हैं, सुरैया एक शीरीं शरबत हैं जिसमें आंसुओं का नमक घुला है। 'ये कैसी अजब दास्‍तां हो गयी है/ छिपाते छिपाते बयां हो गयी है'।  

साईं ज़हूर 'अल्‍ला हू' करते हुए अकसर यूं याद आते हैं जैसे मरीन ड्राइव पर डुबकी लगाता सूरज अपनी लाली समंदर पर छिडक जाता है।

ये सब ना होते तो कितने अकेले होते हम। 

Monday, August 31, 2009

'गणपति-विसर्जन' : तस्‍वीरें और बातें ।

मैं मुंबई के जिस हिस्‍से में रहता हूं उसे गोराई रोड कहते हैं । इस इलाक़े का अंत गोराई खाड़ी पर होता है । चूंकि ये खाड़ी है इसलिए ज़ाहिर है कि 'गणपति-विसर्जन' का ये एक अच्‍छा ठिकाना है । और कई वर्षों से यहां
'गणपति-विसर्जन' होता आ रहा है । अभी दो दिन पहले गौरी-विसर्जन का दिन था । और सबेरे-सबेरे ही महाराष्‍ट्र राज्‍य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हमारे मोबाइल फ़ोन पर ये संदेस चिपका दिया था ।

Ganpati Bappa Morya. Adverse effects of noise pollution: Loss of hearing, heart disease. Have sound-less festival with dignity.

ज़ाहिर है कि तमाम मुंबई वासियों के पास ये संदेश पहुंचा होगा । उनके पास भी जिन्‍होंने 'शोर' करने की सभी तैयारियां पूरी कर ली थीं । बहरहाल हमारा मुद्दा फिलहाल शोर नहीं है क्‍योंकि उससे मुक्ति पाना असंभव ही दिख रहा है । आईये आपको दिखाएं कि 'गौरी-विसर्जन' के दिन क्‍या हो रहा था गोराई खाड़ी के आसपास ।

गणपति बप्‍पा को विदा करने के लिए आए हुए लोगों का भी 'वर्ग' (क्‍लास) साफ़ नज़र आता है । गणपति हाथ ठेलों से लेकर कारों और ट्रकों तक में विसर्जन के लिए लाए जाते हैं । आसपास के घरों के गणपति हाथों से ही ले जाए जाते हैं ।

 

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गणपति-बप्‍पा को विदा करने के लिए लोग गाजे-बाजे के साथ आते हैं । चाहे बच्‍चे हों या बूढ़े, पुरूष या महिलाएं सभी बेफिक्री से नाचते हैं । दूसरे शहरों में शायद आपको ऐसे विसर्जनों में घरों की महिलाएं नृत्‍य करती नहीं दिखेंगी, पर इस मामले में मुंबई 'बिंदास' है ।

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ऐसे समय में ढोल-ताशे बजाने वालों की 'मौज' रहती है । वो बहुत ऊंचे दामों पर बहुत कम समय के लिए उपलब्‍ध होते हैं । सामान्य घरों के गणपति को इस तामझाम के बिना ही सिराने ले जाए जाते हैं ।

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यहां 'प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड' के सारे निवेदन रोते-कलपते नज़र आते हैं । ख़ैर बाजे-वाले इतने प्रोफेशनल होते हैं कि तयशुदा समय से एक सेकेन्‍ड भी ज्‍यादा नहीं बजाते । इधर समय खत्‍म उधर सामान समेट कर अपनी अगली मंजिल की तरफ रवाना ।

IMG_3836-1 'गणपति-बप्‍पा' को सिराने से पहले उनकी बहुत ही भावुक-आरती की जाती है । खाड़ी के पास एक सड़क का पूरा किनारा इसी काम आता है । क़तार में सभी लोग अपने-अपने गणपति-बप्‍पा की आखिरी आरती करते हैं । ऐसा ही एक परिवार गणपति और गौरी को विदाई दे रहा है ।  यहां आपको इन लोगों की आंखों में छलकते आंसूं नहीं दिखेंगे ।

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दरअसल मुंबई में अलग-अलग दिन गणपति-विसर्जन होता है । सबसे जल्‍दी वो लोग गणपति को विदा करते हैं जो 'डेढ़ दिन' के लिए गणपति को अपने घर विराजते हैं । इसके बाद लगभग हर दूसरे दिन गणपति की विदाई होती है । यानी लोग अपनी श्रद्धा और अपने सामर्थ्‍य के मुताबिक़ गणपति-स्‍थापना करते हैं ।

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इस साल मुंबई महानगर पालिका ने कुछ खास इंतज़ाम किए थे । सजावट की सारी सामग्री और नारियल को 'विसर्जन' से पहले ही जमा करने के लिए एक 'गार्बेज-ट्रक' तैनात था ।

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ज़रा इस ट्रक के उन कोनों पर नज़र डालिए जिन पर आपकी दृष्टि शायद इस तस्‍वीर में ना गयी हो । सजावटी सामग्री कहां टंगी है देखिए ।

IMG_3823-1और ज़रा इन्‍हें भी देखिए ।

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गणपति गेला---रह गय खाली ठेला IMG_3825

मुंबई महानगर पलिका के स्‍टॉल पर स्‍वाइन फ्लू का असर देखिए इस बैनर पर ।
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यहीं नज़र आए अनिरूद्ध बापू के disaster management से जुड़े लोग

IMG_3829हां मुंबई महानगर पालिका आपतकाल के लिए क्‍या इंतज़ाम करती है ज़रा उस पर भी नज़र डालिए ।

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पिछले कुछ दिनों से ये क्रेन यहीं विराजी हुई है । इसके ड्राइवर और बाकी कर्मचारी कहीं चाय-तंबाकू-गुटके में लीन होंगे । इस तस्‍वीर के समय यहां तो नहीं हैं ।

अब ज़रा इन्‍हें देखिए । इतने तामझाम और मस्तिष्‍क-बिगाड़ू शोर के बीच ये महाशय ना केवल बुलबुले बना रहे हैं बल्कि दूसरों को भी इसका 'सामान' बेच रहे हैं ।

IMG_3828और इसी दौरान ये बालक जब खड़े-खड़े थक गया तो इसने अपने 'वाहन' पर सुस्‍ताने का निर्णय किया है । बेचारा कब तक खड़ा रहे ।
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गुब्‍बारे बेचने वाला एक अन्‍य बालक समझ गया है कि यहां तो सब नाच-गाने में लीन हैं । बेहतर है कि वो कॉलोनी की तरफ जाकर अपनी बिक्री करे ।

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गणपति-विसर्जन देखना बेहद दिलचस्‍प अनुभव है । इस भीड़ में आप निपट अकेले होते हैं । आप 'दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं, बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीददार नहीं हूं' वाली स्थिति में होते हैं । और अगर आप उस इलाक़े के आसपास रह रहे हों जहां 'गणपति विसर्जन' होता है तो अगली सुबह का नज़ारा देखने लायक़ होता है । इस बारे में मैं क्‍या कहूं.....कवि अनूप सेठी की सुंदर कविताएं इस बारे में बहुत कुछ कहती हैं । अपनी लंबाई में ये पोस्‍ट 'फुरसतिया' मिज़ाज तक पहुंच रही है पर इन कविताओं को साझा करने का मोह हम छोड़ नहीं पा रहे हैं । कविताएं कविता-कोश से साभार । 


गणपति-विसर्जन

 

1.
किसी महासमर के बाद का विकट सन्नाटा है
आसमान का काला मनहूस तरपाल
समुद्र पर गिरा हुआ
वैसा ही गाढ़ा चीकट पानी
भीतर तक छुपता चला गया
रिसती हुई सीली रेत तट पर अकेली
क्षत विक्षत अक्षौहिणी को धारे हुए
कल आधी रात तक थे गणपति अनादि अनंत जीवंत
मद मस्त विदा करके गया जनता जनार्दन
उसके बाद कैसी हुई विसर्जन की मुठभेड़
आसमान पाताल एक हो गए
रह गए देवताओं के कहीं धड़ कहीं मुंड
रेत में धँसे हुए
इन मिट्टी के ढेलों में नहीं रही घुल जाने की भी ताकत
रहे जो हर साल की तरह ग्यारह दिन दुनिया भर को बिसरा के साथ
सो रहे हैं लौट के घरों में निश्चिंत नीम बेहोशी की नींद
किसी महासमर के बाद का विकट सन्नाटा है
धीरे धीरे सिर उठाने लगा है आसमान
उसके फटे हुए पग्गड़ में
सूरज चुभोने लगा है सलेटी सिलाइयां
निढाल पड़े सागर के मुंह से निकला बहुत सारा झाग
बहुत हिम्मत करके फैलाई उसने बांह
मिट जाएँ तट के अवशेष
दुनिया देख ले उससे पहले
समरांगण बन जाए फिर से तफरीह का मैदान।

2.


