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Sunday, April 4, 2010

बचपन की एक खोई कविता का दोबारा मिलना और इससे उठे कुछ सवाल

बचपन की किसी कविता का खो जाना कितना मानीख़ेज़ हो सकता है ये तब समझ आया था।

आज ठीक से याद तो नहीं आ रहा है...पर शायद 'नागपंचमी' आई थी पिछले साल यानी साल 2009 की। और ज़ेहन में कौंध गई थी मध्‍यप्रदेश के स्‍कूलों में 'बालभारती' में पढ़ाई जाने वाली कविता 'नागपंचमी'। दिमाग़ पर ज़ोर डाला तो ज्यादा पंक्तियां याद नहीं आईं। अफ़सोस रह गया कि बचपन में रटी गई... बल्कि बड़े शौक़ से याद की गई कविता एकदम से भूल गई। मन विकल हो गया था इसलिए मध्‍यप्रदेश से ताल्‍लुक रख चुके या अभी भी वहां मौजूद मित्रों को ई-मेल भेजा। शायद किसी को याद हो तो बचपन की खोई कविता याद आ जाए।

कईयों के तो जवाब भी नहीं आए। ढूंढी कि नहीं। मिलेगी कि नहीं। पर 'एकोहम' वाले विष्‍णु बैरागी जी के कई बार उत्‍तर मिले। उन्‍होंने सूचना दी कि वे डटे हुए हैं, कहीं से तो मिल ही
जाएगी। पर आखिरकार उनका एक हारा-थका जवाब भी आया। जिसमें सूचित किया गया था कि कविता कहीं नहीं मिल रही। 

फिर पांच अक्‍टूबर 2009 को उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग 'एकोहम' पर एक बड़ी ही मार्मिक पोस्‍ट
लिखी। जिसकी शुरूआती पंक्तियां यहां दी जा रही हैं।  

यह महज एक कविता के न मिलने का मामला नहीं है। यह उस ‘कुछ’ के न होने की खबर से उपजी उदासी है जिसके लिए पक्का भरोसा था कि ‘वह’ मेरे पुराने बक्से में पड़ी किसी पोटली में बँधी होगी। भरोसा था कि जब जरुरत होगी तो बक्से का ढक्कन उठा कर उसे ऐसे बाहर निकाल लूँगा जैसे आँखें मुँदी होने पर भी कौर मुँह में रख लेता हूँ। लेकिन जरुरत के मौके पर, ‘वह’ नहीं मिली तो भरोसा ऐसे टूटा जैसे लम्बी-ऊँची घास के, सीटियाँ बजाते सुनसान जंगल के बीच, रास्ते से भटका कोई पथिक, दूर से आ रही बंसी की धुन की पगडण्डी पर मंजिल की ओर बढ़ रहा हो और अचानक ही बंसी की आवाज बन्द हो जाए।

विष्‍णु जी की इस पोस्‍ट को ज़रूर पढियेगा। ये पोस्‍ट जिंदगी से छूटती जा रही चीज़ों के प्रति हमारी निस्‍संगता की ओर इशारा करती है।

बहरहाल...मुझे लग रहा था कि कविता नहीं मिलने वाली है। क्‍योंकि मध्‍यप्रदेश की वो बचपन वाली 'बाल-भारती' तो पता नहीं कहां बिला गई। इस बीच कोर्स भी जाने कितनी बार बदला  होगा । naag punchmiअफ़सोस रह गया कि वो किताबें संभाल कर रखी जानी चाहिए थीं। कुछ तो रखी गयी हैं। पर ये वाली नहीं है । फिर एक दिन एक संदेश आया डॉ.टी.आर.शुक्‍ल का । सागर मध्‍यप्रदेश में हायर सेकेन्‍ड्री स्‍कूल में उन्‍होंने हमें फिजिक्‍स पढ़ाई थी। पढ़ाई के अलावा इतर विषयों पर भी उनसे खूब बैठकें होती थीं। नाता सागर से टूटा तो उनसे भी संपर्क टूट गया था। पर 'दैनिक भास्‍कर' के स्‍तंभ के ज़रिए उन्‍हें मेरा ई-मेल आई.डी. मिला और तब से उनसे ई-मेल संपर्क पुन: कायम हो गया । उन्‍हें भी मैंने संदेश भेजा था इस कविता के बारे में।

