Thursday, March 20, 2008

कवि सम्‍मेलनों की विकल याद और एक दिन कविताओं भरा

तरंग पर जैसलमेर यात्रा की श्रृंखला की डोर छूट सी गयी है पर फिर से उसे तानकर जल्‍दी जल्‍दी पोस्‍टें लिखने का मन है । आज जैसलमेर से नहीं बल्कि मुंबई के एक यादगार अनुभव से उपजी है ये पोस्‍ट । कवि-सम्‍मेलन अपनी कमज़ोरी रहे हैं । बहुत छोटे थे, स्‍कूल में रहे होंगे जब दूरदर्शन पर कवि सम्‍मेलनों और मुशायरों की रिकॉर्डिंग्‍स दिखाई जाती थीं । और हम इसे अपने टेप रिकॉर्डर पर रिकॉर्ड कर लेते थे । फिर आराम से बैठकर इन कविताओं को अपनी डायरी में उतारा जाता था । ख़ासतौर पर दूरदर्शन के दिल्‍ली, लखनऊ और हैदराबाद केंद्रों के कवि सम्‍मेलन / मुशायरे बड़े आतिशी होते थे । इन्‍हीं सम्‍मेलनों में कितने कितने लोगों को सुना । शिवमंगल सिंह 'सुमन', नीरज, कुंवर बेचैन, सोम ठाकुर, बालकवि बैरागी, वीरेंद्र मिश्र, रमानाथ अवस्‍थी, कैलाश गौतम, बशीर बद्र, अहमद नसीम काज़मी, निदा फ़ाज़ली, बेकल उत्‍साही, वसीम बरेलवी, शुजा ख़ाबर, मख़मूर सईदी, राहत इंदौरी, शेरी भोपाली, सरोजनी प्रीतम, परवीन शाकिर, रफि़या शबनम आबिदी, कृष्‍ण बिहारी नूर,

.... मध्‍यप्रदेश के स्‍कूलों में चलती हिंदी की पुस्‍तक 'बाल भारती' के अलावा इन्‍हीं कवि सम्‍मेलनों और मुशायरों ने कविता की लौ लगाई । जो आगे चलकर प्रगतिशील कविता की ओर मुड़ गयी ।

कुंअर महेंद्र सिंह बेदी सहर जैसे अनगिनत कवियों और शायरों को सुना । मध्‍यप्रदेश के स्‍कूलों में चलती हिंदी की पुस्‍तक 'बाल भारती' के अलावा इन्‍हीं कवि सम्‍मेलनों और मुशायरों ने कविता की लौ लगाई । जो आगे चलकर प्रगतिशील कविता की ओर मुड़ गयी । फिर त्रिलोचन और केदारनाथ सिंह से होते हुए कविता की लौ राजेश जोशी, ज्ञानेंद्र पति और फिर बोधिसत्‍व या एकांत श्रीवास्‍तव तक पहुंच गयी । बहरहाल फिर से कवि सम्‍मेलनों की यात्रा की बातों की ओर लौटा जाए । इन कवि सम्‍मलनों और मुशायरों की यादों पर अलग से एक पोस्‍ट लिखी जायेगी । क्‍योंकि यहां पर मामला अपनी सड़क से भटक जाएगा ।

हम आपको बताना चाहेंगे कि विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती पर अप्रैल के महीने की तीन तारीख़ के लिए एक कवि सम्‍मेलन आयोजित किया गया । जो एक बाक़ायदा कवि सम्‍मेलन नहीं था बल्कि फॉरमेट के मामले में एक नया प्रयोग था । इस कार्यक्रम का शीर्षक था--'प्‍यार की बातें प्‍यार के गीत' । मतलब ये कि कविताओं को प्रेम के दायरे में समेट दिया गया था, क्‍योंकि ये विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती पर दो महीने पहले आयोजित किये गये उस कार्यक्रम की अगली कड़ी के रूप में प्रस्‍तुत किया गया था जिसे रवि रतलामी ने यहां पर चढ़ाया है ।  

