Sunday, March 2, 2008

जैसलमेर यात्रा चौथी कड़ी--सीमा, सिपाही और सनसनी.....

तरंग पर इन दिनों मैं अपनी जैसलमेर यात्रा का ब्‍यौरा लिख रहा हूं । जैसलमेर-जोधपुर की ये यात्रा अनुभवों से इतनी संपन्‍न रही है कि अभी दो दिन पहले मैं सोच रहा था कि ये श्रृंखला तो बड़ी लंबी हो जाएगी । क्‍या लंबी श्रृंखलाओं में रस बना रहता है । इस माथापच्‍ची को सिर झटककर इसलिए भी भुला दिया कि मैं स्‍वयं अपनी इस यात्रा का डॉक्‍यूमेन्‍टेशन कर लेना चाहता हूं ताकि सनद रहे । स्‍मृति पर समय की दूसरी परतों के चढ़ने से पहले अच्‍छा है कि उनका बैकअप ले लिया जाए । Happy

आपको याद होगा कि पिछली कड़ी में हम तन्‍नोट तक पहुंच गये थे । अब यहां से भारत-पाक सीमा की ओर जाना है । फिर हम लोंगेवाल में रची गयी भारतीय सेना की शौर्य गाथा को दोहराएंगे ।

.... दो सगे मुल्कों के बीच एक सरहद है....ढेर सारी जि़द है....अपार राजनीति है...नफ़रत है...और साझा संस्कृंति की बीच कंटीली बाड़ है...।

अपनी इस कड़ी में मैं भारत पाक सीमा पर बनी सीमा सुरक्षा बल की उन पोस्‍टों के नाम नहीं दे रहा हूं जहां हम गए थे । आज तकरीबन एक महीने बाद भी रोमांच का वो अहसास बिल्‍कुल वैसा का वैसा है, जो भारत-पाक सीमा पर जाने पर हुआ था । फिर ये भी लगा कि जहां सिविलियन्‍स नहीं जा सकते, वहां अपने काम के सिलसिले में जा पहुंचना हमारा सौभाग्‍य ही तो था ।

भारत-पाकिस्‍तान की सीमा को लेकर मुझे हमेशा से तकलीफ़ होती रही है । अफ़सोस है कि इतिहास की करवट ने इस विशाल देश के दो टुकड़े कर दिये और सरहद के उस पार वाला हिस्‍सा हमारे लिए एक कहानी बनकर रह गया । मुझे याद है कि बचपन से ही मैं अपने परिवार में दादाजी के भाई के विभाजन के वक्‍त पाकिस्‍तान चले जाने की कहानियां सुना करता था । दादी बताती थीं कि कैसे मेरे पैतृक गांव हिन्‍डोरिया से मेरे परदादा सभी को लेकर विभाजन के दौरान जबलपुर चले गये थे । वहां से एक भाई पाकिस्‍तान की ओर चले गये और बाक़ी सभी अपने गांव लौट आए । इसके अगले साल मेरे पिताजी का जन्‍म हुआ । अस्‍सी के दशक में हमारे ख़ानदान के उस हिस्‍से से कुछ लोग भारत के दौरे पर आए । बड़ी दिलचस्‍प यादें हैं वो...मेरी पीढ़ी के लोग थे । ख़ानदान की दो शाखाओं के लोग...एक दूसरे से अपरिचित । कौतुहल से इस देस-परदेस को देखते । मिथुन चक्रवर्ती को मिथन पुकारते...उसकी फिल्‍मों के फैन । हालांकि उसके बाद हमारा ज्‍यादा संपर्क नहीं रहा । एक सपना है उस ओर जाकर उन तमाम लोगों से मिलने का ।

जब मैं रामगढ़ में भारत-पाकिस्‍तान की सीमा पर गया तो उस कंटीली बाड़ को देखकर पहला अहसास यही हुआ कि यहां से वो शहर कुछ ही घंटों की दूरी पर होगा । लेकिन दो सगे मुल्‍कों के बीच एक सरहद है....ढेर सारी जि़द है....अपार राजनीति है...नफ़रत है...और साझा संस्‍कृति की बीच कंटीली बाड़ है...। बहरहाल......इस दास्‍तान से बाहर आता हूं और आपको दिखाता हूं एकदम सरहद पर लहराता तिरंगा.... 

