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Tuesday, December 11, 2018

अदाकार-ए-आज़म


लोकमत समाचार में 10
दिसंबर को प्रकाशित कॉलम ज़रा हटके—


हिंदी सिनेमा के अदाकार-ए-आज़म दिलीप कुमार का जन्‍मदिन आता है ग्‍यारह दिसंबर को। वो शख्‍स जिसने हिंदी-सिनेमा के इतिहास को बदलकर रख दिया।

ये जिक्र दिलचस्‍प है कि दिलीप कुमार ने गाने भी गाए हैं। पहला गाना उन्‍होंने सन 1957 में आई फिल्‍म मुसाफिरमें लता जी के साथ गाया था। ऋत्विक घटक की लिखी इस फिल्‍म को ऋषिकेश मुखर्जी ने बनाया था। ये हिंदी सिनेमा की पहली एपीसोडिक फिल्‍म कही जा सकती है। शैलेंद्र का लिखा गीत था, संगीत सलिल चौधरी का और इस गाने के बोल थे—‘लागी नाहीं छूटे रामा। इस गाने में दिलीप साहब एकदम पक्‍के लग रहे हैं। इस धुन से फिल्‍म अभिमान’ (1973) का गीत नदिया किनारे हिराए आई कंगनाभी याद आ जाता है।
दिलीप कुमार ने एक फिल्‍म के लिए खास तौर पर सितार बजाना सीखा था। सिर्फ इसलिए कि उनकी उंगलियों पर फोकस किया जाता। ऐसे में उन्‍हें कतई गवारा नहीं होता कि किसी डबलकी उंगलियों पर शॉट ले लिया जाए। मधुबन में राधिका नाचे रे’-- इस गाने को दिलीप साहब ने कितनी खूबसूरती से निभाया है। ऐसा रहा है दिलीप कुमार का जुनून। यूसुफ साहब को सालगिरह मुबारक।

इसके अलावा दिलीप साहब ने सुभाष घई की फिल्‍म कर्मामें पूछे मेरी बीवी डू यू लव मीजैसा मज़ाहिया मिज़ाज वाला गाना भी गाया था। सन 1948 में आई फिल्‍म मेलाउनके करियर की एक अहम फिल्‍म थी। नौशाद के संगीत से सजी इस फिल्‍म में कई बेहतरीन गाने थे। धरती को आकाश पुकारे’, ‘गाये जा गीत मिलन के’, ‘मैं भंवरा तू है फूलवग़ैरह। अंदाज़का गाना टूटे ना दिल टूटे नावो गाना है जिसमें दिलीप कुमार पियानो बजा रहे हैं और उनके सामने राजकपूर और नरगिस खड़े हैं। जबकि हारमोनियम बजाते हुए वो परदे पर गाते नज़र आए—‘हुस्‍न वालों को ना दिल दो ये मिटा देते हैं। ये तलत मेहमूद का गाया गाना है। इसी फिल्‍म में तलत का गाया गाना था—‘मेरा जीवन साथी बिछड़ गया लो ख़त्‍म कहानी हो गयी। तलत मेहमूद इस दौर में दिलीप कुमार के लिए ख़ूब गा रहे थे। सन 1951 में आई फिल्‍म तरानामें तलत ने गाया—‘सीने में सुलगते हैं अरमानऔर एक मैं हूं एक मेरी बेकसी की शाम है
सन 1951 में ही आई दीदारका एक गाना ख़ासतौर पर याद करना चाहूंगा। तांगे पर दिलीप कुमार और नरगिस चले जा रहे हैं और इस दौरान दिलीप साहब गा रहे हैं—‘बचपन के दिन भुला ना देना। यहां वो रफ़ी साहब की आवाज़ में गा रहे हैं। आपको बता दें कि यही गाना बेबी तबस्‍सुम और बालक परीक्षित साहनी पर भी फिल्‍माया गया था। और यहां आवाज़ें लता मंगेशकर और शमशाद बेगम की थीं। सन 1952 में आई फिल्‍म संगदिल। जिसमें शम्‍मी सितार बजा रही हैं और दिलीप साहब गा रहे हैं—‘ये हवा ये रात ये चांदनी। राजेंद्र कृष्‍ण के बोल और सज्‍जाद की तर्ज़। इसी साल आई फिल्‍म दाग़। जिसमें तलत महमूद ने गाया—‘ऐ मेरे दिल कहीं और चल। अपनी तरह का एकदम अलग गाना। मेहबूब ख़ान की कालजयी फिल्‍म आनमें नौशाद साहब ने क्‍या खनकता हुआ संगीत दिया। मान मेरा अहसान’, ‘मुहब्‍बत चूमे जिनके हा‍थ’, ‘दिल में छिपाकर प्‍यार का तूफान ले चले’....

yunus.radiojockey@gmail.com
लेखक विविध भारती में कार्यरत हैं।

Monday, December 3, 2018

विश्‍वजीत के साथ कुछ पल



लोकमत समाचार मेें आज



बीते हफ्ते एक आयोजन के सिलसिले में मेरी मुलाक़ात जाने-माने अभिनेता विश्‍वजीत से हुई और उन्‍हें क़रीब से जानने का मौक़ा मिला। विश्‍वजीत के साथ जब आयोजन की बात तय हुई तब से ही मुझे लाल स्‍वेटर वाली उनकी छबि याद आ रही थी—या फिर लाल कोट और खुली हुई कमांडर जीप—और उनका गाना—
पुकारता चला हूं मैं। या उनके बाक़ी रूमानी गाने—खासतौर पर ये नयन डरे डरे

विश्‍वजीत रूमानी नायकों की पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। बचपन से फिल्‍मी पर्दे पर उन्‍हें नायिकाओं के इर्द-गिर्द गाने गाते देखना एकदम अलग बात थी और बयासी बरस की उम्र में उन्‍हें एयरपोर्ट पर देखना एकदम अलग बात। विश्‍वजीत की कहानी सुनाने से पहले मैं जिंदगी की कुछ तल्‍ख़ हक़ीक़तों से आपको वाकिफ करवाता चलूं। मुंबई का एकदम व्‍यस्‍त एयरपोर्ट। शनिवार का दिन। सुबह का वक्‍त। सफेद हाई-नेक में विश्‍वजीत एयरपोर्ट पर बैठे हैं। चेहरे पर उम्र की इबारत साफ है। कोई उन्‍हें पहचान ही नहीं रहा है। सच तो ये है कि मुझे पहचानने में भी वक्‍त लगा। रेडियो और उससे इतर कामों के सिलसिले में नियमित रूप से फिल्‍म-कलाकारों से मिलना जुलना होता है। उनसे भी जिनका काम इस वक्‍त शबाब पर है और उनसे भी जो बीते दौर के सितारे बन चुके हैं। यक़ीन मानिए—रोज़ाना खुद को ये याद‍ दिलाते रहिए कि वक्‍त कपूर की तरह उड़ जाता है। ग़ायब। मुट्ठी खोलें तो वक्‍त की झुर्रियां नज़र आती हैं। इसलिए बीतते वक्‍त को बहुत गरिमा के साथ स्‍वीकार करने में ही भलाई है।

फिल्‍मी सितारे अमूमन ऐसा नहीं करते। भीड़ से घिरी उनकी जिंदगी एक सपने की तरह होती है। सपने में भीड़ मौजूद रहती है—हक़ीक़त में भीड़ उन्‍हें छोड़कर किसी और को घेर लेती है। और इसे स्‍वीकारना मुश्किल होता है। चलिए विश्‍वजीत की कहानी शुरू करते हैं। बयासी बरस की उम्र में वो एकदम फिट हैं। सपाट पेट। छरहरा शरीर। क्‍या खाना है, क्‍या नहीं। एकदम तय है सब। तनकर चलते हैं। अदाएं वही हैं पर्दे वाली। कैप, कंधे पर जैकेट और एकदम अदा वाली चाल। और ढेर सारी पुरानी यादें। कैसे किसी फिल्‍म की शूटिंग में वो स्‍टोन क्रैशर में फंसते बचे। कैसे आग में घिरे। कैसे नॉन ग्‍लैमरस रोल भी स्‍वीकार किए।

पिताजी की याद। जिन्‍होंने एक दिन कह दिया था कि एक्टिंग और घर में से किसी एक चीज़ का चुनाव कर लो। विश्‍वजीत उस दिन घर छोड़कर निकल गये थे। ये कोलकाता था। पचास के दशक के अंत वाला कोलकाता। दोस्‍तों ने एक छोटी कोठरी दिलवा दी। थियेटर में काम जारी रहा।
साहेब बीवी और गुलामप्‍ले चल रहा था। भूतनाथ का संवाद बोलते हुए मंच से देखा तो पहली पंक्ति में गुरूदत्‍त बैठे हैं। बेमिसाल गुरूदत्‍त। उफ। ये क्‍या। बहरहाल—प्‍ले पूरा हुआ। गुरूदत्‍त मिले और उन्‍होंने कहा कि मैं इस नाटक पर फिल्‍म बनाना चाहता हूं। तुम्‍हें मुंबई आना होगा। स्‍क्रीन-टेस्‍ट हुआ। सब तय हो गया। और सामने पाँच साल का कॉन्‍ट्रैक्‍ट रख दिया गया। विश्‍वजीत चैटर्जी ने इसे अस्‍वीकार कर दिया। क्‍योंकि दोस्‍तों ने समझाया कि गुरूदत्‍त जैसे सनकी आदमी के साथ पाँच साल बंधकर नहीं रह पायेगा तू। वापस कोलकाता। बांग्‍ला फिल्‍में। थियेटर। छोटे मोटे रोल। यानी बस काम जारी रहा।

