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Thursday, October 17, 2013

दीप्‍ती नवल की कविता “Smita and I”

आज अभिनेत्री स्मिता पाटील का जन्‍मदिन है।
मुझे नहीं पता कि वो आज जिंदा होतीं तो कितने बरस की हो जातीं। ना ही जानने की कोशिश भी की।

स्मिता की आवाज़...उनका बोलना...और उनकी ख़ामोशी...उनका बस कैमेरे की तरफ़ नज़र भर उठा लेना...सब कितनी कितनी परतों वाला होता था। शायद सागर सरहदी से विविध-भारती के लिए बातें कर रहा था--तब उन्‍होंने विकलता से बताया था कि स्मिता ना होतीं तो 'बाज़ार' बनती नहीं। उनका बहुत ज्‍यादा योगदान था फिल्‍म पूरी करवाने में। और फिर सागर साहब तो पहली बार निर्देशन की कमान संभाल रहे थे।

पढ़ाई के ज़माने में 'बाज़ार' का गाना 'करोगे याद तो हर बात याद आएगी' कैसेट में रिकॉर्ड करवाया था--बड़ी मशक्‍कत के बाद। उसमें कुछ संवाद भी आ गये थे। नसीर बोलते हैं--'अपने आप को सोने की चिडिया क्‍यों कह तुमने'। स्मिता--बता नहीं सकती'। नसीर--'अगर कहीं मैं मिल गया तो पहचान लोगी मुझे'। स्मिता--'सलाम ज़रूर करूंगी'। इतने से संवाद थे। पर इसमें स्मिता की आवाज़ का उतार-चढ़ाव...उनके किरदार की बेचैनी और पीड़ा.. सब छलक-छलक आयी थी। आज भी गाना कहीं से बजे तो ज़ेहन में स्मिता की आवाज़ ज़रूर गूंजती है--'सलाम ज़रूर करूंगी'।



अभिनेत्री दीप्‍ती नवल ने स्मिता पाटील पर एक कविता रची थी। कहीं से खोजकर उसे कॉपी-पेस्‍ट कर रहा हूं। साथ में दोनों अभिनेत्रियों की तस्‍वीर भी।
smita-patil-and-deepti-naval

“SMITA AND I” : Deepti Naval

Always on the run
Chasing our dreams
We met each time

At baggage claims
VIP lounges
Check- in counters

Stood a while together
Among gaping crowds
Spoke, unspoken words

Yearning to share
Yet afraid, afraid
Of ourselves

All around us
People cheering, leering
And we, like spectacles
Amidst all the madness

Trying to live a moment
Of truth
A glance, a touch
A feeling to hold on to
And move on…

The last time we sat together
Waiting for a flight
I remember I’d said,

‘There must be another way
Of living this life!’

For a long time
You remained silent

Then,

Without blinking
Without turning
Said,

‘There isn’t’

Today
You are gone, and
I’m still running…

Still trying
To prove you wrong…………………

Monday, October 1, 2012

कभी तो मिलेगी बहारों की मंजिल राही: मजरूह

आज मजरूह का जन्‍मदिन है।

मजरूह....एक नायाब फिल्‍‍म-गीतकार। एक बेमिसाल शायर।
मजरूह के कुछ शेर तो जैसे मुहावरे बन गये हैं लिखने-पढ़ने वाले लोगों के लिए।
हमारे संगीत-ब्‍लॉग 'रेडियोवाणी' पर तो मजरूह का लिखा एक जुमला...दिल की आवाज़ बनकर चस्‍पां है--'हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं'।  ये जुमला हमने मजरूह के इस शेर से लिया है-- 

 

रोक सकता हमें ज़िन्दांन-ए-बला क्या मजरूह
हम तो आवाज़ हैं दीवारों से छन जाते हैं

मजरूह का ही एक और शेर--जिसे अकसर कहा जाता है--

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर
लोग साथ आते गये कारवां बनता गया।

उनका एक और शेर--जो हमारे लिए एक 'लाइट-हाउस' की तरह है--

देख जिंदां से परे जोशे जूनू जोशे बहार
रक्‍स करना है तो फिर पांव की जंजीर ना देख।

मजरूह सिर्फ एक शायर या सिर्फ एक गीतकार नहीं थे। वो एक शायर-गीतकार थे। तभी तो उनके गानों का कारवां सन 1946 से लेकर शाहरूख़ ख़ान के ज़माने तक जाता है। शाहरूख़ की एक फिल्‍म 'कभी हां कभी ना' के लिए उनहोंने लिखा--'वो तो है अलबेला/ हज़ारों में अकेला/ सदा तुमने ऐब देखा/ हुनर तो ना जाना'।
हमारे घरों के नालायक और शरारती माने जाने वाले लड़कों पर ये गाना कितना फिट बैठता है। खासकर पढ़ाई के अलावा खेलों या कलाओं में दिलचस्‍पी रखने वाले और घर का विरोध सहने वाले लड़कों पर।

मजरूह पढ़े लिखे वर्ग में अपने बहुत ही साहित्यिक, संवेदनशील गीतों के लिए याद किये जाते हैं। जैसे--'हम हैं मताए-कूचओ-बाज़ार की तरह' या फिर 'शाम-ए-ग़म की क़सम' या 'तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्‍या है'। यही मजरूह हैं जो इस गाने के ज़रिये हमें जज्‍बाती कर जाते हैं--

जब हम ना होंगे जब हमारी ख़ाक पर तुम रूकोगे चलते चलते
अश्‍कों से भीगी चांदनी में एक  सदा सी सुनोगे चलते चलते
वहीं पर कहीं हम तुमसे मिलेंगे बनके कली बनके सबा बाग़-ए-वफा में
रहें ना रहें हम महका करेंगे।।

यही मजरूह इस गाने के ज़रिये हमें उम्‍मीद दे जाते हैं। यक़ीन मानिए ये गाना तो जैसे उम्‍मीद का कभी ना खत्‍म होने वाला स्त्रोत है।

कभी तो मिलेगी कहीं तो मिलेगी बहारों की मंजिल राही
लंबी सही दर्द की राहें, दिल की लगन से काम ले
आंखों के तूफां को पी जा, आहों के बादल थाम ले
दूर तो है पर दूर नहीं है नज़ारों की मंजिल राही

यही मजरूह हताश दिलों की आवाज़ बन जाते हैं। दिलों की बेक़रारी और बेबसी की आवाज़।
ऐ दिल कहां तेरी मंजिल, ना कोई दीपक है ना कोई तारा है
गुम है ज़मीं दूर आसमां।
किसलिए मिल मिल के दिल टूटते हैं
किसलिए बन बन महल टूटते हैं
पत्‍थर से पूछा, शीशे से पूछा
ख़ामोश है सबकी जुबां
ऐ दिल कहां तेरी मंजिल।

लेकिन मजरूह एक खालिस गीतकार भी थे। और साहिर से उनकी इसी बात पर बहस थी कि फिल्‍मों में गाने किरदार के मिज़ाज के हिसाब से होने चाहिए। इसीलिए तो कभी वो लिखते हैं--'गे गे गेली ज़रा टिम्‍बकटू। काठमान्‍डू काठमांडू काठमांडू गेले हू/ मैं हूं लोहा चुंबक तू'। बहुत बाद के ज़माने में मजरूह ने लिखा--'अंग्रेज़ी में कहते हैं कि आय लव यू'। जिस पर अमिताभ थिरकते नज़र आये।

बस कुछ गानों के बहाने मजरूह को याद करना था।
हम कोई रिसर्च नहीं कर रहे थे। ना ही श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे
बस अपने दिल की बातें कहनी थीं सो कह दीं।

Monday, July 23, 2012

' चंदन चाचा के बाड़े में' :नाग-पंचमी और बचपन की एक कविता की विकल याद।

हम दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच जायें, उम्र के किसी भी पड़ाव पर, लेकिन बचपन की कुछ यादें कभी भी कहीं भी आपको अचानक आईना चमकाती नज़र आती हैं। तब तक कुछ स्‍मृतियां धूमिल पड़ जाती हैं। साल 2010 में यही हुआ था हमारे साथ जब अचानक बचपन की एक कविता याद आ गयी। पर पूरी नहीं आई। 'नागपंचमी' नामक इस कविता को खोजने में कई मित्रों, परिचितों और अपरिचितों ने योगदान दिया था।

और आखिरकार वो कविता पूरी हो ही गयी।
पर इसे पूरा करने में एक नहीं अनेक व्‍यक्तियों का योगदान रहा।
आपको बता दूं कि सबसे पहले तो रतलाम से मित्र विष्‍णु बैरागी जी ने बहुत ही मार्मिक पोस्‍ट लिखी थी, इस कविता को ना खोज पाने से उपजी निराशा को लेकर।
इसे तरंग की 2010 की इस पोस्‍ट पर पढ़ा जा सकता है।   

बाद में विदेश में रह रहे कमलेश ढवले ने सवाल उठाया कि क्‍या मध्‍यप्रदेश में जिन लोगों ने अपना बचपन बिताया और बाल भारती में पढ़ी कविताएं उन्‍हें बार बार याद आती हैं, तो मध्‍य प्रदेश पाठ्य पुस्‍तक निगम से कोई मदद ली जा सकती है। शायद ली भी जा सकती हो पर हमें ज्‍यादा उम्मीद नहीं। अफसोस यही रह गया है कि हम सभी ने इन किताबों को संभालकर नहीं रखा। बहरहाल....सागर से हमारे भौतिकी की अध्‍यापक श्रद्धेय टी.आर. शुक्‍ल जी, विदेश में रह रहे कमलेश जी और छत्‍तीसगढ़ से राहुल जी तीनों ने मिलकर इस कविता को काफी कुछ पूरा करवा दिया है। आज नाग-पंचमी है। इसलिए ये कविता सबेरे से ही ज़ेहन में गूंज रही थी। चलिए फिर से बचपन की उन यादों में पहुंचें इस कविता के माध्‍यम से। जिन्‍होंने इस कविता को लगभग पूरा करवाया उनका धन्‍यवाद। अगर अभी भी कोई तरमीम, सुधार, जोड़ घटाव बाक़ी हो तो कृपया मदद करें।