और कविता उन्‍होंने ने ही खोजी। उन्‍होंने लिखा-

प्रिय यूनुस
तुमने मुझे अपनी प्राथमिक-शाला में सन 1958-59 में बाल-भारती कक्षा 2 में पढ़ी कविता 'नागपंचमी' याद दिलाई। मन को काफी ज़ोर देना पड़ा तब कहीं कुछ अधूरे स्‍टेन्‍ज़ा याद आ पाए। उन्‍हें नीचे लिखे दे रहा हूं । अंतिम पैरा की दो लाइनें याद रह पाईं दो भूल गया हूं। भूले हुए एक दो पदों में शायद कुश्‍ती के दांव-पेंचों के बारे में विवरण था जो अब याद नहीं आ रहा है। पूरी कविता प्राप्‍त करने के लिए इतनी पुरानी पुस्‍तक प्राप्‍त कर पाना संभव नहीं है क्‍योंकि पुरानी पुस्‍तकों में छोटे बच्‍चों को ज्ञान देने का तरीक़ा भिन्‍न था अत: अब उन पुस्‍तकों को कौन संभाल कर रखेगा। इसके साथ ही मैं पहली कक्षा में पढ़ी हुई 'बारहमासी' कविता भी नीचे लिख रहा हूं जिसमें हिंदी माहों के अनुसार प्रत्‍येक माह में क्‍या प्राकृतिक विशेषताएं होती हैं, उनका सटीक विवरण दिया गया है।

नागपंचमी

ये नागपंचमी झम्मक झम

ये ढोल ढमाका ढम्मक ढम।

मल्लों की जब टोली निकली

यह चर्चा फैली गली गली,

दंगल हो रहा अखाड़े में

चंदन चाचा के बाड़े में।

वे गौर सलौने रंग लिये

अरमान विजय का संग लिये,

कुछ हंसते से मुसकाते से

मूछों पर ताव जमाते से।

ये पहलवान अंबाले का

ये पहलवान पटयाले का,

दोनो हैं दूर विदेशों में

लड़ आये हैं परदेशों में।

जब मांसपेशियां बल खातीं

तन पर मछलियां उछल आतीं,

यह दांव लगाया जब डट कर

वह साफ बचा तिरछा कट कर।

..................................................
यहां की पंक्तियां याद नहीं आ रही हैं

.................................................,

भगदड़ मच गयी अखाड़े में

चंदन चाचा के बाड़े में।



बारहमासी


चैत लिये फूलों की डाली

महकाने को आता,

लू के झोंकों में पलकर

वैषाख तभी आ जाता।

और ज्येष्‍ठ दुपहर भर तपकर

आंधी पानी लाता,

वर्षा के रिमझिम गीतों को

गा आषाढ़ सुनाता।

राखी के धागों में बंधकर

सावन झूम झुलाता,

नदी और सागर में पानी

भरने भादों आता।

लिये कांस के फूल गोद में

क्वांर तभी मुसकाता,

ज्वार बाजरे की बालों से

कार्तिक खेत सजाता।

अगहन गन्नों में रस भरता

खेतों को लहराता,

कंबल और रजाई की यादें

पूस ही ताजा करता।

माघ देखकर सरसों फूली

फूला नहीं समाता,

फागुन आमों की बौरों से

बागों को महकाता।


शुक्‍ल जी को कितने भी धन्‍यवाद कहे जाएं, पर अपनी स्‍मृति पर ज़ोर डालकर जिस तरह उन्‍होंने ये कविताएं हमें भेजी हैं, उसका ऋण अभी अदा नहीं किया जा सकता ।

ये भले ही कोई बहुत उत्‍कृष्‍ट कविताएं ना हों, साहित्‍य इन्‍हें शायद सिरे से रद्द कर दे--पर हमें भौतिकी पढ़ाने वाले डॉ. टी.आर.शुक्‍ल वाली पीढ़ी से लेकर मेरी पीढ़ी तक ने इन्‍हें अपने 'कोर्स' में पढ़ा और उनकी स्‍मृतियों में जीवित हैं ये कविताएं ।