एक दिन हेमंत कुमार आ गये। बोले
, विश्‍वजीत तुम्‍हें थियेटर छोड़ना होगा, तुम मेरी फिल्‍म कर रहे हो। हेमंत कुमार नामी संगीतकार थे। और फिल्‍में बनाना उनका शग़ल था। हेमंत-बेला प्रोडक्‍शन के तहत कुछ बांग्‍ला फिल्‍में बना डाली थीं। अब गीतांजली फिल्‍म्‍स के बैनर तले हिंदी फिल्‍मों का कारवां चलाना था। कहानी भी चुनी तो ऑर्थर कानन डायल की द हाउंड ऑफ बास्‍करविलबीस साल बादकी वजह से कोलकाता छूट गया। और फौजी डॉक्‍टर पिता के कारण अलग अलग शहरों में पले बिस्‍वजीत को अच्‍छी हिंदी बोलने में कभी दिक्‍कत भी नहीं आई। विश्‍वजीत हिंदी फिल्‍मों में जम गये। बीस साल बादआज भी बेहतरीन सस्‍पेन्‍स फिल्‍मों में गिनी जाती है। इसका असर ये हुआ कि इसके बाद इसी तरह की फिल्‍में मिलने लगीं। कोहरा’, ‘बिन बादल बरसात’, ‘बीस साल बादसब की सब सस्‍पेन्‍स फिल्‍में। विश्‍वजीत सस्‍पेन्‍स सिनेमा के नायक कहे जाने लगे।

इस इमेज को तोड़ने के लिए उन्‍होंने अपना पैंतरा बदला। अब वो बन गये चॉकलेटी हीरो। 1965 में आई
मेरे सनमने उन्‍हें पूरी तरह रूमानी हीरो बना दिया और उसके बाद अपने पूरे करियर वो हीरोइनों के गिर्द गाने ही गाते रहे। और गाने भी ऐसे वैसे नहीं। अमूमन ओ पी नैयर, हेमंत कुमार और शंकर जयकिशन वग़ैरह के संगीत वाले बेमिसाल गाने। विश्‍वजीत उस दौर में आए जब सुनहरे संगीत का दौर शबाब पर था। फिल्‍में चलें ना चलें, गाने चलते थे। इतने चलते थे कि वो आज तक चलते ही जा रहे हैं। और हमारे और आपके पसंदीदा गाने हैं।

विश्‍वजीत
, जॉय मुखर्जी, शम्‍मी कपूर वगैरह उस पीढ़ी के नायक हैं—जब रूपहले पर्दे पर रूमानियत का कोहरा था। ये वो फिल्‍में हैं जो एक सपनीली दुनिया रचती हैं। वो फिल्‍में जो हक़ीक़त से आपको अलग करके एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं- जहां सिर्फ चाशनीदार मुहब्‍बत है। पर मैंने इस यात्रा में देखा कि लोग विश्‍वजीत को दिलो-जान से चाहते हैं। दरअसल वो विश्‍वजीत को नहीं नॉस्‍टेलजिया को प्‍यार करते हैं।  

Friday, November 30, 2018

माय नेम इज़ एंथनी गोन्‍ज़ालविस


क्‍या आपको पता है कि अमिताभ बच्‍चन ने जब 1977 में परदे पर गाया—‘माय नेम इज़ एंथनी गोन्‍ज़ालविस। तो असल में इस गाने के ज़रिये वो संगीतकार जोड़ी लक्ष्‍मीकांत-प्‍यारेलाल के प्‍यारेलाल शर्मा जी की एक बरसों पुरानी तमन्‍ना को पूरा कर रहे थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि अमर-अकबर-एंथनीके निर्माण के दौरान प्‍यारेलाल जी ने मनमोहन देसाई से ख़ास अनुरोध किया था अमिताभ के किरदार का नाम एंथनी फर्नान्डिस की बजाय उनके गुरू के नाम पर एंथनी गोन्‍ज़ालविस रख दिया जाए। फिर वो गीत बना जिसका मैंने जिक्र किया। लेकिन सवाल ये है कि कौन थे ये एंथनी गोन्‍ज़ालविस।


एंथनी गोन्‍ज़ालविस भारतीय फिल्‍म उद्योग के एक जाने-माने वायलिन-वादक और म्‍यूजिक-अरेन्‍जर थे। साल 2012 में 84 साल की उम्र में उन्‍होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उसी बरस गोवा के अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में उन पर केंद्रित डॉक्‍यूमेन्‍ट्री को विशेष जूरी पुरस्‍कार दिया गया। गोवा के चर्चित वृत्‍तचित्र निेर्देशक अशोक राणे ने काफी शोध के बाद इस डॉक्‍यूमेन्‍ट्री का निर्माण किया था। आपको बता दें कि एंथनी गोन्‍ज़ालविस का जन्‍म सन 1828 में गोवा के माजोर्दा गांव में हुआ था। बचपन से ही वो संगीत में
, खासकर वायलिन बजाने में इतने माहिर हो गए थे कि उन्‍हें अपने गांव माजोर्डा के चर्च का कॉयर-मास्‍टरनियुक्‍त कर दिया गया था। सन 1943 में वो मुंबई आ गये। मुंबई में वो संगीतकार नौशाद की संगीत-टोली में वायलिन-वादक के रूप में शामिल हो गए थे। बाद में वो बॉम्‍बे टॉकीज़से भी जुड़ गये। उन्‍होंने जिन संगीतकारों के साथ काम किया उनमें अनिल विश्‍वास, गुलाम हैदर, श्‍याम सुंदर, नौशाद, गुलाम मोहम्‍मद, सचिन देव बर्मन, सलिल चौधरी और मदनमोहन शामिल हैं। कहते हैं कि एंथनी गोन्‍ज़ालविस भारतीय सिनेमा के पहले म्‍यूजिक अरेन्‍जर थे। पचास और साठ के दशक में उन्‍होंने कई नामी फिल्‍मों के संगीत में ऑर्केस्‍ट्रा का संचालन किया या ये कहें कि म्‍यूजिक-अरेन्‍ज किया। जिनमें महल’, ‘नया दौरऔर दिल्‍लगीजैसी फिल्‍में शामिल हैं।

फिल्‍म भाभी की चूडियांके मशहूर गीत ज्‍योति कलश छलके’,  फिल्‍म प्यासाके गीत हम आपकी आंखों में’, फिल्‍म फुटपाथके गाने शाम-ए-ग़म की क़सम’, फिल्‍म आवाराके घर आया मेरा परदेसीऔर फिल्‍म महलके गीत आयेगा आने वालाका संगीत-संयोजन एंथनी गोन्‍ज़ालविस ने ही किया था। यही नहीं फिल्‍म  जालके गाने ये रात ये चांदनी फिर कहां’, फिल्‍म टैक्‍सी ड्राइवरके जायें तो जायें कहांऔर पहली नज़रके दिल जलता है तो जलने देमें भी उनका योगदान था, इस गाने के ज़रिये मुकेश ने अपना करियर शुरू किया था।

सन 1958 में उन्‍होंने इंडियन सिम्‍फनी ऑर्केस्‍ट्राबनाया था, जिसमें एक सौ दस साजिंदे शामिल थे। मुंबई के सेन्‍ट ज़ेवियर कॉलेज में इस ऑर्केस्‍ट्रा ने अपनी पहली संगीत प्रस्‍तुति दी थी। 23 साल के अपने करियर में उन्होंने करीब पांच हज़ार गानों का म्‍यूजिक अरेन्‍ज किया। उस दौर में बनने वाले लगभग हर गाने का म्‍यूजिक अरेन्‍जमेन्‍ट एंथनी साब का ही होता था। संगीतकार प्‍यारेलाल कहते हैं कि जब वो चौदह साल के थे, तो अपने पिता के म्‍यूजीशियन होने के बावजूद उनसे सीखना चाहता था। भारतीय और पश्चिमी शैली का वायलिन मैंने कई बरस तक उन्‍हीं से सीखा। प्‍यारेलाल के अलावा संगीतकार राहुल देव बर्मन भी उनके शिष्‍य थे।


Friday, November 9, 2018

रंगोली सजाओ रे-- ज़रा हट के- दीपावली विशेष- यूनुस ख़ान

लोकमत समाचार में सोमवार 5 नवंबर को प्रकाशित




ये दीवाली के दिन हैं। त्‍यौहार ने दरवाज़े पे दस्‍तक दे दी है। पता नहीं अब वो ज़माना कहां हवा हो गया
, जब ताज़े पुते चूने की गंध फैली होती थी घर में। आँगन द्वार सब नया-नया सा हो जाता था। खील-बताशे
, कंदील, पटाख़े...रॉकेट-अनार। सब के सब दीवाली को दीवाली बनाते थे। आज हम सब अकसर बातें करते हैं कि अब त्‍यौहारों का वो उत्‍साह कहां बिलाता जा रहा है। अमूमन इसका वाजिब जवाब किसी के पास नहीं है। बहरहाल... आईये दीपावली के इन दिनों में बातें करें कुछ फिल्‍मी गीतों की।

आपको बतायें कि दीपावली के सबसे पुराने गानों में से एक है सन 1941 में आयी फिल्‍म
ख़ज़ांचीका गाना—दीवाली फिर आ गयी सजनी/दीप से दीप जला ले। इस गाने को गाया था शमशाद बेगम ने। गीतकार थे वली साहब और संगीतकार गुलाम हैदर। बिलकुल यही दौर था जब कुंदनलाल सहगल ने फिल्‍म स्‍ट्रीट सिंगरमें एक गीत गाया—लक्ष्‍मी मूरत दरस दिखाए। ये सन 1938 की बात है।

ज़रा सोचिए ये वो दौर था जब भारत आज़ाद नहीं था और फिल्‍म संगीत अपने शैशव काल में था। इसी दौर में कुछ दीपावली गीत आए हैं—जैसे फिल्‍म
'किस्‍मतका गाना—घर घर में दीवाली है मेरे घर में अंधेरा...इसे अमीर बाई कर्णाटकी ने गाया था, गीत कवि प्रदीप का था और संगीत अनिल बिस्‍वास का। बॉम्‍बे टॉकीज़ की फिल्‍म किस्‍मतवही फिल्‍म है जिसमें दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्‍तान हमारा हैजैसा राष्‍ट्र को जगाने वाला गीत आया और अँग्रेज़ सरकार की नींद हराम हो गयी थी। पर वो कहानी फिर कभी.... अभी तो हम दीपावली के कुछ गीतों की बातें कर रहे हैं। रतनमें भी एक दीवाली गीत है—आई दीवाली/ आई दीवाली। इसे जोहरा अंबाला ने गाया है।