सूरज के आते भोर हुआ
लाठी लेझिम का शोर हुआ
यह नागपंचमी झम्मक-झम
यह ढोल-ढमाका ढम्मक-ढम
मल्लों की जब टोली निकली
यह चर्चा फैली गली-गली
दंगल हो रहा अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में।।

सुन समाचार दुनिया धाई,
थी रेलपेल आवाजाई।
यह पहलवान अम्बाले का,
यह पहलवान पटियाले का।
ये दोनों दूर विदेशों में,
लड़ आए हैं परदेशों में।

देखो ये ठठ के ठठ धाए
अटपट चलते उद्भट आए
थी भारी भीड़ अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में


वे गौर सलोने रंग लिये,
अरमान विजय का संग लिये।
कुछ हंसते से मुसकाते से,
मूछों पर ताव जमाते से।
जब मांसपेशियां बल खातीं,
तन पर मछलियां उछल आतीं।
थी भारी भीड़ अखाड़े में,
चंदन चाचा के बाड़े में॥

यह कुश्ती एक अजब रंग की,
यह कुश्ती एक गजब ढंग की।
देखो देखो ये मचा शोर,
ये उठा पटक ये लगा जोर।
यह दांव लगाया जब डट कर,
वह साफ बचा तिरछा कट कर।
जब यहां लगी टंगड़ी अंटी,
बज गई वहां घन-घन घंटी।
भगदड़ सी मची अखाड़े में,
चंदन चाचा के बाड़े में॥


वे भरी भुजाएं, भरे वक्ष
वे दांव-पेंच में कुशल-दक्ष
जब मांसपेशियां बल खातीं
तन पर मछलियां उछल जातीं
कुछ हंसते-से मुसकाते-से
मस्ती का मान घटाते-से
मूंछों पर ताव जमाते-से
अलबेले भाव जगाते-से
वे गौर, सलोने रंग लिये
अरमान विजय का संग लिये
दो उतरे मल्ल अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में

यहां शायद कुछ भूल रहा हूं।

तालें ठोकीं, हुंकार उठी
अजगर जैसी फुंकार उठी
लिपटे भुज से भुज अचल-अटल
दो बबर शेर जुट गए सबल
बजता ज्यों ढोल-ढमाका था
भिड़ता बांके से बांका था
यों बल से बल था टकराता
था लगता दांव, उखड़ जाता
जब मारा कलाजंघ कस कर
सब दंग कि वह निकला बच कर
बगली उसने मारी डट कर
वह साफ बचा तिरछा कट कर
दंगल हो रहा अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में


शुक्र है कि अभी वो लोग बाक़ी हैं जिन्‍हें बचपन की कविताओं की परवाह है। आपको अपने बचपन की कौन सी कविता याद आ रही है।

Sunday, December 18, 2011

मुहब्‍बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है: अलविदा अदम गोंडवी

मैं अदम गोंडवी को नहीं जानता था। वो कॉलेज के दिन थे। मध्‍यप्रदेश का छोटा-सा शहर छिंदवाड़ा। महाराष्‍ट्र की सरहद पर बसा।

कविता का नया-नया शौक़ लगा था। लघु पत्रिकाएं मंगवाना और पढ़ना शुरू हुआ था। नई-नई Adamgondavi ठिएबाज़ी शुरू हुई थी। और उन दिनों में मित्र अनिल करमेले से अदम गोंडवी का नाम सुना था। उसके बाद उन्‍हें कई जगह पढ़ा। और लगा कि सचमुच आम आदमी की ग़ज़लें लिखने वाले कवि-शायर हैं अदम गोंडवी। जनकवि अदम गोंडवी का असली नाम था रामनाथ सिंह। अदम गोंडवी को जितना भी पढ़ा, हमेशा यही लगा कि वो और दुष्‍यंत मिलकर हिंदी ग़ज़ल की बुनियाद रचते हैं। बल्कि बाज़-वक्‍त अदम गोंडवी दुष्‍यंत से ज्‍यादा धारदार और मारक लगे। 

काफी मन था कि कभी उन्‍हें आमने-सामने सुनने का मौक़ा मिले। पिछले कई दिनों से उनके अस्‍वस्‍थ होने के समाचार आ रहे थे। पर आज सुबह वो ख़बर आई, जिससे ये तय हो गया कि हम उस पीढ़ी के हैं, जिसने कभी अदम गोंडवी को नहीं सुना। नहीं देखा। सिर्फ पढ़ा और थोड़ा-थोड़ा जाना। जनकवि अदम गोंडवी को हमारी श्रद्धांजलि। 

कविता-कोश से उनकी कुछ ग़ज़लें

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।।
भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।
बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।
सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास वो कैसे।
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये
छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये

 

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में
आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे
तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे
एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है
लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है
तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

कविता-कोश का लिंक।

Sunday, October 24, 2010

सिलसिला गुलज़ार कैलेन्‍डर का: छठा भाग: 'इन तालों को चाभी से तुम खोल नहीं सकते'

गुलज़ार कैलेन्‍डर का सिलसिला कुछ दिनों के लिए अटक गया था। दरअसल हमारी पतंग मसरूफियत की झाडियों में जा अटकी थी। बहरहाल आईये आगे बढ़ें।

गुलज़ार अपनी संवेदनशीलता में हम सबसे कहीं बहुत आगे खड़े नज़र आते हैं। वो वहां पहुंचते हैं जहां हमारी कल्‍पना पहुंच नहीं पाती। ज़रा इस नज़्म पर ग़ौर कीजिए। एक कटते हुए पेड़ के बारे में गुलज़ार के जज्‍बात।

मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा-सा एक पेड़ कभी ?
मेरा वाक़िफ़ है, बहुत सालों से मैं उसे जानता हूँ...
जब में छोटा था तो इक आम उड़ाने के लिए
पर्ली दीवार से कंधों पे चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख से जा पाँव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैने खुन्नस मैं बहुत फेंके थे पत्‍थर उस पर
मेरी शादी पे मुझे याद है शाखें देकर
मेरी वेदी का हवन गर्म किया था उसने
और जब हामला थी 'बीबा' तो दोपहर मैं हर दिन
मेरी बीवी की तरफ कैरियाँ फेंकी थी इसी ने
वक़्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ती गये
तब भी जल जाता था जब मुन्ने से कहती 'बीबा'
'हाँ,उसी पेड़ से आया है तू, पेड़ का फल है'
अब भी जल जाता हूँ. जब मोड़ से गुज़रते मैं कभी
खाँसकर कहता है, 'क्यो, सर के सभी बाल  गये?'
'सुबह से काट रहे हैं वो कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको'


नज़्म के आखिर तक पहुंचते पहुंचते आप उदास हो जाते हैं। गुलज़ार चीज़ों को मानवीय बना देते हैं। अपने कैलेन्‍डर में भी उन्‍होंने यही किया है। आईये अगले सफ़े पर चलें। ये सितंबर का पन्‍ना है।

9

यहां गुज़रे ज़माने का एक भूला-बिसरा ताला है। और गुलज़ार लिखते हैं--

सदियों से पहनी रस्‍मों को
तोड़ तो सकते हो
इन तालों को चाबी से
तुम खोल नहीं सकते।


अक्तूबर का पन्‍ना भी कमाल है। ये देखिए।
10 यहां एक ख़ानदानी पानदार नज़र आ रहा है। मुझे याद है अपने बचपन के दिनों में ऐसे नज़ाकत भरे पानदान अपने और दूसरे घरों में मैंने बहुत देखे हैं। यहां गुलज़ार की पंक्तियां जैसे जिगर को चाक कर देती हैं।

मुंह में जो बच गया था
वो सामान भी गया।
ख़ानदान की निशानी
पानदान भी गया।


गुलज़ार कैलेन्‍डर का सिलसिला अगली पोस्‍ट में अपने अंजाम पर पहुंच जायेगा।
इस दौरान गुलज़ार के कई दीवानों से यहां और मेल पर निजी तौर पर संपर्क हुआ।
गुलज़ार के हम दीवाने उनकी नामचीन और कम चर्चित रचनाओं का जिक्र यूं ही अपने अपने तईं करते रहेंगे।

फिर मिलते हैं। संभवत: कल ही।

Monday, October 11, 2010

सिलसिला गुलज़ार कैलेन्‍डर का: पांचवां भाग--'याद आते हैं वो सारे ख़त मुझे'

गुलज़ार से सहमत और असहमत होना आसान है।
अपनी शख्सियत पर एक बड़ा-सा ताला लटका रखा है उन्‍होंने।
उनके क़रीब जाना मुश्किल है।
कुछ ख़ुशनसीब हैं जिन्‍हें उनकी नज़दीकी हासिल होती है।
हम उनमें से नहीं हैं।
हमें उनकी रचनाओं से मतलब है। और उन्‍हें पढ़कर अभिभूत होते रहते हैं।
कितनी तरह के अहसास साथ लेकर चलता है ये शायर।
इस नज़्म का उन्‍वान है 'ईंधन'


छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर - कान बनाकर
नाक सजाकर -
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला - तेरा उपला -
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे
हँसता-खेलता सूरज
रोज़ सवेरे आकर गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था -
इक मुन्ना था -

इक दशरथ था -
बरसों बाद -
मैं श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात
इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया!