इन दोनों कविताओं के रचनाकारों का नाम अगर पता चल सके, तो और अच्‍छा रहे ।

Saturday, June 14, 2008

टी बैग के सौ साल और मुंबई की चाय के अलग अलग स्‍वाद

जी हां टी-बैग का इस्‍तेमाल होते हुए सौ बरस पूरे हो गये । दिलचस्‍प बात ये हे कि ग़लती से हुआ था इसका आविष्‍कार । न्‍यूयॉर्क में थॉमस सुलिवान कॉफी बेचते थे, बढ़ती हुई क़ीमतों से परेशान थॉमस ने कॉफी की बजाय चाय बेचनी शुरू कर दी ।
जब उनके ग्राहकों को अचानक चाय की प्‍याली के साथ रेशम का एक छोटा-सा पैकेट दिया जाने लगा तो वो चक्‍कर में पड़ गए । उन्‍हें समझ में नहीं आया कि इसका किया क्‍या जाए । और ये चक्‍कर क्‍या है । बहरहाल ग्राहकों को कुछ दिन समझाना पड़ा । तब जाकर सभी को ये बात पता चल गयी । इस तरह पैसे बचाने का ये आयडिया चल निकला ।  और अमेरिका में चाय के शौकीनों ने इसे खूब आज़माया ।

 

                 teabag_used

 

सन 1930 में विलियम हरमनसन ने रेशम के कपड़े को हटाकर उसकी जगह काग़ज के पैकेट का इस्‍तेमाल शुरू किया । और बॉस्‍टन की कंपनी टेक्निकल पेपर्स कॉरपोरशन ने फाइबर पेपर के बने इस टी-बैग का पेटेन्‍ट करवा लिया ।


लेकिन टी बैग को अमेरिका से यूरोप पहुंचने में लग गयी आधी सदी  । यूरोप वालों को शुरूआत में टी बैग पसंद नहीं आया । उनका मानना था कि इस चाय  में काग़ज़ का स्‍वाद आ जाता है । बहरहाल ब्रिटेन की सबसे मशहूर टी कंपनी जोसेफ टेटली ने 1953 में इंग्‍लैन्‍ड में टी बैग्‍ा लॉन्‍च किये । साठ के दशक में केवल तीन प्रतिशत बाजा़र था टी बैग का । फिर आया टी बैग का एक नया रूप । सन 1964 में आया छिद्रयुक्‍त टी बैग । आज टेटली दो सौ मिलियन टी बैग  महज़ एक हफ्ते में बेच डालती है । इसमें छिद्रयुक्‍त इतना काग़ज होता है कि 128 फुटबॉल मैदानों को ढंका जा सकता है । आज ब्रिटेन में 130 मिलियन कप चाय पी जाती है जिसमें से छियानवे प्रतिशत चाय में टी बैग्‍स का इस्‍तेमाल होता

है ।

 

भारत के आंकड़े पता नहीं । लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आता कि हमारे देश में टी-बैग्‍स का चलन ज्‍यादा क्‍यों नहीं हो पाया ।
वैसे देखा जाये तो हमारे यहां चाय के कितने रूप हैं । हर हाथ की चाय के स्‍वाद में फ़र्क़ आ जाता है । मुंबई शहर में तो बाहर की चाय के कितने स्‍वाद हैं । जब भी चर्चगेट की ओर जाना होता है तो मैं कयानीज़ जाना नहीं भूलता । मेट्रो टॉकीज़ के सामने बना ये पारसी रेस्‍त्रां गाढ़े दूध वाली ईरानी चाय और ताजा बिस्‍किटों के लिए मशहूर है और तकरीबन सौ डेढ़ सौ सालों से बरक़रार है । अख़बारों में अकसर इसका जिक्र आता रहता है । हालांकि मुंबई में अब बहुत कम ईरान रेस्‍त्रां बचे रह गये हैं । वरना ईरानी रेस्‍त्रां हो और उसका बढि़या सा मस्‍का-पाव मिल जाये तो दिल खुश हो जाता था मुंबई वालों का ।

 

kayani rest.