दीपावली के कई ऐसे गाने हैं जिनके बिना ये त्‍यौहार पूरा नहीं हो सकता। जैसे सन 1961 में आयी फिल्‍म
नज़रानाका गाना—मेले हैं चिराग़ों के रंगीन दीवाली है’… इस गाने को लिखा था राजेंद्र कृष्‍ण ने और संगीत था रवि का। दिलचस्‍प बात ये है कि इस गीत का एक उदास संस्‍करण भी आया था—इक वो भी दीवाली थी इक ये भी दीवाली है/ उजड़ा हुआ गुलशन है रोता हुआ माली है। इस गाने को राजकपूर पर फिल्‍माया गया था। दीपावली के उदास गानों में शामिल है फिल्‍म हक़ीक़तका गाना—आई अबकी साल दीवाली’….। इसे कैफी आजमी ने लिखा है और संगीत मदनमोहन का है। इसी तरह हरियाली और रास्‍ताका गीत भी उदासी भरा है—लाखों तारे आसमान में/ एक मगर मुझको ना मिला

दीपावली का एक गीत जो दूरदर्शन पर बचपन के दिनों में अकसर चित्रहार में दिखाया जाता था—वो है—
दीपावली मनाए सुहानी। ये फिल्‍म शिर्डी के साईं बाबाका गाना है। और पांडुरंग दीक्षित ने लिखा है। दरअसल दीपावली का संदेश है संसार में प्रकाश करना। लोगों को उजाले ही ओर ले जाना। और संत ज्ञानेश्‍वर फिल्‍म का गाना यही बात कहता है—जोत से जोत जलाते चलो/ प्रेम की गंगा बहाते चलो
। इसे मुकेश ने गाया है।

आप सबको दीप पर्व की असंख्‍य मंगलकामनाएं।   

Tuesday, October 30, 2018

‘घोड़े को जलेबी खिलाने ले जा रिया हूं’।


प्रिय मित्रो
आप तो जानते ही हैं कि जब मुंबई में मामी फिल्‍म समारोह होता है तो हम वहां होते हैं। पीछे
मुड़कर देखते हैं तो लगता है कि बचपन की फास्‍ट ट्रेन तमिलनाड एक्‍सप्रेस की तरह बीस साल झनझनाते हुए गुज़र गए। ये बीसवां फेस्टिवल है। सवाल ये है कि फेस्टिवल हमें क्‍या देते हैं। क्‍यूं इनके लिए दीवानगी रखी जाए। बीते हफ्ते मैंने इसका थोड़ा जिक्र किया था- शायद आपका ध्‍यान गया होगा। हां तो साहेबान रूटीन सबसे बड़ी क़ैद होती है—इससे जो निकल लिया—वो निकल लिया। सही के रिया हूं। झांक के देख लो गिरेबान में।

बहरहाल..इस रविवार फिल्‍म फेस्टिवल की एक बहुत ही मोहक फिल्‍म की बात। दिल्‍ली की रंगकर्मी हैं अनामिका हक्‍सर। जिन्‍होंने उनसठ साल की उम्र में जिंदगी की पहली फिल्‍म बनायी है। और अपना सब कुछ दांव पर लगाकर बनायी है। उन्‍होंने ये भी बताया कि इसमें उनके ही नहीं, दोस्‍तों के पैसे भी लग गये। आज इसी फिल्‍म की चर्चा होगी। फिल्‍म का नाम है—घोड़े को जलेबी खिलाने ले जा रिया हूं। ऐसे कमाल के नाम वाली फिल्‍म भी कमाल की है। पहले ज़रा इसके नाम के बारे में अनामिका के एक इंटरव्‍यू से अंश—फिल्म के इस नाम के पीछे का किस्सा क्या है? डायरेक्टर अनामिका का कहना है कि उनकी एक आंटी हुआ करती थीं जो पुरानी दिल्ली में संगीत सीखने जाती थीं. वो बहुत कहानियां सुनाती थीं. जब अनामिका 15-16 बरस की थीं तब उन्होंने ये किस्सा उनसे सुना था. एक बार उनकी आंटी दिल्ली में कहीं से गुज़र रही थीं कि उन्होंने सुना किसी ने एक घोड़ेवाले से पूछा – “कहां जा रिया है तू?” तो घोड़ेवाला बोला – “अरे.. घोड़े को जलेबी खिलाने ले जा रिया हूं.ज़ाहिर है सच में वो घोड़े को जलेबी खिलाने नहीं ले जा रहा था, बल्कि उस सवाल पूछने वाले पर तंज कस रहा था कि कॉमन सेंस है वो मेहनत-मज़दूरी वाला आदमी है घोड़े के साथ काम पर ही जा रहा होगा. घोड़े को जलेबी खिलाने वाले तंज में एक विडंबना भी छुपी है कि न तो उस जैसे आर्थिक-सामाजिक वर्ग के लोग अपने रोज़ के संघर्षों से मुक्त हो सकते हैं और न ही उन जैसे गरीब लोगों के घोड़े कभी जलेबी खा सकते हैं

घोड़े को जलेबी...दिल्‍ली को दिखाती है। दिल्‍ली 6 को। यानी पुरानी दिल्‍ली को। पर मुंबई के फिल्‍मकारों की तरह नहीं। यहां मेहनतकश मजदूर हैं। बोझ उठाने वाले, ठेला खींचने वाले हम्‍माल हैं, जेबकतरे हैं, बाल मजदूर हैं, सफाई-कर्मी हैं, कचरा बीनने वाले हैं, सेठ हैं, पुलिस है, हैरिटेज वॉक करवाने वाले गाइड हैं, बिकने को तैयार पुरानी हवेलियां हैं, छतें हैं, टेढी-मेढी...गंदगी से पटी गलियां हैं, भीड़ है, निराशा है, तकलीफ है, सपने हैं, शोषण है, लाचारी है। तरह तरह का परिदृश्‍य है।
ये दिल्‍ली की गलियां हैं—जिनको देखने कोई नहीं आता। जो आते हैं वो दिल्‍ली के इतिहास को देखने आते हैं। दिल्‍ली के पकवानों का लुत्‍फ उठाने आते हैं। अनामिका हक्‍सर हमारी आंखों पर पड़ा पर्दा हटाती हैं और हमें एक बिलकुल अलग भीषण जीवन की बहुत ही असुविधाजनक और तकलीफदेह तस्‍वीर दिखाकर हैरान कर देती हैं। झटका देती हैं। घुटन का अहसास होने लगता है।

फिल्म फीचर, डॉक्यूमेन्ट्री, एनीमेशन और जादुई यथार्थ का एक अजब-सा मिश्रण है। ये फिल्म बहुत दिनों तक साथ चलने वाली है। पुरानी दिल्ली के मेहनतकश लोगों की दुनिया, उनके खौफनाक सपने, उनके जीवन के कटु यथार्थ... एक साथ फिल्म एक पूरी दुनिया को आपके सामने उजागर करती है जिसे आपने हमेशा दूर से और बहुत दूरी बनाकर देखा है। यह फिल्म अपनी ध्वनियों, दृश्यों, नैरेटिव सबके ज़रिए मानो आपकी आंखों के आगे से एक पर्दा हटा देती है ताकि यथार्थ आपके सामने उजागर हो जाए। बधाई अनामिका हक्सर। खासकर इस साहस के लिए। फिर ये बताने के लिए के सिनेमा मुंबई के सपनों के सौदागरों की बपौती नहीं है। किसी भी उम्र में इस रूपहली दुनिया में अपनी तरह से क़दम रखना मुमकिन है। उन्‍होंने 59वें साल में अपनी पहली फिल्‍म बनायी है और बनाकर दिखा दिया है कि अगर पक्‍का इरादा हो तो कुछ भी संभव किया जा सकता है।


अनामिका हक्‍सर ने बताया कि उन्‍होंने बहुत लंबे समय तक उन्‍होंने और उनकी टीम ने इन तमाम लोगों से बात की। उनके सपनों के बारे में पूछा। तकरीबन इन सभी को गहरे गर्त में गिरने के सपने आते हैं। किसी को ये सपना आता है कि सब कुछ डूबा जा रहा है। तरह तरह के डरावने सपने हैं ये। भयानक। खौफनाक। और अनामिका ने एनीमेशन और ग्राफिक्‍स के ज़रिए फिल्‍म में इन सपनों को भी पिरोया है और जीवन की कठिनाईयों के बीच जूझ रहे इन लोगों के जज्‍बात को भी। यहां एक दृश्‍य की चर्चा कर लूं। एक दृश्‍य है जिसमें सड़क पर रातोंरात अचानक मर गये मजदूरों की लाश उठाने वाला एक साइकिल रिक्‍शा आता है। वो तीन लाशों को रिक्‍शे पर रखता है और चला जाता है। उसके लिए ये रोज़ का काम है। वहीं बरसाती ओढ़े एक मजदूर झट से पॉलीथीन हटाता है और जोर से कहता है—मैं मरा नहीं मैं जिंदा हूं। उफ। दम घुटने लगता है इन दृश्‍यों को देखते हुए।

अनामिका ने फिल्‍म का एक बिलकुल नया फॉर्मेट गढ़ा है। उन्‍हें बधाई। कभी कहीं ये फिल्‍म देखने मिले तो मौक़ा जाने मत दीजिएगा।
 



