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Sunday, December 4, 2011

गोआ फिल्‍म समारोह पांचवां और छठा दिन।

फिल्‍म समारोह के आखिरी दो दिन थोड़े व्‍यस्‍त रहे। जिस 'काम' से आए थे उसकी तैयारियों में जुट जाना पड़ा। समापन समारोह का आंखों देखा हाल सुनाना था हमें रेडियो पर। बहरहाल समापन हो चुका है और गोआ की ये यात्रा बेहद यादगार बन चुकी है।

आखिरी दो दिनों में मंगेश जोशी की फिल्‍म “he” देखी। जिसे राष्‍ट्रीय फिल्‍म विकास निगम की मदद से बनाया गया है। 'ही' कमाल की फिल्‍म है। मुंबई की झोपडृपट्टियों में रह रहे उत्‍तरप्रदेश और बिहार के लोगों की जिंदगी को इसमें बहुत करीब से दिखाया गया है। फिल्‍म का नायक करीब सोलह साल का एक लड़का है जो भागकर मुंबई आया है। पूना फिल्‍म संस्‍थान का एक युवा निर्देशक उसे एक फिल्‍म में काम देता है। तब से उसके मन में ये बात बैठ जाती है कि वो हीरो है। उसकी जिंदगी में कोई क्रांति होने वाली है। फिल्‍म शूट करके दोबारा मिलने और बुलाने का वादा करके निर्देशक तो चला जाता है। पर इस बालक को सपने दे जाता है। लड़का ट्रेनों, प्‍लेटफार्म और पटरियों से पानी की खाली बोतलें और कचरा ही जमा करता रह जाता है।

इसके बाद शाम को डेनमार्क की फिल्‍म वोल्‍केनो देखी। एक ज्‍वालामुखी के फटने के बाद एक परिवार को अपने शहर से दूसरे शहर आकर बसना पड़ता है। नई शुरूआत करनी पड़ती है। पति रिटायर हुआ है। जिंदगी का नया दौर शुरू हुआ है। तभी पत्‍नी को ब्रेन स्‍ट्रोक होता है। और वो एक वस्‍तु में बदलकर रह जाती है। पति बड़े मन से उसकी देखभाल करता है। पर उसकी तकलीफ उससे देखी नहीं जाती। और एक दिन तकिये से उसका दम घोंटकर उसे दुनिया से छुटकारा दिला देता है।

आखिरी दिन केवल एक फिल्‍म देखी। अमेरिका की 'रेस्‍टलैस'। एक कैंसर पीडित युवती के एक लड़के से प्रेम की कहानी।

कुल मिलाकर गोवा आकर फिल्‍में देखने और फिल्‍मकारों से बातचीत करने का ये दौर बड़ा ही यादगार रहा। अब मुंबई वापसी की बारी है।

luc besson की फिल्‍म the lady.

कल मैंने लुक बेसों की फिल्‍म 'द लेडी' का जिक्र करके छोड़ दिया था। दरअसल ये गोआ फिल्‍म समारोह की सबसे प्रभावी फिल्‍मों में से एक है। luc besson फ्रांस के नई पीढ़ी के महत्‍वपूर्ण फिल्‍मकारों में गिने जाते हैं। इससे पहले उन्‍होंने “la femme nikita”, “the professional”, 'ängel-a' जैसी फिल्‍में बनाई हैं। 42वें अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की समापन फिल्‍म थी 'द लेडी'। समापन समारोह के बाद फिल्‍म की स्‍क्रीनिंग के मौके पर फिल्‍म के निर्देशक लुक बेसों और अभिनेत्री मिशेल योह मौजूद थे। वैसे मीडिया के लिए फिल्‍म की स्‍पेशल स्‍क्रीनिंग दो दिन पहले ही कर दी गयी थी।   

“the lady” असल में बर्मा में लोकतंत्र के लिए लड़ रही आंग सांग सू ची के जीवनCP - 41727photo Magali Bragard पर आधारित है। बताया गया है कि लेखिका rebecca frayn ने तीन साल तक सू ची के नजदीकी लोगों और सहयोगियों से बातचीत की, शोध किया और तब जाकर सच्‍ची घटनाओं को पटकथा में पिरोया। बहुत कम लोग जानते होंगे कि आंग सांग सू ची ने 1972 में एक शिक्षाविद् michael aris से शादी की थी। कॉलेज के ज़माने में दोनों की मुलाक़ात हुई थी। एक साल तक दोनों भूटान में रहे और फिर ऑक्‍सफोर्ड आ गये। जहां एरिस ने यूनिवर्सिटी में तिब्‍बती अध्‍ययन संस्‍थान की स्‍थापना की। 1988 में आंग सांग सू ची अपनी बीमार मां की देखभाल के लिए बर्मा लौटीं। और वहां जिंदगी ने उन्‍हें बर्मा में लोकतंत्र के लिए संघर्ष से जोड़ दिया। इसके बाद वो कभी वापस ऑक्‍सफोर्ड नहीं लौटीं। माइकल एरिस अपने दो बेटों के साथ बर्मा आते रहे। पर सू ची और एरिस कभी ठीक तरह से साथ नहीं रह सके। एरिस ने हमेशा आंग सांग सू ची को ताक़त दी। हमेशा फौजी सरकार के जुल्‍मों और अडियल रवैये से होने वाली निराशा से उबारा। यही नहीं एरिस की कोशिशों के कारण सू ची को नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया। 
1997 में उन्‍हें प्रोस्‍टेट कैंसर हो गया। पर बर्मा की सरकार ने उन्‍हें वहां आने की इजाजत नहीं दी। अंतर्राष्‍ट्रीय दबावों का भी कोई असर नहीं हुआ। आखिरकार सू ची सू दूर एरिस अपने दो बेटों की मौजूदगी में ऑक्‍सफोर्ड में चल बसे।


'द लेडी' में बर्मा के फौजी शासन की बेरहमी और सू ची की गांधीवादी लड़ाई को CP3- 34219 photo Magali Bragardदिखाया गया है। 145 मिनिट की लंबी फिल्‍म होने के बावजूद कभी ऐसा नहीं होता कि आपकी नज़र स्‍क्रीन से हटे। लुक बेसों ने कई मार्मिक क्षण रचे हैं। जैसे सू ची को नोबेल पुरस्‍कार दिया जाना है, जिसे उनके बेटे और पति स्‍वीकार करते हैं। सू ची बर्मा इसलिए नहीं छोड़ सकतीं क्‍योंकि इसके बाद फौजी सरकार उन्‍हें दोबारा आने नहीं देगी। उन्‍हें लंबे समय से नजरबंद रखा गया है। बीबीसी पर वो पुरस्‍कार समारोह की कमेन्‍ट्री सुन रही हैं। फौजी घर की लाइट काट देते हैं। हड़बड़कर नौकरानी किसी तरह एक ट्रांसिस्‍टर खोजती है। पर उसमें बैटरियां नहीं हैं। टॉर्च से बैटरी निकालकर रेडियो चालू किया जाता है और अपनी मां की ओर से स्‍वीकृति भाषण दे रहे बेटे की आवाज़ सू ची को सुनाई देती है। आंखों से आंसुओं की धारा बह रही है। हॉल में ऑकेस्‍ट्रा सू ची की पसंदीदा धुन बजा रहा है और बर्मा में नजरबंद सू ची पियानो पर धुन बजा रही हैं।

इसी तरह जब एरिस को कैंसर हो जाता है तो सू ची फोन पर बातचीत में ऑक्‍सफोर्ड लौटने की पेशकश करती हैं। एरिस ये कहते हुए मना कर देते हैं कि IMG_3132 photo V.Perezहमने अपने निजी जीवन से ज्‍यादा तरजीह बर्मा को दी है। और कई सालों की मेहनत को तुम इस तरह ज़ाया नहीं कर सकतीं। फोन करने के लिए सू ची को ब्रिटिश एम्‍बेसी आना पड़ता है। जब भी उनकी नजरबंदी खत्‍म होती है तभी वो फोन कर पाती हैं। बेटों को शिकायत है कि मां उनके साथ क्‍यों नहीं रहतीं।

फिल्‍म बर्मा में शूट नहीं की जा सकती थी। इसलिए थाइलैंड में काफी सीक्रेट तरी़क़े से इसे शूट किया गया। आप देखेंगे कि मलेशिया की मशहूर अभिनेत्री michelle yeoh  बिल्‍कुल आंग सांग सू ची की तरह लगती हैं। यहां तक कि उनके पति की भूमिका निभाने वाले david thewlis की शकल भी बिल्‍कुल माइकल एरिस से मिलती जुलती है। 'द लेडी' इससे पहले बुसान और टोरेन्‍टो फिल्‍म समारोहों में दिखाई जा चुकी है। कहा ये जा रहा है कि इस साल ऑस्‍कर में ये फिल्‍म अपने जलवे दिखा सकती है।