 

इसके अलावा चाय का एक अलग ही स्‍वाद है खाऊ गलियों का । जिन्‍हें अब मुंबई महानगरपालिका ने अपना निशाना बनाया है । सड़कों पर ठिये लगाकर चाय बनाने वाले चाय को जमकर उबालते हैं और इसमें स्‍वाद बढ़ाने के लिए इलायची पीसकर डाल देते हैं जिससे उबली हुई काढ़े जैसी चाय थोड़ी सुहानी बन जाती है । फिर अगर आप मोहम्‍मद अली रोड या क्रॉफर्ड मार्केट जैसे इलाक़े में जाएं, तो वहां बढि़या गाढ़े दूध वाली मुसलमानी चाय मिलेगी एकदम छोटे से कप में । जिसमें नज़ाक़त की कोई जगह नहीं है । और बाक़ी नज़ाक़ती चाय तो हैं ही, जो बड़े बड़े एयर कंडीशंड रेस्‍त्राओं में मिलती है । इन जगहों पर कहीं टी बैग्‍ा का इस्‍तेमाल नहीं होता । शायद हम भारतीयों को जमकर उबाली गयी चाय पिये बिना सुकून नहीं मिलता ।

 

            tea 

चाय को लेकर आपके किस तरह के नखरे हैं ।

Sunday, June 1, 2008

किसी कार्टूनिस्‍ट से दोस्‍ती का नतीजा 'ये' होता है ।

निर्मिष ठाकर अचानक मेरे मित्र बन गये हैं । जी हां । एक हफ्ते पहले तक परिचय तक नहीं था । लेकिन घटनाओं का क्रम देखेंगे तो पायेंगे कि सब कुछ अचानक हो गया । हुआ यूं कि पिछले दिनों विविध भारती पर प्रख्‍यात कवि एकांत श्रीवास्‍तव से बातचीत प्रसारित हुई । निर्मिष ने इस बातचीत को सुना । और फिर एकांत से ही संपर्क किया । उनसे मेरा नंबर प्राप्‍त करने का प्रयास किया । जो उनके लापरवाह मोबाइल से गा़यब हो चुका था । सो मेरे बदले कहानीकार और पत्रकार हरीश पाठक का नंबर एकांत ने दिया । हरीश जी से निर्मिष ने मेरा नंबर प्राप्‍त किया और इस कार्यक्रम के लिए बधाई दी ।

मुझे ये एक आम श्रोता का कॉल लगा ।

इस तरह के फ़ोन तो आते ही रहते हैं । लेकिन निर्मिष ने अपने बारे में कई बातें बताईं । जैसे कि वो पहले बहुत ही छोटे पद पर रहे थे और आज ONGC में सुपरिन्‍टेन्‍डेन्‍ट इंजीनियर हैं । सेल्‍फ मेड टाईप के आदमी हैं । शास्‍त्रीय संगीत में गहरी रूचि है । गुजराती पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं । आजकल सूरत में रहते हैं । फिर हुआ ये कि उन्‍होंने अपनी कैरिकैचर बनाने की रूचि के बारे में बताया । ये भी बताया कि शास्‍त्रीय गायकों से लेकर साहित्‍यकारों तक सबके स्‍केच उन्‍होंने बनाए हैं । और अब उनका एक प्रोजेक्‍ट चल रहा है । जिसमें वो रेडियो और टीवी के प्रस्‍तुतकर्ताओं की तस्‍वीरें बना रहे हैं । मुझे चूंकि बरसों से सुन रहे हैं इसलिए मेरे बारे में जानने की इच्‍छा थी । फिर 'दिव्‍य भास्‍कर' में छप रही मेरी श्रृंखला में उन्‍होंने मेरी तस्‍वीर देखी तो जिज्ञासा और बढ़ गयी । वो सहज भाव से पूछ बैठे कि ये आज की तस्‍वीर है या पच्‍चीस साल पुरानी । उनका कहना था कि कई लोग अपनी पुरानी तस्‍वीरें लगाकर खुद को जवान 'दिखाने' का प्रयास करते पाये गये हैं । बहरहाल । तमाम बातों के बाद....उन्‍होंने मेरी क़द काठी वग़ैरह पता कर ली । और मुझसे अपनी एक तस्‍वीर भेजने को कहा ।

मैंने अपनी राजस्‍थान यात्रा की ये तस्‍वीर उन्‍हें मेल कर दी जिसमें मेरे अलावा रेडियो सखी ममता सिंह, कमल शर्मा, और अशोक सोनावणे एक बंजारे के साथ खड़े हैं ।