साँस रोक कर चुपचाप लेटी है सड़क
उसकी बगल में बहुत से लोग बेसुध सोए पड़े हैं दूर-दूर तक
भोर का कलरव शुरू हो गया है
सड़क नींद में खलल नहीं डालना चाहती
गणपति विसर्जन के मेले में मीलों लंबी सड़क पर
देर रात तक बनाए इन जुझारुओं ने
शुध्द हिंदुस्तानी खिलौने और पकवान
और बेचकर सो गए वहीं
बारिश शुरू हुई तो ओढ़ लीं प्लास्टिक की चादरें
जिन पर सजीं थीं कल दुकानें
गणपति भी घड़े गए जितने इस बरस
ढोल तासों की पगलाई ताल पर
भक्तों ने भी उढ़ेल डाले उन पर साल भर के सारे दुख संताप
जब डाले गए गणपति समुद्र की गोद में
दुख और क्रोध और अधूरेपन तमाम
उतर गए अरब सागर में
घुल गए नमक की तरह हिंद महासागर में
इतना घना और विशाल था सामान
सारी रात लगा दी सागर ने समेटने में
उछल उछल कर बिखरा सड़क पर हाहाकार पसीने से भीगा हुआ
टनों अबीर और शोर घुमड़ता रहा घंटों चंदोवे की तरह
सड़क में धीरज सागर से कम नहीं
सोख लिया सब रात ही रात में
दूध और डबलरोटी की गाड़ियाँ घूँ-घूँ गुज़रने लगी हैं
सड़क कुनमुना के सीधी हो गई है
बसें भी चल पड़ेंगी ज़रा देर में
फिर सिग्नल आँखें खोलेंगे
तब तक शुरू हो चुकी होगी सड़क के कुनबे की रेलमपेल।


बॉटमलाइन
आज़ादी की लड़ाई में 'तिलक' ने 'गणेशोत्‍सव' का जो रचनात्‍मक-उपयोग किया था आज छह दशक बाद हम उसे एकदम-से भूल गये हैं । 'गणेशोत्‍सव' इस महानगर में अटूट 'आस्‍था' और हड़बड़ाए बदहवास जीवन में 'थोड़े मज़े' लेने का पर्व बनकर रह गया है ।

Saturday, August 22, 2009

उफ़ परसाई हाय परसाई ।

जबलपुर से हिमांशु दादा ( हिमांशु रॉय ) का मेल आया है । उन्‍होंने सूचित किया है कि बाईस अगस्‍त को यानी आज के दिन जबलपुर इप्‍टा 'विवेचना' द्वारा परसाई जी का जन्‍मदिन मनाया जा रहा है । ये ऐसे मौक़े होते हैं जब जबलपुर विकलता से याद आता है । जब मैं जबलपुर में होना चाहता हूं । दरअसल परसाई और विवेचना जबलपुर के दो ऐसे सूत्र हैं जिनसे जुड़ाव की मीठी यादें अचानक ही ताज़ा हो जाती हैं ।

परसाई को सबसे पहले मध्‍यप्रदेश में स्‍कूल के दिनों में बालभारती या सहायक वाचन में पढ़ा था । वो रचना थी 'सदाचार का ताबीज़' । और दूसरी रचना थी 'टॉर्च बेचने वाला' । तब इतनी समझदारी नहीं थी कि परसाई की रचनाओं के मर्म को समझ पाते । लेकिन इसके बाद तकरीबन नौंवी दसवीं कक्षा वाले सागर शहर के दिनों की बात है । अचानक हमें 'परसाई से प्रेम' हो गया । स्‍कूल के उन दिनों में हमारी एक शानदार मंडली हुआ करती थी । आशीष, पी. राजेश्‍वर राव, संजीव, नवीन और कुछ हद तक श्रवण और भरत वग़ैरह इस मंडली के सदस्‍य थे । उन दिनों हमने 'राष्‍ट्रीय सेवा योजना' यानी NSS ज्‍वाइन कर ली थी । और दिसंबर के महीने में किसी गांव में लगने वाले कैंप में जाते थे । सर्दी के बेहद ठिठुरते इन दिनों में हम सबने सामूहिक रूप से 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र' पढ़ी । स्‍कूल की लाइब्रेरी से निकाली गई ये पुस्‍तक कैसे पढ़ी जाती थी आपको बताते हैं । कोई एक व्‍यक्ति ज़ोर-ज़ोर से पढ़ता था और बाक़ी सारी सुनते थे । सराहना करते थे । तब हमने व्‍यंग्‍य को समझा । तब से हमारी ये राय बनी और आज तक कायम है कि परसाई जैसी राजनीतिक सामाजिक समझ और व्‍यंग्‍य को करूणा की हद तक ले जानी की काबलियत किसी भी व्‍यंग्‍यकार में नहीं है ।  उन दिनों हमने शरद जोशी को भी पढ़ा । पर उन पर ज्‍यादा टिक नहीं सके ।

सागर में वेराइटी बुक स्‍टॉल हुआ करता था । जो शायद अब भी है । और यहां बहुधा राजकमल पेपरबैक्‍स की पुस्‍तकों और अन्‍य प्रकाशनों में हमारा सारा जेबखर्च खप जाता था । किताबों की ख़ब्‍त वाले दिन थे । परसाई की बेहद छोटे आकार की पुस्‍तक 'काग-भगोड़ा' तब इतने बार ख़रीदी की पूछिए मत । हर बार कोई मित्र उठाकर ले गया, लूटकर ले गया । बाद में कोई उधारिया ऐसे ले गया कि आज भी हमारे पास उस पुस्‍तक की प्रति शायद नहीं है । 'काग-भगोड़ा' के बाद तो परसाई को पढ़ने की एकदम से लौ ही लग गयी । फिर जबलपुर वाले दिन आए । तब तक परसाई की रचनाओं के ज़रिए जबलपुर के इत्‍ता जान-समझ गए थे कि वहां पहुंचने के बाद लगा--अच्‍छा तो ये है वो नाला जिसका जिक्र परसाई ने उस रचना में किया था । ओह तो ये वो स्‍कूल है जहां परसाई पढ़ाते थे । अच्‍छा अच्‍छा तो ये है वो अड्डा जहां परसाई बैठा करते थे । शहर की पहचान हम परसाई से करते थे ।

हिम्‍मत नहीं थी कि आकाशवाणी की कैजुएली वाले उन दिनों में अपनी बेहद प्रिय 'स्‍ट्रीट-कैट' साइकिल को परसाई जी के घर की ओर मोड़ दिया जाए । लेकिन ये शौर्य हमने दिखा ही दिया एक दिन । और नेपियर टाउन में परसाई जी के घर पहुंच गए । परसाई जी बिस्‍तर पर थे । हमें पता था कि एक दुर्घटना के बाद उनकी यही हालत है । उनसे बातें हुईं । उन्‍हें पता नहीं किस धुन में हमने अपनी 'कविताएं' तक सुना डालीं । ये बात याद करके आज भी गर्दन के पीछे वाले हिस्‍से में झुरझुरी दौड़ जाती है । उन बचकानी कविताओं पर परसाई ने अपनी राय दी । रास्‍ता दिखाया । फिर तीन चार बार की मुलाकात रही परसाई जी के साथ । एक बार तो गणतंत्र दिवस पर आकाशवाणी जबलपुर के लिए विशेष कार्यक्रम तैयार करते हुए हम उन्‍हें रिकॉर्ड करने भी गए । वो रिकॉर्डिंग पता नहीं जबलपुर केंद्र में अब है या
नहीं । फिर विविध भारती वाले दिन आ गये जीवन में । मुझे याद है कि बंबई से ऑडीशन देकर लौटा ही था कि उसी दिन जबलपुर आकाशवाणी के केंद्र निदेशक क़मर अहमद का फोन आया । परसाई जी नहीं रहे, उनकी 'अंतिम-यात्रा' को कवर करना है । फौरन आओ । जाने क्‍या धुन थी । आनन-फानन पहुंचे । और हमने परसाई को पंच-तत्‍त्व में विलीन होते देखा ।

परसाई से हमारा वास्‍ता देशबंधु के उस कॉलम 'पूछिये परसाई से' भी था । जिसमें वो पाठकों के सवालों के जवाब देते थे । बाद में एक लघुपत्रिका ने ( जिसका नाम याद नहीं आ रहा है ) इस कॉलम को संग्रहीत किया अपने एक विशेष अंक में । वो भी कोई 'उधारिया' ले गया । और हम फड़फड़ाते रहते हैं उस अंक की याद में । किसी भाई-बंधु को उस पत्रिका का अता-पता हो तो कृपया उसकी छायाप्रति ही उपलब्‍ध करा दें । हम आपके आजीवन आभारी रहेंगे ।

जबलपुर में विवेचना अरूण पांडे के निर्देशन में 'परसाई-कोलाज' करती है । बंबई में कुछ बरस पहले इसके छप्‍पर फाड़ शो हुए थे । बंबईया थियेटर ग्रुप भी दंग रह गए थे इन्‍हें देखकर । अगर आपने नहीं देखे तो अब देखिएगा । एक और पुस्‍तक की याद आ रही है अरूण पांडे ने परसाई की रचनाओं से 'कोटेशन्‍स' निकालकर उन्‍हें एक जगह संकलित किया था । वो पुस्‍तक भी किसी उधारिये की भेंट चढ़ गयी । अदभुत था वो संकलन ।

परसाई ने हमारे जीवन पर गहरा असर डाला । परसाई ने हमें 'सेन्‍स ऑफ ह्यूमर' ही नहीं दिया । उन्‍होंने हमें सिखाया कि समाज की विडंबनाओं और वितृष्‍णाओं को देखकर बाल नोंचने या कपड़े फाड़ने की बजाए उन पर चिकोटी काटी जा सकती है । परसाई चुटकुलेबाज़ व्‍यंग्‍य परंपरा से नहीं आते, वो अपने सामाजिक और राजनीतिक सरोकारों के तामझाम के साथ आते हैं । वो हमें सोचने को विवश करते हैं । परसाई को नमन करते हमारा माथा नहीं घिसता । परसाई का जिक्र करते हमारे शब्‍द कम नहीं पड़ते । परसाई का नाम लेते हमारी जीभ नहीं थकती । एक ही अफ़सोस है.. हम दुनिया में थोड़े दिन और पहले आते तो परसाई का साथ और ज्‍यादा मिलता ।

परसाई की आत्‍मकथात्‍मक रचना 'गर्दिश के दिन' हमें बेहद प्रिय है । परसाई के एक अनन्‍य प्रेमी है 'फुरसतिया' अनूप शुक्‍ल । उन्‍हीं के ब्‍लॉग पर जबरिया इसे ठेला गया था साल 2006 में । तो यहां चटका लगाईये और पढिये 'गर्दिश के दिन' । नहीं पढ़ा तो इस पुस्‍तक को खोजकर पढ़ें । परसाई ने अपने समकालीनों और मित्रों पर क्‍या ख़ूब लिखा है ।

 

