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Tuesday, January 13, 2009

slumdog और white tiger के बहाने कुछ सवाल

Danny Boyle की फिल्‍म ‘Slumdog Millionaire’ को चार Gloden Globe अवॉर्ड क्‍या मिले, देश में एक झूठे-गौरव की लहर दौड़ गई है । ऐसा माना जा रहा है कि ये पुरस्‍कार भारतीय फिल्‍म जगत में कोई नई लहर पैदा कर देंगे । कयास लगाए जा रहे हैं कि अब ऑस्‍कर भी दूर नहीं है । पर कुछ नए-पुराने सवाल उठ खड़े हुए हैं ।

 

सबसे पहला सवाल तो ये है कि क्‍यों पश्चिम को केवल भारत से आई फिल्‍मों में यहां की ग़रीबी, विवशताएं, अव्‍यवस्‍था और भभ्‍भड़ देखना ही सुहाता है । यही वो विषय हैं जिन्‍हें देखकर पुरस्‍कारों की झोली बहुधा खोल दी जाती है । ऐसा पहले भी होता रहा है । dharavi-773555सत्‍यजीत राय तक पर ये इल्‍जा़म लगे हैं कि उन्‍होंने भारत की  ग़रीबी को भुनाया और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर ख्‍याति अर्जित की । बहरहाल slumdog मुंबई के जिस हिस्‍से को दिखाती है वो है धारावी का हिस्‍सा । धारावी जिसे एशिया की सबसे बड़ी झोपड़-पट्टी कहा जाता है । इस फिल्‍म्‍ा को भारत में वितरित कर रहे 'फॉक्‍स सर्चलाईट' के प्रमुख का कहना है कि ये फिल्‍म दिखाती है कि किस तरह भारत बदल रहा है । और दुनिया के आकर्षण का केंद्र बन रहा है ।

 

slumdog भारत के एक मशहूर राजनयिक विकास स्‍वरूप की 180px-VikasSwarup पुस्‍तक Q and A पर आधारित
है । इस समय दक्षिण अफ्रीक़ा में भारतीय उच्‍चायोग में तैनात विकास स्‍वरूप की ये पहली पुस्‍तक है । जिसमें ये बताया गया है कि किस तरह एक ग़रीब वेटर राम मोहम्‍मद थॉमस टेलीवीजन के एक मशहूर क्विज़ शो में बारह सवालों का जवाब देता है और किस्‍मत के झोंके में अचानक करोड़पति बन जाता है । ये पुस्‍तक साल 2005 में प्रकाशित हुई थी । बाद में बी.बी.सी. पर जब इस पुस्‍तक पर आधारित नाटक को सर्वश्रेष्‍ठ नाटक का पुरस्‍कार मिला तो ब्रिटिश फिल्‍म निर्माण संस्‍था film four ने इसके फिल्‍म-अधिकार ग्रहण कर लिये और तब बनी  danny boyle के निर्देशन में फिल्‍म sulmdog millionaire.

 

सुना जा रहा है कि विकास स्‍वरूप ने इस पुस्‍तक पर फिल्‍म-निर्माण की पेशकश भारत के कई प्रोड्यूसर्स से की थी । लेकिन सभी ने इसे ठुकरा दिया था । तब जाकर उन्‍होंने फिल्‍म-फोर के इसके अधिकार दिये । ज़ाहिर है कि 'फिल्‍म-फोर' को इस पटकथा में Slumdog-Millionaire-001 अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर नाम कमाने का अच्‍छा मसाला नज़र आया होगा । तभी तो चाहे निर्देशक डैनी बॉयल हों या फिर पटकथा लेखक simon beaufoy सभी ने मुंबई के बदसूरत चेहरे को उकेरने में अपनी सारी कला झोंक दी है । यानी ये फिल्‍म 'समकालीन भारत के यथार्थ को संपूर्णता में क़तई नहीं दिखाती । बल्कि उसके उस हिस्‍से को चुनकर दिखाती है, जिसे संसार कौतुहल की दृष्टि से देखता है । ऐसा भारतीय और विदेशी फिल्‍मकार पहले भी करते आए हैं ।

 