Tuesday, October 9, 2018

यादों का बाइस्‍कोप है सिनेमा



इस बीच मैं कश्‍मीर की एक छोटी यात्रा से लौटा हूं। तमाम बातों से इतर जिस बात पर हमेशा ध्‍यान जाता है और जो बहुत हैरत में डालती है वो है यहां टॉकीज़ों का ना होना। यहां के लोगों से बात करें तो पता चलता है कि एक ज़माने में यहां जाने कितनी सारी टॉकीज़ें थीं और एक पूरी पीढ़ी थी जिसे जुनून था फिल्‍में देखने का। ऐसे भी लोग मिले जिन्‍होंने एक के बाद एक फिल्‍में देखीं। यानी दिन में लगातार तीन-तीन चार-चार शो देखकर वो घर लौटते थे। फिल्‍में देखना तब एक उत्‍सव होता था।

हम वो लोग हैं जिनके लिए फिल्‍में सुलभ हैं। हम जब चाहें
, तब सिनेमाघर का रूख़ कर सकते हैं। कल्‍पना करके देखिए कि आप चाहते हैं परिवार के साथ फिल्‍म देखें और आपके इलाक़े के सारे सिनेमाघर बंद कर दिये गये हैं। अब आप बाकी कहीं भी जा सकते हैं, नदियां, पहाड़ देख सकते हैं पर फिल्‍म तो कतई नहीं देख सकते। कितनी ख़ौफनाक है ये कल्‍पना। हालांकि डिजिटल दुनिया में इसके उपाय निकल गये हैं। कुछ हफ्तों पहले हमने बात की थी कि किस तरह अब सिनेमा देखने का तरीक़ा बदल रहा है। अब आप यूट्यूब से लेकर तमाम एप पर मनचाहा सिनेमा देख सकते हैं—तो कश्‍मीर में भी यही हो रहा है। लोग अगर चाहते हैं तो वो किसी तरह फिल्‍में देख लेते हैं। पर यहां टॉकीज़ों का ना होना मुझे दुःखी करता है।  

कितनी कितनी यादें जुड़ी होती हैं किसी फिल्‍म से। टीवी पर अचानक किसी फिल्‍म का गाना देखते ही याद आता है
, अरे ये फिल्‍म उस साल देखी थी—उस मौक़े पर देखी थी। उस टॉकीज़ में देखी थी। तब हम उस शहर में थे और हमारे साथ फलां-फलां लोग गये थे। टॉकीज़ में फिल्‍म देखने और घर पर अकेले या परिवार के साथ देखने में ख़ासा फर्क है। टॉकीज़ में एक सामूहिकता का बोध होता है। वहां आपके साथ सैकड़ों लोग हंसते-रोते हैं। टॉकीज़ में आप केवल सिनेमा देख रहे होते हैं। उस समय आप पॉज़लगाकर किचन में जाकर पानी नहीं पी सकते। या किसी से फोन पर लंबी बात नहीं कर सकते। वहां सिनेमा से आपका ताल्‍लुक गहरा हो जाता है। आप फिल्‍म को सही मायनों में जीते हैं। वहां आप सिनेमा के काबू में होते हैं। पर जब आप घर पर फिल्म देखते हैं तो सिनेमा आपके काबू में होता है।

जो चीजें हमें सहज सुलभ होती हैं—हमें उनका मोल पता नहीं होता। हम उन्‍हें बहुत हल्‍के-से लेते हैं। इस बार फिर कश्‍मीर जाकर यही अहसास हुआ कि अपने लिए सिनेमा की इतनी सहज उपलब्‍धता पर हमारा कभी ध्‍यान नहीं जाता। उसके मायने ही हम नहीं समझते। सिनेमा के ज़रिए हम एक ही जीवन में कई कई जीवन जीते हैं—हम जीवन के अपने अनुभव को समृद्ध करते हैं। कई बार हमें एक नयी सोच मिलती है। हम बदल जाते हैं। सिनेमा हमारे सुख दुःख का साथी है। फिल्‍में अच्‍छी हों
, बुरी हों पर वो बनती रहीं और कारवां चलता रहे। सिनेमा सारी दुनिया के लिए सहज उपलब्‍ध रहे। अफसोस कि जहां इतनी फिल्‍में शूट होती हैं—वहां के लोगों के पास टॉकीजें नहीं।

लोकमत समाचार के कॉलम ज़रा हट केमें सोमवार 8 अक्‍तूबर को प्रकाशित  


Sunday, September 16, 2018

ऐ नरगिस-ए-मस्‍ताना...हसरत की पुण्‍यतिथि पर।



आज है सत्रह सितंबर। गीतकार हसरत जयपुरी सन 1999 में आज ही के दिन इस असार संसार को अलविदा कह दिया था। हसरत जयपुरी ने अपने तईं गीतकारी की दुनिया को बहुत बदला था।


ये बात तकरीबन 1947-48 की है। उन दिनों राजकपूर अपनी दूसरी फिल्‍म बरसातके लिए गीतकार की तलाश में थे। और पृथ्‍वी जी ने एक नौजवान शायर को यहां राज से मिलने बुलवाया था। ये शायर थे हसरत जयपुरी। आपको बता दें कि ये वो दिन थे जब हसरत को मुंबई में बतौर बस-कंडक्‍टर नौकरी करते सात-आठ बरस हो गए थे। शंकर-जयकिशन के लिए हसरत ने बरसातका जो पहला गीत लिखा वो था—‘जिया बेक़रार है

हसरत हिंदी फिल्‍मों के रूमानी गीतों के सुल्‍तान थे। बचपन में उन्‍हें अपने मुहल्‍ले की एक लड़की राधा से प्रेम हो गया था। मज़हब की दीवार थी। राधा की शादी कहीं और कर दी गयी। और हसरत ने लिखा
—‘दिल के झरोखों में तुझको बिठाकर...रख लूंगा मैं दिल के पास...मत हो मेरी जां उदास। हसरत जिंदगी भर मुहब्‍बतों की दास्‍तां को गीतों की शक्‍ल में ढालते रहे। एक ज़माने में उन्‍होंने राधा के नाम लिखा था—‘ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज़ ना होना। उनका ये पैग़ाम उनकी डायरी में ही दबा रह गया था। बाद में राजकपूर के बेमिसाल फिल्‍म संगममें इसे इस्‍तेमाल किया गया।

मैं अपने रेडियो-कार्यक्रमों में भी हसरत को शिद्दत से की गई मुहब्‍बतों के शायरकहता हूं। आईये उनके कुछ बेहद रूमानी गानों की बातें करें—‘आ जा रे आ ज़रा’ (फिल्‍म लव इन टोकिया’ 1966)इस गाने में वो लिखते हैं—‘देख फिजां में रंग भरा है/मेरे जिगर का ज़ख्‍़म हरा है/सीने से मेरे सिर को लगा दे/ हाथ में तेरे दिल की दवा है। फिल्‍म सुहागन’(सन 1964) का ये गाना याद कीजिए—‘तू मेरे सामने है/ तेरी ज़ुल्‍फ़ें हैं खुलीं/ तेरा आंचल है ढला/ मैं भला होश में कैसे रहूंमदनमोहन-मोहम्‍मद रफ़ी और हसरत का ख़ूबसूरत और दुर्लभ संगम है ये। और अफ़सोस का ये गाना—‘आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें/ कोई उनसे कह दे/ हमें भूल जाएं’ (फिल्‍म परवरिश सन 1958).

हसरत फिल्‍मी-गानों में कमाल के लफ्ज़ और ग़ज़ब की मिसालें लेकर आए। जैसे ऐ नरगिस-ए-मस्‍ताना बस इतनी शिकायत है’ ( फिल्‍म आरज़ू) नरगिस-ए-मस्‍ताना के मायने हैं मस्‍त आंखों वाली। अब ज़रा इस एक्‍सप्रेशन के देखिए जिसे हम आम जिंदगी में कितना इस्‍तेमाल करते हैं--अजी रूठकर अब कहां जाईयेगा, जहां जाईयेगा हमें पाईयेगा’ (फिल्‍म-आरज़ू)। सन 1952 में आई दिलीप कुमार वाली फिल्‍म दाग़के एक गाने में तो हसरत ने जैसे कलेजा चीरकर रख दिया है—‘चांद एक बेवा की चूड़ी की तरह टूटा हुआ/ हर सितारा बेसहारा सोच में डूबा हुआ/ ग़म के बादल एक जनाज़े की तरह ठहरे हुए/ हिचकियों के साज़ पर कहता है दिल रोता हुआ....कोई नहीं मेरा इस दुनिया में/ आशियां बरबाद है
ये वो दौर है जब गानों को गीतकार से जोड़कर नहीं देखा जाता। जब गाने गीतकार की याद नहीं दिलाते। ऐसे में जैसे हसरत आसमानों के पार से एक आवाज़ दे रहे हैं—‘तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे/ जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे/ संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे। 



लोकमत समाचार मेें सोमवार 17 सितंबर 2018 को स्‍‍‍‍तंभ 'ज़रा हटके' मेें प्रका‍शित

Monday, September 10, 2018

बदल गया है सिनेमा देखने का तरीक़ा



पिछले दिनों मित्रों से बात हो रही थी फिल्‍में देखने से जुड़ी पुरानी यादों पर। सब याद कर रहे थे कि किस तरह से फिल्‍में देखना एक समय उत्‍सव हुआ करता था। ये भी याद किया गया कि किस तरह फिल्‍मों के सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ करते थे। मध्‍यप्रदेश में अस्‍सी के दशक में सार्वजनिक गणेश उत्‍सव के दौरान प्रोजेक्‍टर लगाकर फिल्‍में दिखायी जाती थीं। और लोग उन्‍हें देखने को लालायित भी रहते थे। एक मित्र ने बहुत ही महत्‍वपूर्ण बात कही। उसका कहना था कि बाक़ी तमाम फिल्‍में कब कैसे देखीं
, हमें ये भले याद ना हो, पर जो फिल्‍में सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान देखीं—वो याद हैं। गणेशोत्‍सव में शोलेया डॉनदेखना या फिर स्‍कूल से जब फिल्‍में दिखाने ले जाया गया तो जागृतिया चरणदास चोरया कोई और फिल्‍म देखना।