ऐसी नज़्मों के शायर ने 'गुलज़ार-कैलेन्‍डर' में जिंदगी से बेदख़ल हो रही...पुराने वक्‍तों की चीज़ों पर लिखा है। और बहुत ख़ूब लिखा है। कविता की छोटी-सी पुडिया है ये कैलेन्‍डर।
आईये अब चलें जुलाई के पन्‍ने की तरफ़।

यहां पुराने ज़माने का रैमिंगटन या हाल्‍डा का टाइपराइटर नज़र आ रहा है। बेहद पुराना। शायद पोर्टेबल भी हो। कह नहीं सकते। और गुलज़ार की पंक्तियां देखिए:

हर सनीचर जो तुम्‍हें लिखता था दफ्तर से
याद आते हैं वो सारे ख़त मुझे
7

अगला पन्‍ना है अगस्‍त का।
इस पन्‍ने पर 'बुश' का 'बोनस' मॉडल वाला एक बेहद पुराना रेडियो नज़र आ रहा है।
ट्रांजिस्‍टर कह लीजिए।
इस पर गुलज़ार की नामी पंक्तियां नज़र आती हैं।


नाम गुम जायेगा
चेहरा ये बदल जायेगा
मेरी आवाज़ ही पहचान है
गर याद रहे।

8

जारी रहेगा गुलज़ार कैलेन्‍डर का सिलसिला।
अपनी राय देते रहिए।

Sunday, October 10, 2010

सिलसिला गुलज़ार कैलेन्‍डर का। चौथा भाग: 'आठ दस की जब कभी गाड़ी गुज़रती है'

कविता कोई मजमा या बाज़ीगरी नहीं कि वो हमेशा चौंकाए।
उसमें जिंदगी की धड़कनें सुनाई देनी चाहिए।
गुलज़ार पर इस बाज़ीगरी के इल्‍ज़ाम लगते रहे हैं।
पर ज़रा बताईये कि क्‍या हिंदी उर्दू में हमारे पास ऐसा बारीक लिखने वाले कवि हैं।
कितनी कविताएं हैं हमारे पास ताले, छाते, कैमेरे, क़लम जैसी रोज़मर्रा की चीज़ों पर।
यही बारीक obsevation गुलज़ार कैलेन्‍डर की ताक़त है।
वो तो अदाकार नसीरउद्दीन शाह को भी अपने नज़्म में उतार लेते हैं।
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ये रही नसीर पर लिखी नज़्म

एक अदाकार हूं मैं
जीनी पड़ती हैं मुझे कई जिंदगियां
एक हयाती में मुझे
मेरा किरदार बदल जाता है हर रोज़ सेट पर
मेरे हालात बदल जाते हैं
मेरा चेहरा भी बदल जाता है अफ़साना-ओ-मंज़र के मुताबिक़
मेरी आदत बदल जाती है।
और फिर दाग़ नहीं छूटते पहनी हुई पोशाकों के
ख़सता किरदारों का कुछ चूरा-सा रह जाता है तह में
कोई नुकीला-सा किरदार गुज़रता है रगों से
तो ख़राशों के निशां देर तलक रहते हैं दिल पर
जिंदगी से उठाए हुए ये किरदार ख़याली भी नहीं हैं
कि उतार जाएं वो पंखे की हवा से
सियाही रह जाती है सीने में अदीबों के लिखे जुमलों की, सीमीं परदे पे लिखी  
सांस लेती हुई तहरीर नज़र आता हूं
मैं अदाकार हूं लेकिन
सिर्फ अदाकार नहीं
अपने इस वक्‍त की तस्‍वीर भी हूं।

गुलज़ार कैलेन्‍डर इसी मायने में बेहद अहम है। क्‍योंकि जिंदगी से छूटती चली जा रही चीज़ों पर गुलज़ार ने लिखा है इसमें।
मई के सफ़े पर एक पुराने ज़माने का प्रोजेक्‍टर नज़र आ रहा है।
और गुलज़ार लिखते है--

वो सुरैया और नरगिस का ज़माना
सस्‍ते दिन थे एक शो का चार आना
अब न सहगल है, न सहगल-सा कोई
देखना क्या और अब किस को दिखाना
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जून के सफ़े पर पुराने ज़माने का स्‍टीम इंज़न नज़र आ रहा है सजेशन के तौर पर।
यहां इंजन से धुंआ निकालने वाला हिस्‍सा ही नज़र आ रहा है।
और दिल को चीर डालने वाली गुलज़ार की लाइनें--

दिल दहल जाता है
अब  भी शाम को
आठ दस की जब कभी
गाड़ी गुज़रती है

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अपने इस कैलेन्‍डर में गुलज़ार ने कई बारीक अहसास पकड़े हैं।
हम इस कैलेन्‍डर को 'तरंग' के ज़रिए आप तक पहुंचा रहे हैं ताकि बीतता हुए इस साल की इबारत हमारी जिंदगियों पर काफी गहरी छाप छोड़ जाए।
कल फिर दो सफ़े आयेंगे गुलज़ार कैलेन्‍डर के।

Saturday, October 9, 2010

सिलसिला गुलज़ार कैलेन्‍डर का। तीसरा भाग: अब हमारी आंख में रोशनी कम है

गुलज़ार जिस तरह अपने शब्‍दों को बरतते हैं, जिस किफायत से उन्‍हें ख़र्च करते हैं, वो वाक़ई कमाल है। बहुत बरस पहले मैंने ये नज्म पढ़ी थी--तो यूं लगा था कि बेहद किफ़ायतशारी बरती गयी है इसमें, तभी तो इत्‍ती ज़रा-सी नज़्म में कित्‍ती बड़ी बात समेट दी है उन्‍होंने।

नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी


गुलज़ार की दुनिया में कुछ नज़्में डायरी से फिल्‍मों तक आज़ादी से चली आई हैं। जैसे ये नज़्म फिल्मी गीत बन गई तो इसकी ख़ूबसूरती और निखर आई है।
 

एक ही ख्‍वाब कई बार देखा है मैंने
तूने साड़ी में उड़स ली हैं मेरी चाभियां घर की
और चली आई है बस यूं ही मेरा हाथ पकड़ कर
एक ही ख्‍वाब कई बार देखा है मैंने ।
मेज़ पर फूल सजाते हुए देखा है कई बार
और बिस्‍तर से कई बार जगाया है तुझको
चलते-फिरते तेरे क़दमों की वो आहट भी सुनी है
एक ही ख्‍वाब कई बार देखा है मैंने ।
क्‍यों । चिट्ठी है या कविता ।
अभी तक तो कविता है । ( सुलक्षणा पंडित का नाज़ुक आलाप )
गुनगुनाती हुई निकली है नहाके जब भी
और, अपने भीगे हुए बालों से टपकता पानी
मेरे चेहरे पे छिटक देती है तू टीकू की बच्‍ची
एक ही ख्‍वाब कई बार देखा है मैंने ।
ताश के पत्‍तों पे लड़ती है कभी-कभी खेल में मुझसे
और लड़ती है ऐसे कि बस खेल रही है मुझसे
और आग़ोश में नन्‍हे को लिए
will you shut up?
और जानती है टीकू, जब तुम्‍हारा ये ख्‍वाब देखा था ।
अपने बिस्‍तर पे मैं उस वक्‍त पड़ा जाग रहा था ।।


आईये फिर से गुलज़ार कैलेन्‍डर की तरफ लौटते हैं। जैसा कि मैंने बताया कि इस कैलेन्‍डर में उन चीज़ों का जिक्र है जो जिंदगी से लगभग बेदख़ल हो चुकी हैं। इन पुरानी चीज़ों पर गुलज़ार ने अपनी पंक्तियां कहीं हैं।

मार्च के सफ़े पर एक आईना नज़र आता है। बक्‍सेनुमा-सिंगारदान पर लगा एक आईना।
इस आईने के रंग धुंधले पड़ चुके हैं।
यहां गुलज़ार लिखते हैं--

कुछ नज़र आता नहीं
इस बात का ग़म है 
अब हमारी आंख में
रोशनी कम है 

3
अप्रैल के सफ़े पर एक पुरानी अलार्म घड़ी है।
बचपन वाली वो घड़ी, जिससे एक अजीब चिढ़ हुआ करती थी।
यहां गुलज़ार लिखते हैं--

कोई आया ही नहीं
कितना बुलाया हमने
उम्र भर एक ज़माने को
जगाया हमने। 

4
 
जारी रहेगा गुलज़ार कैलेन्‍डर का सिलसिला।

Friday, October 8, 2010

सिलसिला 'गुलज़ार-कैलेन्‍डर' का। दूसरा भाग: घर की दहलीज़ पर बाहर ही छोड़ दिया मुझे।

हम गुलज़ार के शैदाई इसलिए नहीं कि वो चौंकाते हैं। इसलिए भी नहीं कि उनके पास नाज़ुक-ओ-नर्म अलफ़ाज़ हैं। इसलिए भी नहीं कि उनकी शख्सियत कमाल है, आवाज़ ग़ज़ब है, वो पढ़ते भी कमाल का हैं। इन सबसे इतर गुलज़ार की संवेदनशीलता खींचती है।

गुलज़ार तो ख़ुदा को भी नहीं बख़्शते।
उनकी एक नज़्म के हिस्‍से पढिए।


सुरमई रात में साहिल के क़रीब
दूधिया जोड़े में जो आ जाये तू
ईसा के हाथों से गिर जाए सलीब
क़सम से, क़सम से ।
सुरमई रात में साहिल के क़रीब
दूधिया जोड़े में आ जाये जो तू
बुद्ध का ध्‍यान भी उखड़ जाए
क़सम से, क़सम से ।
सुरमई रात में साहिल के क़रीब
दूधिया जोड़े में आ जाये जो तू
तुझको बर्दाश्‍त ना कर पाए ख़ुदा
क़सम से, क़सम से ।


इसे भूपिंदर सिंह ने गाया है। गुलज़ार का एक और तेवर देखिए।

चिपचिपे दूध से नहलाते हैं, आंगन में खड़ा कर के तुम्हें
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलासियाँ भर के
औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो
इक पथराई सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी
जब धुआँ देता, लगातार पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो


उनके पास एक नज़र और नज़रिया है। और ये 'गुलज़ार-कैलेन्‍डर' में भी ख़ूब नज़र आता है।

कल मैंने बताया था कि 'गुलज़ार कैलेन्‍डर' असल में हमारी जिंदगी और रफ्तार से बेदख़ल हो चुकी चीज़ों की बात करता है। उन पर रची कविताएं हैं इस कैलेन्‍डर पर। 
2

जनवरी के सफ़े पर बहुत पुराने ज़माने का एक कैमेरा नज़र आ रहा है लकड़ी के एक स्‍टैन्‍ड पर।
गुलज़ार इस कैमेरे के बारे में लिखते हैं--


सर के बल आते थे
तस्‍वीरें खिंचाने हमसे
मुंह घुमा लेते हैं अब
सारे ज़माने हमसे....।।


2a 

फरवरी के सफ़े पर लकड़ी की मूठ वाला एक काला बोसीदा छाता नज़र आ रहा है।
वो छाता जो दादा-परदादा के ज़माने की शान होता था। और जिसका नया रंग-बिरंगा रूप
फिर से चलन में आ रहा है।
गुलज़ार इस छाते के बारे में लिखते हैं--