दूसरा बड़ा सवाल ये है कि पुरस्‍कार के मंच पर भारतीय फिल्‍म को खड़ा करने और साबित करने के लिए आज भी एक विदेशी निर्देशक दरकार होता है । इस फिल्‍म के निर्देशक और निर्माता के तौर पर भारतीय नाम होते तो क्‍या पुरस्‍कार समारोहों में ये इतनी चमक बिखेर पाती । भले ही 'गोल्‍डन ग्‍लोब' पुरस्‍कार दुनिया भर के अख़बारों, रेडियो और टेलीविजन स्‍टेशनों के ज़रिए किए गए 'पोल' के आधार पर दिये जाते हों पर इनके पश्चिमी पूर्वाग्रह से इंकार नहीं किया जा सकता । ऑस्‍कर और गोल्‍डन ग्‍लोब दोनों ही पूर्वाग्रहों का पिटारा नज़र आते हैं । और ये बार बार साबित भी होता आया है ।

 

'गोल्‍डन-ग्‍लोब' हो या ऑस्‍कर ...दोनों ही पुरस्‍कारों के लिए फिल्‍म-कंपनियों को बाक़ायदा अपनी फिल्‍म की मार्केटिंग करनी पड़ती है और एक रणनीति तैयार करके बहुत सारा पैसा झोंकने के बाद ही मंच पर ट्रॉफी हवा में लहराने का मौक़ा मिलता है ।

 

अरविंद अडिया की 'मैन बुकर' से पुरस्‍कृत पुस्‍तक ‘The White Tiger’ भी वही करती है जो slumdog ने किया है । अडिगा ने एक बेहद मामूली कहानी को बड़े दिलचस्‍प ढंग से बयान किया है । और भारत के उस हिस्‍से को खूब रस लेकर दिखाया है जिसमें ग़रीबी, अंधविश्‍वास, अपराध, बेईमानी, बीमारियां और शोषण
है । अडिगा बड़े ज़ोर-शोर से बताते हैं कि दिल्‍ली दो देशों की राजधानी है । एक उस भारत की जो अंधेरे में है और एक उस शहरी भारत की जो उजाले में है । अडिगा ने अपनी सारी मेहनत शिल्‍प में की है । कथावस्‍तु बेहद लचर और मामूली है । इस पुस्‍तक को भी प्रकाशकों ने छापने से इंकार कर दिया था । बड़ी मुश्किल से वे इसे छपवा सके । उसके बाद से ये बुक-स्‍टॉल्‍स से लेकर ट्रैफिक-सिग्‍नलों तक सब जगह छाई हुई है । इस किताब को पढ़कर आपको अफ़सोस ही होता है । आप ठगे हुए महसूस करते
हैं । slumdog ने भी वही किया है । एक भारतीय लेखक की पुस्‍तक को भुनाया है और खुद को millionaire बनाया है ।

 

अडिगा और बॉयल दोनों भारत की ग़रीबी की मार्केटिंग करके सुर्खियों में आए कलाकार हैं ।


लेकिन 'स्‍लमडॉग' को मिला एक 'गोल्‍डन ग्‍लोब' वाक़ई हर्षित करता है । संगीतकार ए.आर.रहमान को उनके संगीत के लिए विश्‍व स्‍तर पर जो नाम मिला है उससे वाक़ई उम्‍मीद बंधती है ।

Thursday, October 30, 2008

क्‍यों फीके पड़ गए दीपावली विशेषांक

दीपावली आते ही मुझे याद आते हैं अख़बारों के दीपावली विशेषांक, जो हमारे बचपन और कैशौर्य का अनिवार्य हिस्‍सा हुआ करते थे । मुंबई आने के बाद इन विशेषांकों से नाता टूट ही गया । फिर ये भी देखा कि अब इन विशेषांकों की चमक एकदम फीकी पड़ गई है ।

 

मध्‍यप्रदेश के अलग अलग शहरों में पलने बढ़ने की वजह से इंदौर के 'नई 1 दुनिया' से गहन और सघन जुड़ाव रहा है । जब अपन अख़बार को अपनी छोटे छोटे हाथों से फैलाकर नहीं पढ़ सकते थे तब उसे ज़मीन पर बिछाकर उस पर बैठकर अक्षर अक्षर जोड़कर पढ़ा करता था । 'नई दुनिया' के दीपावली विशेषांक खूब सजीले आते थे । कहानियां, लेख, कविताएं, फिल्‍मी-मसाला सब कुछ तो होता था इन विशेषांकों में । और कई दिन पहले से अख़बार 'अपनी प्रति आज ही बुक करांए' की टेर लगाते रहते थे । यूं लगता था कि दीपावली विशेषांक 'मिस' हो गया तो बहुत बड़ी सुख से चूक जायेंगे हम । दैनिक भास्‍कर, दैनिक जागरण, नागपुर के लोकमत समाचार वग़ैरह के दीपावली विशेषांक बड़े ही यादगार हुआ करते थे । लोकमत तो अकसर दो बड़े जिल्‍दों वाली पुस्‍तकें निकालता था । जो अभी भी हमारे जबलपुर वाले घर में संग्रहीत हैं । कहानियां, लघु उपन्‍यास, कविताएं, साक्षात्‍कार सब कुछ । इन विशेषांकों में इतनी सामग्री होती थी कि आराम से दो महीने निकल जाते थे पढ़ते हुए ।