Friday, January 16, 2009

आभा की तहरी ।

बोधिसत्‍व और आभा हमारे लगभग-पड़ोसी ही हैं । लगभग पड़ोसी का मतलब ये है कि ये लोग इसी इमारत या इसी कॉलोनी में नहीं रहते । लेकिन हमारे घरों की दूरी लगभग पांच मिनिट है । लेकिन bodhi cut मुंबई शहर का कुछ मिज़ाज ऐसा है कि मुलाक़ातें यदा-कदा ही होती हैं । पर जब भी होती हैं तो बेहद आत्‍मीय और मुदित कर देने वाली होती है । पिछले बरस विविध-भारती के एक कार्यक्रम 'प्‍यार हुआ इक़रार हुआ' में ये जोड़ा प्रतिभागी के रूप में शामिल था और वहां 'बोधि' के हास्‍य-बोध का ट्रेलर ही नहीं बल्कि पूरी की पूरी फिल्‍म देखने को मिली थी ।

 

बहरहाल..सीधे मुद्दे पर आ जाते हैं । पिछले दिनों आभा ने अपने ब्‍लॉग 'अपना घर' पर जाड़े का जिक्र किया तो हमें भी अपने पुराने 'रज़ाईया' 'मूंगफलिया' और 'कंबलिया' दिन याद आ गये । पर आभा की इस पोस्‍ट में जहां जिक्र था 'तहरी' और 'खिचड़ी' का, वहां हम बुरी तरह 'नॉस्‍टेलजिया' गये । क्‍या करें...हम भारतीय-प्राणियों को 'नॉस्‍टेलजिक' हो जाने की बुरी आदत है...रोग है...असाध्‍य और दुसाध्‍य है । हमने सोचा, चलो एकाध दिन में ये 'नॉस्‍टेलजियाना' कम हो जायेगा और 'मरीज़ का हाल अच्‍छा' हो जायेगा । पर ये क्‍या.....लावण्‍या दीदी ने ये टिप्‍पणी कर डाली आभा की उसी पोस्‍ट पर.....


तहरी .....ये कौन सा व्यँजन है आभा जी ? बता दीजिये -
पहली दफे नाम सुन रही हूँ :) बम्बई की सर्दी तो ऐसी ही होतीँ हैँ -स्वेटर भी शरमा जाये ~~स स्नेह,


लीजिये दिक्‍कत खड़ी हो गई । आभा ने ये पोस्‍ट ठेल डाली । जिसका शीर्षक था 'ये तहरी खिचड़ी की फैशनेबल बहन है' । ज़ाहिर है कि अब हमारा 'नॉस्‍टेलजियाना' दूसरी बीमारी में बदल गया था जिसका नाम है 'तहरियाना' । इसलिए हमने धड़ाक से ये टिप्‍पणी ठेल डाली--


आभा जी चूंकि आप लगभग-पड़ोसन ही हैं--इसलिए हक़ बनता है ये पूछने का--कि 'आपके हाथ की बनी' खिचड़ी की ये फैशनेबल बहन... कब मिल रही है । हम डेढ़ टांग पर तैयार हैं । कब आएं ।


और आभा का मुस्‍तैद जवाब आया कि 'खिचड़ी' यानी मकर-संक्रांति पर आईये । पत्‍नी ममता को भी साथ लाईये । 'मकर-संक्रांति' के दिन जब पूरी मुंबई 'तिळ गुळ घ्‍या, गोळ गोळ बोला' कर रही थी और सड़कों से लेकर हाईवे तक 'वो काटा' 'वो लूटा' चल रहा था... हम किसी तरह मांझे और पतंग-लूटव्‍वल से बचते-बचाते किसी अनिवार्य काम से बांद्रा पहुंचे ही थे कि आभा की ओर से 'ट्रिन-ट्रिन' हुई । 'आप तो खिचड़ी पर आने वाले थे भई' । हम हड़बड़ा गये..क्‍योंकि ये बात दिमाग़ से उतर ही गई थी । हमने स्थिति को संभाला और कहा 'थे नहीं हैं' अभी आते हैं । बांद्रा से फुर्र हुए और ममता जी को घर से लेते हुए हम ये पहुंच गए आभा के घर 'तहरियाने' के लिए ।

IMG_2087 आभा ने बढिया तहरी बना रखी थी । लेकिन जब हमें पता चला कि वे आज 'निर्जला व्रत' हैं, तो बड़ा अफ़सोस हुआ कि हम तो मज़े से 'तहरिया' रहे हैं और जिसने ये सब खेल रचाया....उसे चंद्रमा के निकलने का इंतज़ार करना होगा । बहरहाल बोधिसत्‍व ने मुस्‍तैदी से हमारे संकोच और अपराध-बोध को समाप्‍त किया और वे भी 'तहरियाने' में शामिल हो गए ।

 

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तो इस तरह से हम सभी का 'तहरियाना' या 'खिचडियाना' शुरू हो गया । ज़रा देखिए ममता जी, मुझे और बोधि को भोजन परसकर आभा जी कैसा महसूस कर रही हैं । साथ में हैं 'भानी' जी...जो हमें सबकी 'नानी जी' ज्‍यादा लगती हैं ।

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भानी जी और ममता जी 'फ्रैन्‍ड' हैं । इसलिए ममता ने पहुंचते ही 'भानी' जी से बतियाना शुरू कर दिया । पूछा कि यहां कितनी सहेलियां हैं तुम्‍हारी । तो भानी जी नानी जी का जवाब था--'एक भी नहीं' । ममता जी को माजरा समझ नहीं आया, हैरत हुई, इसलिए सवाल को घुमा कर पूछा । जैसा रेडियो वाले हमेशा करते हैं । एक सवाल का सही जवाब ना मिलने पर घुमा-फिराकर उस सवाल को फिर से दाग़ देते हैं । इस बार सवाल था--तुम्‍हारी कितनी फ्रैन्‍ड हैं भानी । भानी का जवाब था, बहुत सारी हैं । नाम पूछने पर बताया पलक दीदी, अलानी दीदी, फलानी दीदी । ( यानी सारी फ्रैन्‍ड उम्र में बड़ी हैं ) हम सभी बहुत हंसे कि सहेलियां एक भी नहीं हैं, पर फ्रैन्‍ड बहुत सारी हैं । ऐसी हैं ये भानी जी...सबकी हैं नानी जी ।

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आभा की तहरी खाकर बड़ा मज़ा आया । हमने केवल तहरी नहीं खाई बल्कि साथ में 'चंदू हलवाई' की तिल की एक बर्फी़नुमा मिठाई और उड़द की दाल का हलवा भी 'सटका' लिया । ये अलग बात है कि इसकी तस्‍वीर हम नहीं ले पाए । हां भई हमारी ग़लती है..पर चूक गए तो चूक गए । लेकिन 'आभा की तहरी' की तस्‍वीर लेने में हमने कोई चूक नहीं की ।

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अब आप ये सोचने की ग़लती मत कीजिए कि हम बोधिसत्‍व के घर  गए और खा-पीकर सटक लिये । बोधिसत्‍व से हमारी, आभा से ममता की और हम सबकी आपस में ख़ूब गप्‍पें हुईं । ब्‍लॉगिंग से लेकर मौसम, इलाहाबाद, टी.वी.और संक्रांति कितने मुद्दों पर हम बतिया लिए...अब सब बताएं तो कैसे । लेकिन इस शाम को यादगार बनाया बोधिसत्‍व ने । जो आजकल प्रेमचंद की जीवनियां पढ़ रहे हैं । तीन जीवनियां । एक तो है प्रेमचंद के पुत्र अमृत राय की 'कलम का सिपाही' । दूसरी मदन गोपाल जी की लिखी 'प्रेमचंद की आत्‍मकथा' और तीसरी प्रेमचंद की पत्‍नी शिवरानी देवी की लिखी पुस्‍तक 'प्रेमचंद घर में' ।

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बोधि ने इनके कुछ दिलचस्‍प अंश पढ़कर सुनाए और प्रेमचंद के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए तथ्यों पर टॉर्च डाली । इस पूरे प्रसंग में बड़ा आनंद आया । ज़रा बताईये एक अच्‍छे‍ दिन में आपको क्‍या चाहिए । अच्‍छा मेल-जोल, अच्‍छा भोजन, अच्‍छी गप्‍पें, हंसाना हंसाना, पढ़ना लिखना...और क्‍या । ये सच है कि हम गंगा नहीं नहाए, हमने पतंग हीं उड़ाई, पेंच नहीं लड़ाए, मांझा नहीं लूटा...लेकिन क्‍या संक्रात का मतलब बस इतना ही है । भई 'आभा की तहरी' ने तो हमारी संक्रात मनवा दी । आपकी संक्रात कैसी रही...बताईये ।

Monday, August 11, 2008

अभिनव बिंद्रा ने जीता भारत के लिए पहला स्‍वर्ण पदक

                abhinav

 

ये हैं अभिनव बिंद्रा ।

ओलंपिक में व्‍यक्तिगत प्रतियोगिताओं में भारत के पहले स्‍वर्ण पदक विजेता । अभिनव के बारे में बताना ज़रूरी है । पर पहले मैं ये कहना चाहता हूं कि अभिनव की उपलब्धि को देश अपनी उपलब्धि बताकर इतरा ज़रूर ले । खेल मंत्रालय इसे अपनी कामयाबी माने और खेल अधिकारी इस पर सीना चौड़ा कर लें । पर देखा जाये तो ये अभिनव की मेहनत और उसकी लगन की कामयाबी है । वरना क्रिकेट को छोड़ दें तो भारत में बाक़ी खेलों के साथ जैसा सौतेला बर्ताव हो रहा है उससे सभी वाकिफ हैं ।

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28 सितंबर 1983 में जन्‍में 25 साल के इस युवक का ये तीसरा ओलंपिक है । सन 2000 के ओलंपिक खेलों में भाग लेने वाले वो सबसे कम उम्र के भारतीय प्रतियोगी थे । सन 2001 में कई अंतरराष्‍ट्रीय मुक़ाबलों में उन्‍होंने छह मेडल जीते थे । सन 2004 के ओलंपिक में ओलंपिक रिकॉर्ड को तोड़ने के बाद भी अभिनव पदक नहीं जीत पाए थे ।