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बहरहाल ये बाक़ायदा कवि सम्‍मेलन नहीं था बल्कि परिचर्चा और कवि सम्‍मेलन के साथ साथ फिल्‍मी गीतों के ताने बाने में बुना गया एक रोचक कार्यक्रम था । जिसे हमने इस सोमवार को रिकॉर्ड कर लिया । अब इसके पोस्‍ट प्रोडक्‍शन का काम शुरू होगा और तीन अप्रैल को आप इस कार्यक्रम को पूरे तीन घंटे तक विविध भारती पर सुन सकेंगे । इस कवि सम्‍मेलन में शामिल कवि थे--बालकवि बैरागी, निदा फ़ाज़ली, कुंवर बेचैन, राहत इंदौरी और दीप्‍ती मिश्रा । मुनव्‍वर राणा को भी इसमें शामिल होना था पर उनकी फ्लाईट ही छूट गयी । और हम उन्‍हें सुनने से वंचित रह गये । कार्यक्रम के संचालन का जिम्‍मा मुझे दिया गया था । इस आयोजन में असल में क्‍या हुआ ये तो आपको रेडियो पर ही सुनना होगा । कवि सम्‍मेलन के कुल तीन दौर हुए । और साथ में कुछ बातचीत और फिल्‍मी गीत । कुल मिलाकर एक दिलचस्‍प और यादगार दिन रहा ।

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सबेरे से ही सभी कवियों के साथ मिलने बतियाने का सिलसिला रूकते रूकते चल रहा था । बैरागी जी से मुलाका़त हुई तो उन्‍हें हमने बताया कि किस तरह उनकी इन पंक्तियों ने हम जैसे छात्र-आंदोलनकारियों को ऊर्जा दी थी--

हाथों में पत्‍थर, होठों पे नारे

सड़कों पे आ गये क्‍यो जलते अंगारे

हाय राम कोई विचार तो करे

कोई इन अंगारों से प्‍यार तो करे ।।

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कुंवर बेचैन को तरन्‍नुम में सुनना बड़ा शानदार अनुभव रहा ।

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उनकी ये पंक्तियां तो बचपन से ही ज़ेहन में गूंज रही थीं ।

दिल पे मुश्किल बहुत है दिल की कहानी लिखना

जैसे बहते हुए पानी पे है पानी लिखना ।।

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निदा फ़ाज़ली दिलचस्‍प शख्सियत हैं । जिस कव‍ि सम्‍मेलन में वो मौजूद हों, उनके असर से बचना मुश्किल है । इस कार्यक्रम में उन्‍होंने कई मुद्दों पर अपनी बेबाक राय तो रखी ही साथ ही अपनी कुछ मशहूर रचनाएं भी सुनाईं । उनका एक पुराना दोहा पेश है ।

मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्‍यार

दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार ।।

और राहत..राहत इंदौरी के अशआर जलते हुए अशआर होते हैं । आतिशी शायर हैं वो । उनके दो शेर पढि़ये--

सफर की हद है वहाँ तक के कुछ निशान रहे
चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे ।
ये क्या उठाए कदम और आ गई मंज़िल
मज़ा तो तब है के पैरों में कुछ थकान रहे ।।

दीप्‍ती मिश्र को मैंने पहली बार सुना । उनका शेर पढिये ।

सारे जीवन के बदले में कुछ लम्‍हे जी लेने दो

सागर कब मांगा है हमने कुछ क़तरे पी लेने दो ।।

इस तरह सोमवार का दिन काफी यादगार रहा । बैरागी जी की मज़ाकिया चुटकियां, निदा फ़ाज़ली का संदर्भों के सहारे बातें करना और व्‍यंग्‍य बाण चलाना और कुंअर बेचैन का ख़ामोशी से काम लेना और राहत इंदौरी का अंडरप्‍ले करना । सब कुछ मज़ेदार रहा । और हां चलते चलते ये भी बता दिया जाए कि ये तमाम चित्र विविध भारती के सहायक केंद्र निदेशक महेंद्र मोदी ने खींची हैं ।

जैसलमेर यात्रा वाली श्रृंखला की अगली कड़ी शीघ्र ही । जिसमें तस्‍वीरों के सहारे जैसलमेर कि़ले का भ्रमण किया जायेगा । फिलहाल आप बताएं कि कैसे कैसे कव‍ि सम्‍मेलन आपको याद हैं ।

7 टिप्‍पणियां :

anitakumar said...