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बस इस तस्‍वीर को भेजकर मैं भूल गया । पर अगले ही दिन मेरे मेल बॉक्‍स पर दो कैरिकैचर भेज दिये गये थे । निर्मिष इतनी तत्‍परता से काम करते हैं । मुझे एक बात याद आ गयी । बरसों पहले जब मैं म.प्र. में छिंदवाड़ा शहर में पढ़ रहा था तो कार्टूनिस्‍ट राजकुमार चौहान से मित्रता हुई थी और एक दिन अपनी जेब से पैकेट निकालकर सिगरेट के रैपर के पिछले हिस्‍से में उन्‍होंने मेरा एक कार्टून बनाया था । पिछले दिनों मेरे भाई जबलपुर के हमारे घर से कई पुरानी चीज़ें खोजकर मुझ तक पहुंचाईं । उनमें से ये कार्टून भी था । किसी दिन इसे भी आपके साथ शेयर किया जायेगा । बहरहाल । आज तो खुद देखिए कि किसी कार्टूनिस्‍ट से दोस्‍ती करने का मीठा अंजाम क्‍या होता है । मेरी और रेडियोसखी ममता के कैरिकैचर आपकी नज़र ।

 

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Friday, April 11, 2008

नाम है पवन, भदोही से भागकर आया हूं सर ।।

पिछले अठारह बीस दिनों से घर पर रेनोवेशन का काम चल रहा है । हम ईंट गारे और व्‍हाइट सीमेन्‍ट से सराबोर हैं । अजब-ग़ज़ब अनुभव हो रहे हैं । इस तरह के अनुभवों से गुजर चुके लोग जानते हैं कि घर के रेनोवेशन या निर्माण का काम मेंढक तौलने जैसा है, इलेक्‍ट्रीशिन का इंतज़ाम करो, तो प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस का काम करने वाला ग़ायब । उसे खोजो तो पता चला कि कडि़या कहीं और काम लगाकर बैठा है । यहां मज़दूर भेज दिया हैं वो कर रहे हैं मन-मर्जी से काम । इसी तरह के भागम-भाग और अस्‍त-व्‍यस्‍त माहौल में हुए कुछ अनोखे अनुभव में से एक है पवन से मुलाक़ात ।

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हुआ ये कि हमने एक महाशय को प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस से हॉल में सजावट का काम दिया, जिनका नाम था वसंत कुमार । उत्‍तरप्रदेश के किसी इलाक़े के होते हैं ये वसंत । जिन्‍होंने थोड़ी रकम पेशगी मांगी और ग़ायब....किसी और को भेज दिया काम करने । वो आया थोड़ा काम शुरू किया और वो भी ग़ायब । फिर हम दोनों पति-पत्‍नी ने वसंत की खूब ख़बर ली और उसे ताकीद किया कि इतने दिनों में काम ख़त्‍म होना चाहिए वरना.....। तो ये वसंत माफी़ वग़ैरह का नाटक करते हुए अपना सामान लेकर पधारे । साथ में एक लड़का था । दुबला पतला । मूंछों के बाल अब आ रहे थे । उम्र पंद्रह-सोलह साल । आते ही वसंत काम में जुट गए । पहला निर्देश दिया गया इस लड़के को कि ये तसले में प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस घोले, मुंबई की भाषा में ....घमेले में माल तैयार करे । छोटू ने जिस तरह काम शुरू किया उससे मेरी समझ में आ गया कि बच्‍चा नया है । और कुछ तो गड़बड़ है ।

उस दिन ज़रा व्‍यस्‍तता रही मटेरियल वग़ैरह ख़रीदने की । लोगों को मैनेज करने की इसलिए बालक पर ध्‍यान नहीं गया । लेकिन आज जब दोपहर को कहीं से लौटे तो पाया कि ये छोटू हॉल के बीचोंबीच कुर्सी पर मस्‍ती से बैठा है । हम भी जगह बनाकर बैठ गये । जिस कमरे में प्‍लास्‍टर ऑ‍फ पेरिस का काम हो रहा हो उसकी दुर्दशा देखने जैसी होती है, फिर सनद ये कि यहां कारपेन्‍टर भी काम कर रहा है और फर्नीचर पर पॉलिश करने वाला भी । ख़ैर सब कारीगर दोपहर की सुस्‍ती में थे तो हम बालक से गपियाने बैठ गए ।