 

इसके बाद 'इंडिया टुडे' ने भी अपनी साहित्‍य वार्षिकी छापनी शुरू की थी शायद नब्‍बे के दशक में । पर वो सिलसिला भी शायद 'फायदे' का सौदा नहीं लगा होगा । तभी तो इतनी महत्‍त्‍वपूर्ण कहानियों और कविताओं से सजे इतने महत्‍त्‍वपूर्ण आयोजन को बंद कर दिया गया । अब भी इस तरह के विशेषांक सूधी-पाठकों की शेल्‍फ में सजे होंगे ।

 

मुंबई आने के बाद देखा कि 'जनसत्‍‍ता' सबरंग के नाम से अपनी साहित्‍य विशेषांक दीपावली पर छापा करता था । छोटा लेकिन बेहद महत्‍त्‍वपूर्ण । हमें भी इसमें छपने का मौक़ा मिला । सबरंग के भी पुराने अंक किताबों के बीच कहीं दबे पड़े होंगे । सवाल ये है कि आखिर हिंदी में विशेषांकों की सजीली फौज अचानक फीकी क्‍यों पड़ गयी ।

 

कल मुंबई से प्रकाशित हिंदुस्‍तान टाइम्‍स में नेहा भयाना की शानदार रिपोर्ट

.... सबसे पहले के.आर. मित्रा ने साहित्‍य पत्रिका 'मनोरंजन' का दीपावली विशेषांक निकाला था । इसके बाद 'किरलोस्‍कर', 'स्त्री' और 'विविधा जैसी पत्रिकाओं ने विशेषांक निकाले और फिर ये पंरपरा चल पड़ी । विजय तेंदुलकर और वी.सी.मालेकर जैसे लेखकों को दीपावली विशेषांकों के ज़रिए ही ख्‍याति मिली थी ।

है मराठी पत्रिकाओं के दीपावली-विशेषांकों के बारे में । उन्‍होंने लिखा है कि मंदी की मार से मिठाईयों के बक्‍से छोटे हो गये, कपड़ों और पटाखों पर होने वाला खर्च सिकुड़ गया लेकिन दीपावली पर प्रकाशित होने वाले विशेषांकों पर 'मराठी मानुस' आज भी उतनी ही शिद्दत से खर्च कर रहा है । रिपोर्ट में हर महीने आठ हज़ार रूपये कमाने वाले गुरूनाथ शेट्ये का हवाला दिया गया है । पैंतालीस वर्षीय ये सेल्‍समैन कहता है कि भले ही सजावट के खर्च में कटौती करनी पड़े पर लेकिन 25 दीपावली विशेषांक वो जरूर खरीदेगा । ये वो विशेषांक हैं जिनमें कहानियां, आत्‍मकथाएं, कविताएं और अन्‍य सामग्री होती है । अविश्‍वसनीय लगता है ना...एक व्‍यक्ति पच्‍चीस पत्रिकाएं खरीदने को तैयार है । अगर हम हर पत्रिका की कीमत पच्‍चीस रूपये भी मानें तो कुल छह सौ पच्‍चीस रूपये होते हैं । जो कि एक बड़ी रकम है । फिर सवाल केवल खरीद लेने का नहीं है । बल्कि खरीदकर पढ़ने का भी है । पच्‍चीस विशेषांकों को मतलब है साल भर का कोटा । क्‍या हम हिंदी परिदृश्‍य में इस स्थिति की उम्‍मीद कर सकते हैं ।

 