सर पे रखते थे
जहां धूप थी, बारिश थी
घर पे दहलीज़ के बाहर ही
मुझे छोड़ दिया।

जब तक हम दिसंबर तक पहुंचेंगे, कई चीज़ों को देखने का हमारा नज़रिया बदल जाएगा।
ये गुलज़ार की कर सकते हैं।
'गुलज़ार-कैलेन्‍डर' का सिलसिला जारी रहेगा।
प्रिय मित्रो, आखिर तक पहुंचते-पहुंचते मैं इस कैलेन्‍डर का डाउनलोड-लिंक भी दूंगा।

Thursday, October 7, 2010

सिलसिला 'गुल़ज़ार-कैलेन्डर' का। पहला भाग: जो चीज़ें बेजान थीं अब तक जिंदा हैं।

इस बात को हम कई बार ज़ाहिर कर चुके हैं कि हम गुलज़ार के शैदाई हैं।
कब हुए, कैसे हुए, पता नहीं।
गुलज़ार हमारी जिंदगी में एक 'इलहाम' की तरह आए

वो एक 'हादसा' नहीं थे। वो एक 'हैरत' थे।
वो 'इश्‍क़' के सुनहरे अहसास की तरह थे।
बहुत बार 'आनंद' देखी। रेडियो के लिए उस पर लिखा भी।
गुलज़ार की ये पंक्तियां जैसे मन में बसी रह गयी हैं।


मौत तू एक कविता है
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको
डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन
जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आए
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको



इस बरस अचानक किसी ने मेल पर गुलज़ार कैलेन्‍डर भेजा तो जैसे हर महीना 'रोशन' हो गया।
इसे बहुत पहले ही आपके साथ 'शेयर' करना चाहता था पर किसी वजह से टलता रहा।
इस बीच जब पिछले दिनों जयपुर जाना हुआ तो भाई पवन झा ने इसकी 'हार्ड-कॉपी' भी भेंट कर दी। जो हमारे संग्रह की शान बनी रहेगी।

'तरंग' पर अपनी लम्‍बी ग़ैर-हाजिरी को इस कैलेन्‍डर के एक-एक पन्‍ने के ज़रिए मिटाया जा रहा है। इस कैलेन्‍डर के हर पन्‍ने पर एक बेमिसाल तस्‍वीर है और साथ में है एक 'नज़्म'। ये है कैलेन्‍डर का पहला पन्‍ना। 1

गुलज़ार कैलेन्‍डर की थीम है आम जिंदगी की खोई हुई चीज़ें। वो चीज़ें जो समय के प्रवाह में पीछे छूट गयीं। इस पन्‍ने की इबारत पढिये यहां नीचे भी--

अकबर का लोटा रखा है शीशे की अलमारी में
राना के 'चेतक' घोड़े की एक लगाम
जैमल सिंह पर जिस बंदूक से अकबर ने
दाग़ी थी गोली
रखी है।

शिवाजी के हाथ का कब्‍जा
'त्‍यागराज' की चौकी, जिस पर बैठ रोज़
रियाज़ किया करता था वो
'थुंचन' की लोहे की क़लम है
और खड़ाऊं तुलसीदास की
'खिलजी' की पगड़ी का कुल्‍ला

जिन में जान थी, उन सबका देहांत हुआ
जो चीज़ें बेजान थीं, अब तक जिंदा हैं

--गुलज़ार।

ये कैलेन्‍डर का पहला पन्‍ना है।
यानी उसका कवर।

कल हम दो दो महीनों से शुरू करके दिसंबर तक पहुंचेंगे।

कैलेन्‍डर के क्रेडिट्स- अच्‍युत पल्‍लव और विवेक रानाडे

Sunday, April 4, 2010

बचपन की एक खोई कविता का दोबारा मिलना और इससे उठे कुछ सवाल

बचपन की किसी कविता का खो जाना कितना मानीख़ेज़ हो सकता है ये तब समझ आया था।

आज ठीक से याद तो नहीं आ रहा है...पर शायद 'नागपंचमी' आई थी पिछले साल यानी साल 2009 की। और ज़ेहन में कौंध गई थी मध्‍यप्रदेश के स्‍कूलों में 'बालभारती' में पढ़ाई जाने वाली कविता 'नागपंचमी'। दिमाग़ पर ज़ोर डाला तो ज्यादा पंक्तियां याद नहीं आईं। अफ़सोस रह गया कि बचपन में रटी गई... बल्कि बड़े शौक़ से याद की गई कविता एकदम से भूल गई। मन विकल हो गया था इसलिए मध्‍यप्रदेश से ताल्‍लुक रख चुके या अभी भी वहां मौजूद मित्रों को ई-मेल भेजा। शायद किसी को याद हो तो बचपन की खोई कविता याद आ जाए।

कईयों के तो जवाब भी नहीं आए। ढूंढी कि नहीं। मिलेगी कि नहीं। पर 'एकोहम' वाले विष्‍णु बैरागी जी के कई बार उत्‍तर मिले। उन्‍होंने सूचना दी कि वे डटे हुए हैं, कहीं से तो मिल ही
जाएगी। पर आखिरकार उनका एक हारा-थका जवाब भी आया। जिसमें सूचित किया गया था कि कविता कहीं नहीं मिल रही। 

फिर पांच अक्‍टूबर 2009 को उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग 'एकोहम' पर एक बड़ी ही मार्मिक पोस्‍ट
लिखी। जिसकी शुरूआती पंक्तियां यहां दी जा रही हैं।  

यह महज एक कविता के न मिलने का मामला नहीं है। यह उस ‘कुछ’ के न होने की खबर से उपजी उदासी है जिसके लिए पक्का भरोसा था कि ‘वह’ मेरे पुराने बक्से में पड़ी किसी पोटली में बँधी होगी। भरोसा था कि जब जरुरत होगी तो बक्से का ढक्कन उठा कर उसे ऐसे बाहर निकाल लूँगा जैसे आँखें मुँदी होने पर भी कौर मुँह में रख लेता हूँ। लेकिन जरुरत के मौके पर, ‘वह’ नहीं मिली तो भरोसा ऐसे टूटा जैसे लम्बी-ऊँची घास के, सीटियाँ बजाते सुनसान जंगल के बीच, रास्ते से भटका कोई पथिक, दूर से आ रही बंसी की धुन की पगडण्डी पर मंजिल की ओर बढ़ रहा हो और अचानक ही बंसी की आवाज बन्द हो जाए।

विष्‍णु जी की इस पोस्‍ट को ज़रूर पढियेगा। ये पोस्‍ट जिंदगी से छूटती जा रही चीज़ों के प्रति हमारी निस्‍संगता की ओर इशारा करती है।

बहरहाल...मुझे लग रहा था कि कविता नहीं मिलने वाली है। क्‍योंकि मध्‍यप्रदेश की वो बचपन वाली 'बाल-भारती' तो पता नहीं कहां बिला गई। इस बीच कोर्स भी जाने कितनी बार बदला  होगा । naag punchmiअफ़सोस रह गया कि वो किताबें संभाल कर रखी जानी चाहिए थीं। कुछ तो रखी गयी हैं। पर ये वाली नहीं है । फिर एक दिन एक संदेश आया डॉ.टी.आर.शुक्‍ल का । सागर मध्‍यप्रदेश में हायर सेकेन्‍ड्री स्‍कूल में उन्‍होंने हमें फिजिक्‍स पढ़ाई थी। पढ़ाई के अलावा इतर विषयों पर भी उनसे खूब बैठकें होती थीं। नाता सागर से टूटा तो उनसे भी संपर्क टूट गया था। पर 'दैनिक भास्‍कर' के स्‍तंभ के ज़रिए उन्‍हें मेरा ई-मेल आई.डी. मिला और तब से उनसे ई-मेल संपर्क पुन: कायम हो गया । उन्‍हें भी मैंने संदेश भेजा था इस कविता के बारे में।

और कविता उन्‍होंने ने ही खोजी। उन्‍होंने लिखा-

प्रिय यूनुस
तुमने मुझे अपनी प्राथमिक-शाला में सन 1958-59 में बाल-भारती कक्षा 2 में पढ़ी कविता 'नागपंचमी' याद दिलाई। मन को काफी ज़ोर देना पड़ा तब कहीं कुछ अधूरे स्‍टेन्‍ज़ा याद आ पाए। उन्‍हें नीचे लिखे दे रहा हूं । अंतिम पैरा की दो लाइनें याद रह पाईं दो भूल गया हूं। भूले हुए एक दो पदों में शायद कुश्‍ती के दांव-पेंचों के बारे में विवरण था जो अब याद नहीं आ रहा है। पूरी कविता प्राप्‍त करने के लिए इतनी पुरानी पुस्‍तक प्राप्‍त कर पाना संभव नहीं है क्‍योंकि पुरानी पुस्‍तकों में छोटे बच्‍चों को ज्ञान देने का तरीक़ा भिन्‍न था अत: अब उन पुस्‍तकों को कौन संभाल कर रखेगा। इसके साथ ही मैं पहली कक्षा में पढ़ी हुई 'बारहमासी' कविता भी नीचे लिख रहा हूं जिसमें हिंदी माहों के अनुसार प्रत्‍येक माह में क्‍या प्राकृतिक विशेषताएं होती हैं, उनका सटीक विवरण दिया गया है।

नागपंचमी

ये नागपंचमी झम्मक झम

ये ढोल ढमाका ढम्मक ढम।

मल्लों की जब टोली निकली

यह चर्चा फैली गली गली,

दंगल हो रहा अखाड़े में

चंदन चाचा के बाड़े में।

वे गौर सलौने रंग लिये

अरमान विजय का संग लिये,

कुछ हंसते से मुसकाते से

मूछों पर ताव जमाते से।

ये पहलवान अंबाले का

ये पहलवान पटयाले का,

दोनो हैं दूर विदेशों में

लड़ आये हैं परदेशों में।

जब मांसपेशियां बल खातीं

तन पर मछलियां उछल आतीं,

यह दांव लगाया जब डट कर

वह साफ बचा तिरछा कट कर।

..................................................
यहां की पंक्तियां याद नहीं आ रही हैं

