बचपन की एक खोई कविता का दोबारा मिलना और इससे उठे कुछ सवाल
बचपन की किसी कविता का खो जाना कितना मानीख़ेज़ हो सकता है ये तब समझ आया था। नागपंचमी ये नागपंचमी झम्मक झम ये ढोल ढमाका ढम्मक ढम। मल्लों की जब टोली निकली यह चर्चा फैली गली गली, दंगल हो रहा अखाड़े में चंदन चाचा के बाड़े में। वे गौर सलौने रंग लिये अरमान विजय का संग लिये, कुछ हंसते से मुसकाते से मूछों पर ताव जमाते से। ये पहलवान अंबाले का ये पहलवान पटयाले का, दोनो हैं दूर विदेशों में लड़ आये हैं परदेशों में। जब मांसपेशियां बल खातीं तन पर मछलियां उछल आतीं, यह दांव लगाया जब डट कर वह साफ बचा तिरछा कट कर। .................................................. ................................................., भगदड़ मच गयी अखाड़े में चंदन चाचा के बाड़े में। बारहमासी चैत लिये फूलों की डाली महकाने को आता, लू के झोंकों में पलकर वैषाख तभी आ जाता। और ज्येष्ठ दुपहर भर तपकर आंधी पानी लाता, वर्षा के रिमझिम गीतों को गा आषाढ़ सुनाता। राखी के धागों में बंधकर सावन झूम झुलाता, नदी और सागर में पानी भरने भादों आता। लिये कांस के फूल गोद में क्वांर तभी मुसकाता, ज्वार बाजरे की बालों से कार्तिक खेत सजाता। अगहन गन्नों में रस भरता खेतों को लहराता, कंबल और रजाई की यादें पूस ही ताजा करता। माघ देखकर सरसों फूली फूला नहीं समाता, फागुन आमों की बौरों से बागों को महकाता।
आज ठीक से याद तो नहीं आ रहा है...पर शायद 'नागपंचमी' आई थी पिछले साल यानी साल 2009 की। और ज़ेहन में कौंध गई थी मध्यप्रदेश के स्कूलों में 'बालभारती' में पढ़ाई जाने वाली कविता 'नागपंचमी'। दिमाग़ पर ज़ोर डाला तो ज्यादा पंक्तियां याद नहीं आईं। अफ़सोस रह गया कि बचपन में रटी गई... बल्कि बड़े शौक़ से याद की गई कविता एकदम से भूल गई। मन विकल हो गया था इसलिए मध्यप्रदेश से ताल्लुक रख चुके या अभी भी वहां मौजूद मित्रों को ई-मेल भेजा। शायद किसी को याद हो तो बचपन की खोई कविता याद आ जाए।
कईयों के तो जवाब भी नहीं आए। ढूंढी कि नहीं। मिलेगी कि नहीं। पर 'एकोहम' वाले विष्णु बैरागी जी के कई बार उत्तर मिले। उन्होंने सूचना दी कि वे डटे हुए हैं, कहीं से तो मिल ही
जाएगी। पर आखिरकार उनका एक हारा-थका जवाब भी आया। जिसमें सूचित किया गया था कि कविता कहीं नहीं मिल रही।
फिर पांच अक्टूबर 2009 को उन्होंने अपने ब्लॉग 'एकोहम' पर एक बड़ी ही मार्मिक पोस्ट
लिखी। जिसकी शुरूआती पंक्तियां यहां दी जा रही हैं।