कमाल की बात ये है कि फिल्‍में पहले की तुलना में ज़्यादा बनने लगी हैं। फिल्‍में देखने के मौक़े भी बढ़ गये हैं। सिंगल स्‍क्रीन थियेटर की जगह अब बहुधा मल्‍टीप्‍लेक्‍स ने ले ली है। पहले की तरह अब फिल्‍में के टिकिट ब्‍लैक नहीं होते। लेकिन इसके बावजूद फिल्‍में देखने का वो उत्‍साह
, फिल्‍मों का वो कौतुहल, वो ललक कम से कमतर होती चली जा रही है। आज फिल्‍में देखना उस तरह उत्‍सव नहीं रह गया है। वरना एक समय था जब दूरदर्शन के श्‍वेत-श्‍याम दौर में भी रविवार की शाम की फिल्‍म के लिए पूरा परिवार एकदम मुस्‍तैदी से तैयार रहता था। बढिया खाना पहले तैयार कर लिया जाता था। बच्‍चे अपने हिस्‍से की पढ़ाई भी पहले ही खत्‍म कर लेते थे। और फिर सब काले-सफेद रंगों में फिल्‍म बड़े चाव से देखते थे।

सवाल ये है कि अब ऐसा क्‍या बदल गया है। जहां तक मुझे लगता है, सूचना की तेज़ आंधी ने फिल्‍मों के बारे में ज़रूरत से ज्‍यादा जानकारियां हम तक लाना शुरू कर दी है। एक माध्‍यम के रूप में सिनेमा से जुड़ा जो कौतुहल का तत्‍व था—उसे छोटे परदे पर चौबीस घंटे चलने वाले मूवी चैनल्स ने ख़त्‍म कर दिया है। इसके अलावा अब ये भी है कि पायरेटेड वीडियो का एक लंबा दौर आया है। जब उधर फिल्‍म रिलीज़ हुई—इधर लोगों के पास उसका वीडियो आया। मल्‍टीप्‍लेक्‍स में फिल्‍में देखना महंगा होता चला गया, बहुधा मध्‍यवर्ग के ‍लिए उसका खर्च उठाना भी मुश्किल हुआ है। सिनेमा देखने के वैकल्‍पिक साधन भी आते चले गये हैं। अकसर चैनल्‍स पर कुछ महीने बाद बीतों दिनों की हिट फिल्‍म दिखा दी जाती है।

इसके अलावा एक और बड़ा बदलाव टीवी और सिनेमा देखने के हमारे तरीक़े में आया है। वो है स्‍मार्ट टीवी का आना। या एप्‍लीकेशन के ज़रिये सिनेमा देखने का इंतज़ाम। अब अमेजन प्राइम
, नेट फ्लिक्‍स, ऑल्‍ट बालाजी, इरोज़ नाउ, जियो सिनेमा, हॉट-स्‍टार, स्‍पूल जैसे एक दर्जन एप्‍लीकेशन मौजूद हैं। इनमें से कुछ मुफ्त हैं जबकि कुछ के लिए आपको सालाना या प्रति फिल्‍म पैसे चुकाने पड़ सकते हैं। जो ज्‍यादा टेक्‍नो पीढ़ी है वो कोडी जैसे ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर की मदद लेती है और स्‍ट्रीमिंग के ज़रिए चलते फिरते फिल्‍में देखती है। मुंबई या अन्‍य शहरों में चारों तरफ देखिए, नई पीढ़ी कानों में हेडफोन लगाए मोबाइल पर फिल्‍में देखती पायी जायेगी। बदल गया है हमारे समय का सिनेमा देखने का तरीक़ा।   


लोकमत समाचार मेंं बीते सोमवार 3 सितंबर 2018 को कॉलम 'ज़रा हटके' में प्रकाशित। 

साहित्‍यकारों पर बायोपिक



इन दिनों आगामी फिल्‍म
मंटोकी काफी चर्चा है, इसे नंदिता दास ने बताया है। मंटो हिंदी उर्दू लेखक सआदत हसन मंटो के जीवन पर आधारित बायोपिक है। इस बीच आपने ख़ूब पढ़ा होगा कि भारतीय सिनेमा अचानक बायोपिक बनाने में जुट गया है, ख़ासतौर पर स्‍पोर्ट्स बायोपिक। पर क्‍या कभी आपने सोचा है कि हमारे देश में लेखकों पर फिल्‍में या डॉक्‍यूमेन्‍ट्रीज़ बनने का सर्वथा अभाव है। हमने अपने महत्‍वपूर्ण लेखकों से जुड़ी चीज़ें बतौर विरासत संजोकर रखने का ज़्यादा प्रयत्‍न नहीं किया है। हमारे पास प्रेमचंद पर कोई महत्‍वपूर्ण फिल्‍म नहीं है। निराला या महादेवी पर नहीं है। साहिर पर नहीं है। अमृता पर नहीं है। निर्मल वर्मा पर भी नहीं है। यहां मैं बायोपिक की बात कर रहा हूं। सवाल ये है कि इसकी वजह क्‍या है।

बहुत कम लोगों को पता है कि साहित्‍य अकादमी ने कुछ महत्‍वपूर्ण साहित्‍यकारों पर मोनोग्राफ प्रकाशित किये हैं। इनमें से कुछ बहुत उम्‍दा बन पड़े हैं। इसी तरह कई महत्‍वपूर्ण साहित्‍यकारों पर डॉक्‍यूमेन्‍ट्री भी बनायी गयी हैं। अफ़सोस बस इतना है कि प्रचार उतना ज्‍यादा नहीं है। अनेक कारणों से ये फिल्‍में जनता तक उस तरह नहीं पहुंच पायी हैं
, जितनी अपेक्षा की जाती है। अच्‍छा तो ये होता कि स्‍कूलों या विश्‍वविद्यालयों में व्‍यापक रूप से इन्‍हें उपलब्‍ध करवा दिया जाता। बच्‍चे इन्‍हें देखते और एक पूरी दुनिया से रूबरू होते।

यहां आपको साहित्‍य अकादमी की बनायी कुछ फिल्‍मों के बारे में बता दिया जाए। अमृता प्रीतम पर बासु भट्टाचार्य ने फिल्‍म बनायी है जबकि अख़्तर-उल-ईमान पर फिल्‍म बनायी है सईद अख़्तर मिर्जा ने। विष्‍णु प्रभाकर पर पद्मा सचदेव की बनायी फिल्‍म उपलब्‍ध है जबकि धर्मवीर भारती और विजयदान देथा पर पर उदय प्रकाश ने फिल्‍में बनायी है। महाश्‍वेता देवी पर संदीप रॉय ने फिल्‍म बनायी है। कृष्‍णा सोबती पर सहजो सिंह की बनायी फिल्‍म उपलब्‍ध है। इन डॉक्‍यूमेन्‍ट्रीज़ को हम बाक़ायदा ख़रीद सकते हैं। इसके लिए आप साहित्‍य अकादमी की वेबसाइट पर जायें और खोजबीन करें।

अंग्रेज़ी में कुछ महान साहित्‍यकारों पर बहुत ही कमाल की फिल्‍में बनी हैं और उन्‍हें काफी सराहा भी गया है। जैसे महान अंग्रेज़ कवि जॉन कीट्स के जीवन के आखिरी तीन वर्षों पर एक फिल्‍म जेन कैंपियन ने बनायी थी- जिसका नाम है—
ब्राइट स्‍टार। इसी तरह मार्खेज़ पर गाबो द क्रियेशन ऑफ गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज़जैसी चर्चित डॉक्‍यूमेन्‍ट्री बनायी गयी है। महान अमेरिकन कवियत्री सिल्विया प्‍लाथ पर एक बेहतरीन फिल्‍म सिल्विया’ 2003 में आई थी। सेन्‍स एंड सेन्सिबिलिटीऔर प्राइड एंड प्रीजूडिसजैसी अमर कृतियां देने वाली जेन ऑस्‍टेन पर 2007 में एक फिल्‍म आई थी बिकमिंग जेन। इसी तरह जाने माने लेखक अर्न्‍स्‍ट हेमिंग्वे के जीवन पर कुछ महत्‍वपूर्ण फिल्‍में उपलब्‍ध हैं। जैसे हेमिंग्‍वे और गेलहॉर्न के रिश्‍ते पर टीवी सीरीज़ हेमिंग्‍वे एंड गेलहॉर्न और हेमिंग्‍वे और एक पत्रकार डेन बार्ट के रिश्‍तों पर पापा हेमिंग्वे इन क्‍यूबा। इसके अलावा उन पर एक अदभुत डॉक्‍यूमेन्‍ट्री भी बनायी गयी थी—द लेजेन्‍ड्री लाइफ ऑफ अर्न्‍स्‍ट हेमिंग्‍वे। इन तमाम फिल्‍मों को देखना बहुत मुश्किल नहीं है। पर मेरे मन में सवाल ये उठता है कि हमारे यहां ऐसा काम क्‍यों नहीं होता।


लोकमत समाचार मेंं कॉलम 'ज़रा हट केेे' आज दस सितंंबर 2018 को प्रकाशित। 

Monday, August 27, 2018

हम सब मुकेश- 27 अगस्‍त पुण्‍यतिथि पर विशेष।






 सन 1976 भारत के हिसाब से बड़ा दिलचस्‍प साल था। भारत में आपातकाल चल रहा था। इस बरस की हिट फिल्‍मों में शामिल थीं—दस नंबरी
, लैला मंजनू, नागिन, हेरा फेरी, चरस, फकीरा, कालीचरण, कभी-कभी वग़ैरह। इसी बरस अमिताभ बच्‍चन की एक ही महत्‍वपूर्ण फिल्‍म आयी कभी कभी। बीते बरस शोलेआयी थी। और अगले बरस आने वाली थी अमर अकबर एंथनी