.................................................,

भगदड़ मच गयी अखाड़े में

चंदन चाचा के बाड़े में।



बारहमासी


चैत लिये फूलों की डाली

महकाने को आता,

लू के झोंकों में पलकर

वैषाख तभी आ जाता।

और ज्येष्‍ठ दुपहर भर तपकर

आंधी पानी लाता,

वर्षा के रिमझिम गीतों को

गा आषाढ़ सुनाता।

राखी के धागों में बंधकर

सावन झूम झुलाता,

नदी और सागर में पानी

भरने भादों आता।

लिये कांस के फूल गोद में

क्वांर तभी मुसकाता,

ज्वार बाजरे की बालों से

कार्तिक खेत सजाता।

अगहन गन्नों में रस भरता

खेतों को लहराता,

कंबल और रजाई की यादें

पूस ही ताजा करता।

माघ देखकर सरसों फूली

फूला नहीं समाता,

फागुन आमों की बौरों से

बागों को महकाता।


शुक्‍ल जी को कितने भी धन्‍यवाद कहे जाएं, पर अपनी स्‍मृति पर ज़ोर डालकर जिस तरह उन्‍होंने ये कविताएं हमें भेजी हैं, उसका ऋण अभी अदा नहीं किया जा सकता ।

ये भले ही कोई बहुत उत्‍कृष्‍ट कविताएं ना हों, साहित्‍य इन्‍हें शायद सिरे से रद्द कर दे--पर हमें भौतिकी पढ़ाने वाले डॉ. टी.आर.शुक्‍ल वाली पीढ़ी से लेकर मेरी पीढ़ी तक ने इन्‍हें अपने 'कोर्स' में पढ़ा और उनकी स्‍मृतियों में जीवित हैं ये कविताएं ।

इन दोनों कविताओं के रचनाकारों का नाम अगर पता चल सके, तो और अच्‍छा रहे ।

Wednesday, December 31, 2008

इस बार नहीं मनाएंगे हम जश्‍न नये साल के आगमन का । इस बार खोजेंगे हम मुट्ठी भर जीवित संवेदनाएं

इस बार

 

इस बार

नहीं मनाएंगे हम जश्‍न नए साल के आगमन का

इस बार चुनेंगे हम अपने जल चुके घरों की राख से अंगारे

और घोल लेंगे इन्‍हें अपनी शिराओं में....रक्‍त में ।

 

इस बार सहेज कर रखेंगे हम

अपने-अपने हिस्‍से का उजाला

और बांट लेंगे इसे दूसरों के हिस्‍सों के अंधेरे के साथ

 

इस बार चुरा लेंगे हम अंजुरी भर सूरज उगते ही

और टांक देंगे इसे नवविधवाओं के आंसुओं से भीगे आंचल में

 

इस बार रोकेंगे हम गुंबदों और मीनारों से उठने वाली सड़ांध को

इस बार नहीं होगा उत्‍सव की रात्रि का कोलाहल

इस बार

सर्द रात में हम बैठेंगे

झुग्गियों के बाहर बैठे अलाव तापते लोगों के बीच

और समेट लेंगे अलाव की आग अपने भीतर

 

इस बार हम समेटेंगे मूल्‍यों और विश्‍वासों की किरचियां

बो देंगे इन्‍हें पथराई चेतना-भूमि पर

और इंतज़ार करेंगे इंसानियत के स्‍नेहिल-अंकुर फूटने का

 

इस बार नहीं मनाएंगे हम जश्‍न नये साल के आगमन का

इस बार खोजेंगे हम मुट्ठी भर जीवित संवेदनाएं ।

 


ये कविता सन 1992 के अंतिम दिनों में तब लिखी गई थी जब बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था और देश जबर्दस्‍त ध्रुवीकरण का शिकार हो गया था । मध्‍यप्रदेश के छिंदवाड़ा शहर में युवा रचनाकारों, चित्रकारों और नाट्यकर्मियों के समूह 'कथन' ने पोस्‍टर प्रदर्शनी और नुक्‍कड़ नाटकों के ज़रिए शहर में जनचेतना का संचार किया था । उन पोस्‍टरों में एक इस कविता पर भी बनाया गया
था । ऊपर दिया गया चित्र हमारे मित्र मनोज कुलकर्णी के बनाए पोस्‍टर का एक प्रतिरूप है ।


Sunday, August 10, 2008

उर्दू के नामचीन मज़ाहिया शायर साग़र ख़ैयामी नहीं रहे । आईये उनकी आवाज़ सुनें ।

मुझे लगता है कि या तो मैं बेख़बर रहा या फिर मीडिया ने ख़बर तरीक़े से नहीं पहुंचाई । अभी कुछ सप्‍ताह पहले उर्दू के नामचीन शायर साग़र ख़ैयामी के बारे में तफ्तीश कर रहा था इंटरनेट पर । तो इस साईट पर पहुंचा और मिली वो अफ़सोसनाक ख़बर । साग़र खैयामी का उन्‍नीस जून गुरूवार को निधन हो चुका है । वो लंबे समय से कैंसर से पीडि़त थे । साग़र साहब ने मुंबई के नानावटी अस्‍पताल में आखिरी सांस ली ।

 

                           sagar khaiyami

 

मुझे याद है कि बचपन से ही जब दूरदर्शन पर मुशायरे देखने में रूचि जागी थी तो साग़र साहब को पढ़ते देखकर अच्‍छा लगता था, लगता था कि एक बंदा है जो सबकी टांग बड़े मज़े लेकर खींचता है । सा़ग़र ख़ैयामी की मज़ाहिया शायरी के दीवाने वैसे भी देश-विदेश में फैले हैं । और उनकी पढ़ने की ख़ास अदा ने सबको हंसाया भी था और सोचने पर मजबूर भी किया था । यूट्यूब से साग़र साहब की कुछ रिकॉर्डिंगें पेश हैं । जो कब तक यहां पर कायम रहेंगी, कहा नहीं जा सकता । कोशिश करूंगा कि इसे चुराकर यहां स्‍थाई रूप से लगा दिया जाए । मद्धम गति वाले इंटरनेट कनेक्‍शन की वजह से अगर आप इस क्लिप को ना देख पाएं तो कोई बात नहीं । मैं इसी पोस्‍ट पर कुछ ऑडियो क्लिप भी दे रहा हूं ।

 

साग़र साहब के बारे में जो कुछ पता चला वो ये कि उनका असली नाम था रशीदुल हसन । वो सत्‍तर बरस जिये । साग़र साहब का ताल्‍लुक लखनऊ के मशहूर गुफरामआब घराने से था । सागर खय्यामी के पिता मौलाना औलाद हुसैन भी शायर थे और मौलवी लल्लन के नाम से जाने जाते थे। सागर ख्य्यामी का क्रिकेट पर लिखा गया गजल संग्रह 'अंडर क्रीज' खासा मशहूर हुआ था। उन्हें 1977 में केंद्र सरकार द्वारा मिर्जा गालिब अवार्ड से नवाजा गया था। उन्हें कई राज्यों ने उर्दू अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया था ।

 

आमतौर पर मज़ाहिया शायरों या कवियों को चुटकुलेबाज़ मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है । पर साग़र साहब ने अपनी शायरी की गहराई और चुटीलेपन से ख़ासा नाम कमाया था । ये सच है कि कई बार उनकी कविताओं ने इतनी गहरी चुटकी ली कि कुछ लोगों के दिलों में दर्द भी हुआ और उन्‍हें गुस्‍सा भी आया । उन्‍होंने मौलवियों से लेकर सरकारी कर्मचारियों, प्रोफ़सरों, क्रिकेटरों और हसीनाओं सबको अपनी रचनाओं का विषय बनाया और सबके मज़े लिए ।

 

मिर्जा़ गा़लिब के शेर 'ये इश्‍क़ नहीं आसां बस इतना समझ लीजिये, इक आग का दरिया है और डूबकर जाना है ' पर उनकी 'ओरीजनल तरंगित शायरी' की मिसाल पेश है---

ये इश्‍क़ नहीं मुश्किल बस इतना समझ लीजिये

कब आग का दरिया है कब डूब कर जाना है ।

मायूस ना हो आशिक़ मिल जायेगी माशूक़ा 

बस इतनी सी ज़ेहमत है मोबाइल उठाना है ।।

 

नमक की बढ़ती क़ीमतों और बेईमानों की भरती तिजोरियों पर उन्‍होंने लिखा था--

कहां निकलती हैं नमकीन सूरतें घर से

नमक की शहर में क़ीमत जो बढ़ गयी प्‍यारे

नमक-हलालों की यूं ही कमी है दुनिया में

नमक हरामों की औक़ात बढ़ गयी प्‍यारे ।।

दिल्‍ली में मकान की तंगी पर उनका एक शेर मुझे याद आता है । वो लिखते हैं कि--

यक़ीन है जाएगी एक रोज़ जान दिल्‍ली में

तलाश करते हैं एक मकान दिल्‍ली में ।

 

साग़र ख़ैयामी पढ़ते वक्‍त बड़ी गंभीर शक्‍ल बनाकर पढ़ते थे । आप समझ ही नहीं सकते थे कि वो कब किस तरह का तीर छोड़ने वाले हैं । साग़र ख़ैयामी के कुछ मुशायरों से पेश हैं उनकी आवाज़ में उनकी रचनाएं । इन्‍हें तसल्‍ली से सुनिये और बताईये कि साग़र ख़ैयामी के साथ क्‍या आपकी कोई याद जुड़ी है ।

 

क्रिकेट पर साग़र साहब की मशहूर रचना उनकी आवाज़ में

 

 

इस नज़्म का शीर्षक है 'सर्दी और मुशायरा ।

 

 

अपनी जवानी के दिनों को याद करते हुए अपनी एक रचना सुना रहे हैं साग़र ख़ैयामी

 

 

 

हमने तरंग पर एक बार पतंगबाज़ी का जिक्र किया था । यहां साग़र ख़ैयामी पतंगबाज़ी के साथ इश्‍क़बाज़ी का जिक्र कर रहे हैं । इस रिकॉर्डिंग की क्‍वालिटी थोड़ी सी कम है ।

 

 

 

लोड शेडिंग की शिकायत कुछ दिन पहले हमारे मित्र सागर नाहर भी कर रहे थे । बड़े परेशान हैं । साग़र साहब की ये रचना हम सागर नाहर के नाम कर रहे हैं ।