नाम पूछा तो पता चला कि ये महाशय हैं पवन कुमार मौर्य । बातों बातों में पवन कुमार ने बताया कि जब वो पहले दिन काम पर आया था और मेरी आवाज़ सुनी थी तो पहचान गया था कि मैं विविध भारती पर यूथ एक्‍सप्रेस प्रस्‍तुत करने वाला यूनुस हूं । लेकिन हिम्‍मत नहीं हुई पूछने की । पवन ने ये भी बताया कि काम के दौरान उसे एक पोस्‍टकार्ड पड़ा नज़र आया जो विविध भारती के पते पर आया था । और उसमें मेरे बारे में कुछ लिखा था । तब तो उसे पूरा यक़ीन हो गया कि मैं वही विविध भारती वाला बंदा हूं । मैंने उसके इस संशय को दूर किया और बताया कि मैं वही हूं । तो उसने सबसे पहले हाथ मिलाया और बोला- सर आपसे मिलकर हमें बहुत खुशी हुई है । हम आपके कार्यक्रम को बहुत ध्‍यान से सुनते हैं । चूंकि इसमें सामान्‍य ज्ञान की बातें होती हैं इसलिए हम उन्‍हें नोट भी करते चलते हैं । पवन का कहना था कि उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वो हमसे इस तरह मिलेगा ।

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बहरहाल अब असली बातें शुरू हुईं । मैंने पवन से पूछा कि वो मुंबई में कब से है । तो उसने बताया कि पिछले तकरीबन एक महीने से वो यहां है । मैंने फौरन सवाल दाग़ा भागकर आए हो ना । ऊपर जो तस्‍वीर आपने देखी, ये उस सवाल के जवाब देने से पहले की उसकी तस्‍वीर है । जो मैंने अपने मोबाइल फोन से खींची है । उसने स्‍वीकार कर लिया कि वो भागकर आया है । मैंने पूछा पवन कुमार बात क्‍या है, सौतेली मां वाला मामला है या खूंखार पिता वाला या फिर प्‍यार मुहब्‍बत की कहानी है । कहीं तुम हीरो या गायक बनने तो नहीं आए हो । तो पवन मुस्‍कुराकर बोला कि नहीं साहब ऐसी बात नहीं है । हम पढ़ाई में ठीक-ठाक हैं । अच्‍छे घर के हैं । भदोही के लोहारखास गांव के हैं और पिता का नाम है श्री जल्‍लूराम मौर्या । हमारे घर में क़ालीन की फिनिशिंग का काम होता है । मैंने पूछा तो उसने बताया कि क़ालीन जब बनकर आते हैं तो उनमें काफी ग़ल‍तियां होती हैं । उसके पिता क़ालीनों की फिनिशिंग करके उन्‍हें सही रूप देते हैं । घर है अपना स्‍वयं का । आर्थिक परेशानियां भी नहीं हैं । वो विज्ञान का विद्यार्थी है, नवीं कक्षा में पढ़ता है । अगले महीने में परीक्षाएं होने वाली हैं । भदोही के कारपेट बुनकरों के विकट जीवन के बारे में पढ़ें सदासिवन की इस वेबसाइट पर

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मेरी परेशानी बढ़ती जा रही थी । मैंने उससे पूछा- अरे भई जब सब ठीक था तो भाग क्‍यूं आए । पवन ने बताया कि गांव के कुछ लड़के मुंबई घूमने आ रहे थे । उसने सोचा कि इस समय माता पिता से पूछेंगे तो अनुमति नहीं मिलेगी । इसलिए चुपके से उनके साथ हो लिया । सीधे बोरीवली पहुंचा । जो साथ में आए लड़के थे, वो गांजा-भांग पीने लगे । पवन को कुछ ठीक नहीं लगा । वो मायानगरी मुंबई में यहां-वहां भटकने लगा । मुंबई के सुदूर उपनगर विरार में एक माता जीवदानी का मंदिर है, एक दिन वहां बिता लिया । फिर कालबादेवी गया और मुंबई की ग्राम देवी- मुंबादेवी के दर्शन किए । इसी तरह और भी भटका । इस चक्‍कर में हुआ ये कि पवन की जेब में रखो डेढ़ हज़ार रूपए किसी ने पार कर लिये । इस तरह पवन का फिल्‍में देखने का और घूमने का सिलसिला रूक गया । मैंने पवन से पूछा कि उसने यहां कौन कौन सी फिल्‍में देखीं तो उसने बताया कि सैफ़ अली ख़ान की फिल्‍म रेस देखी उसने । एक भोजपुरी फिल्‍म भी देखी । और उसके प्रिय हीरो संजय दत्‍त हैं क्‍योंकि जब वो मुन्‍नाभाई बनते हैं तो उसे बहुत अच्‍छा लगता है ।