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सीमा पर पहुंचते ही हमें अजीब-सी सनसनी का अहसास हुआ । ये भी लगा कि किन मुश्किल हालात में सीमा सुरक्षा बल के सिपाही सीमाओं की हिफ़ाज़त करते हैं । इस पोस्‍ट के युवा-कमांडर ने हमें यहां की कार्यप्रणाली के बारे में बताया । यहीं पर पैंतालीस फुट ऊंचा ये वॉच-टावर भी था, जिस पर चढ़ने का लोभ-संवरण मैं और मेरे कुछ इंजीनियर नहीं कर पाए । इस पर चढ़ने के बाद कुछ नज़र नहीं आया सिवाय बंजर सरज़मीं के । दोनों तरफ़ वीराना...कहते हैं कि ऐसे हालात में सीमा-सुरक्षा-बल के सिपाही रायफल और रेडियो के सहारे अपना समय काटते हैं ।

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यहां गर्मियों में तापमान तकरीबन पचास डिग्री सेल्सियस और सर्दियों में दो डिग्री सेल्सियस से भी कम हो जाता है । ज़रूरत का हर सामान दूर से लाना पड़ता है । यानी दिक्‍कतें ही दिक्‍कतें । अपनी आम जिंदगी में कभी हमें ये अहसास भी नहीं होता कि हम जिस बेफिक्री से अपना जीवन जीते हैं, देश का कामकाज चलता है, उसमें कहीं ना कहीं इन सिपाहियों का ज़बर्दस्‍त योगदान है । इन सिपाहियों से बातें करना एक दिव्‍य-अनुभव था ।

.... ख़ानदान की दो शाखाओं के लोग...एक दूसरे से अपरिचित । कौतुहल से इस देस-परदेस को देखते । मिथुन चक्रवर्ती को मिथन पुकारते...उसकी फिल्मों के फैन ...।

हम आपको बता दें कि यहां हमने इन फौजियों के साथ 'जयमाला संदेश' और 'मनचाहे गीत' कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग की । 'जयमाला संदेश' का कन्‍सेप्‍ट है फौजियों के संदेश उनके परिवार वालों के नाम और उनके परिवार वालें के संदेश फौजियों के नाम । और 'मनचाहे गीत' का कंसेप्‍ट तो आप जानते ही हैं--फ़रमाईशी फिल्‍मी गीत । यहां कोई मणिपुर का था, तो कोई उड़ीसा का, कोई बंगाल का तो कोई झारखंड, बिहार, राजस्‍थान, म.प्र., कर्नाटक और तमिलनाडु का । दिलचस्‍प थीं इन फौजियों की फ़रमाईशें । मैं हमेशा से कहता हूं कि कौन सा गाना किसे और किस तरह रिलेट करे कह नहीं सकते । ज़रूरी नहीं है कि मशहूर फिल्‍में और उनके गीत ही लोगों पर असर डालें । ज्‍यादातर फ़रमाईशें थीं कम मशहूर फिल्‍मों की--जैसे 'सैनिक', 'पाले खां', 'जान' जैसी फिल्‍मों के गीत । किसी ने अपनी फेवरेट हीरोईन करीना कपूर बताई तो किसी ने बताया कि उन्‍हें सन्‍नी देओल पसंद हैं क्‍योंकि वो दमदार हीरो हैं ।

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साल में एक या दो बार छुट्टियों में घर जाना, परिवार को याद करते हुए गाने गाना, चिट्ठियों की बजाय महीने में एक बार फोन पर बातें करना...कितनी कितनी बातें बताई गयीं हमें । ये वो लोग थे जिनके लिए विविध भारती सबसे ज्‍यादा महत्‍त्‍वपूर्ण थी, जिन्‍होंने हमसे सबसे ज्‍यादा प्‍यार किया । और जो हमें देखकर फूले नहीं समाए । मेरे कैमेरे की नज़र से देखिए उन ऊंटों को जिन पर सीमा सुरक्षा बल के प्रहरी सरहद पर गश्‍त लगाते हैं । 