छह बरस पहले राज कपूर
मेरा नाम जोकरबनाकर हाथ जला चुके थे। 2 इंटरवल और 255 मिनिट वाली इस फिल्‍म को देखना जाने कितने लोगों को याद है। फिर बॉबीआयी 1973 में, जब पहली बार राजकपूर की फिल्‍म में ना शंकर जयकिशन थे, ना हसरत-शैलेंद्र, ना ही मुकेश। झमाझम लक्ष्‍मीकांत प्‍यारेलाल ने बॉबीमें कमाल कर दिया था। इस दौर में मुकेश के गिने चुने गाने आ रहे थे—बस ‘‘कभी कभी’ 1976 में आयी—जिसमें मुकेश के अमर गीत थे। यही हाल रफी का था। पर यादों की बारात’, ‘हीर रांझा,’ अभिमान’, ‘हवस’, ‘लैला मंजनूजैसी फिल्‍मों के ज़रिए उनके यादगार गाने सामने आये थे। पर किशोर इस दौर में छाए हुए थे। आंधी’ 1975 में आयी थी। 1976 में महबूबामें उन्‍होंने गाया—मेरे नैना सावन भादो। आगे-पीछे तमाम ऐसे गाने आये जो उन्‍हें कामयाब गायक बना रहे थे।

22 जुलाई 1976 को मुकेश ने सरला त्रिवेदी से अपनी शादी की तीसवीं सालगिरह मनाई। और चार दिन बाद 26 जुलाई 1976 को वो अमेरिका में अपने कंसर्ट की श्रृंखला के लिए निकल पड़े। उन्‍होंने राजकपूर के लिए अपना आखिरी गीत रिकॉर्ड किया—
चंचल शीतल कोमल निर्मल। फिल्‍म थी सत्‍यम शिवम सुंदरम। किसी को पता नहीं था कि बस एक महीने बाद मुकेश ताबूत में लौटेंगे। 27 अगस्‍त 1976 को डेट्रॉइट मिशिगन में एक कंसर्ट के दौरान मंच पर ही दिल का दौरा पड़ा और सुरों का पंछी उड़ गया। एयरपोर्ट पर मुकेश को रिसीवकरने खड़े थे राजकपूर और मनोज कुमार जैसे सितारे। राजकपूर ने कहा—मेरी तो आवाज़ ही चली गयी

42 साल में जाने कितनी पीढियां बदल जाती हैं। पर क्‍या कोई दिन ऐसा बीता है जब हमने मुकेश को गुनगुनाया नहीं हो। क्‍या किसी उदासी के पल में आप
भूली हुई यादोंनहीं गुनगुनाते। कुदरत की हज़ार हजार बांहें जब आपको थामने को तैयार होंआप अनायास ही गुनगुना उठते हैं—‘ये कौन चित्रकार है। मुकेश हमारे साथ इन पंक्तियों में भी खड़े होते हैं—‘कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते, कहीं से निकल आयें जन्‍मों के नाते। मुकेश हमारी अंत्‍याक्षरियों के बहुत ज़रूरी गीत डम डम डिगा डिगाके दौरान भी आसमान से मुस्‍कुराते होंगे। जब कहीं किसी का दिल टूटता हैवो मुकेश बन जाता है।

मुकेश का होना इसलिए भी मायने रखता है कि हम बिना संकोच अपने सुरे-बेसुरे अंदाज़ में उन्‍हें गुनगुनाते हैं। बिना किसी लाज शर्म के। वो आज जनता के गायक हैं। वो हमारे अपने हैं। वो बहुत सरल हैं, सहज हैं। मुकेश जैसे गायक की लोकप्रियता का च्‍यवनप्राश तो यही रहा है। हम सब पर मुकेश की आवाज़ बहुत फबती है।


लोकमत समाचार के स्‍तंंभ 'ज़रा हटकेेे' में 27 अगस्‍त 2018 को प्रकाशित। 

Monday, July 30, 2018

मन मोरा बावरा- रफी के गाये ऐसे गाने जिन्हें किशोर कुमार पर फिल्‍माया गया।


आज तीस जुलाई है। कल एक बहुत ही ख़ास तारीख़ है जब गायकी की दुनिया का एक बेमिसाल सितारा हमारी दुनिया से चला गया था और रह गयी थी तो सिर्फ उसकी आवाज़। उस सितारे को दुनिया मोहम्‍मद रफ़ी के नाम से जानती है। 

मुंबई में आप अगर बांद्रा स्टेशन से बाहर निकलें और वेस्‍ट में एक चौराहे की तरफ बढ़ें तो वहां एक बोर्ड नज़र आयेगा
, मोहम्‍मद रफी चौक। आने-जाने वाले बदहवास लोगों की नज़र शायद ही कभी उस बोर्ड पर पड़ती हो। दरअसल कामयाबी के बाद रफ़ी वहीं पास में रहा करते थे। बोर्ड भले ही नज़रअंदाज़ हो जाता हो पर रफी की आवाज़ को आप नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। जीवन के इस बीहड़ सफर में हर झटके पर रफी अपनी आवाज़ की उँगली पकड़कर आपको थाम लेते हैं।

अकसर लोग रफी और किशोर की तुलना करते हैं। पर मोहम्‍मद रफी और किशोर कुमार मित्र रहे हैं। किशोर तो अपने कंसर्ट्स में रफी के गाने भी गाया करते थे। आज मैं आपको कुछ ऐसे गानों के बारे में बता रहा हूं-जिन्‍हें किशोर कुमार पर फिल्‍माया गया
, पर इन्हें गाया मोहम्‍मद रफी ने। सन 1958 में एक फिल्‍म आई थी रागिनी’, जिसमें अशोक कुमार, किशोर कुमार और पद्मिनी थे। फिल्‍म के निर्माता अशोक कुमार ही थे। संगीत ओ.पी. नैयर तैयार कर रहे थे। एक गाना ऐसा था, जो शास्‍त्रीय संगीत पर आधारित था और नैयर ने फैसला किया कि इसे रफी गायेंगे। किशोर कुमार ने दादामुनि से कहा भी कि ऐसा कैसे, हीरो मैं हूं और मैं स्‍वयं गाता भी हूं। उन्‍होंने हस्‍तक्षेप करने से इंकार कर दिया और इस तरह आया गाना—‘मनमोरा बावरा/ निस दिन गाये गीत मिलन के। राग तिलंग पर आधारित इस गाने को खोजकर वीडियो पर देखिएगा। किशोर कुमार तानपूरा थामे गा रहे हैं, आवाज़ रफी साहब की है।

लेकिन ये ऐसा इकलौता मौक़ा नहीं था। मो. रफी की आवाज़ का इस्‍तेमाल किशोर कुमार के लिए अनेक बार हुआ। सन 1959 में एक फिल्‍म आई थी
शरारत’, कहते हैं कि इस फिल्‍म के लिए किशोर कुमार को साइन नहीं किया गया था, तब रफी की आवाज़ में एक गाना रिकॉर्ड कर लिया गया था—अजब है दास्‍तां तेरी ऐ जिंदगी/ कभी हंसा दिया, रूलादिया कभी’। इस गाने में किशोर पियानो बजाते नजर आते हैं। इन गानों को देखना बहुत ही अद्भुत अनुभव है, क्‍योंकि एक पार्श्‍वगायक दूसरे पार्श्‍वगायक के लिए गा रहा है।

इसी तरह सन 1972 में भी एक और मौक़ा आया जब मोहम्‍मद रफी ने किशोर कुमार के लिए गाना गाया। ये फिल्‍म थी
प्‍यार दीवानाजिसके गाने असद भोपाली ने लिखे थे और संगीत था लाल सत्‍तार का। संगीत के दीवानों को बता दें कि लाला, असर और सत्‍तार तीन लोग थे। इस तिकड़ी ने फिल्‍म संग्राममें रफी साहब का शानदार गाना दिया था—मैं तो तेरे हसीन ख्‍यालों मेें खो गया'   बहरहाल इन्‍हीं संगीतकार ने रफी साहब से गवाया- ‘अपनीआदत है सबको सलाम करना। इसे भी किशोर कुमार पर फिल्‍माया गया था। तकनीक के इस ज़माने में इन तीनों गाने के वीडियो आप खोजकर देख सकते हैं ये अद्भुत अनुभव ले सकते हैं। नमन रफी साहब को और किशोर कुमार को भी। 


30 जुुुुलाई को लोकमत समाचार में प्रकाशित कॉलम--ज़रा हट के'

Monday, July 16, 2018

वो भूली दास्‍तां




मैं हमेशा कहता हूं, गाने अतीत का रिफरेन्‍स पॉइन्‍टहोते हैं। जिंदगी की इस भागदौड़ में वो कहीं से भी आकर हमारे गले में झूल जाते हैं और बीते समय की ना जाने कौन-सी भूली याद को ताज़ा कर जाते हैं। एकदम अनायास। एकदम अचानक। गाने सुनने के लिए रेडियो से बेहतर ज़रिया कोई हो नहीं सकता। आपको पता नहीं होता कि अब कौन-सा गाना आने वाला है। आप अकसर अपने काम में लगे या सोच में डूबे होते हैं और रेडियो की तरंगें आपकी उँगली थामकर आपके साथ चलती हैं।