Friday, December 2, 2011

गोवा फिल्‍म समारोह: चौथा दिन

चौथे दिन की शुरूआत में बड़े उत्‍साह के साथ हम विम वेन्‍डर्स की फिल्‍म 'पिना' देखने गए। विम वेन्‍डर्स से कुछ साल पहले मुंबई के मैक्‍समूलर भवन ने परिचय करवाया था। उस समय उनका retrospective किया गया था जिसका नाम था “until the end of the world”. तब विम वेन्‍डर्स की कई प्रायोगिक फिल्‍में देखने मिली थीं। और तब से उन पर हमेशा हमारी नज़र रही है। 

अब PINA की बात। ये एक थ्री डायमेन्‍शल मूवी है। आपको बता दें कि इस फिल्‍म समारोह में थ्री डायमेन्‍शन फिल्‍मों के लिए एक अलग से खंड है जिसका नाम है--'थर्ड डायमेन्‍शन'। जाहिर है कि इस सेक्‍शन को लेकर काफी उत्‍साह देखा गया। विम वेन्‍डर्स से जैसी उम्‍मीद थी, ये फिल्‍म वैसी ही है। अगर आप बेहद मसाला या कहें नाटकीय पारंपरिक मनोरंजन या एक सही ढांचे वाली कहानी की उम्‍मीद करके सिनेमा देखने जायें तो आपको विम वेन्‍डर्स की फिल्‍में नहीं देखनी चाहिए। 'पिना' एक फीचर लेन्‍थ की डान्‍स फिल्‍म है। क्‍लासिक वेस्‍टर्न डान्‍स की टोली की निर्देशिका पीना की 2009 में मृत्‍यु हो गयी। इस फिल्‍म के जरिये नृत्‍य को लेकर पीना के प्रयोग और उनके कलाकारों की यादों के ज़रिये उसकी शख्सियत और कला को उभारा गया है। तीन आयाम वाली इस फिल्‍म को देखना अपने आप में एक बेहतरीन अनुभव कहा जा सकता है। बशर्ते आप टिपिकल फीचर की उम्‍मीद ना करें। ट्रेलर यहां देखें। फिल्‍म की वेबसाइट ये रही।  

कला अकादमी में 'पीना' देखने के बाद हम फिर से 'गोआ एंटरटेन्‍मेन्‍ट सोसाइटी' के परिसर में आ गये, जिसे एक तरह से फिल्‍म समारोह का मुख्‍य आयोजन स्‍थल कहा जा सकता है। यहां अल्‍जीरिया की फिल्‍म देखने मिली “how big us your love”. इस फिल्‍म की निर्देशिका हैं फातिमा जोहरा ज़मूम। जो हॉल में मौजूद थीं और उन्‍होंने दर्शकों के सवालों के जवाब भी दिये। ये फिल्‍म असल में एक ऐसे बच्‍चे की कहानी है जिसके माता-पिता की बनती नहीं। तलाक की नौबत है। मां अपने मायके जा चुकी है। पिता डॉक्‍टर है और व्‍यस्‍त रहता है इसलिए बच्‍चे को वो उसके दादा-दादी के पास छोड़ देता है। ये एक बुजुर्ग जोड़ा है जिसके दो बेटे हैं, पर वो साल भर में एकाध बार ही मां-बाप के पास आते हैं। दोनों खासा अकेलापन महसूस करते हैं। पोते के आने से दोनों के जीवन में बहार आ गयी है। और ये बात कुछ दृश्‍यों में बड़ी अच्‍छी तरह से उभारी गयी है।

दादाजी पोते को चिडियाघर दिखाने ले जाते हैं। बताते हैं कि शेर जंगल का राजा है जिसके लिए शेरनी शिकार करती है। पर बदले में वो अपने परिवार की हिफाजत करता है। पोता कहता है कि मेरे पापा भी शेर हैं ना। दादाजी--'हां बेटा वो भी शेर हैं, पर शेर और इंसान में फर्क यही होता है कि शेर वफादार होता है'। पोता--'वफादार' का क्‍या मतलब होता है दादाजी। और दादाजी निरूत्‍तर होकर पोते को अगले जानवर जेब्रा के बारे में बताने लगते हैं। पोता अपनी दादी के पास पहुंचता है और वहां उनसे पूछता है कि वफादार का क्‍या मतलब होता है। दादी का जवाब है वफादार का मतलब होता है हमेशा रिश्‍ते को निभाने वाला। जैसे कि मैं। और उनकी आंखें चमक उठती हैं। फिर दादा पूछती हैं बताओ बेटा तुम मुझसे कितना प्‍यार करते हो।  (how big is your love)......दादी हाथ फैलाकर बोलती हैं, इतना...पोता कहता है, नहीं और.....दादी और बड़ा हाथ फैलाती हैं...पोता संतुष्‍ट है, इतना प्‍यार करता हूं मैं आपसे।

फिल्‍म में अल्‍जीरिया के बदलते समाज और बदलते पारिवारिक मूल्‍यों को दर्शाया गया है। हमारी फिल्‍मों की तरह ये सुखांत नहीं है। बल्कि मां-बाप की कोशिशों के बावजूद कोई हल नहीं निकलता है। तलाक होना अब पक्‍का है। सोचिए--'हाउ बिग इज योर लव'।


चूंकि अब समापन समारोह नज़दीक आ रहा है--और लगातार सिनेमा देखने से एक ख़ास तरह की घबराहट, ऊब और थकान कभी-कभी मन पर तारी हो जाती है इसलिए हमने दोपहर के बाद का समय रखा अपने लिए। शान से सर्किट हाउस में लंच लिया और फिर आकाशवाणी पणजी के लोगों से गप्‍पें और अपने कमरे में आराम।


शाम को राजेश पिन्‍जानी की चर्चित फिल्‍म 'बाबू बैन्‍ड बाजा' देखी। इससे पहले मणिपुर की एक शॉर्ट फिल्‍म दिखाई noong amaadi yeroom. चौदह मिनिट की इस फिल्‍म में एक पिता का बेटे पर खौफ दिखाया गया है। बेटा किशोर है और शरारत करता है। उससे पिता का हुक्‍के का ढक्‍कन टूट जाता है और वो अपने चाचा के घर से चुराने के चक्‍कर में पकडा जाता है फिर चाचा उसे बचाते हैं।

राजेश पिन्‍जानी की फिल्‍म 'बाबू बैंड बाजा' पहले ही खासी मशहूर हो चुकी है। और ये उसका रिपीट शो था जो पूरी तरह हाउस फुल रहा। आपको बता दें कि 'बाबू बैन्‍ड बाजा' का मतलब है बाबू बैन्‍ड पार्टी। ये कहानी है उन बाजे वालों की जो जन्‍म और मृत्‍यु हर मौके पर बाजा बजाते हैं। और उनकी अपनी जिंदगी में ना कोई सुर है ना ताल है। 'बाबू बैंड बाजा' में राजेश पिन्‍जानी ने काफी प्रभावी तरीक़े से महाराष्‍ट्र के इस समुदाय के ग्रामीण जीवन की कथा कही है। मां जो पुराने कपड़ों के बदले में बर्तन बेचने का काम करती है, चाहती है कि बाबू पढ़े। पिता चाहता है कि बाबू उसके साथ बाजा बजाए। एक दिन स्‍कूल से लौटते वक्‍त खेलने के चक्‍कर में बाबू का बस्‍ता कोई चुरा ले जाता है। जिसमें किताबें और बाजा दोनों हैं। यूनिफॉर्म और पुस्‍तकें ना होने की वजह से मास्‍टर बाबू को क्‍लास में बिठाता नहीं है। पिता संघर्षरत है, क्‍योंकि बाजा बजाने का काम बहुत कम हो रहा है, शहर से सजीली बैंड पार्टी बुलवाई जाने लगी है। मां बर्तन का काम छोड़कर एक रूई फैक्‍ट्री में काम पकड़ती है और किसी तरह बाबू का बस्‍ता खरीदती है। ठीक उसी समय बाबू को अपना पुराना बस्‍ता गांव की एक पागल औरत के पास मिल जाता है। रूई फैक्‍ट्री में आग लग जाती है। बस्‍ता अंदर है, जिसे लाने के चक्‍कर में बाबू की मां जलकर मर जाती है।

जाते-जाते मां बाबू और उसके पिता को एक सपना दे गई है कि बाबू पढ़ेगा। बाजा नहीं बजाएगा। फिल्‍म बेहद मार्मिक है। कई दृश्‍य आपको भीतर तक भिगो देते हैं। दिलचस्‍प बात है कि राजेश पिन्‍जानी की ये पहली फीचर फिल्‍म है। जाहिर है कि बतौर युवा निर्देशक राजेश ने काफी उम्‍मीदें जगाई हैं।

आज की आखिरी फिल्‍म थी 'द लेडी' जो अलग से पोस्‍ट की मांग करती है।

Thursday, December 1, 2011

गोआ फिल्‍म समारोह तीसरा दिन

फिल्‍म समारोह कहीं कहीं निराश भी कर रहा है। कुछ नामी फिल्‍में बड़ी ही disappointing हैं। पर फिर भी अच्‍छी फिल्‍में उस अफसोस को धो देती हैं।