 

 

 

शायरों के बीच क्रिकेट मैच का ब्‍यौरा साग़र ख़ैयाम की ज़बानी ।

 

 

 

कहना ना होगा कि साग़र ख़ैयामी के साथ हमारी कई यादें जुड़ी हैं । साग़र ख़ैयामी इन जैसी हज़ारों रिकॉर्डिंग्‍स के ज़रिए हमारे बीच रहेंगे और हमें अपने तंज़ से चिकोटी काटते रहेंगे ।

 

 

 

Sunday, May 11, 2008

मातृ दिवस पर मुनव्‍वर राणा के चंद शेर ।।

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती

बस एक मां है जो कभी ख़फ़ा नहीं होती ।।

 

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है

मां बहुत गुस्‍से में होती है तो रो देती है ।।

 

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू

मां ने मुद्दतों नहीं धोया दुपट्टा अपना ।।

 

अभी जिंदा है मां मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा

मैं जब घर से निकलता हूं दुआ भी साथ चलती है ।।

 

जब भी कश्‍ती मेरी सैलाब में आ जाती है

मां दुआ करती है, ख्‍वाब में आ जाती है ।।

 

ऐ अंधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया

मां ने आंखें खोल दीं घर में उजाला हो गया ।।

 

मेरी ख्‍वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्‍ता हो जाऊं

मां से इस तरह लिपटूं कि बच्‍चा हो जाऊं ।।

 

मुनव्‍वर मां के आगे यूं कभी खुलकर नहीं रोना

जहां बुनियाद हो इतनी नमी अच्‍छी नहीं होती ।।

 

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा नहीं कर सकता

मैं जब तक घर ना लौटूं मेरी मां सज्‍दे में रहती है ।।

 

बुजुर्गों का मेरे दिल से अभी तक डर नहीं जाता

जब तक जागती रहती है मां, मैं घर नहीं जाता ।।

 

जब से गई है माँ मेरी रोया नहीं,

बोझिल हैं पलकें फिर भी मैं सोया नहीं ।

 

साया उठा है माँ का मेरे सर से जब,

सपनों की दुनिया में कभी खोया नहीं ।

 

ज़रा सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाए

दीए से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है ।।

 

सुख देती हुई मांओं को गिनती नहीं आती

पीपल की घनी छायों को गिनती नहीं आती।

Thursday, April 3, 2008

आज कवि सम्‍मेलन के अखाड़े में बैरागी, निदा, राहत और कुंवर बेचैन साथ में और उनके साथ मैं तरंगित ।

तरंग पर वैसे तो जैसलमेर यात्रा की डायरी का अगला भाग लिखा जाना चाहिए था । लेकिन आज मैं विषय को ज़रा बदल रहा हूं । मुद्दा ये है कि विविध भारती की अपनी नौकरी में रोज़ाना ही नित नए अनुभव होते हैं । लेकिन कुछ दिनों पहले हमने दो बड़े आयोजन किये और इन दोनों आयोजनों के अनुभव एकदम अलग रहे । इन्‍हीं में से एक आयोजन की कहानी आज आपके सामने रखी जा रही है ।

विविध-भारती की स्‍वर्ण-जयंती के मौक़े पर हर महीने की तीन तारीख़ को हो रहे हैं विशेष-आयोजन । और इन आयोजनों ने हमें कुछ दिलचस्‍प अनुभव कराए हैं  । जैसे पिछले कई महीनों से हमारे एक महत्‍त्‍वाकांक्षी कार्यक्रम की योजना तैयार की जा रही थी । जिसका नाम रखा गया था--'प्‍यार की बातें, प्‍यार के गीत' । ये एक कवि-सम्‍मेलन होता, लेकिन कोरा कवि सम्‍मेलन करें तो विविध भारती कैसी । इसलिए सोचा गया कि इस कवि सम्‍मेलन में विविध भारती के मिज़ाज का तड़का लगाया जाये । कवियों से कुछ मुद्दों पर बहस की जाए और उनके प्रिय गीतों पर भी बात की जाए, उन गीतों को भी सुनवाया जाए । तो कुल मिलाकर ज़बर्दस्‍त माथापच्‍ची की गयी । और तब जाकर एक स्‍वरूप तैयार हुआ । कार्यक्रम की जिम्‍मेदारी सौंपी गयी आपके इस दोस्‍त यूनुस खान को । अब ज़रा कवियों की सूची भी तो देख लीजिए । तय हुआ कि दिल्‍ली से पद्मा सचदेव को बुलाया जाये जो कभी विविध भारती में उद्घोषिका रही हैं तो बातों का रस और बढ़ जाएगा । लेकिन पद्मा जी नहीं आ सकीं ।

दूसरा नाम मेरी फ़रमाईश पर मुनव्‍वर राणा का तय किया गया । उन्‍होंने आने की स्‍वीकृति भी दे दी । और फिर ऐन कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग के दिन मुनव्‍वर भाई की फ्लाईट छूट गयी । जब हम उनका इंतज़ार अपने दफ्तर में कर रहे थे उस वक्‍त वो कलकत्‍ता से फ़ोन करके माज़रत चाह रहे थे कि वो इस बार नहीं आ सके तो क्‍या । अगली बार तशरीफ़ लायेंगे । मैंने जब एक दिन पहले बोधिसत्‍व को फोन करके मुनव्‍वर राणा की बातें की तो उन्‍होंने कहा कि वो मुनव्‍वर राणा को सुनने के लिए ज़रूर आयेंगे । हालांकि उन्‍होंने मुनव्‍वर राणा को पहले भी सुन रखा है । मुझ अज्ञानी को बोधिसत्‍व ने मुनव्‍वर भाई की कुछ पुस्‍तकों के नाम भी बताए । और उनके शेर भी सुनाए । और हां इस बात का वादा भी किया कि अगर मैं उनके घर आ जाऊं तो मुझे वो पुस्‍तकें पढ़ने को दी जा सकती हैं । यानी मुनव्‍वर राणा की पुस्‍तकों को हासिल करने के लिए अपन जल्‍दी ही बोधिसत्‍व के घर जा धमकने वाले हैं । फिलहाल आईये मुनव्‍वर राणा के कुछ शेर सुने जाएं, मेरा मतलब पढे जाएं । रेडियो की आदत जो लगी है, मुझे लगा मैं सुनवा ही डालूंगा । पढिये पढिये ।

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊं

माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं

कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर

ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं

सोचता हूं तो छलक उठती हैं मेरी आँखें

तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊं ।।

तो भई मुनव्‍वर भाई की किस्‍मत, चाहत और आमद ने दग़ा दे दिया । इसलिए उन्‍हें पहली बार सुनने से हम रह गये वंचित । हां तो मैं आपको बता रहा था कि कौन कौन से शायर और कवि इस कार्यक्रम में शामिल किये जाने थे । इसके बाद उन लोगों के नाम लूंगा, जिनके बारे में तय किया गया और वो आए भी । बालकवि बैरागी । बचपन से कवि सम्‍मेलनों में दद्दा बालकवि बैरागी को सुना है । स्‍कूल के दिनों में आरक्षण की आंधी चली तो हम सब भड़क उठे और तब बालकवि बैरागी की ये कविता हमारा नारा बन गये ।

हाथों में पत्‍थर होठों पे नारे

सड़कों पे आ गये क्‍यों जलते अंगारे

हाय राम कोई विचार तो करे

कोई इन अंगारों से प्‍यार तो करे ।

बालकवि जी आये तो मैंने उनके पैर छुए और फिर उन्‍हें याद दिलाया कि हमने इस कविता के सहारे बहुत आग फूंकी है अपने बचपन में । बालकवि बैरागी का सेन्‍स ऑफ ह्यूमर कमाल का है । उन्‍होंने तुरंत टांग खींची, तो यूनुस तुमको क्‍या लगता है कि तुम्‍हारा बचपन ख़त्‍म हा गया है । फिर तो ठहाकों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो चलता ही रहा । एक से एक किस्‍से सुनाए बैरागी जी ने । ब्‍लॉगिंग में थोड़े दिनों के लिए चमके उनके अनुज और हमारे मित्र भाई विष्‍णु बैरागी की भी चर्चा निकली । जाने कितनी कितनी बातें उन्‍होंने सुनाई । जिनमें संगीतकार जयदेव की यादें भी थीं । मुंबई फिल्‍म उद्योग से जुड़े किस्‍से भी थे और राजनीति के किस्‍से भी । इस उम्र में भी बालकवि बैरागी हम सबसे ज्‍यादा जोशीले और तरोताज़ा नज़र आए ।

राहत इंदौरी को बहुत खोजा और तब जाकर उन्‍हें इस कार्यक्रम के लिए राज़ी किया गया । वो आए भी । कुछ फिल्‍मों में उनके लिखे गीत हमें बहुत ज्‍यादा पसंद रहे हैं । राहत भाई के पढ़ने की अदा कमाल की है । कई कई मुशायरों में उन्‍हें सुना है और उनकी आग की तपिश अच्‍छी लगती है । पेश है उनका शेर ।

देवियां पहुंची ही थीं बाल बिखराए हुए

देवता मंदिर से निकले और पुजारी हो गये ।

कुछ और शेर

चेहरों की धूप आंखों की गहराई ले गया

आईना सारे शहर की बीनाई ले गया ।।

डूबे हुए जहाज़ का क्‍या तबसरा करें

ये हादसा तो सोच की गहराई ले गया ।।

झूठे क़सीदे लिखे गये उसकी शान में

जो मोतियों से छीन के सच्‍चाई ले गया ।।

निदा फ़ाज़ली हमारे समय के एक महत्‍त्‍वपूर्ण शायर हैं । उनके दोहे मुझे लंबे अरसे से पसंद रहे हैं । निदा साहब भी तशरीफ़ लाये और कई कई मुद्दों पर उन्‍होंने अपने बेबाक राय रखी । कमाल की बात ये थी कि निदा हों या बालकवि बैरागी या फिर राहत, इन तीनों का ताल्‍लुक फिल्‍मी गीतों से रहा है । तीनों ने ही फिल्‍मों में भी लिखा है । इसलिए इससे जुड़ी यादें तो आती ही रहीं इस कार्यक्रम में । जिस कार्यक्रम में इतने हेवीवेट कवि हों उसका संचालन कितनी बड़ी चुनौती होगी इसका अंदाज़ा आप लगा ही सकते हैं । मन:स्थिति बनाने और तैयारियों को अंजाम देने के लिए अंतत: एक ही दिन मिला और उसमें अच्‍छा खासा सरो-सामां जमा कर लिया । और हम मैदाने जंग में डट गये । चलिए निदा साहब की कुछ पंक्तियां सुन लीजिए--