एक खीझे हुए या सुकून भरे दिन आप रेडियो का साथ मांगते हैं
, इस उम्‍मीद में कि कहीं से कुछ ऐसा सुनने मिल जाए- जो लहू में सब्र घोल दे। जो इस बेरहम संसार में उम्‍मीद बंधाए और कहीं से 'लग जा गले कि फिर ये हंसी रात हो ना हो...सुनाई दे जाता हैकहीं तो कोई दिन होता है, जब बदहवासी के आलम में कहीं दूर से भूपिंदर जी की आवाज़ आपका सिर सहला जाती है--'जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेटकर/......दिल ढूंढता है'....जाने वो कौन-सा लम्‍हा होता है,  जब आपके होठों पर अनायास ही सज उठता है--'माई री मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की' 
और क्‍या आपके बस में होता है जब आंखों की गीली कोरों पर अटकी आंसू की हर बूंद गुनगुनाती है--'नैनों में बदरा छाए/ बिजली-सी चमके हाय'...क्‍या आपको पता है कि बहुत उदास और ख़ाली दिनों में क्‍यों रेडियो का कोई चैनल आपका हमसफर बन जाता है--'वो भूली दास्‍तां लो फिर याद आ गयी/ नज़र के सामने घटा-सी छा गयी'...... कभी तो आपका दर्द से कांपता दिल पुकारता है--'जो हमने दास्‍तां अपनी सुनाई आप क्‍यों रोए'.... कभी तो यूं भी लगता है कि कोई कंधा हो-- जिस पर सिर रखकर देर तक सुनें--'आपके पहलू में आकर रो दिए'। शाम के धुंधलके में लरजिश भरी एक आवाज़ सुरमई शाम के मानूस सायों को और गहरा कर जाती है—फिर वही शाम वही ग़म वही तन्‍हाई है/ दिल को बहलाने तेरी याद चली आई है

इंतज़ार का कोई पल तो आपने जिया होगा--जब संतूर की तरह आहटों के तार बजे होंगे--
'ज़रा सी आहट होती है तो दिल सोचता है, कहीं ये वो तो नहीं'। उस ज़माने को याद करते हुए जब आंख भर जाती है--और आपको लगता है--'होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा'...ऐसे रूमानी पलों में पल भर ठहरकर नमन कर लीजिएगा मदन मोहन को.....

आपको नहीं पता पर अनायास ही आपने अपने जीवन के अनगिनत पलों को उनके साथ जिया है। साझा किया है। कहां अहसास होता है गुनगुनाते हुए, सुनते हुए कि ये गाने किस संगीतकार के हैं। बस हाथ जोड़ लीजिएगा। कहिएगा सलाम मदनमोहन।


कॉलम- ज़रा हट के
लोकमत समाचार
16 जुलाई 2018 

Monday, July 9, 2018

ये शामें सब की सब ये शामें...




लोकमत समाचार मेंं 9 जुलाई 18 को प्र
काशित 

धर्मवीर भारती की एक कविता है—-‘ये शामें, सब की शामें.../ जिनमें मैंने घबरा कर तुमको याद किया/ जिनमें प्यासी सीपी-सा भटका विकल हिया/ जाने किस आने वाले की प्रत्याशा में/ ये शामें/ क्या इनका कोई अर्थ नहीं?’ किसने सोचा था कि कभी ये फिल्‍मी गीत में तब्‍दील हो जायेंगी। जी हां, श्‍याम बेनेगल ने जब सन 1992 में सूरज का सातवां घोड़ाजैसी अद्भुत फिल्‍म बनाई तो उसमें इसे शामिल किया, वनराज भाटिया की तर्ज पर इसे गाया उदित नारायण और कविता कृष्‍णमूर्ति ने। जाहिर है कि ये हमारे लिए एक अनमोल नगीना बन गया है।  

इसी तरह सन 1984 में कुमार शाहनी ने फिल्‍म
तरंगबनायी थी। इस फिल्‍म में विख्‍यात कवि रघुवीर सहाय की एक कविता को लता मंगेशकर ने स्‍वर दिया था। बरसे घन सारी रात/ संग सो जाओइसका भी संगीत वनराज भाटिया ने तैयार किया था। जिन दोनों गानों का मैंने अभी जिक्र किया वो बाकायदा इंटरनेट पर उपलब्‍ध हैं और कभी भी सुने जा सकते हैं। अफसोस यही है कि ये गीत आपको किसी रेडियो स्‍टेशन से बजते सुनाई नहीं देते, क्‍योंकि इन्‍हें उस तरह रिलीज़ नहीं किया गया।

जब बात हिंदी कविता के फिल्‍मी परदे पर आने की ही हो रही है तो बच्‍चन जी को याद कर लिया जाए। सन 1977 में ऋषिकेश मुखर्जी ने अमिताभ बच्‍चन को लेकर फिल्‍म
आलापबनायी तो अपने विषय की वजह से उसमें बहुत ही ललित गीत लिए गए। डॉ. हरिवंश राय बच्‍चन का इस फिल्‍म में एक गीत था—आंखों में भरकर प्‍यार अमर/ आशीष हथेली में भरकर/ कोई मेरा सर गोदी में रख सहलाता/ मैं सो जाता/ कोई गाता, मैं सो जाता। इसे गाया था येशुदास ने और इसका संगीत जयदेव ने तैयार किया था।

सन 1976 में जब फिल्‍म
कादंबरीआई तो इसमें अमृता प्रीतम की एक कविता को संगीतबद्ध किया गया। उस्‍ताद विलायत ख़ां की धुन पर आशा भोसले ने इसे गाया था, बोल थे—अंबर की एक पाक सुराही/ बादल का एक जाम उठाकर/ घूँट चाँदनी पी है हमने/ बात कुफ्र की, की है हमने। आगे चलकर जब अमृता प्रीतम की कहानी पर फिल्‍म पिंजरबनी, तो इसमें उनकी कई रचनाओं को स्‍वरबद्ध किया गया। उनमें से एक थी—चरखा चलाती मां/ धागा बनाती मां/ बेटी है सपनों की केसरी। इसे प्रीती उत्‍तम ने गाया था और संगीत उत्‍तम सिंह का था।

इसी तरह महादेवी वर्मा की कविता—कैसे उनको पाऊं आलीको छाया गांगुली की आवाज़ में फिल्‍म त्रिकोण का चौथा कोणके लिए रिकॉर्ड किया गया था। संगीतकार थे जयदेव। वैसे इस गीत को एक गैर फिल्‍मी अलबम के लिए आशा भोसले ने भी गया है। आशा भोसले का एक गैर फिल्‍मी अलबम है संगीतकार जयदेव के संगीत निर्देशन में। इसमें उन्‍होंने कई साहित्यिक रचनाओं को गाया है। इसमें जयशंकर प्रसाद की अमर रचना—तुमुल कोलाहल कलह में...मैं हृदय की बात रे मनभी शामिल है। इस अलबम की महादेवी वर्मा की लिखी अन्‍य रचनाएं हैं जो तुम आ जाते एक बार’, ‘तुम सो जाओ, मैं गाऊं’, ‘मधुर मधुर मेरे दीपक जल। ऐसे ललित गीतों को सदा अपने साथ रखना चाहिए।  

Tuesday, July 3, 2018

अल्‍लाह मेघ दे




ये कहना ग़लत नहीं होगा कि हम कुदरत से दूर होते चले जा रहे हैं। अब कुछ नौजवान ये कहते पाए जाते हैं कि बारिश का मौसम काफी तकलीफें लेकर आता है। फिर, बारिश आ गयी, वही ट्रैफिक-जाम
, आने-जाने की तकलीफें। ये आपको भले रूमानी और सपनीला ख़्याल लगे, लेकिन ज़रा याद कीजिए कि काग़ज़ की कश्‍ती छोड़ने वाली बारिश देखे कितने दिन हुए। वो दिन, जिनके लिए जगजीत सिंह ने सुदर्शन फाकिर का लिखा गाया था—ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी/ मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो काग़ज़ की कश्‍ती वो बारिश का पानी

ये बारिश के वो दिन हैं जिनके लिए अमीर ख़ुसरो ने लिखा और जाने कितने कितने गायकों ने गाया—
अम्‍मा मेरे बाबा को भेजो री/ के सावन आया। ये बारिश के वो दिन हैं—जिनका नज़ारा सन 1979 में आई बासु चटर्जी की फिल्‍म मंजिलमें दिखता है—जब अमिताभ बच्‍चन और मौसमी चटर्जी गेट-वे, क्रॉस मैदान, मरीन ड्राइव जैसे इलाक़ों में खूब-खूब भीगते हैं। इस गाने को देखते हुए कभी जी ही नहीं भरता। जो लोग मुंबई आते हैं, वो इन जगहों को वैसा देखना चाहते हैं जैसी वो पर्दे पर नज़र आईं। पर अब सब बदल चुका है।

बारिश का इंतज़ार कितना विकल होता है
, इसे सन 1965 में आई विजय आनंद की फिल्‍म गाइडमें देखा जाना चाहिए। राजू गाइड गांव वालों को बताना चाहता है कि वो कोई स्‍वामी नहीं है, सिद्ध पुरूष नहीं है- और फिर एक गांव वाले का ये कहना—मेरा विश्‍वास और भी दृढ़ हो गया है, कि बारह दिन के तप से पवित्र होने के बाद आपकी आत्‍मा से जो पुकार निकलेगी, वो आसमान का सीना फाड़कर रख देगी और देवता लोग आंसू बहा-बहाकर धरती की प्‍यास बुझाने के लिए मजबूर हो जायेंगे। और फिर सचिन देव बर्मन की कातर पुकार—अल्‍ला मेघ दे, पानी दे छाया दे रे तू, रामा मेघ दे। आपको बता दें कि ये गाना जाने-माने भटियाली गायक अब्‍बासुद्दीन अहमद के गीत—अल्‍ला मेघ देसे प्रेरित था।

बारिश का यही इंतज़ार आज से 17 बरस पहले आई आमिर ख़ान की फिल्‍म
लगानमें भी नज़र आता है—इस फिल्‍म में जावेद अख्तर ने लिखा--काले मेघा, काले मेघा पानी तो बरसाओ/ बिजुरी की तलवार नहीं, बूंदों के बाण चलाओ। सन 1957 में वी. शांताराम ने जब जेल-सुधार के मुद्दे पर दो आंखें बारह हाथ बनायी तो इस फिल्‍म में भरत व्‍यास ने बारिश का एक सुंदर गीत रचा था—नन्हीं-नन्हीं बूँदनियों की खनन-खनन खन खन्जरी बजाती आई/ देखो भाई बरखा दुल्हनिया। ये घुमड़ घुमड़ के छायी रे घटागाने की पंक्तियां हैं।