 

हैरत की बात ये है कि अभिनव ऐसे वैसे युवा नहीं हैं । उन्‍होंने MBA किया है । और उनका अपना व्‍यवसाय है । मैं जानता हूं कि शूटिंग प्रतियोगिताओं में हिस्‍सा लेना आम आदमी के बस की बात नहीं है । ये एक बेहद महंगा खेल है । पर सवाल ये है कि अगर कोई अपने निजी संसाधनों से ट्रेनिंग करता है और अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर जाकर नाम कमाता है तो इसमें बुराई क्‍या है । हां इससे व्‍यवस्‍था की कलई जरूर खुलती है कि मुफ्तिया संसाधन बांटने वाला प्रशासन कुछ उत्‍कृ‍ष्‍ट खिलाड़ी तैयार नहीं कर पाता क्‍योंकि हर कोने में भ्रष्‍टाचार की दीमक लगी है ।

 

अभिनव ने इस साल के ओलंपिक में पुरूषों की दस मीटर के रायफल इवेन्‍ट में 700.5 अंक लेकर स्‍वर्ण पदक हासिल किया है । बार बार मेरे मन में यही बात आ रही है कि एक अरब की आबादी वाले इस देश को इस एक स्‍वर्ण पर ही उन्‍मत्‍त होकर नाचना पड़ रहा है । एक अरब लोगों के पीछे एक स्‍वर्ण । जबकि हमसे बहुत छोटे नन्‍हें नन्‍हें देश कई खेलों में हमसे बहुत आगे हैं । क्‍यों ।

Tuesday, May 20, 2008

वो पलाश के, कॉमिक्‍स के, तिलस्‍म के....गर्मियों के दिन ।

पता नहीं क्‍यों मुझे गर्मियों का ये मौसम बहुत पुराने दिनों की याद दिला देता है । पिछले कई दिनों से मन बचपन की उस दुनिया में घूम रहा है जहां गर्मियां बड़ी तिलस्‍मी हुआ करती थीं । अपना बचपन यूं तो कोई बहुत क्रांतिकारी नहीं रहा, जिसमें आवारागर्दी की बहुत ज्‍यादा गुंजाईश हो.....लेकिन जैसा बीता है उसकी स्‍मृतियों की ऐसी सरगम आजकल छिड़ रही है कि क्‍या कहें ।

याद आते हैं बचपन वो दिन जो भोपाल में बीते । जब छुट्टियों की विकल प्रतीक्षा की जाती थी । योजनाएं बनाई जाती थीं और जब अचानक किसी धमाके की तरह छुट्टियां सामने आ जाती थीं तो सूझता नहीं था कि क्‍या किया जाए । सारी योजनाएं धरी रह जाती थीं । मई जून की वो ऊबी हुई, सुस्‍त, घुटी घुटी सी दोपहर बहुत याद आती हैं, जब घर में मां  को सोते देखकर हम अकसर 'गली डॉक्टर आबिद' वाले उस घर से चुपचाप सटक लिया करते थे । फिर या तो छत पर जाकर कोनों में कीट-पतंगों की प्रतीक्षा करती गिजगिजाहट से भरी छिपकलियों पर नज़र डाली जाती थी, मुहल्‍ले की करामाती नालियों में नावें छोड़ी जातीं । या फिर छत की ओर जाती सीढियों पर पसरकर कॉमिक्‍स पढ़ी जाती थीं । आसपास के छर्रे-मित्रों से कॉमिक्‍स बदल ली जाती थीं । इस तरह दिन में कॉमिक्‍सों की इतनी खुराक हो जाती कि हज़म नहीं होती । फिर जब रात को नींद आती....जो ज़रा देर से ही आती थी....तो कभी मैन्‍ड्रैक की दुनिया में घूम रहे होते थे तो कभी चंद्रकांता-सं‍तति के इलाक़ों में । लगता था कि हम भी ऐयारी सीख लेंगे और अभी चमत्‍कार करने लगेंगे ।

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गर्मियों की दोपहर की वो मासूम आवारागर्दी बहुत याद आती है, जब मुहल्‍ले के बच्‍चे चोरी से फिल्‍म देखने जाते और हम सोचते कि काश हमें भी कभी चोरी से फिल्‍म जाने मिले तो कितना मज़ा आये । वो कार्टून फिल्‍मों और चैनलों के दिन नहीं थे । इसलिए टी.वी. का जीवन में कोई रोल नहीं था । मौज मस्‍ती के नाम पर बस इतना किया जा सकता था कि भरी दोपहर नींद के खुमार में डूबे किसी अलसाए घर की कॉलबेल टन्‍न से बजा दी जाये और चुपके से भाग जाया जाए । या किसी अंकल का स्‍कूटर न्‍यूट्रल पर करके स्‍टार्ट कर दिया जाये और भाग खड़ा हुआ जाए । बेचारा स्‍कूटर घुरघुराता रहे घंटों तक । पता नहीं क्‍यूं कुछ स्‍कूटर बिना चाभी के चालू हो जाते थे तब ।

तब मुहल्‍ले के कुछ घरों में भूत रहा करता था । एक घर तो अभी भी याद है जहां किसी महिला ने खुद को आग लगा ली थी, उस घर को भुतहा घर माना जाता था । पर दिक्‍कत ये थी कि वहां रहने वाले दोनों बच्‍चों को उनके पिताजी ने मां की कमी पूरी करने के लिए हिंद पॉकेट बुक्‍स की किताबों के बड़े बड़े सेट ला दिये थे । बचपन से ही मिज़ाज ऐसा था कि जो छपा हुआ पुरज़ा दिखे उसे ही पढ़ लिया करते थे । यानी समोसे अख़बार के जिस टुकड़े में लपेटकर लाये जाते अपन तेल से तर उस अख़बार को भी पढ़ लेते थे । पता नहीं पुराने अख़बार पढ़ने में क्‍या आनंद आता था । तो धर्मसंकट था । चुड़ैल वाले घर में जायें कैसे । कहीं कुछ हो गया तो । लेकिन आलमारी में जमी प्रेमचंद की किताबों का पूरा सेट आंखों के आगे तैर जाता था । आखिर प्रेमचंद चुड़ैल से जीत गये । छत पर जाकर दोनों घरों के बीच की दीवार को पार करके हम चुड़ैल वाले उस घर में जाते रहे और दोपहरों को प्रेमचंद की किताबों के पूरे सेट को एक एक करके पढ़ते रहे । सोचिए कि प्रेमचंद को उस भुतहे घर में पढ़ना ऐसा होता था जैसे किसी हॉरर फिल्‍म को देखना हुआ करता है । पता नहीं कब कहां से और किस तरह की प्रेतात्‍मा आ जाये, भूतनी, डाकिनी, चुड़ैल । इस तरह चंपक, चंदामामा और मधु-मुस्‍कान में हमने हॉरर मिलाकर पढ़ा ।

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उन तिलस्‍मी दिनों की एक चीज़ और याद आती है । अकसर शाम को पिता गन्‍ने का रस पिलाने ले जाया करते थे । क्‍या माहौल खिंचा रहता था तब गन्‍ने के रस की दुकानों में । खस की पट्टी की बाड़ बनाकर लकड़ी की कुर्सियां और मेज़ें सजाई जाती थीं । शानदार लाल मेज़पोश । मद्धम संगीत और मेज़ पर रखी नमकदानी । बाहर बोर्ड लगा होता था फलानी मधुशाला । बड़े दिलचस्‍प नाम होते थे । और गन्‍ने के उस रस में बार बार नमक छिड़ककर पीने का आनंद दिव्‍य होता था । उन दिनों में थम्‍स-अप हमें कड़वा लगता और उस आदमी की बेची कुल्‍फी बहुत मीठी.....जिसका एक हाथ नहीं था....लेकिन ठेले के नीचे उसने घंटी लगा रखी थी जिसे बजाकर वो अपनी कुल्‍फी की बांग दिया करता था । वो दूधिया कुल्‍फी...गन्‍ने का वो रस....वो चीज़ें आज मैकडोनाल्‍ड और पेप्‍सी की आंधी में जाने कहां बिला गयीं ।

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उन दिनों पिता शाम को अकसर बग़ीचों में ले जाते । अपनी सबसे अच्‍छी पोशाक पहनी जाती । घंटों जूते के तस्‍में बांधे जाते । जो बार बार खुल जाते । फिर बांधे जाते । और पार्क में डूरेन्‍टा की झाडि़यों से बनी दीवारों और आकृतियों को देखकर अजीब-सा लगता । शहर भर के बच्‍चे पार्क में जमा होते । चकरियां, फिरकियां खरीदी जातीं । बुढिया के बाल खाए जाते । 'जॉय आईसक्रीम' और 'क्‍वालिटी आईसक्रीम' खाई जाती ।  पार्क के उस ओर हम देखते कि लिली टॉकीज़ में 'क़ातिलों के क़ातिल' लगी है । या गूंज बहादुर सिनेमा में 'खूबसूरत' लगी है । तिलस्‍मी फिल्‍मों होती थीं ये हमारे लिए । पार्क के दूसरी तरफ छोटा तालाब का पानी छप छप कर रहा होता था और वहीं नज़र आता बोट क्‍लब का ऑब्‍ज़रवेशन टावर । जिस पर चढ़कर हम लोगों को बोटिंग करते देखा करते थे । कभी नाव की सैर करने का मौक़ा जो मिलता तो डर के मारे हालत पतली हो जाती । लेकिन सारा शहर भोपाल के छोटे और बड़े तालाबों के आसपास बने पार्कों में आया करता था ।

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शायद पलाश, कॉमिक्‍स और तिलस्‍मी गर्मियों के वो दिन आज भी मन की दुनिया में कहीं ठहरे हैं । तभी तो मुंबई की बजबजाई सी गर्मी में मैं उन सुहाने दिनों में घूम रहा हूं ।