काश हमारा घर आप के दफ़तर के पास होता तो हम इन महारथियों को सुनने का मौका कभी न खोते। भाग्यशाली है जी आप।
सारे जीवन के बदले में कुछ लम्‍हे जी लेने दो

सागर कब मांगा है हमने कुछ क़तरे पी लेने दो ।।

बहुत सुन्दर शेर है।
कार्यक्र्म का इंतजार रहेगा। रवि जी को प्रार्थना करनी पड़ेगी की इसकी भी पोडकास्ट बना दें तो क्या बात है।
विविध भारती बहुत ही उम्दा कार्यक्र्म दे रहा है।

ख़ुशबू said...

यूनुस, कवि सम्मेलन के ज़िक्र से आपनें हमें बचपन की याद दिला दी। हमारे परिवार में पिता जी ने भाषा और कविता से लगाव खू़ब ज़ाहिर किया और हम बच्चों को भी अपनें साथ कवि सम्मेलनों में ले जाते रहे। और तो और, रीवा में हमारे घर में अक्सर आयोजित कविता संध्या में जिन कवियों का जमाव होता था उनमें एक थे ओज से कविता पाठ करनें वाले शिव कुमार अर्चन जी जिनकी लिखी पंक्तियाँ ’जो यहाँ मसीहा होता है अपना सलीब खु़द ढ़ोता है’अभी तक याद हैं।

अभिषेक ओझा said...

कवी सम्मेलन की बात करके आपने हमारे हमें हमारे कॉलेज में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों की याद दिला दी.. अभी भी कुछ ८-१० जीबी कवितायें पड़ी है... हार्ड डिस्क में... ३ अप्रिल का इंतज़ार रहेगा.

जोशिम said...

अरे वाह - अच्छा तो यह रही आपके व्यस्त रहने की वजह - क्या बात सुनाई " ये क्या उठाए कदम और आ गई मंज़िल/ मज़ा तो तब है के पैरों में कुछ थकान रहे" - मेज़ की बात है की कल दिन छुट्टी थी तो निदा फाजली साहब की किताब उठाई थी और पहला पन्ना "न चिट्ठी न तार" वाला ही खुला - ताउम्र होस्टलों में गुजारने के कारण कम कवि सम्मेलन नसीब हुए - बहुत छुटपन में घर की गोष्ठियाँ रहीं - अर्चन जी की जो कविता बड़ी बहन ऊपर बता रही हैं - थोड़ी मुझे भी याद है - बहुत सशक्त अभिव्यक्ति है - अभी भी जवान है - और उस समय अर्चन जी जब गाते थे तो लगता था सब रुक गया है - "फूलों ने महकना छोड़ दिया / काँटों पर शबनम सोती है / बंगले की नागफनी हंसती / आँगन की तुलसी रोती है/ कोई तड़प रहा उजियारे को / कोई सूरज बांधे सोता है/ ऐसा भी होता है (२)"
होली वगैरह की राम राम रेडियोनामा में कर आया हूँ - मनीष

annapurna said...

आपने अच्छा किया जो ये चिट्ठा अभी लिख दिया। मैं होली के बाद सोमवार को रेडियोनामा पर एक शिकायती चिट्ठा लिखने वाली थी कि बहुत समय से विविध भारती पर कवि सम्मेलन नहीं सुने।

हैदराबाद के जिन कवि सम्मेलनों और मुशायरों की बात आपने की लगभग उन सभी में श्रोता की तरह मैं मौजूद रही।

हैदराबाद दूरदर्शन में स्थानीय कवियों के साथ कई कवि सम्मेलन आयोजित किए, संचालन भी किया। एक ऐसा ही कवियित्री सम्मेलन मुझे याद आ रहा है जो केवल महिलाओं को लेकर किया गया था जिसमें स्थानीय कवित्रियाँ थी पर मुख्य अतिथी थी सरोजिनी प्रीतम जो उस समय हैदराबाद में थी सो उन्हें आमंत्रित किया गया था।

संचालन मेरा था। हैदराबाद में पानी की उस समय बहुत किल्लत थी। सरोजिनी प्रीतम ने उसी पर हास्य कविता सुनाई थी जिसकी आरंभि पंक्ति थी -

दमयन्ती उठी भी नहीं थी कि नल चला गया

अन्नपूर्णा

कंचन सिंह चौहान said...

सफर की हद है वहाँ तक के कुछ निशान रहे
चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे ।
ये क्या उठाए कदम और आ गई मंज़िल
मज़ा तो तब है के पैरों में कुछ थकान रहे ।।

kya baat hai

सागर नाहर said...

अब जल्दी से इन कविताओं को सुनने का इंतजार है।

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