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वैसे पवन ने ये भी बताया कि उसके प्रिय हीरो तो मिथुन चक्रवर्ती हैं क्‍योंकि वो डान्‍स बहुत अच्‍छा करते हैं और वो अपने गांव में सी डी पर मिथुन की फिल्‍में बहुत देखता है । उसकी प्रिय हीरोइन माधुरी दीक्षित है और उसे अफ़सोस है कि माधुरी ने फिल्‍मों को लगभग छोड़ दिया है । बस 'आजा नच ले' में नज़र आई थी । इन दिनों पवन मुंबई की एक झोपड़ पट्टी में रहता है । जेब कटने के बाद पेट भरने के लिए उसे पैसों की जरूरत थी । ऐसे में प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस से मोल्डिंग का काम करने वाले वसंत ने उसे अपने साथ रख लिया । और वही उसे लेकर हमारे घर पर आया था । वसंत का कहना है कि पवन के नखरे बहुत हैं । और पवन का कहना है कि उससे ग़लती हो गयी जो वो घर से भाग आया वरना उसे ये काम नहीं करना पड़ता । उसके मांबाप को बता चलेगा तो वो पता नहीं क्‍या सोचेंगे । उसने मुंबई आने के बाद सबसे पहले अपने घर में फोन किया और बताया कि वो घूमने मुंबई आया है और जल्‍दी ही लौटेगा । उसके बाद से वो नियमित रूप से उनसे फोन पर बतियाता रहता है । मां बाप का कहना है कि वो जल्‍दी घर आ जाए । pavan

पवन ने बताया कि वो रेडियो बहुत सुनता है । और उसे ज्‍यादातर उद्घोषकों की आवाज़ें पसंद आती हैं । चूंकि रेडियोसखी ममता घर के काम का अवलोकन सबेरे शाम करती ही हैं दिन भर तो वो ऑफिस में होती हैं । तो बसंत को उनकी बातें सुनना अच्‍छा लगता है । उसने ये भी बताया कि कल शाम जब वो वसंत को डांट रही थीं तो उसे बहुत मज़ा आ रहा था । उसका कहना है कि ममता जी डांटती भी हैं तो लगता है कि रेडियो चल रहा है । .....सुना आपने ममता की सारी डांट का सत्‍यानाश हो गया । मेरा मतलब मुझे एक नुस्‍खा मिल गया । ममता अब मुझे भी डांटे तो मैं यही समझ लिया करूंगा कि मैं रेडियो सुन रहा हूं ।

पवन कहता है कि मुंबई आकर उसका क्‍या हाल हो गया है । पर वो खुश है उसे जिंदगी के नये अनुभव हुए हैं । उसे ये समझ में भी आया है कि घर से अनायास भागना नहीं चाहिए । उसे ये भी लगा है कि अच्‍छा हुआ कि वसंत उसे मिल गया तो वो काम करने लगा । वरना गुंडे बदमाशों की संगति में आ जाता तो क्‍या होता । जिन साथियों के साथ वो यहां आया था वो तो छोटे मोटे काम करके दारू पीने लगे हैं । पर पवन वापस लौटने के पैसे जमा कर रहा है । वो घर लौटना चाहता है । और अपनी कमाई से लौटना चाहता है । उसका कहना है कि अगले महीने परीक्षाओं से पहले वो घर लौट जाएगा और डटकर पढ़ेगा ।

पवन को हमारी शुभकामनाओं की ज़रूरत है ।

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