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबाँ होती है दिल होते हैं
अपने घर की दर-ओ-दीवार सजा कर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढा़ कर देखो

कुंवर बेचैन को आप सभी ने सुना होगा । इस कवि सम्‍मेलन में उन्‍हें भी बुलाया गया था । और अगर आज कव‍ि सम्‍मेलन के बाद उसकी ईमानदार विवेचना करूं तो सबसे ज्‍यादा छिपे रूस्‍तम कुंवर बेचैन ही निकले । ख़ामोशी से हर दौर में महफिल को उन्‍होंने लूटा । मुझे उनकी ये पंक्तियां याद आ रही हैं---

दिल में मुश्किल बहुत है दिल की कहानी लिखना

जैसे बहते हुए पानी को है पानी लिखना ।।

या फिर ये पंक्तियां:

अंकगणित-सी सुबह है मेरी

बीजगणित-सी शाम

रेखाओं में खिंची हुई है

मेरी उम्र तमाम।

भोर-किरण ने दिया गुणनफल

दुख का, सुख का भाग

जोड़ दिए आहों में आँसू

घटा प्रीत का फाग

प्रश्नचिह्न ही मिले सदा से

मिला न पूर्ण विराम ।

दीप्‍ती मिश्र मुंबई की युवा कवियित्री हैं । उनकी कविताएं मुझे याद नहीं हैं इसलिए माफी चाहता हूं कि यहां उनकी पंक्तियां नहीं दे पा रहा हूं । वो भी इस कव‍ि सम्‍मेलन में शामिल थीं । आईये इस आयोजन की तस्‍वीरें भी आपको दिखा दी जाएं ।

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इस कवि सम्‍मेलन से जुड़ी कई यादें और हैं । जैसे मौक़ा बेमौक़ा लगभग सभी ने एक दूसरे की चुटकी ली । निदा फ़ाज़ली जैसे धाकड़ चुटकीबाज़ को वक्‍त वक्‍त पर बालकवि बैरागी जी ने बहुत खींचा । और एक भी मौक़ा नहीं छोड़ा । राहत इंदौरी के क़रीब जाना और उनकी जिंदगी की कहानी को सुनना समझना अच्‍छा था । कुंअर बेचैन बेहद मौन और शर्मीले नज़र आए लेकिन जब कविता सुनाने की बारी आई तो लगा कि वे अचानक बदल गये हैं । दिन भर के इस आयोजन ने जिंदगी के एक दिन को यादगार बना दिया ।

अब इस पोस्‍ट की बॉटम लाइन: ये रिकॉर्डिंग सत्रह मार्च को की गयी थी । और इसका प्रसारण आज दिन में ढाई बजे से शाम साढ़े पांच बजे के बीच विविध भारती पर किया जायेगा । हम तो तरंगित हो लिए अब आप सुनिएगा और बताईयेगा कविता की तरंगों ने आपको कितना तरंगित किया । 

Thursday, March 20, 2008

कवि सम्‍मेलनों की विकल याद और एक दिन कविताओं भरा

तरंग पर जैसलमेर यात्रा की श्रृंखला की डोर छूट सी गयी है पर फिर से उसे तानकर जल्‍दी जल्‍दी पोस्‍टें लिखने का मन है । आज जैसलमेर से नहीं बल्कि मुंबई के एक यादगार अनुभव से उपजी है ये पोस्‍ट । कवि-सम्‍मेलन अपनी कमज़ोरी रहे हैं । बहुत छोटे थे, स्‍कूल में रहे होंगे जब दूरदर्शन पर कवि सम्‍मेलनों और मुशायरों की रिकॉर्डिंग्‍स दिखाई जाती थीं । और हम इसे अपने टेप रिकॉर्डर पर रिकॉर्ड कर लेते थे । फिर आराम से बैठकर इन कविताओं को अपनी डायरी में उतारा जाता था । ख़ासतौर पर दूरदर्शन के दिल्‍ली, लखनऊ और हैदराबाद केंद्रों के कवि सम्‍मेलन / मुशायरे बड़े आतिशी होते थे । इन्‍हीं सम्‍मेलनों में कितने कितने लोगों को सुना । शिवमंगल सिंह 'सुमन', नीरज, कुंवर बेचैन, सोम ठाकुर, बालकवि बैरागी, वीरेंद्र मिश्र, रमानाथ अवस्‍थी, कैलाश गौतम, बशीर बद्र, अहमद नसीम काज़मी, निदा फ़ाज़ली, बेकल उत्‍साही, वसीम बरेलवी, शुजा ख़ाबर, मख़मूर सईदी, राहत इंदौरी, शेरी भोपाली, सरोजनी प्रीतम, परवीन शाकिर, रफि़या शबनम आबिदी, कृष्‍ण बिहारी नूर,

.... मध्‍यप्रदेश के स्‍कूलों में चलती हिंदी की पुस्‍तक 'बाल भारती' के अलावा इन्‍हीं कवि सम्‍मेलनों और मुशायरों ने कविता की लौ लगाई । जो आगे चलकर प्रगतिशील कविता की ओर मुड़ गयी ।

कुंअर महेंद्र सिंह बेदी सहर जैसे अनगिनत कवियों और शायरों को सुना । मध्‍यप्रदेश के स्‍कूलों में चलती हिंदी की पुस्‍तक 'बाल भारती' के अलावा इन्‍हीं कवि सम्‍मेलनों और मुशायरों ने कविता की लौ लगाई । जो आगे चलकर प्रगतिशील कविता की ओर मुड़ गयी । फिर त्रिलोचन और केदारनाथ सिंह से होते हुए कविता की लौ राजेश जोशी, ज्ञानेंद्र पति और फिर बोधिसत्‍व या एकांत श्रीवास्‍तव तक पहुंच गयी । बहरहाल फिर से कवि सम्‍मेलनों की यात्रा की बातों की ओर लौटा जाए । इन कवि सम्‍मलनों और मुशायरों की यादों पर अलग से एक पोस्‍ट लिखी जायेगी । क्‍योंकि यहां पर मामला अपनी सड़क से भटक जाएगा ।

हम आपको बताना चाहेंगे कि विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती पर अप्रैल के महीने की तीन तारीख़ के लिए एक कवि सम्‍मेलन आयोजित किया गया । जो एक बाक़ायदा कवि सम्‍मेलन नहीं था बल्कि फॉरमेट के मामले में एक नया प्रयोग था । इस कार्यक्रम का शीर्षक था--'प्‍यार की बातें प्‍यार के गीत' । मतलब ये कि कविताओं को प्रेम के दायरे में समेट दिया गया था, क्‍योंकि ये विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती पर दो महीने पहले आयोजित किये गये उस कार्यक्रम की अगली कड़ी के रूप में प्रस्‍तुत किया गया था जिसे रवि रतलामी ने यहां पर चढ़ाया है ।  

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बहरहाल ये बाक़ायदा कवि सम्‍मेलन नहीं था बल्कि परिचर्चा और कवि सम्‍मेलन के साथ साथ फिल्‍मी गीतों के ताने बाने में बुना गया एक रोचक कार्यक्रम था । जिसे हमने इस सोमवार को रिकॉर्ड कर लिया । अब इसके पोस्‍ट प्रोडक्‍शन का काम शुरू होगा और तीन अप्रैल को आप इस कार्यक्रम को पूरे तीन घंटे तक विविध भारती पर सुन सकेंगे । इस कवि सम्‍मेलन में शामिल कवि थे--बालकवि बैरागी, निदा फ़ाज़ली, कुंवर बेचैन, राहत इंदौरी और दीप्‍ती मिश्रा । मुनव्‍वर राणा को भी इसमें शामिल होना था पर उनकी फ्लाईट ही छूट गयी । और हम उन्‍हें सुनने से वंचित रह गये । कार्यक्रम के संचालन का जिम्‍मा मुझे दिया गया था । इस आयोजन में असल में क्‍या हुआ ये तो आपको रेडियो पर ही सुनना होगा । कवि सम्‍मेलन के कुल तीन दौर हुए । और साथ में कुछ बातचीत और फिल्‍मी गीत । कुल मिलाकर एक दिलचस्‍प और यादगार दिन रहा ।

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सबेरे से ही सभी कवियों के साथ मिलने बतियाने का सिलसिला रूकते रूकते चल रहा था । बैरागी जी से मुलाका़त हुई तो उन्‍हें हमने बताया कि किस तरह उनकी इन पंक्तियों ने हम जैसे छात्र-आंदोलनकारियों को ऊर्जा दी थी--

हाथों में पत्‍थर, होठों पे नारे

सड़कों पे आ गये क्‍यो जलते अंगारे

हाय राम कोई विचार तो करे

कोई इन अंगारों से प्‍यार तो करे ।।

corrected 3 

कुंवर बेचैन को तरन्‍नुम में सुनना बड़ा शानदार अनुभव रहा ।

corrected 2 

उनकी ये पंक्तियां तो बचपन से ही ज़ेहन में गूंज रही थीं ।

दिल पे मुश्किल बहुत है दिल की कहानी लिखना

जैसे बहते हुए पानी पे है पानी लिखना ।।

corrected 4

निदा फ़ाज़ली दिलचस्‍प शख्सियत हैं । जिस कव‍ि सम्‍मेलन में वो मौजूद हों, उनके असर से बचना मुश्किल है । इस कार्यक्रम में उन्‍होंने कई मुद्दों पर अपनी बेबाक राय तो रखी ही साथ ही अपनी कुछ मशहूर रचनाएं भी सुनाईं । उनका एक पुराना दोहा पेश है ।

मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्‍यार

दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार ।।

और राहत..राहत इंदौरी के अशआर जलते हुए अशआर होते हैं । आतिशी शायर हैं वो । उनके दो शेर पढि़ये--