आज की पहली फिल्म थी पोलैन्‍ड के निर्देशक Feliks Falk की साल 2010 में बनी MV5BMTYzMzU4NDUwOF5BMl5BanBnXkFtZTcwMTM5MjA5Ng@@._V1._SY317_फिल्‍म Joanna. निर्देशक फीलिक्‍स फॉक सन 75 से फिल्‍में बना रहे हैं। और अपनी दो सामाजिक-व्‍यंग्‍यात्‍मक फिल्‍मों top dog और hero of the year के लिए जाने जाते हैं। जोआना, दूसरे विश्‍व-युद्ध में जर्मन कब्‍जे वाले वॉरसॉ शहर की एक लड़की की कहानी है। एक छोटी बच्‍ची 'रोज़' के जन्‍मदिन पर मां खतरे के बावजूद उसे एक रेस्‍त्रां में पार्टी के लिए ले जाती है। तोहफे देती है। पर तभी जर्मन आकर यहूदियों को पकड़ कर ले जाती हैं। मां ले जाई गयी है। बच्‍ची को वेट्रेस 'जोआना' एक चर्च में छिपे देखकर अपने घर ले आती है। उसके बाद उस यहूदी बच्‍ची को पनाह देने के लिए उसे कितनी मुसीबतों से गुज़रना पड़ता है, इसी की कहानी है जोआना। मुख्‍य भूमिका में urzula grabowska ने शानदार काम किया है। इस फिल्‍म के दौरान हॉल खचाखच भरा था। और दर्शक विंग में खड़े होकर भी फिल्‍म देख रहे थे। फायदा उठाने के लिए जर्मन फौजी अफसर की सहानुभूति, नन्‍हीं बच्‍ची रोज़ का अपनी मां के बारे में पूछना, जोआना के पति की मौत की पुष्टि, सज़ा के तौर पर उसके बाल काट दिये जाना....ऐसे कई लम्‍हे थे जहां फिल्‍म गहरे तक छू जाती है।

आज की दूसरी फिल्‍म रही प्रतियोगिता खंड की रूसी फिल्‍म elena. उम्‍मीद के उलट ये एक औसत फिल्‍म थी। ऐलेना एक अधेड़ महिला है, जो एक रईस बुजुर्ग से शादी करके दो साल से उसके साथ रहती है। बुजुर्ग की एक बिगडैल बेटी है जो अलग रहती है। ऐलेना का एक कामचोर और शादीशुदा बेटा है जो दूर एक औद्योगिक शहर में रहता है। ऐलेना के नाती का कॉलेज में एडमीशन कराना है और इसके लिए पैसे चाहिए। जो ऐलेना का बुजुर्ग पति नहीं दे रहा। उसका कहना है कि वो ऐलेने के बेटे के बेटे के लिए जिम्‍मेदार नहीं है। इस दौरान पति को दिल का दौरा पड़ता है। और एलेना उसकी देखभाल के दौरान उसे वियाग्रा का पूरा पत्‍ता खिला देती है। जिससे रातों रात उसकी मौत हो जाती है। ऐलेना के नाती के एडमीशन का इंतजाम हो गया है। बडे से घर का आधा हिससा भी ऐलेना को मिला है। और ऐलेना के नाकारा बेटे-बहू उसके साथ रहने आ गये हैं। बेहद औसत फिल्‍म।

रात में ईरानी फिल्‍म देखने मिली। जिसका नाम है nader and simin a separation. असगर फरहादी की ये फिल्‍म कमाल की है। नादेर और सिमिन पति पत्‍नी हैं। दोनों के बीच काफी झगड़े होते हैं। सिमिन चाहती है कि परिवार विदेश जाकर रहे, ईरान छोड़ दे। नादेर के पिता को पर्किन्‍सन है। और वो ईरान में रहकर ही उनकी देखभाल करना चाहता है। इनकी एक बेटी है--तिर्मी। पति-पत्‍नी तलाक़ चाहते हैं। पर जज का कहना है कि जो वजहें उन्‍होंने बताईं हैं वो काफी नहीं हैं। इसलिए तलाक़ मिलता नहीं। और परेशान होकर सिमिन अपने मायके चली जाती है। नादेर एक युवा महिला को पिता की देखभाल के लिए रख लेता है। हालात कुछ ऐसे होते हैं कि उसे लापरवाही के रहते उस महिला को निकालना पड़ता है। झड़प होती है। नादेर उस महिला को हल्‍का-सा धक्‍का दे देता है और घर से निकाल देता है। महिला का गर्भपात हो जाता है। और नादेर पर मुक़दमा चलता है। सुनवाई होती है। गवाहियां होती हैं। सिमिन मदद के लिए आती है। और पता लगाती है कि दरअसल गर्भपात उसके धक्‍का देने से नहीं हुआ बल्कि महिला के एक कार से टकरा जाने से हुआ है। पत्‍नी के एक हफ्ते के लिए मायके जाने पर नादेर बुरी तरह फंस जाता है। किसी तरह दोनों इस मामले को तो लगभग निपटा लेते हैं। पर अपने रिश्‍ते की उलझनों को नहीं सुलझा पाते।

देर रात तक खत्‍म हुई ये दो घंटे लंबी फिल्‍म लगातार आपको बांधे रखती है। निर्देशक ने फिल्‍म को एक ऐसे मोड़ पर खत्‍म किया है, जहां और-और की गुंजाईश बनी रहती है। क्रेडिट्स के बीच भी दर्शकों को लगता है कि शायद भारतीय फिल्‍मों की तरह 'हैपी  एन्डिंग' हो जाए। और अजीब सी बेचैनी के साथ आप हॉल से बाहर निकलते हैं।

गोआ फिल्‍म समारोह: दूसरा दिन


भारत के 42 वें अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म-समारोह में हमारा दूसरा दिन था 29 को। सिनेमा का ये अंतर्राष्‍ट्रीय मेला कई मायनों में उत्‍साहवर्धक होता है। बढिया माहौल, फिल्‍मों के कई विकल्‍प, इंटरव्‍यूज, विचार-विमर्श, प्रेस-कॉन्‍फ्रेन्‍स वगैरह सब। मुझे हर फिल्‍म समारोह में आकर यही लगता है कि एक साथ चार-चार या छह शोज़ चलते रहते हैं। और इनमें से आप एक ही देख सकते हैं। अगर फिल्‍में रिपीट ना हों तो हर पाली में तीन या चार फिल्‍मों को देखने से आप वंचित ही रह जाते हैं। ऐसे में ये तय करना सचमुच मुश्किल होता है कि किसे देखें और किसे छोड़ें। ये सचमुच एक लॉटरी है। कई बार ऐसी फिल्‍में जो अलग अलग फिल्‍म समारोहों में नाम कमा चुकी हैं, वो भी निराश करती हैं। जैसे 'हंटर' जिसकी चर्चा मैंने पिछले अंक में की थी।

मेरा दूसरा दिन मिला-जुला ही रहा। शुरूआत फिलिप नॉयस की फिल्‍म 'न्‍यूज-फ्रंट' से हुई। जैसा कि मैंने आपको पहले भी बताया कि यहां फिलिप नॉयस की newsfrontफिल्‍मों का पुरावलोकन चल रहा है। 'न्‍यूज-फ्रंट' असल में दो भाईयों की कहानी है, जो न्‍यूज़रील शूट करते हैं। परिदृश्‍य ऑस्‍ट्रेलिया का है। चालीस और पचास का ज़माना जबकि न्‍यूज़रील समाचारों को देखने का अकेला ज़रिया होती थी। टेलीविजन आ रहा था और वो इस उद्योग पर अपना असर डाल रहा था। दोनों भाईयों के सहारे उनकी अपनी जिंदगी और तब के ऑस्‍ट्रेलिया को, उसकी राजनीति उथल पुथल को और न्‍यूजरील उद्योग के भीतरी कामकाज को दिखाया गया है। दिलचस्‍प बात ये रही कि इस फिल्‍म में असली न्‍यूज़रील फुटेज भी शामिल थे। फिल्‍म बीच बीच में ब्लैक-एंड-व्‍हाइट है और बीच बीच में रंगीन। कुल मिलाकर इसे देखना एक दिलचस्‍प अनुभव रहा।