बारिश धरती की प्‍यास ही नहीं बुझाती
, अर्थव्‍यवस्‍था की सेहत ही नहीं सुधारती, ये हमारी स्‍मृतियों, हमारी संस्‍कृति,
हमारी तहज़ीब का हिस्‍सा है। हमारे कितने कितने त्‍यौहार बारिश की धुरी पर घूमते हैं। हिंदी सिनेमा ने बारिश का तरह-तरह से इस्‍तेमाल किया है। और जाने कितने गाने हैं बारिश के। सवाल ये है कि आप इस बारिश कौन सा गीत गुनगुनाने वाले हैं।




लोकमत समाचार में हर सोमवार को कॉलम 'ज़़रा हट केेे'।

Wednesday, June 27, 2018

घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा



‘लोकमत समाचार’ में हर सोमवार को कॉलम--‘ज़रा हटके’ इस सोमवार प्रकाशित। 


बीते दिनों हॉलीवुड की एक फिल्‍म रिलीज़ हुई है—
जुरासिक पार्क-फॉलन किंगडम। ये सन 1993 में रिलीज़ हुई स्‍टीवन स्‍पीलबर्ग की फिल्‍म जुरासिक पार्ककी सीरीज़ की पांचवीं फिल्‍म है। दरअसल डायनोसॉर हमारे लिए लंबे समय से कौतुहल का विषय रहे हैं। विज्ञान ने इन पर गहन शोध किया है और पता लगाया है कि आखिर वो क्‍या वजह थी कि अचानक दुनिया से डायनोसॉर विलुप्‍त हो गये।

बहरहाल...डायनोसॉर की दुनिया पर बनी फिल्‍मों को बच्‍चों की फिल्‍मों की तरह प्रोजेक्‍ट किया जाता है। ये बड़े स्‍टूडियो और उनके विकसित किये फ्रैंचाइज़ की सोची-समझी रणनीति है। जाहिर है कि
जुरासिक-पार्क फॉलन किंगडमके प्रति भी बच्‍चों का बड़ा रूझान देखने को मिला है। ठीक वैसे ही जैसे हॉलीवुड की सुपर-हीरोज़ वाली फिल्‍मों के लिए देखा जाता है। यहां एक बड़ा सवाल ये है कि बच्‍चों के लिए सिनेमा सोचना और बनाना लगातार कम से कमतर होता चला जा रहा है। अफसोस की बात ये है कि हिंदी में भी लंबे समय से बच्‍चों और किशोरों के लिए ओरीजनल कन्‍टेन्‍ट का इतना अभाव है कि हमारे और आपके घरों के बच्‍चे विदेशों से आयात किए गये कन्‍टेन्‍ट का उपभोग कर रहे हैं।

आप पायेंगे कि चाहे एनीमेशन हों या फिर इन्फोटेनमेन्‍ट की दुनिया के तमाम चैनल—हम बच्‍चों के लिए अपने देश में सामग्री विकसित नहीं कर पा रहे हैं। बल्कि विदेशों में विकसित सामग्री को विभिन्‍न भारतीय भाषाओं में डब करके रिलीज़ कर दिया जाता है। अब इसकी आदत पड़ चुकी है। इसके पीछे तर्क ये है कि ये सामग्री सचमुच अच्‍छे दर्जे की है। इसमें जानकारी का भंडार है। कमाल की बात तो ये है कि भारतीय विषयों पर भी विदेशी फिल्‍मकार बाजी मार ले जाते हैं। वो यहां आकर विभिन्‍न विषयों पर डॉक्‍यूमेन्‍ट्री बनाते हैं और उन्‍हें डिस्‍कवरी या नेशनल ज्‍योग्राफिक जैसे चैनलों पर प्रदर्शित करते हैं।

पुस्‍तकों की भी यही है। इंग्लिश मीडियम में पढ़ने वाले हमारे बच्‍चे अमेरिकन पॉपुलर टीन-एज लिटरेचर पढ़ रहे हैं। हैरी पॉटर या इसी तरह की पुस्‍तकें। सवाल ये है कि क्‍या हिंदी या अन्‍य भारतीय भाषाओं में बच्‍चों के लिए सामग्री तैयार करना इतना मुश्किल है
? और तो और मैंने कुछ घरों में माता पिता को तारक मेहता...जैसे सीरियल को बच्‍चों का मानकर उन्‍हें परोसते देखा है।

ज़रा ग़ौर कीजिए कि बहुत छोटी उम्र के आपके घरों के बच्‍चे इन दिनों कौन-से फिल्‍मी-गीत गाते हैं। मेहमानों के आने पर
बच्‍चा, ज़रा वो गाना सुनाओका इसरार करने पर बच्‍चे के होठों पर कौन-सा गाना सजता है। अब सवाल कीजिए कि क्‍या ये गाने वाक़ई बच्‍चों के लिए हैं। दरअसल हमने भारत में बच्‍चों के लिए फिल्‍मों, गीतों, पुस्‍तकों, डॉक्‍यूमेन्‍ट्रीज़ वगैरह का एक स्‍वस्‍थ बाज़ार ही तैयार नहीं किया। जो बाजा़र था वो धीरे धीरे विलुप्‍त हो गया। कई पीढियां चंदामामा, चंपक, नंदन जैसी पत्रिकाओं को पढ़कर बड़ी हुईं हैं और ये उनके संस्‍कारों का हिस्‍सा बनीं। बच्‍चों की पत्रिकाएं या तो बंद हो गयी हैं या उनका विस्‍तार कम होता चला गया है।

ज़रा सोचिए
, हम अपने बच्‍चों को पढ़ने, गाने और देखने के कौन-से संस्‍कार दे रहे हैं।  

Saturday, June 23, 2018

‘बचपन के एक बाबू जी थे’- यूनुस ख़ान




कल पितृ दिवस था। भले ही बाज़ार ने इस दिन को अपनी सुविधा और मुनाफे के सरोकारों के तहत तैयार किया है
, लेकिन अगर कोई दिन इस ज़रूरी रिश्‍ते को सलाम करता है—तो हम अपने तरीक़े से इसके साथ खड़े हो सकते हैं।

सिनेमा ने पिता की बहुधा स्‍टीरियो-टाइप छबि दी है
, जिसमें वो अपने नालायक बेटे को दूर हो जा मेरी नज़रों सेवाला संवाद सुनाता है। या फिर उस पर गर्व करता है। जैसे मुग़ल-ए-आज़ममें पृथ्‍वीराज कपूर अकबर की भूमिका में—जो प्‍यार की राह में अपने शहंशाही गुरूर के साथ मौजूद हैं।

जब महेश भट्ट की फिल्‍म
डैडीको याद करता हूं- तो अनुपम खेर की एक शराबी पिता की छबि उभरती है। इस फिल्‍म में सूरज सनीम ने बेहतरीन गाना लिखा है—सपनों के घर की छत पे हैं तारे/ टॉफियों की दीवारों पर लटके गुब्‍बारे/ घर के उजियारे सो जा रे/ डैडी तेरे जागें, तू सो जा रे। इसे तलत अज़ीज़ ने गाया है। अगर आपने ये फिल्‍म नहीं देखी है और अगर आप ये सोच रहे हैं—कि ये किसी बेटे के लिए पिता का गीत है—तो आप ग़लत समझ रहे हैं। ये गाना डैडी अपनी बेटी के लिए गा रहे हैं।

अनुपम खेर की एक और पिता की छबि उभरती है—
सारांश वाले पिता वाली। इत्‍तेफाक ये है कि ये भी महेश भट्ट की ही फिल्‍म है। एक दृश्‍य जो आपको यू-ट्यूब पर भी मिल जाएगा, इसमें अपने बेटे को खो चुका एक लाचार पिता, परेशान है- जूझ रहा है कि उसकी अस्थियां उसे सौंप दी जाएं। पर दफ्तर का अपना सिस्‍टम है। जिसमें भ्रष्‍टाचार है, जिसमें देरी है, जिसमें संवेदनहीनता है। वो कहता है—एक बाप का अपने बेटे की लाश पर अधिकार है या नहीं। या उसके लिए भी हमें रिश्‍वत देनी पड़ेगी

पेशेवर हिंदी सिनेमा में पिता अमूमन बेटे या बेटी के फैसलों के खिलाफ ही खड़े नज़र आते रहे हैं। जैसे
दिल वाले दुल्‍हनिया ले जायेंगेके अमरीश पुरी। या मुहब्‍बतेंके अमिताभ बच्‍चन। भले ही अंत में उनका हृदय-परिवर्तन होता दिखाया जाता है। एक फूल दो मालीमें पिता अपने बेटे के लिए प्रेम धवन का लिखा गीत गाते हैं—मेरा नाम करेगा रोशन/ जग में मेरा राज दुलारा। इस गाने में ये आग्रह भी है कि कल जब मैं बूढ़ा हो जाऊं तो मेरा ख्‍याल रखना। मैं प्रेम की दीवानी हूंमें लड़की गाती है—पापा की परी हूं मैं’, ये हमारे बदलते हुए समाज में लड़की के प्रति मिटते भेदभाव को दिखाता है। हाल के दिनों में मैंने दंगलमें अद्भुत व्‍यंग्‍य-गीत देखा—बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है। ये पिता....अपनी बेटियों को पहलवान बनाने के लिए समाज से टक्‍कर लेता है।

सीक्रेट सुपरस्‍टार फिल्‍म में तो पिता का इतना खूंखार रूप देखने को मिलता है—कि आपको उससे नफरत होने लगती है। आज पितृ दिवस पर वो गुलज़ार का वो गीत भी याद आ रहा है—बचपन के एक बाबूजी थे/ अच्‍छे सच्‍चे बाबूजी थे/ दोनों का सुंदर था संगम। बताईये, आप अपने पिता को याद करके कौन-सा गाना गुनगुनाते हैं।

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