Friday, November 9, 2018

रंगोली सजाओ रे-- ज़रा हट के- दीपावली विशेष- यूनुस ख़ान

लोकमत समाचार में सोमवार 5 नवंबर को प्रकाशित




ये दीवाली के दिन हैं। त्‍यौहार ने दरवाज़े पे दस्‍तक दे दी है। पता नहीं अब वो ज़माना कहां हवा हो गया
, जब ताज़े पुते चूने की गंध फैली होती थी घर में। आँगन द्वार सब नया-नया सा हो जाता था। खील-बताशे
, कंदील, पटाख़े...रॉकेट-अनार। सब के सब दीवाली को दीवाली बनाते थे। आज हम सब अकसर बातें करते हैं कि अब त्‍यौहारों का वो उत्‍साह कहां बिलाता जा रहा है। अमूमन इसका वाजिब जवाब किसी के पास नहीं है। बहरहाल... आईये दीपावली के इन दिनों में बातें करें कुछ फिल्‍मी गीतों की।

आपको बतायें कि दीपावली के सबसे पुराने गानों में से एक है सन 1941 में आयी फिल्‍म
ख़ज़ांचीका गाना—दीवाली फिर आ गयी सजनी/दीप से दीप जला ले। इस गाने को गाया था शमशाद बेगम ने। गीतकार थे वली साहब और संगीतकार गुलाम हैदर। बिलकुल यही दौर था जब कुंदनलाल सहगल ने फिल्‍म स्‍ट्रीट सिंगरमें एक गीत गाया—लक्ष्‍मी मूरत दरस दिखाए। ये सन 1938 की बात है।

ज़रा सोचिए ये वो दौर था जब भारत आज़ाद नहीं था और फिल्‍म संगीत अपने शैशव काल में था। इसी दौर में कुछ दीपावली गीत आए हैं—जैसे फिल्‍म
'किस्‍मतका गाना—घर घर में दीवाली है मेरे घर में अंधेरा...इसे अमीर बाई कर्णाटकी ने गाया था, गीत कवि प्रदीप का था और संगीत अनिल बिस्‍वास का। बॉम्‍बे टॉकीज़ की फिल्‍म किस्‍मतवही फिल्‍म है जिसमें दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्‍तान हमारा हैजैसा राष्‍ट्र को जगाने वाला गीत आया और अँग्रेज़ सरकार की नींद हराम हो गयी थी। पर वो कहानी फिर कभी.... अभी तो हम दीपावली के कुछ गीतों की बातें कर रहे हैं। रतनमें भी एक दीवाली गीत है—आई दीवाली/ आई दीवाली। इसे जोहरा अंबाला ने गाया है।

दीपावली के कई ऐसे गाने हैं जिनके बिना ये त्‍यौहार पूरा नहीं हो सकता। जैसे सन 1961 में आयी फिल्‍म
नज़रानाका गाना—मेले हैं चिराग़ों के रंगीन दीवाली है’… इस गाने को लिखा था राजेंद्र कृष्‍ण ने और संगीत था रवि का। दिलचस्‍प बात ये है कि इस गीत का एक उदास संस्‍करण भी आया था—इक वो भी दीवाली थी इक ये भी दीवाली है/ उजड़ा हुआ गुलशन है रोता हुआ माली है। इस गाने को राजकपूर पर फिल्‍माया गया था। दीपावली के उदास गानों में शामिल है फिल्‍म हक़ीक़तका गाना—आई अबकी साल दीवाली’….। इसे कैफी आजमी ने लिखा है और संगीत मदनमोहन का है। इसी तरह हरियाली और रास्‍ताका गीत भी उदासी भरा है—लाखों तारे आसमान में/ एक मगर मुझको ना मिला

दीपावली का एक गीत जो दूरदर्शन पर बचपन के दिनों में अकसर चित्रहार में दिखाया जाता था—वो है—
दीपावली मनाए सुहानी। ये फिल्‍म शिर्डी के साईं बाबाका गाना है। और पांडुरंग दीक्षित ने लिखा है। दरअसल दीपावली का संदेश है संसार में प्रकाश करना। लोगों को उजाले ही ओर ले जाना। और संत ज्ञानेश्‍वर फिल्‍म का गाना यही बात कहता है—जोत से जोत जलाते चलो/ प्रेम की गंगा बहाते चलो
। इसे मुकेश ने गाया है।