फिल्‍म समारोह में कुछ फिल्‍मों का इतना नाम हो गया है कि करीब आधे घंटे पहले ही बड़ी तादाद में दर्शक सीटें घेर लेते हैं। यानी देर से पहुंचने वालों को निराशा हाथ लग रही है। पर ऐसा कुछ ही फिल्‍मों के साथ हो रहा है। दूसरे दिन की सबसे बेहतरीन फिल्‍में रहीं “school cinema” खंड की दो लघु-फिल्‍में। इस बार सिने-समारोह में शॉर्ट फिल्‍मों की बाढ़ है। एक पूरा खंड है छोटा सिनेमा। जिसमें बहुत ही नायाब फिल्‍में दिखाई जा रही हैं। जिस खंड की मैं बात कर रहा हूं उसमें छोटे स्‍कूली बच्‍चों की जिंदगी पर बनी फिल्‍में दिखाई जा रही हैं। जिनमें से ज्‍यादातर को 'एडुमीडिया' नामक संस्‍था ने प्रोड्यूस किया है। आकाश रॉय की फिल्‍म the finishing line कवल छब्‍बीस मिनिट की है। बहुत कम कलाकारों, संसाधनों और तामझाम में बनी एक ईमानदार फिल्‍म। कहानी दो स्‍कूली बच्चों हरप्रीत और निखिल की है। जो हंसराज स्‍कूल में पढ़ते थे और धावक थे। जहां फिल्‍म शुरू होती है वहां निखिल कामयाब एथलीट बन चुका है और कॉमनवेल्‍थ की तैयारी कर रहा है। हरप्रीत खेल-पत्रकार बन गया है। हरप्रीत को याद आता है कि किस तरह स्‍पोर्ट्स-टीचर निखिल को सपोर्ट करते रहे क्‍योंकि उसके पापा वाइस-प्रिंसिपल थे। एक अच्‍छा धावक होते हुए भी उसे सपोर्ट नहीं किया गया, क्‍योंकि उसके भाई ने स्‍कूल छोड़ते हुए स्‍पोर्ट्स-टीचर की इंसल्‍ट की थी। वार्षिक खेल प्रतियोगिता के लिए टीम का ऐलान होना है। निखिल के जोर देने पर हरप्रीत उसके साथ टीचर के कमरे में घुसकर चुपके से लिस्‍ट देख लेता है। निखिल भाग जाता है और हरप्रीत पकड़ा जाता है। उसे स्‍कूल से निकाल दिया जाता है। पूछताछ में वो निखिल का नाम नहीं बताता। निखिल खुलकर सामने नहीं आता।

कॉमनवेल्‍थ की तैयारियों के दौरान निखिल और हरप्रीत मिलते हैं और दोनों स्‍पोर्ट्स टीचर से मिलने जाते हैं। जहां टीचर का वही पुराना बर्ताव सामने आता है। पर इस बार हरप्रीत हिम्‍मत के साथ मुंह खोल देता है। वो कहता है कि गलती मेरी थी जो मैंने आपको अपना कॉन्फिडेन्‍स तोड़ने का मौक़ा दिया। थोड़ी हिम्‍मत जुटाकर पहले ही विरोध करता तो ये नौबत नहीं आती।

उसी शाम इस खंड की एक और फिल्‍म देखने मिली, जिसका नाम red building where the sun sets. इस अंग्रेजी फिल्‍म की अवधि है केवल 17 मिनिट। इसे दक्षिण की नामी अभिनेत्री और निर्देशिका रेवती ने बनाया है। राधिका और अरविंद की मुलाकात एक ट्रैफिक सिग्‍नल पर हुई थी। प्‍यार हुआ, शादी हुई और बच्चा भी। शादी के सात साल बाद दोनों की जिंदगी बदल गई है। झगड़े होते रहते हैं। जिन्‍हें बच्चा आर्या खामोशी से देखता है। फिल्‍म फ्लैश-बैक-नैरेटिव है। बच्‍चे के नाना उसे समंदर किनारे घुमा रहे होते हैं, तो वो पूछता है नानाजी आप कहां रहते हैं। नानाजी कहते हैं वहां पश्चिम में। red building where the sn sets. मम्‍मी-डैडी के झगड़ों से तंग आकर एक दिन बच्‍चा स्‍कूल जाने के लिए निकलता है पर वहां ना जाकर उस लाल इमारत की तलाश में निकल जाता है जहां सूरज डूबता है। और जहां उसके नानाजी रहते हैं। देर रात नानाजी उसे सड़क पर भटकते देख लेते हैं और घर पहुंचाते हैं। इस एक घटना से पति-पत्‍नी की जिंदगी बदल जाती है। वो ज्‍यादा सहनशील और एडजस्टिंग हो जाते हैं। एक दूसरे से वादा करते हैं कि अब झगड़ा नहीं केवल प्‍यार होगा।

दूसरे दिन दक्षिण की दो फिल्‍में देखीं। एक वी.के.प्रकाश की मलयालम फिल्‍म 'कर्मयोगी' जो शेक्‍सपीयर के 'हेमलेट' पर बनी है। केरल की मार्शल-आर्ट कलरिपायटू के माहिर रूद्रन की कहानी। जिसके पिता को उसके भाई ने ही जहर देकर मरवा दिया। इससे उसे गहरा सदमा लगा है। वो एक गहरे भावनात्‍मक और आध्‍यात्मिक बदलाव के दौर से गुज़रता है। और अपने पिता की मौत का बदला लेता है। काफी गूढ और जटिल कथानक वाली फिल्म है ये। जिसमें पद्मिनी कोल्‍हापुरे एक छोटी-सी भूमिका में नजर आती हैं। दूसरी मलयालम फिल्‍म थी 'ट्रैफिक'। जिसमें दिखाया गया है कि किस तरह ट्रैफिक की लाल बत्‍ती पर सभी एक साथ रूकते हैं और फिर अपने अपने रास्‍तों पर चले जाते हैं। किस तरह ज़रा सी एक लापरवाही कई लोगों की जिंदगियों को बदल देती है। 'ट्रैफिक' एक कमर्शियल फिल्‍म है, जिसमें चौंकाने वाले सारे तत्‍त्‍व शामिल किये गये हैं। पर अपनी संवेदना की वजह से ये फिल्‍म कई जगह झकझोरती है। फिल्‍मों का एक नामी और व्‍यस्‍त हीरो पारिवारिक मूल्‍यों की बातें अपने इंटरव्‍यू में कर रहा है, सामने बैठी उसकी बेटी इंटरव्‍यू ले रहे टीवी पत्रकार को सवाल भेजती है। पूछिए, मेरा फेवरेट टीचर कौन है। मेरा फेवरेट सब्‍जेक्‍ट क्‍या है वगैरह। हीरो अचकचा जाता है। कैमेरा रोककर बच्‍ची से पूछता है। और फिर कैमेरा रोल करवाकर जवाब देता है।

इस हीरो की बेटी को दिल का दौरा पड़ा है। हार्ट ट्रांसप्‍लान्‍ट करके ही उसे बचाया जा सकता है। सड़क दुर्घटना में एक होनहार टी वी पत्रकार बुरी तरह घायल है। उसके बचने की कोई उम्‍मीद नहीं। उसके माता पिता पर राजनीतिक दबाव डालकर इस बात के लिए मनवाया जाता है कि वो अपने बेटे का हार्ट दान कर दें ताकि उस बच्‍ची को बचाया जा सके। आखिरकार माता-पिता इस बात के राजी हो जाते हैं। हार्ट एक नीयत समय में दूसरे शहर पहुंचाना है। और केवल सडक से जाने का विकल्‍प है। एक कॉन्‍स्‍टेबल जिसने अपनी बच्‍ची की पढाई के पैसे जमा करने के लिए घूस ली और सस्‍पेन्‍ड हुआ..अपनी बदनामी को धोने के लिए ये चुनौती स्‍वीकार करता है। फिल्‍म में रफ्तार है, कसावट है और साथ ही संवेदना भी है। पर अफसोस कि फिल्‍म का एक बडा हिस्‍सा सडक मार्ग से रोमांचक सफर करते हुए हार्ट को मंजिल पर पहुंचाने के स्‍टंट पर खर्च कर दिया गया है। निर्देशक राजेश पिल्‍लई अब इसे हिंदी, तमिल और तेलुगू में बना रहे हैं। 

फिल्‍म-समारोह में ओमी वैद्य मीडिया से भागते नज़र आए। थ्री ईडियटस में अपनी कॉमेडी से लोगों को हंसाने वाले ओमी के खानदान का ताल्‍लुक शायद गोवा से रहा है इसलिए यहां उनका सम्‍मान था। जहां वो कोंकणी संस्‍कृति और गोआइन जीवन शैली की तारीफ करते नज़र आए। पर ऐसे फंसे कि दौडते हुए पीछा छुडाना पडा।

मोबाइल फोन इतनी बडी परेशानी बन गया है कि फिल्‍म समारोह में लोग इससे खीझते नज़र आते हैं। जब फिल्‍म परवान पर हो तो किसी का मोबाइल बज उठता है और पूरी बेशर्मी से वो हॉल में बातें करने लगता है। जिससे बाकी सभी उसे डांटते हैं और बाहर भागते हैं।

तीसरे दिन की बातें कल। 

Tuesday, November 29, 2011

गोआ फिल्‍म समारोह: पहला दिन

अब तक एक पर्यटक के रूप में गोआ आना होता रहा था, लेकिन इस बार गोआ फिल्‍म समारोह के तामझाम का हिस्‍सा बनने का मौक़ा मिला, तो ज़ाहिर है कि मन बाग़ बाग़ हो गया।  सत्‍ताईस की रात मैंगलोर एक्‍सप्रेस में सफ़र करते हुए एक ख्‍याल ये आया कि कभी इस ट्रेन के आखिरी स्‍टेशन पर भी जाने का मौक़ा मिले तो मज़ा आ जाए।