2 महाराष्‍ट्र में दीपावली विशेषांक छापने का सिलसिला 100 साल पुराना है । इस साल 437 दीपावली विशेषांक बाज़ार में उतरे हैं । मुंबई के अर्थशास्‍त्री गिरीश वासुदेव का कहना है कि इस साल प्रकाशक तकरीबन 22 करोड़ का व्‍यवसाय इन विशेषांकों के सहारे करने वाले हैं । इसके अलावा कोने-कोने में मौजूद सर्क्‍यूलेटिंग-लाइब्रेरियों के ज़रिए ना जाने कितने पाठक लंबे समय तक इन विशेषांकों को पढ़ने वाले हैं । कई ऐसे परिवार हैं जो इतनी सारी पत्रिकाओं को ख़रीद नहीं सकते । ऐसे में दादर की शारदाश्रम को-ऑपरेटिव सोसाइटी ने एक अनूठा उपाय किया है । प्रति सदस्‍य पचास रूपये जमा किये गए हैं । ताकि इन पैसों से साठ सत्‍तर दीपावली विशेषांक ख़रीदे जायें और फिर साझे में पढ़े जायें ।

 

मुझे लगता है कि ऐसी परंपरा महाराष्‍ट्र के अलावा अगर कहीं और है तो वो बंगाल में है । जहां के लोग क्रॉनिक रीडर्स माने जाते हैं । पर मुझे ये बात समझ नहीं आती कि हिंदी परिदृश्‍य में ऐसा क्‍यों नहीं होता । हमारी तो लघु पत्रिकाएं भी डगमगाते हुए चल रही हैं । बड़े समूहों की दिलचस्‍पी हिंदी पत्रिकाओं में नहीं रही, फिर दीपावली विशेष तो दूर ही बात है । हमारे यहां पढ़ने की परंपरा पर कितना ग्रहण लगा है ये सभी जानते हैं । हम तो मांग कर भी पढ़ने में विश्‍वास नहीं रखते । हां मांग कर किताबों को अपने घर पर 'सजा' लेते हैं । और फिर वापस नहीं करते ।

 

दीपावली बीत गयी । आज 'भाईदूज' है । अख़बारों के दफ्तर बंद हैं । दीपावली विशेषांक कहीं हैं नहीं । और मैं ब्‍लॉगों की दुनिया का चक्‍कर काट रहा हूं । बहरहाल देर से ही सही आपको 'शुभ दीपावली' ।

Thursday, October 9, 2008

ये किस शहर में हम आ निकले

दिन तो बीत जाता है दफ्तरों में । पर कटती नहीं रातें । जी नहीं ये प्‍यार-व्‍यार का चक्‍कर नहीं है । रूमानियत की कच्‍ची सड़क पर मत जाईये । थोड़ा गंभीर हो जाईये और सुनिए । मुंबई की ये रातें जश्‍न की रातें हैं । समंदर किनारे का ये शहर सितंबर से लेकर दिसंबर तक शोर में डूबा होता है । मुंबई में पहले ही शोर कम थोड़ी है । लोकल ट्रेन का रिदम, बेस्‍ट की बसों की आवारगी और दो-चार पहियों की चिल्‍लपों । कितने ज़रिए हैं शोर के । फिर भी मुंबई को शोर करने के लिए बहानों की ज़रूरत नहीं है । गणपति महोत्‍सव, नवरात्र, ईद, क्रिसमस, नया साल, भारतीय क्रिकेट टीम का जीतना, किसी राजन‍ीति‍क किले पर फतह हर कुछ शोर का सूत्र बन सकता है ।


जिस समय मैं नौ अक्‍तूबर के सुबह नौ बजे के लिए इस पोस्‍ट को लिखकर शेड्यूल कर रहा हूं--आठ अक्‍तूबर की रात के नौ बजे हैं । और मेरे चारों तरफ से शोर का हमला हो रहा है । ज़रा शोर के इस कॉकटेल के अलग-अलग स्‍वादों की बानगी देखिए---

