Saturday, June 23, 2018

‘बचपन के एक बाबू जी थे’- यूनुस ख़ान




कल पितृ दिवस था। भले ही बाज़ार ने इस दिन को अपनी सुविधा और मुनाफे के सरोकारों के तहत तैयार किया है
, लेकिन अगर कोई दिन इस ज़रूरी रिश्‍ते को सलाम करता है—तो हम अपने तरीक़े से इसके साथ खड़े हो सकते हैं।

सिनेमा ने पिता की बहुधा स्‍टीरियो-टाइप छबि दी है
, जिसमें वो अपने नालायक बेटे को दूर हो जा मेरी नज़रों सेवाला संवाद सुनाता है। या फिर उस पर गर्व करता है। जैसे मुग़ल-ए-आज़ममें पृथ्‍वीराज कपूर अकबर की भूमिका में—जो प्‍यार की राह में अपने शहंशाही गुरूर के साथ मौजूद हैं।

जब महेश भट्ट की फिल्‍म
डैडीको याद करता हूं- तो अनुपम खेर की एक शराबी पिता की छबि उभरती है। इस फिल्‍म में सूरज सनीम ने बेहतरीन गाना लिखा है—सपनों के घर की छत पे हैं तारे/ टॉफियों की दीवारों पर लटके गुब्‍बारे/ घर के उजियारे सो जा रे/ डैडी तेरे जागें, तू सो जा रे। इसे तलत अज़ीज़ ने गाया है। अगर आपने ये फिल्‍म नहीं देखी है और अगर आप ये सोच रहे हैं—कि ये किसी बेटे के लिए पिता का गीत है—तो आप ग़लत समझ रहे हैं। ये गाना डैडी अपनी बेटी के लिए गा रहे हैं।

अनुपम खेर की एक और पिता की छबि उभरती है—
सारांश वाले पिता वाली। इत्‍तेफाक ये है कि ये भी महेश भट्ट की ही फिल्‍म है। एक दृश्‍य जो आपको यू-ट्यूब पर भी मिल जाएगा, इसमें अपने बेटे को खो चुका एक लाचार पिता, परेशान है- जूझ रहा है कि उसकी अस्थियां उसे सौंप दी जाएं। पर दफ्तर का अपना सिस्‍टम है। जिसमें भ्रष्‍टाचार है, जिसमें देरी है, जिसमें संवेदनहीनता है। वो कहता है—एक बाप का अपने बेटे की लाश पर अधिकार है या नहीं। या उसके लिए भी हमें रिश्‍वत देनी पड़ेगी

पेशेवर हिंदी सिनेमा में पिता अमूमन बेटे या बेटी के फैसलों के खिलाफ ही खड़े नज़र आते रहे हैं। जैसे
दिल वाले दुल्‍हनिया ले जायेंगेके अमरीश पुरी। या मुहब्‍बतेंके अमिताभ बच्‍चन। भले ही अंत में उनका हृदय-परिवर्तन होता दिखाया जाता है। एक फूल दो मालीमें पिता अपने बेटे के लिए प्रेम धवन का लिखा गीत गाते हैं—मेरा नाम करेगा रोशन/ जग में मेरा राज दुलारा। इस गाने में ये आग्रह भी है कि कल जब मैं बूढ़ा हो जाऊं तो मेरा ख्‍याल रखना। मैं प्रेम की दीवानी हूंमें लड़की गाती है—पापा की परी हूं मैं’, ये हमारे बदलते हुए समाज में लड़की के प्रति मिटते भेदभाव को दिखाता है। हाल के दिनों में मैंने दंगलमें अद्भुत व्‍यंग्‍य-गीत देखा—बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है। ये पिता....अपनी बेटियों को पहलवान बनाने के लिए समाज से टक्‍कर लेता है।

सीक्रेट सुपरस्‍टार फिल्‍म में तो पिता का इतना खूंखार रूप देखने को मिलता है—कि आपको उससे नफरत होने लगती है। आज पितृ दिवस पर वो गुलज़ार का वो गीत भी याद आ रहा है—बचपन के एक बाबूजी थे/ अच्‍छे सच्‍चे बाबूजी थे/ दोनों का सुंदर था संगम। बताईये, आप अपने पिता को याद करके कौन-सा गाना गुनगुनाते हैं।

Tuesday, June 12, 2018

ये कहानी है दिए की और तूफान की- यूनुस ख़ान


मैंने लोकमत समाचार में सिनेमा पर अपना कॉलम शुरू किया है। ये है उसकी ताज़ा कड़ी। जो 11 जून को प्रकाशित हुई है। 