Wednesday, January 16, 2008

चरखी, चस्‍का और चूना

आज मन कर रहा है कि पतंगबाज़ी से जुड़ी अपनी यादें बांटी जाएं ।

मकरसंक्रांति पर मुंबई का आसमान पतंगों से गुलज़ार है । और मुझे बचपन के दिन याद आ रहे हैं । मेरा पैतृक गांव है हिन्‍डोरिया, जो दमोह से एक घंटे के रास्‍ते पर है । कहते हैं कि मशहूर चित्रकार सैयद हैदर रज़ा हमारे गांव के रास्‍ते में पड़ने वाले अमखेड़ा के रहने वाले थे । वो या उनके पुरखे । सच क्‍या है मालिक जाने या उसके 'रज़ा' जानें । ख़ैर तो पतंग को देखकर हमें याद आ गये बचपन वाले दिन । दरअसल भोपाल में बचपन बीतने की वजह से पतंग से 'नाता' तो बचपन से ही रहा था । पर अपन कुछ ज्‍यादा ही शरीफ़ किस्‍म के थे, इसलिए पतंगबाज़ी के दुस्‍साहसों से ज्‍यादा नहीं गुज़रते थे । पर जब गर्मियों की छुट्टियों में दमोह और हिन्‍डोरिया जाना होता तो वहां पतंगबाज़ी का बुंदेली रंग देखने को मिलता और हम पतंगबाज़ी के समंदर में डुबकी नहीं लगाते थे बल्कि दूर-दूर से ही उसके मज़े लिया करते थे । 

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बहुत बचपन की यादों में हिन्‍डोरिया की यादें भी हैं, छोटा-सा गांव हिन्‍डोरिया, जहां गर्मियों की छुट्टियों में चाचा पतंग उड़ाते और हमसे चरखी पकड़वाते । बहुत छोटी रही होगी तब उम्र । शायद पांच छह साल । चाचा पतंगबाज़ी में दौड़ाते बहुत थे । जैसे चलो पतंग छोड़ कर आओ । या फिर जब घिर्री पकड़ते तो अकसर होता ये कि उनको दनादन ढील चाहिए पड़ती । वो डोर को हल्‍के हाथों से पकड़े रहते और मेरे हाथों में मौजूद घिर्री सायकिल के पहिए की तेज़ी से ढील छोड़ रही होती । और पतंग हिन्‍डोरिया के तालाब के ऊपर आसमान में परवाज़ कर रही होती । नज़ारा शानदार होता था अपने लिये । लेकिन हाथ में घिर्री का तेज़ घूमना हाथों पर बड़ा भारी गुज़रता था । मुझे ये भी दमोह और हिन्‍डोरिया में मैंने जीवन में पहली बार 'मांझा' बनते देखा था । चाचा ने कांच की कुछ बोतलें जमा कीं, लेई तैयार की, कांच पीसा गया और फिर एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक सफेद 'सद्दी'  को बांधा गया, अब इसके ऊपर मांझे का लेप चढ़ाया गया । ये सब बड़ी तन्‍मयता का काम होता था और चाचा के मित्र भी इसमें सहयोग करते । ठेठ बुंदेली में बातें करते और मुझ पर इसलिए हंसते कि ना तो अपन को पतंग बनाते आता है, ना मांझा बनाते और ना ही बुंदेली बोलते । हिन्‍डोरिया के उन ग्रामीण युवकों को लगता कि इन शहरी बच्‍चों का जीवन भी कोई जीवन है । अरे पांच साल के हो गये, मांझा बनाते नहीं आता, कमाल है ।

 

ख़ैर आगे चलकर हमने पतंग उड़ाना तो सीख लिया लेकिन पतंग या मांझा तैयार करने का काम कभी नहीं किया । शहरी बच्‍चों की तरह बाजा़र से पतंग लाते रहे और कन्‍नी बांधकर उसे उड़ाते रहे । बस । लेकिन भोपाल में पतंगबाज़ी का मज़ेदार रंग देखने को मिला । जिस भोपाल में मेरी परवरिश हुई वो आज के भोपाल जैसा नहीं था । उसमें ख़ालिस भोपाली रंग था । बड़े बड़े दरवाजों वाले हवेलीनुमा मकान, परदेदार औरतें, और पतंग के शौकीन लोग । ठहरी ठहरी सी जिंदगी । आज जैसी रफ्तार नहीं थी तब । ये गैस त्रासदी से कुछ सालों पहले की बात है । बहरहाल....भोपाल की पतंगबाज़ी में दिलचस्‍प ये था कि यहां पतंग केवल बच्‍चों, किशोरों या युवकों तक सीमित नहीं थी । यहां तो बुजुर्गवार भी पतंग उड़ाया करते थे । और वो भी कैसे । शर्तें लगाकर । मैदान में पतंगबाज़ी चल रही है । दो बुजुर्गवारों का मुक़ाबला हो रहा है । बाक़ी तमाशबीन हैं । छोटे बच्‍चे ज़रा इधर उधर के कोने पकड़कर अपनी पतंगें उड़ा रहे हैं । नौजवान दो ख़ेमों में बंट गये हैं । किसी शातिर पतंगबाज़ नौजवान ने घिर्री संभाल ली है । आंख के इशारे समझकर चरखी को संभाल रहा है । ये चरखी टू इन वन है । जी हां बीच बीच में जो चूने का चस्‍का बुजुर्गवार ले रहे हैं, वो भी तो इसी चरखी पर एक सिरे पर लगा हुआ है । जैसे ही 'मियां' को टेन्‍शन होता है, वो चूना कैसे खाते हैं ज़रा देखिए---नज़रें.........पतंग पर, हाथ सधे हुए, डोरी को संभाल रहे हैं......पेंच लड़ाने के बीच के राहत के एक दो सेकेन्‍ड हैं ये । मियां जी ने बिना देखे अपने बांये हाथ को थोड़ा फैलाया, चरखी पकड़े 'जमूरे' की समझ में आ गयी, उसने चूने वाला सिरा थोड़ा आगे कर दिया । मियां जी ने टटोलते हुए चूना चरखील से निकाला........अरे कमबखत पेंच लड़ा रहा है....दोनों हाथों डोरी पर......अंगूठे में चूना लगा है.....मियां जी ने डोरी से वैसे ही पेंच लड़ाए जैसे एक माहिर ट्रक ड्रायवर रफ्तार में ट्रक मोड़ता है । और फिर सामने वाली की पतंग को 'वो काटा'......और चूने को वो चखा........जिस बात को कहने में इतने सारे वाक्‍य का स्‍क्रीनप्‍ले लग गया.......उसमें महज़ चार पांच सेकेन्‍ड लगते थे । कहने का मतलब ये है कि 'बन्‍ने ख़ां भोपाली' पेंच लड़ाते हुए भी चूना चखने का मौक़ा निकाल लेते थे । यहां थोड़ा विषयांतर करते हुए बता दूं कि 'हॉकी का मक्‍का' कहे जाने वाले भोपाल में उस दौर के हॉकी के खिलाड़ी भी अपनी हॉकी पर थोड़ा 'चूना'  चिपकाए रहते थे । और ड्रिबल करते हुए बीच में चूना चख लेते थे । यानी ये चूना चखा, ये आगे बढ़े, चार पांच खिलाडि़यों को चकमा दिया, डी में घुसे और ये गोल.....और ये चूना......।

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उन दिनों के भोपाल में 'पेंच लड़ाते हुए'  हार जाने का मतलब था शान पर दाग़ लग जाना । पतंगबाज़ी का एक रंग होता है पतंग लूटना । बड़े बड़े छकड़े बनाए जाते हैं और फिर पेंचों पर नज़र रखते हुए कटी हुई पतंग को लूटने की जंग लड़ी जाती है । आमतौर पर लूटने का ये काम बच्‍चे और किशोर ही करते हैं । यही है वो रंग जिसकी वजह से हादसे भी होते हैं । मैंने अकसर देखा है कि लूटी हुई पतंग लेकर भाई लोग यूं लौटते हैं मानो पुराने ज़माने के आक्रमणकारी किसी देश को लूटकर लौट रहे हों । पचास पैसे की पतंग और दुनिया भर की जंग । आज भी पतंग लूटने के रहते हादसे होते रहते हैं । हम तो यही कामना करते हैं कि पतंग लूटने की जंग में कोई अपनी जान ना गंवाए । मकर संक्रांति के बहाने देखिए ना पतंगबाज़ी की कितनी कितनी बातें याद आ गयीं ।

Friday, January 11, 2008

ये अधूरी तमन्‍नाएं--हाय हाय हाय !!!

जिंदगी में कुछ काम हमेशा मुल्‍तवी होते रहते हैं । पता नहीं क्‍यों पिछले कुछ दिनों से वो छूटे अधूरे काम याद आ रहे हैं । शायद इसलिए कि नया साल नई शुरूआत का मौक़ा देता है और हम अपनी जिंदगी को नये सिरे से पटरी पर लाने की कोशिश भी करते हैं  । नये साल के वादे यानी new year resolution भी करते हैं । जैसे काकेश जी ने सार्वजनिक-तौर पर किये । और हम सबको प्रेरित भी किया कि मियां क्‍या कर रिए हो । बस समझ लीजिए कि हम इसीलिए जाग गये । और चेहरे पर अफ़सोस का पोस्‍टर चिपका लिया । हाथ में वो फेहरिस्‍त है जिसमें वो इरादे लिखे हैं जिन्‍हें हम पूरा नहीं कर पाए । हाय हाय हाय ।