कहीं से नब्‍बे के दशक का शुरूआती गीत बज रहा है---हवा हवा ऐ हवा, यार मिला दे
किसी और दिशा से फाल्‍गुनी पाठक गुजराती में राम जाने क्‍या गा रही हैं । बस डांडिया बीट्स सुनाई दे रही हैं ।
और इस डांडिया में 'सिंग इज़ किंग' का तड़का भी लग रहा है किसी दिशा से ।
मुंबई में बोरीवली पश्चिम स्थित गोराई का ये इलाक़ा जहां मैं रहता हूं---एक कड़ाहे की तरह बन गया है । हर तरफ़ से शोर के नए नए फ्लेवर मिला मिलाकर एक महा-शोर-पकवान तैयार हो रहा है । अरे अब ये कहां से 'मी डोलकर दरयांचा राज़ा' सुनाई दे रहा है हेमंत कुमार और लताजी की आवाज़ों में । कहीं से किशोर कुमार डिस्‍को रीमिक्‍स पर चीख़ रहे हैं--'मैं हूं डॉन' । कुछ फीकी आवाजें 'नीबूड़ा' की हैं । कहीं से ठेलती हुई ध्‍वनि है 'ये देश है वीर जवानों का' । हे भगवान ये कौन सी खिचड़ी है ।

ये वही गीत हैं जिन्‍हें हम अपने घरों में संगीत के नाम पर सुनते हैं । जब इनका डेसीबल बढ़ जाता है तो ये असह्य हो जाते हैं । मुंबई जश्‍न मना रहा है ।
मैं क्‍या करूं । कहां जाऊं । किससे कहूं ।
एक शेर सुनिए---
छोड़कर शहर को अब जंगल में गुजारें बारिश
साल भर में बस एक यही मौसम तो है अपना ।
यहां 'बारिश' की बजाय कोई भी महीना जोड़ दीजिये ।
जंगल में बसने का बहाना तैयार हो जायेगा ।
बहरहाल विजयादशमी की शुभकामनाएं ।
ये विजयादशमी शोर पर सुरीलेपन की जीत का पर्व बन जाये ।

Monday, September 29, 2008

बच्‍चों की आउटडोर गतिविधियों के लिए करनी पड़ी एक कार्टून चैनल को पहल ।

क्‍या आपने ध्‍यान दिया है कि हमारे घरों के बच्‍चों को टेलीविजन का नशा होता जा रहा है । ख़ासकर कार्टून चैनलों का । उस पर सिफत ये है कि बच्‍चों की शैत‍ानियों से छुटकारा पाने के लिए जनम-घुट्टी की तरह मां-बाप बच्‍चों को कार्टून-चैनलों के हवाले कर देते हैं । ये उस अफ़ीम की तरह है जो बचपन में दाईयां बच्‍चों को चटा दिया करती थीं । यही वजह है कि आजकल बच्‍चों की आउट-डोर एक्‍टिविटीज़ बंद-सी हो गई हैं । ये बात उस समय और भी ज्‍यादा रेखांकित हुई जब एक कार्टून-चैनल ने एक बड़ी पहल की ।

 

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सत्‍ताईस तारीख़ को बच्‍चों के चैनल निकोलोडियन ने एक बड़ा आयोजन किया । LETS JUST PLAY नामक इस अभियान का मक़सद था बच्‍चों को बाहर जाकर खेलने के लिए प्रेरित करना । पिछले कई दिनों से कुछ प्रमुख टी.वी. चैनलों पर इस अभियान का प्रमोशन किया जा रहा था । प्रिया दत्‍त, पूजा बेदी, सायरस भरूचा, स्‍मृति ईरानी जैसी जानी-मानी हस्तियां इस अभियान का प्रचार करती नज़र आईं । इस अभियान को मुख्‍य रूप से दिल्‍ली, मुंबई और बैंगलोर में आयोजित किया गया । सत्‍ताईस तारीख को थोड़ी देर के लिए 'निकोलोडियन' ने अपना प्रसारण पूरी तरह से बंद कर दिया और उस दिन इन बड़े शहरों में कुछ चुनिंदा जगहों पर बच्‍चों के खेलों का आयोजन किया गया ।

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'निक' की इस पहल ने कई मुद्दों को उजागर कर दिया है । आज के बच्‍चे अपनी स्‍कूली पढ़ाई, प्रोजेक्‍ट्स, ट्यूशनों वग़ैरह में तो उलझे  होते ही हैं । इसके अलावा कंप्‍यूटर गेम्‍स और टी.वी. ने उनका बहुत सारा समय अपने क़ब्ज़े में कर लिया है । ऊपर से बाहर जाकर खेलने के लिए जगह की भारी कमी है इन महानगरों में । इसलिए वो सारे खेल समाप्‍त हो गए हैं जिन्‍हें हम कभी बचपन में खेला करते थे । अभी कुछ दिन पहले ही हम सभी मित्र याद कर रहे थे कि किस तरह हमारा बचपन गिल्‍ली डंडा, भंवरा, कंचे, छिपा-छिपी जैसी शैतानियों से भरपूर था । इसी बचपन का हिस्‍सा था क्रिकेट और फुटबॉल खेलना । और सायकिल जमकर चलाना । जिस शहर में हम बड़े हुए वहां मैदानों की व्‍यवस्‍था थी । वहां मुहल्‍लों और दिलों में जगह की कोई कमी नहीं थी । इसलिए हम जमकर पैर फैला सकते थे और डटकर खेल सकते थे ।