सफर की हद है वहाँ तक के कुछ निशान रहे
चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे ।
ये क्या उठाए कदम और आ गई मंज़िल
मज़ा तो तब है के पैरों में कुछ थकान रहे ।।

दीप्‍ती मिश्र को मैंने पहली बार सुना । उनका शेर पढिये ।

सारे जीवन के बदले में कुछ लम्‍हे जी लेने दो

सागर कब मांगा है हमने कुछ क़तरे पी लेने दो ।।

इस तरह सोमवार का दिन काफी यादगार रहा । बैरागी जी की मज़ाकिया चुटकियां, निदा फ़ाज़ली का संदर्भों के सहारे बातें करना और व्‍यंग्‍य बाण चलाना और कुंअर बेचैन का ख़ामोशी से काम लेना और राहत इंदौरी का अंडरप्‍ले करना । सब कुछ मज़ेदार रहा । और हां चलते चलते ये भी बता दिया जाए कि ये तमाम चित्र विविध भारती के सहायक केंद्र निदेशक महेंद्र मोदी ने खींची हैं ।

जैसलमेर यात्रा वाली श्रृंखला की अगली कड़ी शीघ्र ही । जिसमें तस्‍वीरों के सहारे जैसलमेर कि़ले का भ्रमण किया जायेगा । फिलहाल आप बताएं कि कैसे कैसे कव‍ि सम्‍मेलन आपको याद हैं ।

Saturday, January 5, 2008

यादगार रहा मिलना युवा कवि एकांत श्रीवास्‍तव से

कल का दिन ख़ास रहा । कल विविध भारती में मुझे युवा कवि एकांत श्रीवास्‍तव का इंटरव्‍यू लेने का मौक़ा मिला । एकांत की कविताएं मैं पिछले दस पंद्रह सालों से पढ़ रहा हूं और कई दिनों से इच्‍छा थी कि इतनी संवेदनशील और बारीक कविताएं रचने वाले कवि से आमने-सामने बात करने मिले । इसलिए जब एक आयोजन में एकांत के आने की ख़बर मिली तो फ़ौरन इस मौक़े को झटक लिया ।

एकांत बेहद सादा इंसान हैं । सहज और सरल । वे छत्‍तीसगढ़ के एक छोटे-से इलाक़े राजिम से आते हैं । और उनकी ज्‍यादातर परवरिश अपनी दादी के सान्निध्‍य में हुई है । जब मैंने एकांत को बताया कि मैंने सबसे पहले उनकी वो कविताएं पढ़ी थीं जो उन्‍होंने रंगों पर लिखी थीं तो वो चौंक गये । वो उम्‍मीद नहीं कर रहे थे कि आकाशवाणी जैसे संस्‍थान में कोई इतने लंबे समय से उनकी कविताओं को पढ़ रहा है । और उन पर पैनी नज़र रखे हुए है । हां जिन लोगों ने ये कविताएं पढ़ी नहीं हैं उन्‍हें बता दूं कि एकांत श्रीवास्‍तव ने नब्‍बे के दशक की शुरूआत में रंगों पर एक पूरी श्रृंखला लिखी थी । एक कविता लाल रंग पर, एक सफ़ेद पर, तो एक काले रंग पर कविता । शायद पांच कविताएं थीं वो । कोशिश करेंगे कि 'तरंग' पर आपको वो कविताएं पढ़वाई जाएं ।

बहरहाल, एकांत ने अपने जीवन की कई अनजानी-अनछुई बातें बताईं । उन्‍होंने बताया कि शुरूआती दिनों में वो गुलशन नंदा और रानू की स्‍टाईल वाले उपन्‍यास और कहानियां लिखा करते थे । अपने उस छोटे से गांव में रहते हुए लिखने की प्रेरणा उन्‍हें अपनी दादी से मिलती रही । जिन्‍हें वो अम्‍मां कहते थे । दादी के पास उनकी परवरिश इसलिए हुई क्‍योंकि उनके माता-पिता दुर्ग में नौकरी करते थे । और उन्‍हें गांव में दादी के पास रख दिया गया था । दादी के कहने पर ही एकांत ने कविताओं पर ज़ोर देना शुरू किया । छत्‍तीसगढ़ और म.प्र. के प्रसिद्ध अखबार देशबंधु के अवकाश अंक यानी रविवारीय परिशिष्‍ट में उनकी कविताएं छपीं और वहां से उनका नाम होना शुरू

हुआ ।

मुझे एकांत की कविताओं की ख़ासियत लगती है हमारी जिंदगी से खत्‍म होती जा रही संवेदनाओं की धड़कन को पकड़ना और हमारी भाषा से ग़ायब हो चुके शब्‍दों का प्रयोग । एकांत कभी करेले बेचने वाली लड़की को अपनी कविता में बेहद प्रभावी ढंग से ले आते हैं तो कभी बग़ीचे में बरसाती दिनों में चहलक़दमी कर रही बीरबहूटी को । अदभुत है उनकी संवेदना । आज के समय में जबकि कविता में जटिलताएं बढ़ रही हैं और विचार....संवदेनाओं पर हावी हो रहे हैं, एकांत की कविताएं विचारों और सादगी या सरलता का तालमेल करती चलती हैं ।

किसी कवि को लगातार पढ़ते रहना और उससे मिलने की इच्‍छा को मन में दबाए लंबे समय तक जिए चले जाना दिलचस्‍प होता है और जब अपने प्रिय कवि से मुलाक़ात हो, और केवल मुलाक़ात ही नही बल्कि बाक़ायदा इंटरव्‍यू करने का मौक़ा भी मिले तो लगता है कि बातों का सिलसिला खत्‍म ना हो तो कितना अच्‍छा हो । बातों के नये नये सिरे खुलते चले जाएं । नये नये पहलू मिलते जाएं और कवि के व्‍यक्तित्‍व और उसके कृतित्‍व में नए तरीक़े से झांकने का मौक़ा मिलता जाए । हमने फिल्‍मों से लेकर साहित्‍य और समाज से लेकर लघु‍पत्रिकाओं के भविष्‍य तक हर मुद्दे पर बातचीत की । और केवल अच्‍छा ही नहीं लगा बल्कि बहुत अच्‍छा लगा ।

एकांत के तीन कविता संग्रह आ चुके हैं--अन्‍न हैं मेरे शब्‍द, मिट्टी से कहूंगा धन्‍यवाद और बीज से फूल तक ।
उनकी एक आलोचनात्‍मक पुस्‍तक आई है--कविता का आत्‍मपक्ष । बहुत जल्‍दी उनकी एक डायरीनुमा पुस्‍तक आने वाली है, जिसकी हमें लगातार प्रतीक्षा रहेगी । आजकल एकांत
वागर्थ के संपादक हैं और कलकत्‍ता में रेलवे की नौकरी भी कर रहे हैं । एकांत पर बात हो और कविताएं ना हों ऐसा हो नहीं सकता---ये रही एकांत की तीन कविताएं जो वागर्थ में छप चुकी हैं ।

करेले बेचने आईं बच्चियां


पुराने उजाड़ मकानों में
खेतों-मैदानों में
ट्रेन की पटरियों के किनारे
सड़क किनारे घूरों में उगी हैं जो लताएं
जंगली करेले की
वहीं से तोड़कर लाती हैं तीन बच्चियां
छोटे-छोटे करेले गहरे हरे
कुछ काई जैसे रंग के
और मोलभाव के बाद तीन रुपए में
बेच जाती हैं
उन तीन रुपयों को वे बांट लेती हैं आपस में
तो उन्हें एक-एक रुपया मिलता है
करेले की लताओं को ढूंढने में
और उन्हें तोड़कर बेचने में
उन्हें लगा है आधा दिन
तो यह एक रुपया
उनके आधे दिन का पारिश्रमिक है
मेरे आधे दिन के वेतन से
कितना कम
और उनके आधे दिन का श्रम
कितना ज्या़दा मेरे आधे दिन के श्रम से
करेले बिक जाते हैं
मगर उनकी कड़ुवाहट लौट जाती है वापस
उन्हीं बच्चियों के साथ
उनके जीवन में।

लोहा


जंग लगा लोहा पांव में चुभता है
तो मैं टिटनेस का इंजेक्शन लगवाता हूं
लोहे से बचने के लिए नहीं
उसके जंग के संक्रमण से बचने के लिए
मैं तो बचाकर रखना चाहता हूं
उस लोहे को जो मेरे खून में है
जीने के लिए इस संसार में
रोज़ लोहा लेना पड़ता है
एक लोहा रोटी के लिए लेना पड़ता है
दूसरा इज्ज़त के साथ
उसे खाने के लिए
एक लोहा पुरखों के बीज को
बचाने के लिए लेना पड़ता है
दूसरा उसे उगाने के लिए
मिट्टी में, हवा में, पानी में
पालक में और खून में जो लोहा है
यही सारा लोहा काम आता है एक दिन
फूल जैसी धरती को बचाने में

रास्ता काटना*

* एकांत ने बताया कि यह कविता उन दिनों लिखी गयी जब वे विशाखापत्‍तनम में पोस्‍टेड थे, आंध्र में महिलाएं बाहर जाने वाले पुरूष का रास्‍ता काटती हैं और ये शुभ होता है ।


भाई जब काम पर निकलते हैं
तब उनका रास्ता काटती हैं बहनें
बेटियां रास्ता काटती हैं
काम पर जाते पिताओं का
शुभ होता है स्त्रियों का यों रास्ता काटना
सूर्य जब पूरब से निकलता होगा
तो निहारिकाएं काटती होंगी उसका रास्ता
ऋतुएं बार-बार काटती हैं
इस धरती का रास्ता
कि वह सदाबहार रहे
पानी गिरता है मूसलाधार
अगर घटाएं काट लें सूखे प्रदेश का रास्ता
जिनका कोई नहीं है
इस दुनिया में
हवाएं उनका रास्ता काटती हैं
शुभ हो उन सबकी यात्राएं भी
जिनका रास्ता किसी ने नहीं काटा ।

अब एक अच्‍छी ख़बर भी देता चलूं कि एकांत श्रीवास्‍तव से हुई इस बातचीत को विविध भारती से आगे चलकर 'हमारे मेहमान' कार्यक्रम में प्रसारित किया जायेगा । इसकी सूचना आपको रेडियोनामा के ज़रिए जरूर दी जाएगी ।

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