आप सबको दीप पर्व की असंख्‍य मंगलकामनाएं।   

Tuesday, October 30, 2018

‘घोड़े को जलेबी खिलाने ले जा रिया हूं’।


प्रिय मित्रो
आप तो जानते ही हैं कि जब मुंबई में मामी फिल्‍म समारोह होता है तो हम वहां होते हैं। पीछे
मुड़कर देखते हैं तो लगता है कि बचपन की फास्‍ट ट्रेन तमिलनाड एक्‍सप्रेस की तरह बीस साल झनझनाते हुए गुज़र गए। ये बीसवां फेस्टिवल है। सवाल ये है कि फेस्टिवल हमें क्‍या देते हैं। क्‍यूं इनके लिए दीवानगी रखी जाए। बीते हफ्ते मैंने इसका थोड़ा जिक्र किया था- शायद आपका ध्‍यान गया होगा। हां तो साहेबान रूटीन सबसे बड़ी क़ैद होती है—इससे जो निकल लिया—वो निकल लिया। सही के रिया हूं। झांक के देख लो गिरेबान में।

बहरहाल..इस रविवार फिल्‍म फेस्टिवल की एक बहुत ही मोहक फिल्‍म की बात। दिल्‍ली की रंगकर्मी हैं अनामिका हक्‍सर। जिन्‍होंने उनसठ साल की उम्र में जिंदगी की पहली फिल्‍म बनायी है। और अपना सब कुछ दांव पर लगाकर बनायी है। उन्‍होंने ये भी बताया कि इसमें उनके ही नहीं, दोस्‍तों के पैसे भी लग गये। आज इसी फिल्‍म की चर्चा होगी। फिल्‍म का नाम है—घोड़े को जलेबी खिलाने ले जा रिया हूं। ऐसे कमाल के नाम वाली फिल्‍म भी कमाल की है। पहले ज़रा इसके नाम के बारे में अनामिका के एक इंटरव्‍यू से अंश—फिल्म के इस नाम के पीछे का किस्सा क्या है? डायरेक्टर अनामिका का कहना है कि उनकी एक आंटी हुआ करती थीं जो पुरानी दिल्ली में संगीत सीखने जाती थीं. वो बहुत कहानियां सुनाती थीं. जब अनामिका 15-16 बरस की थीं तब उन्होंने ये किस्सा उनसे सुना था. एक बार उनकी आंटी दिल्ली में कहीं से गुज़र रही थीं कि उन्होंने सुना किसी ने एक घोड़ेवाले से पूछा – “कहां जा रिया है तू?” तो घोड़ेवाला बोला – “अरे.. घोड़े को जलेबी खिलाने ले जा रिया हूं.ज़ाहिर है सच में वो घोड़े को जलेबी खिलाने नहीं ले जा रहा था, बल्कि उस सवाल पूछने वाले पर तंज कस रहा था कि कॉमन सेंस है वो मेहनत-मज़दूरी वाला आदमी है घोड़े के साथ काम पर ही जा रहा होगा. घोड़े को जलेबी खिलाने वाले तंज में एक विडंबना भी छुपी है कि न तो उस जैसे आर्थिक-सामाजिक वर्ग के लोग अपने रोज़ के संघर्षों से मुक्त हो सकते हैं और न ही उन जैसे गरीब लोगों के घोड़े कभी जलेबी खा सकते हैं