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( चित्र पिकासा वेब से साभार ) पर आज समुद्र वाले इस शहर में खेल के मैदान नहीं हैं । खेलने की जगहें नहीं हैं । इमारत के कंपाउंड में खेलें तो बड़े इसलिए डांटते हैं कि गाडि़यों के शीशे टूट जायेंगे । हमारी इमारत में तो बच्‍चों के तेज़ सायकिल ना चलाने के लिए स्‍पीड-ब्रेकर बना दिए गए हैं । जिन इमारतों में खेलने की जगह है भी, तो वहां बच्‍चों के भीतर बाहर जाकर खेलने की इच्‍छा नहीं है । उनका शेड्यूल इतना व्‍यस्‍त है कि मां-बाप को मजबूरी में उन्‍हें कार्टून चैनल देखने के लिए हां कहना पड़ता है । अगर ज़रा सी ना-नुकुर की तो बच्‍चे पूरे घर को सिर पर उठा लेते हैं ।

 

bachche 2 ऐसे परिदृश्‍य में स्‍कूलों को पहल करनी चाहिए थी । पर शायद वहां इसके लिए कोई गुंजाईश नहीं थी । इसलिए 'निक' ने अपने विश्‍व-व्‍यापी अभियान के तहत भारत में भी lets just play का नारा दे दिया । और चुनिंदा बड़े शहरों में बच्‍चों को बाहर बुलवाकर खेलने की प्रेरणा दी । सवाल ये है कि क्‍या एक दिन आधे घंटे अपने चैनल पर प्रसारण ना करने से वाक़ई कुछ होगा । सिवाय इसके कि लोगों का ध्‍यान इस मुद्दे पर जाए । अब इस मुद्दे पर हम सबको ध्‍यान देना होगा और समय निकालकर खुद बच्‍चों को आउटडोर गेम्‍स के लिए ले जाना होगा । खुद उनके साथ खेलना होगा ।

 

क्‍या आप इसके लिए तैयार हैं ?  

 

Wednesday, September 24, 2008

राजू भाई, छुट्टन और घर के बेदखल बूढ़े ।

मुंबई का उपनगर बोरीवली ( पश्चिम) । और यहां का एक व्‍यस्‍त-सा चौराहा । डॉन बॉस्‍को स्‍कूल और चर्च यहां के प्रमुख लैन्‍डमार्क हैं, ये वो रास्‍ता है जो पश्चिमी उपनगरों की बहुत मुख्‍य-सड़क न्‍यू लिंक रोड पर है । कल अचानक वहां से गुज़रते हुए एक अनदेखे-से कोने पर एक बुजुर्ग को मूंगफली बेचते हुए देखा । विषयांतर करते हुए आपको बता दूं कि यहां मुंबई में आते-जाते मूंगफली और चने खाकर अपने पोषण को पूरा करने की परंपरा है । देश का सबसे पुराना फास्‍ट-फूड है ये । भुनी हुई मूंगफली, या चने या फिर हरे मटर जैसी चीज़ें फांकते हुए आप चल भी सकते हैं और सार्वजनिक-वाहनों में बैठे भी रह सकते हैं । ख़ैर कल सात बजे सांझ के झुटपुटे के दौरान लालटेन की रोशनी में एक बूढ़े को मूंगफली बेचते हुए देखा तो अपन वहीं रूक गए । छूकर देखा मूंगफली बढिया चकाचक गर्म थी । लेकिन बुढ़ऊ से बतियाने लगे । जब तक बुढ़ऊ दद्दू पुडि़या में मूंगफली पैक कर रहे थे, तब तक उनसे बहुत सारी बातें हुईं । पता चला कि उनका नाम छुट्टन है । मुझे अजीब लगा कि हैं बुढ़ऊ और नाम छुट्टन । दुबली पतली, झुर्रीदार काया, कंटीली मूंछें, धोती कुर्ता और धुंआं धुंआ आंखें लिये, मूंगफली की सिगड़ी के धुंए से तर-ब-तर छुट्टन मज़े से बातें कर रहे थे और ग्राहकों को मूंगफली भी दे रहे थे, पता चला कि पूरी बारिश आज़मगढ़ के आसपास किसी गांव में बिताकर आए हैं । अभी परसों ही लौटे हैं और फिर से ठिया लगाना शुरू किया है । हमने पूछा कि इस उम्र में क्‍या ज़रूरत है ये सब करने की । घर बैठिये, आराम कीजिए । छुट्टन का जो जवाब था उसने ही हमें इस पोस्‍ट को लिखने के लिए मजबूर कर दिया है । उनका कहना था कि दो बेटे हैं । एक मुंबई में दहिसर में । और दूसरा गांव में । अगर दिन भर घर पर बैठें तो बहुओं की ज्‍यादती, बेटों की झिड़क और ताने सुनने पड़ेंगे । इससे अच्‍छा है कि कोई ऐसा ज़रिया हो जाए, जिससे आमदनी भी हो जाये और दिन में घर पर रहना ना पड़े ।