गोआ आने पर एक बात बड़ी संगीन है। अगर आपको जानकारी ना हो तो आराम से बतौर टूरिस्‍ट आपसे हर काम के ज्‍यादा पैसे वसूल लिये जाते हैं। पर हम तो गोआ को अच्‍छी तरह जानते हैं। इसलिए इस बार हमारे जेब पर डाके का सवाल नहीं उठता था। आकाशवाणी पणजी के बारे में रेडियोनामा पर शुभ्रा जी के संस्‍मरणों से काफी कुछ जाना था। गोआ आते हुए कभी पणजी रेडियो स्टेशन कर रूख इसलिए नहीं किया कि यहां भी दफ्तर की सूरत क्‍यों देखी जाए।

गेस्‍ट-हाउस में सामान रखने के बाद हम पंद्रह मिनिट के भीतर समारोह जाने को तैयार थे। फिल्‍म देखना सचमुच एक उत्‍सव होता है। बचपन से रहा है। जब पापा या मामा या चाचा किसी के भी साथ हम फिल्‍म जाने के लिए उत्‍साह से तैयार हो जाते थे। चूंकि 28 नवंबर का आधा दिन तो बीत ही गया था। इसलिए जाते ही अपनी किट वगैरह लेकर जो फिल्‍म तुरंत दिखाई जाने वाली थी--उसमें घुस गए। वो थी इलाहाबादी तिग्‍मांशु धूलिया की 'शागिर्द'। यहां आने से पहले तिग्‍मांशु से फोन पर इंटरव्‍यू किया था, फिल्‍म समारोह के मुद्दे पर। वहां उन्‍होंने साफ तौर पर कहा था कि ये कोई बौद्धिक क्रांति वाली फिल्‍म नहीं है। बाक़ायदा बॉलीवुड की मसाला फिल्‍म है। जिसे देखकर आपको मजा आयेगा। और वाकई वो मज़ा आया भी।

तिग्‍मांशु टिपिकल बॉलीवुड ढांचे से अलग सोचते हैं। ये फिल्‍म एक पुलिस अधिकारी की कहानी है जो अपने तरीके से सोचता है। उसका काम करने का अपना ढंग है, क्राइम ब्रांच में है तो गोलियों के ज़रिये ही बात करता है। रिश्‍वत लेने और राजनीतिक गोटियां खेलने में उसे कोई परहेज़ नहीं है। उसका शागिर्द बनता है एक नया पुलिस अधिकारी मोहित अहलावत। कुल मिलाकर भयानक मारा-मारी वाली ये फिल्‍म आपको आखिर तक बांधे रखती है। नाना पाटेकर अपने खास मै‍नेरिज्‍म के साथ हैं, पर शुक्र है कि यहां उन्‍हें चिल्‍लाने से रोके रखा गया है। नाना के कैरेक्‍टर की एक बात बड़ी खास रखी गयी है। उन्‍हें पुराने गानों का शौक है। और जहां भी गाना बजता हुआ सुनाई पड़ता है, वो उसका पूरा ब्‍यौरा देते हैं। गीतकार, संगीतकार, गायक, सन और कलाकार।

नाना एक एनकाउंटर कर रहे हैं, दो गुंडे पुरानी दिल्‍ली के एक मकान की ऊपरी मंजिल की कोठरी में छिप जाते हैं। नाना नीचे चाय की दुकान पर अपने साथियों के साथ मौजूद हैं। टीवी पर गाना बज रहा है। नाना कहते हैं, 'अनाड़ी' सन फलाना, हसरत जयपुरी, शैलेंद्र और शंकर जयकिशन। इसी तरह पत्रकारों को आतंकवादियों ने पकड़ लिया है। और उनका वीडियो भेजा है। जिसमें रेडियो पर गाना बजता सुनाई पड़ रहा है। नाना फौरन हाइ-लेवल पुलिस मीटिंग में होते हुए भी उस गाने का पूरा ब्‍यौरा देते हैं। ऐसे कई मौक़े रखे गए हैं फिल्‍म में। हम रेडियोवाले हैं ना, इसलिए ये पहलू अच्‍छा लगा। 'शागिर्द' बिना गानों वाली फिल्‍म है। और काफी कसी हुई।

पहला दिन इसलिए अस्‍त व्‍यस्‍त रहा क्‍योंकि एक तो आधा दिन मिला। ऊपर से तीन भीमकाय कैटलॉग। जिन्‍हें पढ़ने की मोहलत नहीं थी। शागिर्द के बाद फिलिप नॉयस की फिल्‍म clear and present danger देखी। हैरिसन फोर्ड और विलियम डफो जैसे नामचीन सितारों वाली ये फिल्‍म फिलिप नॉयस पर चल रहे 'पुनरावलोकन' खंड का हिस्‍सा है। पूरी कहानी क्‍या लिखूं। आप फिल्‍म के लिंक पर जाकर पढ़ ही सकते हैं। ठेठ अमेरिकन फिल्‍म है ये। 141 मिनिट की बेहद लंबी फिल्‍म। दरअसल फिल्‍म समारोह में ऐसी कमर्शियल और अमेरिका का महिमा-मंडन करने वाली फिल्‍म पचती नहीं है। हैरिसन फोर्ड की कमाल की एक्टिंग के बावजूद मुझे यही लगा कि इस फिल्‍म को टीवी पर तो फिर भी देखा जा सकता था। यहां नहीं।

आखिरी फिल्‍म देखी रूस की 'द हंटर'। 2001 में रूव में बनी इस फिल्‍म का कथानक काफी प्रॉमिसिंग लग रहा था। पर इतनी धीमी और उबाऊ पेशकश कि हॉल में बैठे अडूर गोपालकृष्‍ण भी काफी सब्र करने के बाद बाहर निकल गये। बेहद निराशाजनक फिल्‍म। निर्देशक bakur bakuradze. 

कुल मिलाकर फिल्‍म समारोह का हमारा पहला दिन मिला-जुला ही रहा। हां इस दौरान फिल्‍म्‍स डिविजन का स्‍टॉल दिलचस्‍प लगा। जहां से कुछ मशहूर डॉक्‍यूमेन्‍ट्री खरीदी जायेंगी। कुछ क्‍लासिक्‍स भी एक स्टॉल पर बिकती नज़र आईं।

कुछ तस्‍वीरें।
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Friday, November 21, 2008

अजमेर यात्रा की तस्‍वीरें-दूसरा भाग । सूफी परंपरा का इतिहास और ख्‍वाजा ग़रीब नवाज़ की कहानी ।


जैसा कि पिछली पोस्‍ट में अर्ज़ किया था कि अचानक अप्रत्‍याशित रूप से हम अजमेर हो आए । चूंकि आग्रह है इसलिए इस बार तफ़सील से सूफ़ी मत और ख्‍वाजा मोईनुद्दीन चिश्‍ती के बारे में बताने की 'कोशिश' की जा रही है ।

दक्षिण-एशिया में सूफ़ी परंपरा की चार शाखाएं प्रचलित हैं ।  

चिश्‍तिया सिलसिला- जिसकी शुरूआत पश्चिमी अफ़ग़ानिस्‍तान के  हेरात या अरिया शहर में हुई थी । इस सिलसिले के संस्‍थापक थे 'अबू इशाक समी' । इस सिलसिले के सबसे मशहूर संत हुए हैं ख्‍वाजा मोईनुद्दीन चिश्‍ती, जो तेरहवीं शताब्‍दी में हुए थे । इस सिलसिले के दूसरे महत्‍त्‍वपूर्ण संत हैं हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्‍ली), फ़रीदुद्दीन गंजशकर (पाकपट्टन, पाकिस्‍तान), कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (दिल्‍ली) वग़ैरह ।

क़ा‍दरिया सिलसिला- ये सूफी परंपरा का सबसे पुराना सिलसिला है, जिसकी बुनियाद अब्‍दुल क़ादिर जीलानी ने रखी थी । कहते हैं कि इस सिलसिले का इतिहास पैग़ंबर हज़रत मोहम्‍मद तक जाता है । दक्षिण पूर्वी एशिया के अलावा ये सिलसिला पूर्वी और पश्चिमी अफ्रीक़ा तक फैला है ।

नक्‍‍शबंदी सिलसिला-इस सिलसिले का आग़ाज़ हज़रत बहाउद्दीन नक्‍शबंद बुख़ारी से होता है । इस सिलसिले की भी कई शाखाएं हैं, जैसे मकसूदी, ताहिरी, उवैसिया वग़ैरह ।

सुहरावर्दी सिलसिला- इस सिलसिले की शुरूआत हज़रत दिया-अल-दीन-अबू-नज़ीब-अस-सुहरावर्दी से होती है ।