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सीमा-सुरक्षा-चौकी पर जाकर रिकॉर्डिंग करने के इस दिव्‍य अनुभव को शायद शब्‍दों में ठीक ठीक नहीं उतारा जा सकता । आज एक महीने बाद भी जब-तब ज़ेहन में उस अनुभव की छबियां तैर जाती हैं ।

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पिछली पोस्‍ट पर 'विखंडित' जी की टिप्‍पणी थी जिसमें उन्‍होंने तन्‍नोट के पास रेत की टीले और तन्‍नोट मंदिर में घूमते मीठा खाने के शौकीन काले बकरे का जिक्र था । लंबी होती पोस्‍ट की वजह से ये तस्‍वीरें ग़ायब कर दी थीं । लीजिए ये रहीं वो तस्‍वीरें--- 

इस बकरे ने ममता से अच्‍छी दोस्‍ती कर ली और लगातार उसके पीछे पीछे घूमता रहा ।  

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और ये उस टीले से इलाक़े का जायज़ा लेते हम....

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अगली कड़ी में पढि़ये लोंगेवाल की शौर्यगाथा ।

इस श्रृंखला की अन्‍य कडि़यां--

1.पहला भाग--रामदेवरा

2.दूसरा भाग--रामगढ़ में संगीत-संध्‍या

3.तीसरा भाग-सीमा प्रहरियों के विश्‍वास का केंद्र तन्‍नोट

5 टिप्‍पणियां :

डॉ. अजीत कुमार said...

यूनुस भाई,
ब्लॉग लेखन तो है ही डायरी लिखने की परम्परा का डिजिटल स्वरूप. हम अपनी यादों, अनुभवों को कलमबद्ध करते हैं.
आपका यात्रा वृत्तांत बिल्कुल सजीव हो रहा है और हम स्वयं को आपके ही करीब पा रहे हैं. यही तो लेखन की सफलता है. और आप हमें उनसे वंचित करना चाह रहे हैं.
देश तो बंट ही चुका है पर अब तो कुछ लोग इसे तार -तार करने पर लगे हुए हैं. शायद हम आप ही इसे फ़िर से जोड़ सकते है.
धन्यवाद.

Harshad Jangla said...

Yunusbhai
It was an extremely enjoyable joueney with live pictures and interesting description. Thanx & Rgds.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA
March 3, 2008

जोशिम said...

बहुत सही चल रहा है भाई - देखिये आपके कितने फैन हैं - सरहदों पर दुखी न होयें - इंसानों की निशानी हैं ज़मीन पर - जिस देश में हम रहते हैं दोस्त-पडोसियों में पाकिस्तान से भी हैं और निहायत मददगार अच्छे लोग हैं [- हाँ जैसे हम अपने मुल्क से प्यार करते हैं वैसे वो अपने मुल्क से - ] - मनीष

anitakumar said...

युनुस जी बहुत ही सजीव विवरण है, बंटवारे के समय की कुछ ऐसी ही यादें हमारे परिवार की भी हैं। सच कहा आप ने बहुत सारी जिद, बेकार की राजनीति पता नहीं कितनी पुशतों का खून पिएगी।
हां बकरा जरूर मीठे का चुटीरा रहा होगा और सौंदयप्रेमी भी इस लिए उसे पता था कि किसके पीछे घूमना है, उसे अपनी परिक्रमाओं का कुछ फ़ल मिला कि नहीं , क्या उस बकरे का कुछ नाम भी है। और फ़ोटोस दिखाइए और प्लीज पोस्ट लंबी होने की चिंता मत किजिए, पढ़वाते जाइए।

विखंडन said...

युनुस भाई वाक्य ही ला जवाब विवरण । प्योर मजा।

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