ईरान कई मामलों में मुझे भारत जैसा लगता है। खासकर उनका समाज।
 यही वजह है कि ईरानी फिल्‍में अपनी-सी लगती हैं। भारत में विश्‍व सिनेमा के कद्रदानों के बीच उनकी लोकप्रियता का कारण भी यही है। ईरान ने कई विश्‍व-स्‍तरीय फिल्‍मकार दिये हैं जो अपने देश की अस्थिरता और बंदिशों के बीच भी अपनी तरह का सिनेमा बनाते और उसे दुनिया में पहुंचाते रहे हैं। अब्‍बास किरोस्‍तामी, ज़फर पनाही, असग़र फरहादी, मोहसिन मख़मलबाफ़, समीरा मख़मलबाफ़, तहमीन मिलानी, शाहाब हुसैनी, बहमान ग़ोदादी जैसे फिल्‍मकारों की एक लंबी फेहरिस्‍त है, जिनकी फिल्‍में देखना एक अद्भुत अनुभव होता है। 

ईरानी सिनेमा में संघर्ष करती औरतें हैं। कभी शोषण करते तो कभी बेचारे मर्द हैं। जंग है, अभाव हैं। आधुनिक जीवन के तनाव और दबाव हैं। कट्टरता है। वो सब है जो हमारे देश में है। और इसलिए ईरानी जीवन हमें अपना-सा लगता है। हो सकता है कि पश्चिम उसे अचंभे की तरह देखता हो पर बीते चार दशकों में जितनी तेज़ी से ईरानी सिनेमा ने दुनिया भर में फिल्‍म समारोहों और पुरस्कारों में अपना असर दिखाया है, वो बहुत कुछ साबित करता है।

बीते बरस मशहूर ईरानी फिल्‍म निर्देशक माजिद मजीदी ने भारत में एक फिल्‍म बनाई। भारतीय कलाकारों के साथ। हिंदी में। और ऐसा पहली बार हुआ। beyond the clouds” कई वजहों से सिनेमा के इतिहास में याद रखी जायेगी।  ईशान खट्टर और मालविका मोहनन इस फिल्‍म के सितारे हैं। बेमिसाल निर्देशक गौतम घोष ने भी इस फिल्‍म में अभिनय किया है। कहानी मुंबई के इर्दगिर्द बुनी गयी है। फिल्‍म को मिला जुला रिस्‍पॉन्‍स मिला है। कई लोगों ने इसकी बहुत ज्‍यादा तारीफ की। कुछ आलोचनाएं भी सामने आईं।

माजिद मजीदी इससे पहले मुहम्‍मद, सॉन्‍ग ऑफ स्‍पैरोज़, द विलो ट्री, बरान, द कलर ऑफ पैराडाइज़, चिल्‍ड्रन ऑफ हैवन जैसी नायाब फिल्‍में बना चुके हैं। और सारी दुनिया में सराहे जा चुके हैं। उनकी फिल्‍में खोज-खोजकर देखी जाती हैं। 

एक तरफ माजिद मजीदी का सिनेमा है, दूसरी तरफ भारत का पेशेवर सिनेमा है और उसी के बीच लगातार आ रही हैं हॉलीवुड के फ्रैंचाईज़ वाली फिल्‍में। इस बरस हॉलीवुड की जो विशाल फिल्‍में रिलीज़ हुई हैं उनमें ब्‍लैक पैंथर और avengers infinity war प्रमुख हैं। हाल ही में जुरासिक वर्ल्‍ड: फॉलन किंगडम आई है। इसके बाद Incredibles 2 और मिशन इंपॉसिबल 6 जल्‍दी रिलीज को तैयार हैं।

avengers infinity war  हॉलीवुड के मार्वल कॉमिक्‍स और स्‍टूडियो का ये फ्रेंचाइज़ पूंजीवादी सिनेमा की ऊँचाई है। तकरीबन 2008 में फिल्‍म आइरन मैनसे एवेन्‍जर्स ने अपनी यात्रा शुरू की। अब तक इस सीरीज़ में कुल 19 फिल्‍में आई हैं। और ये होमवर्क कभी करना चाहिए कि इनकी लागत कितनी थी और सारी दुनिया में इन फिल्‍मों ने कितनी कमाई की। स्‍पाइडरमैन द होमकमिंगकी दुनिया भर में कमाई थी 880 मिलियन डॉलर। इंटरनेट से मैंने हिसाब लगाया तो रूपयों में आज के मूल्‍य के हिसाब से कमाई बैठती है इतनी 58,62,56,00,000.00. ये तकरीबन 58 अरब की कमाई है। एक फिल्‍म की। 

बस अंदाजा लगा लीजिए कि हम जो सीक्रेट सुपरस्‍टारकी एक हजार करोड़ की कमाई से कूदते फिरते हैंइस महा विराट सिनेमा के सामने कित्‍ते से हैं। बीते बरस आई ब्‍लैक पैंथरकी कुल कमाई थी 8,84,71,36,00,00,000.00 रूपए।
इससे आगे मुझे कुछ नहीं कहना है।

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