तो चिश्‍तिया सिलसिले के फ़कीर थे हज़रत मोईनुद्दीन चिश्‍ती । जिनका जन्‍म सन 1141 में सिस्‍तान में हुआ था । जब वो पंद्रह बरस के थे तो उनके माता-पिता का देहान्‍त हो गया था । परिवार का फलों का एक बग़ीचा और पवन-चक्‍की थी । इन्‍हें 'ग़रीब नवाज़' क्‍यों कहा जाता है इसके पीछे भी एक दंत-कथा है । कहते हैं कि बचपन में ईद-उल-फित्र (मीठी ईद) के दिन वो अपने पिता के साथ नमाज़ अदा करने गए थे । वहां उन्‍होंने एक बच्‍चे को रोते हुए देखा तो इसकी वजह पूछी, उसने बताया कि ईद के दिन सब बच्‍चों ने नये कपड़े पहन रखे हैं । पर उसके पास नए कपड़े नहीं हैं । इसलिए वो रो रहा है । इतना सुनकर मोईनुद्दीन ने अपने कपड़े उस बच्‍चे को दे दिये और खुद पुराने कपड़े पहन लिये । इसके बाद उन्‍हें 'ग़रीब नवाज़' कहा गया ।

एक दिन जब मोईनुद्दीन पौधों को पानी दे रहे थे, तो उन्‍होंने एक बूढ़े को देखा । ये बुज़ुर्गवार शेख इब्राहीम क़ुन्‍दोज़ी थे । उन्‍हें एक पेड़ की छांह में बैठाकर मोईनुद्दीन ने एक पेड़ से तोड़कर ताज़े अंगूर खाने को दिये । बदले में बुज़ुर्गवार ने भी उन्‍हें कुछ खाने को दिया । कहते हैं कि इसके बाद मोईनुद्दीन को इलहाम हुआ, उन्‍होंने दुनियावी चीज़ों को छोड़ दिया और फ़कीर बन गए । इसके बाद वो सफ़र पर निकल पड़े । और आखि़रकार हज़रत उस्‍मान हरवानी के शिष्‍य बन गए ।

कहते हैं कि एक दिन सपने में उन्‍हें पैग़ंबर हज़रत मोहम्‍मद ने दर्शन दिये और उसके बाद उनके हुक्‍म से वो निकल पड़े दक्षिण एशिया की तरफ़ । कुछ दिन लाहौर में रहने के बाद वो अजमेर आ गये और फिर यहीं बस गए ।

मुग़ल बादशाह अकबर (1556-1605) के ज़माने में अजमेर एक बेहद महत्‍त्‍वपूर्ण तीर्थस्‍थल के रूप में मशहूर हुआ । मशहूर फिल्‍म 'मुग़ले-आज़म' में आपने देखा होगा किस तरह अकबर रेगिस्‍तान में पैदल चलकर अजमेर पहुंचे थे और ख्‍वाजा की बारगाह में उन्‍होंने मुराद मांगी और वो पूरी भी हुई थी ।

तो ये थी संक्षिप्‍त पृष्‍ठभूमि ग़रीब नवाज़ के बारे में । और अब अजमेर-यात्रा की तस्‍वीरों का दूसरा भाग--दरअसल सारी तस्‍वीरें इसी भाग में निपटानी है इसलिए मुमकिन है कि धीमे कनेक्‍शन में लोड होने में देर लगे । सभी तस्‍वीरों पर क्लिक करके उन्‍हें बड़ा किया जा सकता है । फिर याद दिला दें: सभी तस्‍वीरें मोबाइल कैमेरे से खींची गई हैं । 

                                   

                               

ये ताकीद भी होती है अब इबादतगाहों में ।
बोर्ड पर लिखा है ज़ायरीन अपने मोबाइल और दीगर सामान की हिफ़ाज़त ख़ुद करें । 

बड़े बड़े करें इबादत । छोटे बच्‍चे खेलें खेल 
रंग बिरंगी तस्‍बीहें ( जाप करने की मालाएं )  
                                   
    
बंगाली बाबू यहां आएं ।                                            


 छोटी देग़ बड़ी देग़ ( दान के पैसों से बनता है लंगर ) 
 

दरग़ाह के बाहर का हाल, गुलाबी 'बुढिया के बाल'                       

मंदी में मद्धम हैं दाम: तीन पांच और आठ रूपए में कुल्‍फी 

इन्‍होंने बड़ों बड़ों को टोपी पहनाई है भाय 
                                       
सीढि़यां खुद बताती हैं वो कहां जा रही हैं । 
 

कॉम्बिनेशन देखिए--एक तरफ स्‍टोव दूसरी तरफ सिंधी ज़बान की सीडीज़  

हम यहीं रूकते हैं आप दर्शन करके आईये ।  

                                
ये है मंटू । फोटू खिंचाने की अदा देखिए ।
क्‍या बाल मज़दूरी वाक़ई खत्‍म हो गई है ।
 

सोणा सोणा सोहन हलवा  
 

चल खुसरो घर आपने । रिक्‍शा है तैयार  

                                                 

 

Wednesday, November 19, 2008

अजमेर यात्रा की तस्‍वीरें: पहला भाग ।।

इस हफ्ते हम अचानक बेहद अप्रत्‍याशित ढंग से अजमेर चले गए । हुआ यूं कि सब चीज़ें सही होती चली गईं और आने-जाने की सारी 'जुगाड़' इतनी आसानी से हो गई कि हमें लगा--ऐसा था तो पहले ही चले जाते । ख़ैर । अप्रत्‍याशित यात्रा की हड़बड़ी के तहत हम पहले से तैयार 'डिजी-कैम' घर पर ही छोड़ गए । ज़ाहिर है कि अपने 'मोबाइल-कैमेरे' की सेवाएं लेनी पड़ीं, जो ऐसे हर मौक़े पर बेहद मुस्‍तैदी से अपनी सीमाओं के बावजूद हमारा साथ निभाता
है । तो पेश हैं अजमेर-यात्रा की तस्‍वीरें ।

 

हां बस ये ज़रूर कहना चाहते हैं कि दरग़ाह के ठीक बाहर कुछ 'म्‍यूजिक स्‍टोरों' की ख़ाक छानी, एक बंदे से पूछा ख़ूब पुरानी क़व्‍वालियां होंगी । उसका जवाब सुनिए--'हमारे यहां तो नुसरत फतेह से शुरू होती हैं क़व्‍वालियां ।'  उल्‍टे पांव भाग खड़े हुए वहां से । लेकिन कुछ दुकानदारों ने 'सहयोग' किया । और जो संग्रह जमा हुआ है वो दिलचस्‍प है । ज़रा नामों पर ग़ौर कीजिए--

 

पाकिस्‍तान के छत्‍तीस बड़े क़व्‍वालों की 171 क़व्‍वालियों की एम.पी.3, जिसमें कुछ नाम हैं---साबरी ब्रदर्स, नुसरत फतेह, मोईन नियाज़ी, ग़ौस मोहम्‍मद नासिर, मंज़ूर वारसी वग़ैरह ।

हबीब पेन्‍टर, इस्‍माईल आज़ाद, यूसुफ़ आज़ाद, मजीद शोला, शंकर शंभू, असलम साबरी, जानी बाबू, वग़ैरह ।

 

हालांकि क़व्‍वालियों से अपना परिचय इतना ज़्यादा नहीं रहा है । पर ये एम.पी.-3 इस्‍लामी, इश्कि़या और मुक़ाबले वाली क़व्‍वालियों को 'सुनने' के मक़सद से तो ख़रीदे ही गए हैं । लेकिन मुख्‍य-मक़सद है 'रेडियोवाणी' पर क़व्‍वालियां सुनवाने के लगातार 'इसरार' को थोड़ा-बहुत पूरा करना । तो क़व्‍वालियां सुनने का इंतज़ार कीजिए । फिलहाल ये तस्‍वीरें देखिए । हो सकता है कि धीमे कनेक्‍शनों में तस्‍वीरें लोड होने में समय लगे । पोस्‍ट को भारी-भरकम होने से बचाने के लिए इसे दो भागों में पेश किया जा रहा है ।

 

 

 

दरगाह का मुख्‍य-द्वार ।

 

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सुबह फलों की शाम फूलों की

 

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क्‍या इन फूलों का कोई मज़हब होता है ।

 

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अब इसकी भी हिदायत देनी पड़ती है ।

 

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ख्‍वाजा मेरे ख्‍वाजा दिल में समा जा

 

4

 

इस बच्‍ची की वीतरागी नज़रों से देखिए प्रवेश द्वार का नज़ारा ।

 

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मुरादों के धागे ।

 

8

 

मुरादें ही मुरादें ।

 

9

 

भर दे झोली

 

10

 

मुरादें पूरी कीजिए, हम फिर आयेंगे

 

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मोरपंख से झड़वाओ, दस रूपये थमाओ

 

12

 

 

ख्‍वाजा का काजल

 

13

 

ख्‍वाजा की चिराग़ी

 

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अकीदत की तिजारत

 

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बरामदे में क़व्‍वालियां

 

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और क़व्‍वालियां ।

 

17

Tuesday, November 4, 2008

रज़्ज़ाक मियां 'रिकॉर्ड वाले' 'किताब-महल' डॉ. डी.एन.रोड फोर्ट मुंबई 400 001

किसी वजह से दो तीन दिन पहले जब चर्चगेट के इलाक़े में जाना पड़ा तो मन नहीं माना कि यूं ही लौट जाएं । दरअसल बरसों-बरस विविध-भारती के स्‍टूडियोज़ इसी इलाक़े में रहे हैं और बरसों-बरस हमने चर्चगेट और फोर्ट के इलाक़ों में मटरगश्‍ती की है । इस इलाक़े में पैदल घूमने के बड़े मज़े हैं । हर बार शहर का एक नया चेहरा नज़र आ जाता है ।