यह महज एक कविता के न मिलने का मामला नहीं है। यह उस ‘कुछ’ के न होने की खबर से उपजी उदासी है जिसके लिए पक्का भरोसा था कि ‘वह’ मेरे पुराने बक्से में पड़ी किसी पोटली में बँधी होगी। भरोसा था कि जब जरुरत होगी तो बक्से का ढक्कन उठा कर उसे ऐसे बाहर निकाल लूँगा जैसे आँखें मुँदी होने पर भी कौर मुँह में रख लेता हूँ। लेकिन जरुरत के मौके पर, ‘वह’ नहीं मिली तो भरोसा ऐसे टूटा जैसे लम्बी-ऊँची घास के, सीटियाँ बजाते सुनसान जंगल के बीच, रास्ते से भटका कोई पथिक, दूर से आ रही बंसी की धुन की पगडण्डी पर मंजिल की ओर बढ़ रहा हो और अचानक ही बंसी की आवाज बन्द हो जाए।
विष्णु जी की इस पोस्ट को ज़रूर पढियेगा। ये पोस्ट जिंदगी से छूटती जा रही चीज़ों के प्रति हमारी निस्संगता की ओर इशारा करती है।
बहरहाल...मुझे लग रहा था कि कविता नहीं मिलने वाली है। क्योंकि मध्यप्रदेश की वो बचपन वाली 'बाल-भारती' तो पता नहीं कहां बिला गई। इस बीच कोर्स भी जाने कितनी बार बदला होगा । अफ़सोस रह गया कि वो किताबें संभाल कर रखी जानी चाहिए थीं। कुछ तो रखी गयी हैं। पर ये वाली नहीं है । फिर एक दिन एक संदेश आया डॉ.टी.आर.शुक्ल का । सागर मध्यप्रदेश में हायर सेकेन्ड्री स्कूल में उन्होंने हमें फिजिक्स पढ़ाई थी। पढ़ाई के अलावा इतर विषयों पर भी उनसे खूब बैठकें होती थीं। नाता सागर से टूटा तो उनसे भी संपर्क टूट गया था। पर 'दैनिक भास्कर' के स्तंभ के ज़रिए उन्हें मेरा ई-मेल आई.डी. मिला और तब से उनसे ई-मेल संपर्क पुन: कायम हो गया । उन्हें भी मैंने संदेश भेजा था इस कविता के बारे में।
और कविता उन्होंने ने ही खोजी। उन्होंने लिखा-
प्रिय यूनुस
तुमने मुझे अपनी प्राथमिक-शाला में सन 1958-59 में बाल-भारती कक्षा 2 में पढ़ी कविता 'नागपंचमी' याद दिलाई। मन को काफी ज़ोर देना पड़ा तब कहीं कुछ अधूरे स्टेन्ज़ा याद आ पाए। उन्हें नीचे लिखे दे रहा हूं । अंतिम पैरा की दो लाइनें याद रह पाईं दो भूल गया हूं। भूले हुए एक दो पदों में शायद कुश्ती के दांव-पेंचों के बारे में विवरण था जो अब याद नहीं आ रहा है। पूरी कविता प्राप्त करने के लिए इतनी पुरानी पुस्तक प्राप्त कर पाना संभव नहीं है क्योंकि पुरानी पुस्तकों में छोटे बच्चों को ज्ञान देने का तरीक़ा भिन्न था अत: अब उन पुस्तकों को कौन संभाल कर रखेगा। इसके साथ ही मैं पहली कक्षा में पढ़ी हुई 'बारहमासी' कविता भी नीचे लिख रहा हूं जिसमें हिंदी माहों के अनुसार प्रत्येक माह में क्या प्राकृतिक विशेषताएं होती हैं, उनका सटीक विवरण दिया गया है।
यहां की पंक्तियां याद नहीं आ रही हैं
शुक्ल जी को कितने भी धन्यवाद कहे जाएं, पर अपनी स्मृति पर ज़ोर डालकर जिस तरह उन्होंने ये कविताएं हमें भेजी हैं, उसका ऋण अभी अदा नहीं किया जा सकता ।
ये भले ही कोई बहुत उत्कृष्ट कविताएं ना हों, साहित्य इन्हें शायद सिरे से रद्द कर दे--पर हमें भौतिकी पढ़ाने वाले डॉ. टी.आर.शुक्ल वाली पीढ़ी से लेकर मेरी पीढ़ी तक ने इन्हें अपने 'कोर्स' में पढ़ा और उनकी स्मृतियों में जीवित हैं ये कविताएं ।
इन दोनों कविताओं के रचनाकारों का नाम अगर पता चल सके, तो और अच्छा रहे ।