पढ़ाई के दिनों में हम सोचते थे कि चलो गिटार सीख लिया जाए, पर माता-पिता ने कहा कि भैया पढ़ाई कर लो, गिटार सीखने के लिए तो उम्र पड़ी है । हमारा अपना ही सिक्‍का कमज़ोर था, पढ़ाई के अलावा बाक़ी सब करते थे । जहां कहीं वाद-विवाद प्रतियोगिता होती, पहुंच जाते । जहां कहीं लिखने-पढ़ने का कोई काम होता, प्रतियोगिता होती, वहां भी पहुंच जाते । कुछ ट्रॉफी वग़ैरह जीत लाते । फिर रेडियो पर बोलने की लत भी पढ़ाई के दिनों में ही लग गई थी । सो वहां समय चला जाता । कविताएं लिखना भी जारी था । पर अब अड्डेबाज़ी वाला मामला चल निकला था । मध्‍यप्रदेश के शहर छिंदवाड़ा में एक छोटा सा समूह बनाया था, कथन-समकालीन सोच और सृजन के लिए । इस समूह के ज़रिए चर्चाएं, नुक्‍कड़ नाटक और गोष्ठियों का आयोजन किया जाता । हंस, पहल, कथ्‍यरूप जैसी पत्रिकाओं में घुसे रहते । घर पर कम सड़कों, चाय की दुकानों, खेल के मैदानों और अपने टुटले टू-व्‍हीलर पर ज्‍यादा पाए जाते । चोरी से फिल्‍में देखते, जिनकी ख़बर किन्‍हीं जादूगरों  ( BSNL में कार्यरत पिताजी के मातहत फोन मैकेनिक, लाइनमैन और फोन इंस्‍पेक्‍टर जो जाने कहां कहां से हमें देख लेते थे ) के ज़रिए  मेरे घर वालों को चल जाती  । तो हम जैसे hopeless child को गिटार सीखने की इजाज़त नहीं मिली ।  होपलेस इसलिए कि कॉलेज में बंक मारने की वजह से प्रोफेसर्स चिढ़े रहते थे और पढ़ाई में दीदा ना लगने की वजह से घर वाले बोलते थे कि इस लड़के का कुछ नहीं हो सकता ।  आज भी मुंबई में धोबी तालाब वाले इलाक़े से गुज़रते हुए Furtados की साज़ों की दुकान में सजे gibson के गिटार देख लेते हैं तो आहें भरते हैं । हाय हाय हाय ।

 

ऐसी ही एक अधूरी-छूटी तमन्‍ना है देश-भ्रमण की । फिर कॉलेज के दिन याद आ गये । उस ज़माने में हम सोचते थे कि चलो देश घूमा जाए । पर तब पैसे नहीं हुआ करते थे । और अगर हम देश घूमते तो पढ़ाई क्‍या हमारे चाचाजी करते । पता है उस ज़माने में हमने यूथ हॉस्‍टेल एसोसिएशन की सदस्‍यता भी ले ली थी । एकाध कैम्‍प भी किया ट्रैकिंग का । पर वही सब जो गिटार के साथ हुआ वही तफरीह की तमन्‍ना के साथ भी हो गया । विविध भारती में आने के बाद यूथ हॉस्‍टल की मुंबई यूनिट का पता लगाया । मगर फिर मामला टांय टांय फिस्‍स हो गया । यहां हम साफ़ कर दें कि देश भ्रमण वाला हमारा concept ज़रा अलग है । ऐसा नहीं कि साल में महीने पंद्रह दिन के लिए निकले, चार मशहूर पर्यटन स्‍थलों पर गये और लौट आए । इसे हम कहते हैं  'पोस्‍टरी घूमना'  । घूमने का हमारा फिनॉमिना ज़रा अलग है, हम चाहते हैं कि एक बार निकलें तो ज़रा चार छह महीनों बाद ही घर लौटें, एक पूरे इलाक़े की ख़ाक छानने के बाद ही दम लें । वो भी अपने कैमेरे और डायरी के साथ । और शिमला या कुल्‍लू मनाली में नहीं बल्कि सुजानगढ़ और मंडी में जाकर रहें । हरिद्वार में नहीं बल्कि अल्‍मोड़ा में रहें । बल्कि और भी कहीं भीतर के गांव में रहने मिल जाए तो क्‍या बात है । वो कहते हैं ना कि 'सैर कर दुनिया की ग़ाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां' । पर हमारा हाल बयां करता है राजेश रेड्डी साहब का ये शेर, जो उन्‍होंने मुंबई के बारे में लिखा है --'इस शहर में आती हैं सैकड़ों पगडंडियां, यहां से बाहर निकलने का कोई रास्‍ता नहीं । कै़द मुंबई शहर की, हाय हाय हाय ।

 

एक अधूरी पूरी तमन्‍ना है दुनिया भर की फिल्‍में देखने की, जिसे थोड़ा थोड़ा मुंबई आकर पूरा किया जा सका है । जब डी वी डी वाला ज़माना नहीं था तो फिल्‍म समारोहों में पहुंच जाते थे । लाईन लगाकर थियेटर में जाना और फिर लॉटरी की तरह फिल्‍में देखना । खराब निकली तो बाहर आकर बौद्धिक जुगाली । फिर डी वी डी के ज़माने ने फिल्‍म फेस्टिवलों की आवारागर्दी पर थोड़ी सी लगाम लगाई है । नाटक देखने की तमन्‍ना तो जब भी उबाल मारती है तो हम सीधे पृथ्‍वी थियेटर या एन सी पी ए पहुंच जाते हैं । ये अलग बात है कि जब लौट रहे होते हैं तो लगता है कि काश हमारा घर पृथ्‍वी थियेटर के पड़ोस में ही होता, कमबख्‍त पच्‍चीस तीस किलोमीटर आना जाना तो नहीं पड़ता । फिर खूब सारा पढ़ने की तमन्‍ना है, जिसने हमें मुंबईया भाषा में कहें तो 'चश्‍मीश' बना दिया है । चार आंखों वाला । फिर भी पढ़ना उतना नहीं हो रहा है जितने हम पढ़ना चाहते हैं । हां मुंबई आए थे नये नये तो लोकल ट्रेनों की यात्रा में धक्‍का मुक्‍की के बीच कई किताबें पढ़ डालीं । कई कई बार पढ़ीं । ज़रा कुछेक की याद कर ली जाय । हरिया हरक्‍यूलिस की हैरानी और कसम--दोनों मनोहर श्‍याम जोशी की । निर्मल वर्मा की किताब --कव्‍वे और काला पानी । सुरेंद्र वर्मा की 'मुझे चांद चाहिए' । उदय प्रकाश की पाल गोमरा का स्‍कूटर और पीली छतरी वाली लड़की । मंटो की रचनावली । परसाई जी की कई कई किताबें । राही मासूम रज़ा की आत्‍मकथा । कृश्‍न चंदर की आत्‍मकथा--आधे सफर की पूरी कहानी । अनगिनत कविताएं । और जाने क्‍या क्‍या । लंबी फेहरिस्‍त है । धन्‍य हो लोकल ट्रेनों की यात्राएं । पढ़ते तो अब भी हैं पर ज़रा नहीं काफी कम । ये अधूरी तमन्‍नाएं और हाय हाय हाय ।

 

अब ज़रा एक फेहरस्ति पेश कर दें जल्‍दी जल्‍दी । आपको बता दें कि भोपाल में बचपन के दिनों में हमें लगा था डाकटिकिटों के संग्रह का शौक़ । यानी फिलेटली । आज भी जबलपुर वाले घर में एक ब्रीफकेस के भीतर हमारी बचपन वाली अखबारों की कटिंग और डाकटिकिटों का संग्रह रखा हुआ है । सुरक्षित । एकदम सुरक्षित । हां याद आया । स्‍कूल के दिनों में हमें माचिस की डिब्बियों के रैपर जमा करने का शौक लगा था । सैकड़ों तरह की माचिस की डिब्बियों के कवर रखे थे हमने । रूस्‍टर, चाभी और जाने क्‍या क्‍या । वो एलबम वक्‍त की किसी दरार में जा घुसा है । इसी तरह देश विदेश के सिक्‍के भी जमा किये थे हमने । फिर आया गाने जमा करने का युग । पुराने अनगिनत गानों का संग्रह है । जो लगातार बढ़ रहा है । तमन्‍ना है कि ये ख़ज़ाना और भी ज्‍यादा बढ़े । दुनिया भर के रेडियो स्‍टेशनों को सुनने का शौक़ रहा है हमें । रेडियोनामा पर इस बारे में अलग से लिखा जाएगा । आजकल ये शौक़ भी बंद पड़ा है । देश भर के अखबारों को पढ़ने की तमन्‍ना रहती है, जो धक्‍का लगा लगा कर हम पूरी कर ही लेते हैं । किसी ज़माने में आर्किटेक्‍ट बनने का सपना देखा था, प्री इंजीनियरिंग में सिलेक्‍शन ही नहीं हुआ । इंटीरियर डिज़ायनिंग का शौक़ रहा है । पर ये तमन्‍ना ठंडे बस्‍ते में है । आधी रात को बाईक पर शहर घूमने की तमन्‍ना रहती है । हां मुंबई शहर में हमने अकसर रात को शहर की ख़ाक छानी है । शहर की रात और मैं नाशादो नाकारा फिरूं, ऐ गमे दिल क्‍या करूं । इसका अपना मज़ा है, शहर के कई रूप होते हैं दिन का अलग रात का एकदम अलग । कितनी कितनी तमन्नाएं । उफ़ ये तमन्‍नाएं । ये अधूरी तमन्‍नाएं जिन्‍हें पूरा ना करने का दोष हमारा अपना है । चाहे जितने बहाने बनाएं । इस जुर्म का इक़बाल करते हैं, अपनी तरंग में रहते हैं, कभी ना कभी तो तमन्‍नाओं के बही खाते में हिसाब किताब बराबर हो ही जाएगा । बस  जि़द पकड़ लेने की बात है  । पर तब तक एक ही उपाय । हम करते रहेंगे हाय हाय हाय ।

 

 

 

 

वो सात दिन

नये साल का पहला हफ्ता बड़ा ही परेशान कर देने वाला रहाहुआ यूं कि बकौल एम टी एन एल हमारे एरिया के एक्‍सचेन्‍ज में मेजर फाल्‍ट गयायानी घर का नेट कनेक्‍शन ऐसा सोया कि जागने का नाम ही नहीं ले रहाथायही वजह थी कि मैं पिछले एक हफ्ते से चिट्ठों की दुनिया में झांक भी नहीं पायाऔर जरूरी ईमेल देखनेऔर भेजने के लिए भी साईबर कैफे का सहारा लेना पड़ा