 

हालांकि आजकल जब चर्चगेट से फ्लोरा फाउंटेन की तरफ़ बढ़ें तोbooks bazaar अनायास वो किताबें बेचने वाले याद आ जाते हैं जो टेलीग्राफ़ ऑफिस की पुरातन इमारत के सामने से लेकर फ्लोरा फाउंटेन के चौराहे तक और फिर सड़क के उस पार वी.एस.एन.एल की इमारत के फुटपाथ वाले आखिरी हिस्‍‍से तक पर जमे रहते थे । अब वो नदारद हैं । हो सकता है कि कहीं रेडिमेड कपड़े बेच रहे हों-फैशन स्‍ट्रीट पर । दरअसल मुंबई की महानगर पालिका ने समझा कि पुस्‍तकों का ये बाज़ार निहायत ही बदसूरत है । शहर की सड़क पर चलने वालों के लिए दिक्‍कत है । इसकी क्‍या ज़रूरत है । और बस इस अतिक्रमण को एक झटके में साफ कर दिया गया । और बरसों से जो अड्डा था पुरानी अनुपलब्‍ध किताबों को खोजने का....वो वीरान हो गया ।

 

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books bazar 1

( ऊपर के दोनों चित्र फ्लिकर से साभार )

 

इस इलाक़े से आहें भरते हुए आगे बढ़े तो रज्‍़ज़ाक मियां की दुकान नज़र आ गई जो नवसारी बिल्डिंग के क़रीब 'किताब महल' नामक

.... विलायत खां साहब के रिकॉर्ड का कवर भी फोर्ट की सैकड़ों बरस पुरानी इमारत के अहाते में पत्‍थर पर ठुंकी कील से लटकता नज़र आयेगा ।

इमारत के अहाते में है । अगर तफ़सील से कहें तो ये वो सड़क है जो चर्चगेट से वी.टी. ( सॉरी सॉरी CST यानी छत्रपति शिवाजी टर्मिनस ) की ओर जाती है और जिसे फोर्ट कहा जाता है, वैसे सरकारी तौर पर इस सड़क को क्‍या कहा जाता है, हमें याद नहीं  था, पर रज़्ज़ाक मियां के कार्ड को देखकर याद आया कि ये तो डॉ. डी.एन.रोड है । जब से हम इस शहर में हैं रज़्ज़ाक मियां की इस दुकान से हमारा आमना सामना होता रहा है । और सिर्फ देखने दिखाने के लिए नहीं बल्कि कुछ दुर्लभ कैसेट्स भी ख़रीदें है अपन ने रज़्ज़ाक की दुकान से । वो भी उस ज़माने में जब कैसेट्स की पूछ-परख कम हो चुकी थी । इनमें से ज्‍यादातर वेस्‍टर्न इंस्‍ट्रूमेन्‍टल्‍स हैं । कुछ बंट गए यार-दोस्‍तों में ।

 

लेकिन इस बार जब रज़्ज़ाक मियां की दुकान पर खड़े हुए तो कुछ ख़रीदने का इरादा नहीं था । बस तस्‍वीरें लेनी थीं और कुछ बातें करनी थीं । रज़्ज़ाक मियां कहते हैं कि आज के ज़माने में भी रिकॉर्डों, पुराने डाक-टिकिटों और पोस्‍ट-कार्डों का संग्रह करने वालों की कमी नहीं है । कई बार रिकॉर्डों के नाम उनके लिखवा दिये जाते हैं, जिनकी खोज-बीन का सिलसिला जारी रहता है । दूसरे शहरों से भी दीवाने अपनी तलाश का सिर पकड़कर यहां तक चले आते हैं । रज़्ज़ाक मियां फोर्ट के इलाक़े में भले ही रिकॉर्ड बेचने वाले अकेले दुकानदार हों पर बंबई में ऐसे और भी ठिकाने हैं । और यहां ऐसे बेशक़ीमती नगीने आपके हाथ लग सकते हैं, जिनकी तलाश आपको बरसों बरस से रही होगी ।

 

मैं आपको बता दूं कि पुराने रिकॉर्ड प्‍लेयर्स भी बाज़ार में बड़ी तादाद में उपलब्‍ध रहते हैं । ख़ासकर चोर-बाज़ार में । इसके अलावा एक बड़ी ज़रूरत रिकॉर्ड कलेक्‍टर्स को रहती है स्‍टाइलस की । यानी उस सुई की, जिसके ज़रिये रिकॉर्ड 'बजते' हैं  । ये सारी चीज़ें इस तरह के ओने-कोने की दुकानों, फुटपाथों या गुमठियों पर बिक रही हैं । जबलपुर के गुरंदी मार्केट में मैंने कई कई बार पुरानी फिल्‍मों के रिकॉर्ड बिकते देखे । एल.पी.भी और ई.पी. भी ।

 

बहरहाल..रज़्ज़ाक मियां की दुकान पर जहां 'नैट किंग कोल', मौजूद हैं तो दूसरी तरफ़ 'बड़े गुलाम अली खां' भी हैं । शिव-हरि की जोड़ी की जुगलबंदी के पुराने हसीन रिकॉर्ड भी यहां मिलेंगे तो विलायत खां साहब के रिकॉर्ड का कवर भी फोर्ट की सैकड़ों बरस पुरानी इमारत के अहाते में पत्‍थर पर ठुंकी कील से लटकता नज़र आयेगा । और हिंदी की पुरानी फिल्‍मों के ऐसे ऐसे रिकॉर्ड कि आप अश अश कर उठें । अपने मोबाइल से खींचीं गयीं तस्‍वीरें पेश हैं रज़्ज़ाक साहब की दुकान की । साथ ही उनके विजिटिंग कार्ड को स्‍कैन करके पेश किया जा रहा है ताकि कभी ज़रूरत हो तो आपमें से कोई संपर्क कर सके । हां यहां रज़्ज़ाक़ मियां जैसे लोग तभी तक जिंदा है जब तक शहर को शंघाई बनाने वाली ताक़तों को बदसूरत नहीं लग रहे हैं । हो सकता है कि किसी दिन बुक-ज़ोन की तरह इनको भी खदेड़ दिया जाये ।

 

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        record collector

 

वैसे चलते-चलते ये बात भी बता दूं कि ख़ास तौर पर ये पोस्‍ट बैंगलोर के हमारे मित्र शिरीष कोयल की नज़र है । जो साहिर लुधियानवी के शुरूआत से लेकर आखिर तक सारे गाने जमा कर रहे हैं । साहिर के कुछ अनमोल गाने अभी तक उनकी पहुंच से बाहर हैं । आप उनकी मदद कर सकें तो अच्‍छा है ।

Tuesday, April 8, 2008

पालीवालों के प्राचीन-रहस्‍यमय गांव कुलधरा की तस्‍वीरें और इतिहास ।

तरंग पर मैं अपनी जैसलमेर यात्रा की डायरी लिख रहा हूं । जो लगातार अनियमित होती जा रही है । निजी और पेशेवर जिंदगी की व्‍यस्‍तताएं उस तरह का सुकून नहीं दे पा रही हैं जिनमें एक एक लम्‍हे को याद करके डायरी पर उतारा जा सके । पिछली पोस्‍ट थी जैसलमेर के किले के बारे में । जिसमें मैंने आपको बताया था कि किस तरह सारा शहर किले में बसा है ।

अब आपको बता दूं कि हड़बड़ी में जैसलमेर का किला देखने के बाद हम सीमा सुरक्षा बल के जैसलमेर परिसर में पहुंचे और वहां युद्ध में विधवा हुई स्त्रियों तथा फौजियों के परिवार की अन्‍य महिलाओं की रिकॉर्डिंग की गयी । चूंकि महिलाओं की तादाद ज्‍यादा थी इसलिए सखियों के अलावा हमें भी..यानी हम पुरूषों को भी इस कार्यक्रम का संचालन करना पड़ गया । बहरहाल । यहां से एक बहुत ही अहम ठिकाना था हमारा और वो था कुलधरा । कुलधरा पालीवालों का गांव था और पता नहीं क्‍या हुआ कि एक दिन अचानक यहां फल-फूल रहे पालीवाल अपनी इस सरज़मीं को छोड़कर अन्‍यत्र चले गये । उसके बाद से कुलधरा पर कोई बस नहीं सका । कोशिशें हुईं पर नाकाम हो गयीं । कुलधरा के अवशेष आज भी विशेषज्ञों और पुरातत्‍वविदों के अध्‍ययन का केंद्र हैं । कई मायनों में पालीवालों ने कुलधरा को वैज्ञानिक आधार पर विकसित किया था । इसलिए आज मैं आपको कुलधरा के इतिहास के बारे में तो बताऊंगा की साथ ही उसके अनमोल तस्‍वीरें भी दिखलाऊंगा ।