मुझे छुट्टन की इस बात से राजू भाई याद आ गये । तकरीबन साढ़े पांच फुट की काया । केवल एक हाथ । पैर दोनों सही सलामत । सदरी, लाल कमीज़ और सफेद धोती । और पगड़ी । बिल्‍ला अपनी जगह पर कायम । राजू भाई कुली थी और वो मुझे अहमदाबाद रेलवे स्‍टेशन पर मिले थे इसी जून के महीने में संभवत: बाईस तारीख की शाम । हम हिचके कि 'इन्‍हें' सामान कैसे थमाया जाए । राजू-भाई ने कहा कि ये ना समझिये कि एक हाथ नहीं है तो हम आपका बैग नहीं पकड़ पायेंगे । बहरहाल राजू भाई को सामान थमा दिया गया । उन्‍होंने हमें प्‍लेटफॉर्म पर छोड़ा और ट्रेन का इंतज़ार करने लगे । इस दौरान राजू भाई से बातें हुईं ।
पता चला कि वो राजस्‍थान के हैं और एक अरसे से यहां कुलीगिरी कर रहे हैं । काम के सिलसिले में राजस्‍थान से गुजरात आए थे । हमने पूछा इस हाथ को क्‍या हुआ । पता चला कि एक बार ग्राहक झटकने के चक्‍कर में प्‍लेटफार्म पर आती ट्रेन पर चढ़े थे और फिसल पड़े थे । गांव के बारे में उन्‍होंने बताया‍ कि कई बीघा जमीन है । बेटे हैं, पर उन्‍हें राजस्‍थान में इसलिए नहीं रहना क्‍योंकि घर पर पड़े रहेंगे तो बेटे बहुओं की चार बातें सुननी होंगी । एकाध बार कोशिश की है फिर तय किया है कि जब तक जान रहेगी, यही काम करेंगे और खुदमुख्‍तारी से जीवन बिताएंगे ।

सवाल ये है कि छुट्टन या राजू भाई को अपने बुढापे में क्‍यों घर से बाहर रहना पड़ता है । पारिवारिक स्थितियां अच्‍छी होते हुए भी ये बूढ़े इसलिए काम कर रहे हैं क्‍योंकि उन्‍हें घर से बाहर रहने का बहाना चाहिए । बूढ़े बाप मुंबई में हमारे परिवारों का इस क़दर बोझ बन चुके हैं ।

मुंबई के सुदूर उपनगर भाइंदर में मैंने देखा कि रेल की पटरियों के आसपास बनी इमारतों के अवांछित बूढ़े निष्क्रिय पटरियों और बेंचों पर आकर महफिलें जमाते हैं । चूंकि तब नया-नया था इसलिए पता नहीं था कि इतने बड़े बड़े झुंड क्‍या कर रहे हैं भरी दोपहर में । बाद में पता चला कि बहुओं के तानों से बचने के लिए ये पुरूष और महिलाएं समूह में इस तरह से पार्कों, सड़क की पटरियों, रेलवे स्‍टेशनों और कुछ हॉल्‍स में अपना वक्‍त गुज़ारते हैं । 

बस यही वस्‍तु स्थिति आप तक पहुंचानी थी । इसके आगे आज मुझे कुछ नहीं कहना है ।

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