ये पूरा सप्‍ताह त्रासद रहात्रासद इसलिए क्‍योंकि सोचा ये था कि अब लगातार चिट्ठाकारी की जाएगी, कम से कम पढ़ने का काम तो ज़ोरों पर चलाया जाएगाइन सात दिनों में मुझे समझ में आया कि संचार के ये साधन अब हमारा नशा बनते जा रहे हैंएक ज़माने में इंटरनेट के बिना काम चल जाता थाफिर हफ्ते में एकाध बार मेल करने के दिन आएफिर दिन रात इंटरनेट पर रहने का ज़माना चला आयाऐसे में टेक्निकल फाल्‍ट तुरंत ज़मीन पर ला पटकते हैंआप बेकरार होते हैं कि सब जल्‍दी ठीक हो जाए, पर इस देश के टेलीफोन विभाग को तो आप जानते ही हैं नाबिना धक्‍का दिये काम नहीं करता

दिलचस्‍प
बात ये रही कि महानगर टेलीफोन निगम के उनींदे कर्मचारी और अधिकारी रोज़ाना दिलासा देते रहे किआज ठीक हो जायेगा, कल ठीक हो जायेगालेकिन जब बर्दाश् की सीमा पार हो गयी तो कल मैंने महानिदेशक ब्रॉडबैन्‍ड को फोन लगाया और उन्‍हें बताया कि उनके विभाग में कितना गैर पेशेवर रूख हैतबजाकर सारे के सारे नींद से जागेअपने आप घर के फोन और मोबाईल खनखनाने लगे, नरमी से बातें की जाने लगीं और दोपहर दो बजे तक ब्रॉडबैन्‍ड फिर से जागृत हो गया

पर अधिकारियों के टेलीफोन कॉल का सिलसिला रात तक जारी रहाहर व्‍यक्ति यही पूछ रहा था कि क्‍या समस्‍या थी, हमसे कहते, शिकायत दर्ज कराई थी क्‍या । क्‍या सर आपने तो ऊपर शिकायत कर दीबताईये कि हमारे देश के 'निगम' इस अंदाज़ में काम कर रहे हैंमज़ेदार बात ये है कि फाल्‍ट था बिल्डिंग के नीचे लगे बॉक्‍स में । अब लाइनमैन क्‍यों जहमत करेऔर साहब लोग क्‍यों उस पर दबाव डालें

बहरहाल जब तक नेट ठीक है, ठीक है, वरना क्‍या पता कब हफ्ते दस दिन के लिए सो जाएकोई विकल्‍प भी तो नहीं है भाईचलिए आप भी अपने कड़वे अनुभव बताईये हम सुन रहे हैं
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Thursday, December 27, 2007

जोशिम की हरी मिर्च के ज़रिए आओ चलो बादलों में खो जाएं

जिंदगी में कुछ दिलचस्‍प-लोग बड़े इत्‍तेफा़क़ से मिल जाते हैं । जैसे मुझे मिल गये मनीष जोशी । मनीष जोशी यानी जोशिम

सबसे मज़ेदार बात ये है कि अपन मनीष जोशी को नहीं पहचानते । हां जानते ज़रूर हैं । और वो भी इत्‍तेफाक़ से । बात उन्‍नीस दिसंबर की है । मशहूर भजनगायक हरिओम शरण के देहान्‍त पर मैंने जो पोस्‍ट लिखी थी उस पर एक नाज़ुक-सी मार्मिक टिप्पणी नज़र आई--

वे ईश्वर और आस्था को बचपन से जोड़ने की एक बहुत मज़बूत कड़ी थे. लगभग छः वर्षों तक श्री हरिओम शरण हमारे दिनों का आरंभ रहे. स्कूली छात्रावास की मेस का लाउडस्पीकर उनकी गर्म गुदगुदी आवाज़ से सुबह भरता था - अभी भी "नंदलाला हरि का प्यारा नाम है ... " गूँज गया - ईश्वर उनकी संत सुजान स्मृति और भजन चिरायु रखे ।

लिखने वाले का नाम था--जोशिम । सहज जिज्ञासा हुई कि ये जनाब कौन हैं, पहले कभी नज़र नहीं आए । मेरे ब्‍लॉग पर कहां से आए, कैसे आए वग़ैरह वगै़रह । सो राईट क्लिक किया और इनके प्रोफाईल पर पहुंच गये । अपने बारे में मनीष जी ने ये लिख रखा है----

नाम मनीष जोशी; / उम्र - बयालीस ; / परिवार - एक पत्नी दो बच्चे;/ ठौर कहाँ कहाँ : रीवा, कानपुर, जयपुर, लखनऊ, दिल्ली, लंदन, गाजिआबाद, बंगलोर, रस अल खैमा ;/ हरी मिर्च क्यों : पुरानी हसरत (?);

नीचे इनके ब्‍लॉग का नाम लिखा था---हरी मिर्च

इस तरह अपन मनीष जोशी के ब्‍लॉग पर पहुंच गये । और पहुंच गये तो मुट्ठी में........ छुट्टे पैसों की तरह मौजूद ज़रा-से वक्‍त को हरी मिर्च पर  ख़र्च कर दिया । ज़रा-सा वक्‍त और हरी मिर्च । वाक़ई तीखी है हरी मिर्च । तीखी तेज़ और ग़ज़ब की । मनीष भाई ने हरी मिर्च के हैडर पर लिखा है--

"एक कबूतर चिट्ठी लेकर, पहली-पहली बार उड़ा, मौसम एक गुलेल लिए था पट से नीचे आन गिरा" (श्री दुष्यंत कुमार की "साये में धूप" से )

ये चित्र भी मनीष जी के ब्‍लॉग से ही उड़ाया गया है । शीर्षक है 'गयी मिर्च पानी में'

                                             chilly_in_the_glass

सबसे दिलचस्‍प बात तो परसों और कल हुई । मेरे ब्‍लॉग रेडियोवाणी की एक नियमित पाठिका हैं, उन्‍होंने कल मुझे ई-मेल पर लिखा कि मेरे भाई का हिंदी ब्‍लॉग देखिए, बरसों बाद उन्‍होंने हिंदी में लिखना और पढ़ना शुरू किया है । हिंदी जो हमारे दिलों के बहुत क़रीब है । उन्‍होंने ये भी बताया कि तीन पीढि़यों से रीवा म.प्र. में रहने के बाद हम परदेस में चले आए हैं ।

फिर मैं 'हरी मिर्च' पर आया तो चौंक गया । क्‍योंकि इस ब्‍लॉग पर पहली नज़र तो मैं उन्‍नीस दिसंबर को ही डाल चुका था । तब और अब दोनों बार हैरत ये हो रही थी कि जनाब इसे किसी एग्रीगेटर से क्‍यों नहीं जोड़ रहे हैं । ख़ैर ।

जोशिम यानी मनीष जोशी.....और उनकी ये हरी मिर्च मुझे बहुत प्‍यारी लगी । यक़ीन मानिए पहले ही दिन इसे बुकमार्क कर लिया गया था । और लगा कि आप सब से इस प्‍यारे से ब्‍लॉग का परिचय कराना चाहिए । फिर लगा कि हो सकता है प्राईवेसी जैसा कोई मामला हो । घुसपैठ करने से अच्‍छा था कि पहले पूछ लिया जाये । सो मनीष जी को मेल किया गया और जवाब यूं आया----

अभी नौसिखिया हूँ - घूम घूम कर सीख रहा हूँ -  तकरीबन एक डेढ़ महीने पहले तो यह मालूम ही नहीं था की इतनी आसानी से देवनागरी छापी जा सकती है -  आस्तीन का अजगर - जो सैनिक स्कूल (रीवा)  में कुछ समय साथ रहे - उनके ब्लॉग पर पहले जानना  हुआ - उन्होंने कहा लिखो तो शुरू किया -  "बकौल" नाम यूं लिया कि बब्बा इस नाम से देशबंधु में लिखते थे और "हरी मिर्च"  नाम से मैंने कॉलेज के Festival  दिनों में एक RAG MAG  चलायी थी (१९८५)  - फिलहाल अभी नई नई बरसात सा आलम है और इस मेंढक को माइक पर पहुँचते जुखाम होने का काफी अंदेशा है

देखिये नेकी पर पूछ पूछ नहीं करूंगा और आपको इजाज़त लेने की आवश्यकता ही नहीं है - इधर चूंकी समय का संकोच सा रहता है -  लिखने - पढने  में हाथ पैर ज़्यादा  फ़ेंक रहा हूँ Blog roll  में उपस्थिति दर्ज कराने का काम टलता जा रहा है ।

अब आधा काम हो गया था । मनीष जी की ये अदा अच्‍छी लगी हमें । तो आईये ज़रा 'हरी मिर्च' के थोड़े चटख़ारे लिये जाएं ।

मनीष जी ने सत्रह नवंबर को 'हरी मिर्च' को चुपके चुपके शुरू किया था और इस पर अपनी पहली पोस्‍ट 'प्रथम' चढ़ाई थी । ज्ञान जी के शब्‍दों में कहें तो ये मुनिया पोस्‍ट थी.....ज़रा.....सी । लेकिन असर उफ.....