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कुलधरा जैसलमेर से तकरीबन अठारह किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है । सबने कहा था कि जैसलमेर जाएं तो कुलधरा जरूर जाना । कहते हैं कि पालीवाल समुदाय के इस इलाक़े में चौरासी गांव थे और ये उनमें से एक था । मेहनती और रईस पालीवाल ब्राम्‍हणों की कुलधार शाखा ने सन 1291 में तकरीबन छह सौ घरों वाले इस गांव को बसाया था । पालीवालों का नाम दरअसल इसलिए पड़ा क्‍योंकि वो राजस्‍थान के पाली इलाक़े के रहने वाले  थे । पालीवाल ब्राम्‍हण होते हुए भी बहुत ही उद्यमी समुदाय था । अपनी बुद्धिमत्‍ता, अपने कौशल और अटूट परिश्रम के रहते पालीवालों ने धरती पर सोना उगाया था । हैरत की बात ये है कि पाली से कुलधरा आने के बाद पालीवालों ने रेगिस्‍तानी सरज़मीं के बीचोंबीच इस गांव को बसाते हुए खेती पर केंद्रित समाज की परिकल्‍पना की थी । रेगिस्‍तान में खेती । पालीवालों के समृद्धि का रहस्‍य था जिप्‍सम की परत वाली ज़मीन को पहचानना और वहां पर बस जाना । पालीवाल अपनी वैज्ञानिक सोच, प्रयोगों और आधुनिकता की वजह से उस समय में भी इतनी तरक्‍की कर पाए थे ।

पालीवाल समुदाय आमतौर पर खेती और मवेशी पालने पर निर्भर रहता था । और बड़ी शान से जीता था । इतिहास के झरोखों में आगे झांकने से पहले ज़रा कुछ तस्‍वीरों पर एक नज़र डाल लीजिए । कुलधरा के मुख्‍य द्वार पर अपने गाइड के इंतज़ार में बैठे हम तरंगित ।

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कुलधरा के मुख्‍य द्वार पर बंजारा समुदाय का एक वृद्ध बटलोई में खिचड़ी पका रहा था । और पास में बैटरी से चलने वाला रेडियो चल रहा था । हमारे क्‍लीनर ने उसे बताया कि विविध भारती की टोली कुलधरा देखने आई है । और एक फोटो-सेशन हो गया उस बंजारे के साथ । इस तस्‍वीर में बांईं ओर अशोक सोनावने, फिर हम 'तरंगित', महाशय 'बंजारे', 'जिप्‍सी' कमल शर्मा और फिर 'रेडियोसखी' ममता सिंह ।

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दोपहर-ऐ-इंतज़ार में क्‍या क्‍या ना कर बैठे । कभी बस के भीतर लेटे, कभी बस की छत पर बैठे ।

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दरअसल हमारे गाइड पेशे से टीचर और लेखक हैं और आकाशवाणी जैसलमेर के सौजन्‍य से वो हमारे लिए जैसलमेर शहर से पधार रहे थे इसलिए उनके इंतज़ार में इतने पापड़ बेलने पड़े हमें । पालीवालों के इतिहास के बारे में ज्‍यादातर जानकारी हमारे गाइड महोदय ने ही दी है और बाक़ी जानकारियां आपके इस तरंगित लेखक ने इंटरनेटी छानबीन से जमा की हैं । अब तक मैंने आपको बताया कि पालीवाल खेती और मवेशियों पर निर्भर रहते थे और इन्‍हीं से समृद्धि अर्जित करते थे । दिलचस्‍प बात ये है कि रेगिस्‍तान में पालीवालों ने सतह पर बहने वाली पान या ज़मीन पर मौजूद पानी का सहारा नहीं लिया । बल्कि रेत में मौजूद पानी का इस्‍तेमाल किया । पालीवाल ऐसी जगह पर गांव बसाते थे जहां धरती के भीतर जिप्‍सम की परत हो । जिप्‍सम की परत बारिश के पानी को ज़मीन में अवशोषित होने से रोकती और इसी पानी से पालीवाल खेती करते । और ऐसी वैसी नहीं बल्कि जबर्दस्‍त फसल पैदा करते । पालीवालों के जल-प्रबंधन की इसी तकनीक ने थार रेगिस्‍तान को इंसानों और मवेशियों की आबादी या तादाद के हिसाब से दुनिया का सबसे सघन रेगिस्‍तान बनाया । पालीवालों ने ऐसी तकनीक विकसित की थी कि बारिश का पानी रेत में गुम नहीं होता था बल्कि एक खास गहराई पर जमा हो जाता था ।

कुलधरा की वास्‍तुकला के बारे में हमारे गाइड ने कुछ दिलचस्‍प तथ्‍य बताए । उनका कहना था कि कुलधरा में दरवाज़ों पर ताला नहीं लगता था । गांव का मुख्‍य-द्वार और गांव के घरों के बीच बहुत लंबा फ़ासला था । लेकिन ध्‍वनि-प्रणाली ऐसी थी कि मुख्‍य-द्वार से ही क़दमों की आवाज़ गांव तक पहुंच जाती थी । दूसरी बात उन्‍होंने ये बताई कि गांव के तमाम घर झरोखों के ज़रिए आपस में जुड़े थे इसलिए एक सिरे वाले घर से दूसरे सिरे तक अपनी बात आसानी से पहुंचाई जा सकती थी । घरों के भीतर पानी के कुंड, ताक और सीढि़यां कमाल के हैं । कहते हैं कि इस कोण में घर बनाए गये थे कि हवाएं सीधे घर के भीतर होकर गुज़रती थीं । कुलधरा के ये घर रेगिस्‍तान में भी वातानुकूलन का अहसास देते थे । 

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ऐसा उन्नत और विकसित गांव एक दिन अचानक खाली कैसे हो गया । ये एक रहस्‍य ही है ।

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कहते हैं कि जैसलमेर की राजा सालम सिंह को कुलधरा की समृद्धि बर्दाश्‍त नहीं हो रही थी । उसने कुलधरा के बाशिंदों पर भारी कर/टैक्‍स लगा दिये थे । पालीवालों का तर्क था कि चूंकि वो ब्राम्‍हण हैं इसलिए वो ये कर नहीं देंगे । जिसे राजा ने ठुकरा दिया । ये बात स्‍वाभिमानी पालीवालों को हज़म नहीं हुई और मुखियाओं के विमर्श के बाद उन्‍होंने इस सरज़मीं से जाने का फैसला कर लिया । इस संबंध में एक कथा और है । कहते हैं कि जैसलमेर के दिलफेंक दीवान को कुलधरा की एक लड़की पसंद आ गयी थी । ये बात पालीवालों को बर्दाश्‍त नहीं हुई और रातों रात वो यहां से हमेशा हमेशा के लिए चले गये । अब सच क्‍या है ये जानना वाक़ई बेहद मुश्किल है । लेकिन कुलधरा के इस वीरान खंडहर में घूमकर मुझे बहुत अजीब- सा लगा । इन घरों, चबूतरों, अटारियों को देखकर पता नहीं क्‍यों ऐसा लग रहा था कि अभी कोई महिला सिर पर गगरी रखे निकल पड़ेगी या कोई बूढ़-बुजुर्ग चबूतरे पर हुक्‍का गुड़गुड़ाता दिखेगा । बच्‍चे धूल मिट्टी में लिपटे खेलते नज़र आएंगे । पगड़ी लगाए पालीवाल अपने खेतों पर निकल रहे होंगे । पर सच ये है कि सदियों से पालीवालों का ये गांव पूरी तरह से वीरान है ।

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कुलधरा के बारे में एक बात और कहनी है । कुलधरा अभी भी चर्चित पर्यटन-स्‍थल नहीं है । जब हम वहां पहुंचे तो दक्षिण की एक फिल्‍म यूनिट अपनी चर्चित पौराणिक फिल्‍म की शूटिंग कर रही थी । एक बंदा राक्षस बना था जिसने अपनी तस्‍वीरें खिंचाने से इंकार कर दिया । लेकिन विविध भारती के लोगों से बातचीत करके उसे बड़ा मज़ा आया । हमें ये भी पता चला कि कुछ विदेशी पर्यटक यहां इस उम्‍मीद में आते हैं कि पालीवालों ने जो सोना यहां दबा रखा था शायद वो उन्‍हें मिल जायेगा । इसलिए कुलधरा में जगह जगह खुदाई हुई पड़ी है । इसके अलावा शायद चोरी छिपे या घोषित रूप से यहां से पत्‍थरों को खींचकर निकाला जा रहा है और शहर के निर्माण स्‍थलों में इस्‍तेमाल किया जा रहा है । ऐसे वीरान गांवों को देखकर मन बेचैन हो जाता है । शायद कुलधरा का सही डॉक्‍यूमेन्‍टेशन हो सके और सरकार इसे एक पुरातात्‍विक धरोहर का दर्जा दिलवा पाए । अफ़सोस के पालीवालों के वैज्ञानिक रहस्‍य कुलधरा के अवशेषों के साथ ही गुम हो जाएंगे ।

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