घोड़े को जलेबी...दिल्‍ली को दिखाती है। दिल्‍ली 6 को। यानी पुरानी दिल्‍ली को। पर मुंबई के फिल्‍मकारों की तरह नहीं। यहां मेहनतकश मजदूर हैं। बोझ उठाने वाले, ठेला खींचने वाले हम्‍माल हैं, जेबकतरे हैं, बाल मजदूर हैं, सफाई-कर्मी हैं, कचरा बीनने वाले हैं, सेठ हैं, पुलिस है, हैरिटेज वॉक करवाने वाले गाइड हैं, बिकने को तैयार पुरानी हवेलियां हैं, छतें हैं, टेढी-मेढी...गंदगी से पटी गलियां हैं, भीड़ है, निराशा है, तकलीफ है, सपने हैं, शोषण है, लाचारी है। तरह तरह का परिदृश्‍य है।
ये दिल्‍ली की गलियां हैं—जिनको देखने कोई नहीं आता। जो आते हैं वो दिल्‍ली के इतिहास को देखने आते हैं। दिल्‍ली के पकवानों का लुत्‍फ उठाने आते हैं। अनामिका हक्‍सर हमारी आंखों पर पड़ा पर्दा हटाती हैं और हमें एक बिलकुल अलग भीषण जीवन की बहुत ही असुविधाजनक और तकलीफदेह तस्‍वीर दिखाकर हैरान कर देती हैं। झटका देती हैं। घुटन का अहसास होने लगता है।

फिल्म फीचर, डॉक्यूमेन्ट्री, एनीमेशन और जादुई यथार्थ का एक अजब-सा मिश्रण है। ये फिल्म बहुत दिनों तक साथ चलने वाली है। पुरानी दिल्ली के मेहनतकश लोगों की दुनिया, उनके खौफनाक सपने, उनके जीवन के कटु यथार्थ... एक साथ फिल्म एक पूरी दुनिया को आपके सामने उजागर करती है जिसे आपने हमेशा दूर से और बहुत दूरी बनाकर देखा है। यह फिल्म अपनी ध्वनियों, दृश्यों, नैरेटिव सबके ज़रिए मानो आपकी आंखों के आगे से एक पर्दा हटा देती है ताकि यथार्थ आपके सामने उजागर हो जाए। बधाई अनामिका हक्सर। खासकर इस साहस के लिए। फिर ये बताने के लिए के सिनेमा मुंबई के सपनों के सौदागरों की बपौती नहीं है। किसी भी उम्र में इस रूपहली दुनिया में अपनी तरह से क़दम रखना मुमकिन है। उन्‍होंने 59वें साल में अपनी पहली फिल्‍म बनायी है और बनाकर दिखा दिया है कि अगर पक्‍का इरादा हो तो कुछ भी संभव किया जा सकता है।


अनामिका हक्‍सर ने बताया कि उन्‍होंने बहुत लंबे समय तक उन्‍होंने और उनकी टीम ने इन तमाम लोगों से बात की। उनके सपनों के बारे में पूछा। तकरीबन इन सभी को गहरे गर्त में गिरने के सपने आते हैं। किसी को ये सपना आता है कि सब कुछ डूबा जा रहा है। तरह तरह के डरावने सपने हैं ये। भयानक। खौफनाक। और अनामिका ने एनीमेशन और ग्राफिक्‍स के ज़रिए फिल्‍म में इन सपनों को भी पिरोया है और जीवन की कठिनाईयों के बीच जूझ रहे इन लोगों के जज्‍बात को भी। यहां एक दृश्‍य की चर्चा कर लूं। एक दृश्‍य है जिसमें सड़क पर रातोंरात अचानक मर गये मजदूरों की लाश उठाने वाला एक साइकिल रिक्‍शा आता है। वो तीन लाशों को रिक्‍शे पर रखता है और चला जाता है। उसके लिए ये रोज़ का काम है। वहीं बरसाती ओढ़े एक मजदूर झट से पॉलीथीन हटाता है और जोर से कहता है—मैं मरा नहीं मैं जिंदा हूं। उफ। दम घुटने लगता है इन दृश्‍यों को देखते हुए।

अनामिका ने फिल्‍म का एक बिलकुल नया फॉर्मेट गढ़ा है। उन्‍हें बधाई। कभी कहीं ये फिल्‍म देखने मिले तो मौक़ा जाने मत दीजिएगा।
 



तरंग © 2008. Template by Dicas Blogger.

HOME