मेरे सहमे कदम, दरवाज़े तक टहलते, ठहरे
अभी भी दस्तक की दहलीज़ थमे, हिचके इकहरे
मरोड़ता रहा हथेली के मुहाने,
अभी वक्त को शुरू होना हैं
इस बार कलम को नहीं उँगलियों को सहेजना है
.....शायद

मुझे वो बंदा कमाल का लगता है जो चीज़ों और भावों को भी समझे और उनके बीच पसरी चुप्पियों को भी । जो भाषा की कलाबाज़ी ना करे, बल्कि बड़ी सहजता से उसे एक बच्‍चे के मानिंद......निक्‍कर की जेब में बहुत दिनों से संजोई रेज़गारी या चिल्‍लर की तरह बजाए । भाषा चूरन की पुडि़या नहीं है कि चटख़ारा लिया और भूल गए । भाषा मेरे लिए नानी का बनाया खस का शरबत है, जो नस-नस में तरंग पैदा करते हुए पेट में चला तो जाता है लेकिन उसकी खुश्‍बू और खुमार मन पर दिन भर तारी रहता है । मनीष यही कर रहे हैं 'हरी मिर्च'  में ।

अठारह दिसंबर को मनीष जी ने अपनी एक कविता 'चलोगे'  ब्‍लॉग पर डाली है । जिसमें एक विकलता है, सरलता है, तरलता है ।

ज़रा एक अंश पढि़ये ।

आओ चलो ...
आओ चलो बादल को खो आएं।
इमली के बीजों को,
सरौते से छांट कर,
खड़िया से पटिया में,
धाप-चींटी काट कर,
खटिया से तारों को,
रात-रात बात कर,
इकन्नी की चाकलेट,
चार खाने बाँट कर,
संतरे के छीकल से आंखो को धो आएं।
आओ चलो बादल को खो आएं।
धूल पड़े ब्लेडों से,
गिल्ली की फांक छाल,
खपरैल कूट मूट,
गिप्पी की सात ढाल ,
तेल चुपड़ चुटिया की,
झूल मूल ताल ताल,
गुलाबी फिराक लेस,
रिब्बन जोड़ लाल लाल ,
चमेली की बेलों में, अल्हड़ को बो आएं।
आओ चलो बादल को खो आएं।

मनीष की बहन ने बताया कि वे बहुत दिनों बाद हिंदी से पुन: जुड़ रहे हैं । फिर से लिखना पढ़ना शुरू कर रहे हैं । कितनी ज्‍यादाती की है मनीष ने खुद को अपने पेशे के सांचे में कै़द करके और लिखने से दूर रहकर । इस कविता को पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक क‍ीजिएगा । आप इसे गुलज़ारिया भाषा कह लें, मैं भी गुलज़ार का प्रशंसक हूं पर मैं कहूंगा कि ये जिंदगी के सच्‍चे और खरे अनुभवों की मार्मिक भाषा है । इस भाषा और इस बंदे को मेरा सलाम पेश है ।

बीस दिसंबर को मनीष जी ने अपनी ग़ज़ल चढ़ाई जिसका शीर्षक था--ढलते हुए फिर संभलते । इसके कुछ शेर पेश हैं---

तार जुड़ते हैं तो तमाशे भी मिल पाते है।
बात जो सच लगे, वो ही जबान होती है।

भर समेट तारे हैं, यूं के नमक पारे हैं।
बूँद उठती है साथी, तो ही आसमान होती है।


कौम में, अमन-इंक़लाब में, दरारें सोहबत हैं।
फरेब अपनी किस्मत, यूं ही बयान होती है।

इस ग़ज़ल को पूरा यहां पढि़ये । मनीष जोशी यानी जोशिम के ब्‍लॉग को अभी तकरीबन एक महीना ही हुआ है और कुल जमा एक दर्जन पोस्‍टें आई हैं इस पर । भीड़ के बीच ये एक अलग से चमकता ब्‍लॉग है । सऊदी अरब के शहर रस अल ख़ैमा में फाईनेन्‍स उद्योग में माथापच्‍ची करते एक शख्‍स की अपनी जड़ों तक लौटने की बेक़रार कोशिश । हममें से कुछ लोग तो मनीष के ब्‍लॉग 'हरी मिर्च' पर टहल आए हैं । उम्‍मीद है कि बाक़ी भी 'हरी मिर्च' का स्‍वाद लेंगे । मनीष जी को हमारी तरंगित बधाई और शुभकामनाएं ।

 

Friday, December 21, 2007

क्‍या हो रहा था दुनिया में उस दिन--जब पैदा हुए थे हम

तरंग को बीस दिसंबर को शुरू किया जाना था । बीस दिसंबर मेरा जन्‍‍मदिन है । इसलिए सोचा था इसी दिन शुरू किया जाये । लेकिन आई आई टी मुंबई में विविध भारती की एक महत्‍त्‍वपूर्ण रिकॉर्डिंग में ही पूरा दिन बीत गया । इसलिए तरंग का आग़ाज़ आज किया जा रहा है ।

बहरहाल, मुझे हमेशा से ही ये जिज्ञासा रही है कि जिस दिन मेरा जन्‍म हुआ उस दिन दुनिया में क्‍‍या हो रहा था । विश्‍‍व राजनीति में क्‍‍या हो रहा था, खेलों की दुनिया में क्‍‍या और बाक़ी क्षेत्रों में क्‍‍या । आज छुट्टी के दिन इंटरनेट पर इस बात की पड़ताल करने का मन हुआ और ज़रा पढि़ये कि मैंने कितनी दिलचस्‍‍प बातें खोजी हैं ।

सन 1972 में जिस दिन मैं पैदा हुआ, अंतरिक्ष में अपोलो 17 को छोड़े महज़ आठ दिन हुए थे । चंद्रमा की सतह पर उतरने के बाद इस अंतरिक्ष यान पर कड़ी नज़र रखी जा रही थी । आपको बता दें कि अपोलो-17 मनुष्‍यों को अंतरिक्ष में लेकर गया ‍ग्‍यारहवां यान था । अंतरिक्ष में भेजा गया पहला मानव यान था vostok-1 जिसमें 12 अप्रैल 1961 को को यूरी गागरिन अंतरिक्ष में गये थे । सन 1969 में बीस जुलाई के दिन नील आर्मस्‍ट्रॉंग अपोलो-11 में चंद्रमा की सतह पर उतरे थे ।

बारह से बीस दिसंबर 1972 के बीच अहमदाबाद में भारत और अमेरिका के बीच satellite instructional television systems के बारे में बैठक चल रही थी और इस आशय का एक समझौता भी हुआ था । लेकिन इसकी शुरूआत तीन साल बाद यानी सन 1975 में हुई थी । भारत में टेलीविजन पर शैक्षणिक कार्यक्रमों का ये एक गहन और सफलतम प्रयोग था ।

इंटरनेटी खोजबीन और यायावरी में मुझे ये भी पता चला कि बीस दिसंबर 1972 को लंदन के The Marquee Club में मशहूर पॉप बैन्‍ड Queen का कंसर्ट भी हुआ था । इस बैन्‍ड‍ में गिटारिस्‍ट Brian May, गायक Freddie Mercury, ड्रमर Roger Taylor वगैरह शामिल थे, आपको ये तो बता ही दूं कि फ्रैडी मरक्‍यूरी का असल नाम था फारूख बलसारा । वो भारतीय पारसी थे । क्‍वीन्‍स बैन्‍ड रॉक एन रोल और रॉक का बेहद मशहूर बैन्‍ड रहा है । इस कंसर्ट में इस बैन्‍ड ने great king rat, son and daughter, doing alright जैसे गाने गाये थे । इन गानों पर क्लिक करके आप इनके यू टयूब वीडियो देख सकते हैं ।

मैंने काफी माथापच्‍ची की और पता लगाया कि बीस दिसंबर 1972 को और क्‍या क्‍या हो रहा था संसार में । अकसर मैं अपने पिताजी से भी पूछा करता था कि जब मैं पैदा हुआ था तब भारत के प्रधानमंत्री, राष्‍ट्रपति कौन थे, अमेरिका में ‍या हो रहा था वगैरह । और उनकी परेशानियां बढ़ाता रहता था । लेकिन इंटरनेट के आने से काफी आसानी हो गयी है । और जब ईद के दिन फुरसत से खोजबीन का ख्याल आया, तो बड़ी ‍दिलचस्‍प बातें पता चलीं । जाने माने ‍फिल्‍म निर्देशक Ingmar Bergman की फिल्‍म Cries and Whispers का प्रीमियर Cinema I Theatre, New York में हुआ था ।

सन 1972 में अमेरिका में राष्‍ट्रपति चुनाव हुए थे । जिनमें richard nixon अपने प्रतिद्वंद्वी George McGovern को हराकर दोबारा अमरीकी राष्‍ट्रपति बने थे । ये वो दौर था जब अमरीका वियतनाम युद्ध में अपने हाथ गंदे कर रहा था । जनवरी 1973 में पेरिस में वियतनाम शांति समझौता हुआ था । मतलब जिस वक्‍त हम इस दुनिया में आए थे वियतनाम को लेकर खींचम तान चल रही थी ।

मुझे ये भी पता करना था कि क्रिकेट की दुनिया में मेरे जन्म वाले दिन क्‍या हो रहा था । और मैंने पता लगा ही लिया । बीस दिसंबर को दिल्‍ली के फीरोज़शाह कोटला मैदान में भारत और इंग्‍लैन्‍ड के बीच टेस्‍ट श्रृंखला का पहला टेस्‍ट शुरू हुआ था । आगे चलकर इस घरेलू टेस्‍ट सीरिज को भारत ने 2-1 से जीत लिया था । बहरहाल आपको फीरोजशाह कोटला टेस्‍ट के बारे में और बता दिया जाये । दिलीप सरदेसाई का ये आखिरी टेस्‍ट मैच था । इसके बाद उन्‍होंने सन्‍यास ले लिया था । इस मैच में भी उनका प्रदर्शन अच्‍छा नहीं रहा था ।

खोजबीन के इसी सिलसिले में मुझे मिला बीस दिसंबर 1972 यानी मेरे जन्‍म वाले दिन प्रकाशित हुआ न्‍यूयॉर्क टाईम्‍स का अंक । जिसमें मुख्‍य खबर ये छपी है कि अमरीकी सेनाओं ने पनामा में अपना फौजी ऑपरेशन शुरू कर दिया है । इस अभियान का मकसद है Gen. Manuel Antonio Noriega की सरकार को खत्‍म कर देना ।

तो मित्रो मैंने तो इस दिलचस्‍प खोज को अंदाज दे दिया । क्‍या आपने कभी पता करने की कोशिश की कि जिस दिन आप पैदा हुए थे तब दुनिया में क्‍या हो रहा था ?

तरंग © 2008. Template by Dicas Blogger.

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