Sunday, September 16, 2018

ऐ नरगिस-ए-मस्‍ताना...हसरत की पुण्‍यतिथि पर।



आज है सत्रह सितंबर। गीतकार हसरत जयपुरी सन 1999 में आज ही के दिन इस असार संसार को अलविदा कह दिया था। हसरत जयपुरी ने अपने तईं गीतकारी की दुनिया को बहुत बदला था।


ये बात तकरीबन 1947-48 की है। उन दिनों राजकपूर अपनी दूसरी फिल्‍म बरसातके लिए गीतकार की तलाश में थे। और पृथ्‍वी जी ने एक नौजवान शायर को यहां राज से मिलने बुलवाया था। ये शायर थे हसरत जयपुरी। आपको बता दें कि ये वो दिन थे जब हसरत को मुंबई में बतौर बस-कंडक्‍टर नौकरी करते सात-आठ बरस हो गए थे। शंकर-जयकिशन के लिए हसरत ने बरसातका जो पहला गीत लिखा वो था—‘जिया बेक़रार है

हसरत हिंदी फिल्‍मों के रूमानी गीतों के सुल्‍तान थे। बचपन में उन्‍हें अपने मुहल्‍ले की एक लड़की राधा से प्रेम हो गया था। मज़हब की दीवार थी। राधा की शादी कहीं और कर दी गयी। और हसरत ने लिखा
—‘दिल के झरोखों में तुझको बिठाकर...रख लूंगा मैं दिल के पास...मत हो मेरी जां उदास। हसरत जिंदगी भर मुहब्‍बतों की दास्‍तां को गीतों की शक्‍ल में ढालते रहे। एक ज़माने में उन्‍होंने राधा के नाम लिखा था—‘ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज़ ना होना। उनका ये पैग़ाम उनकी डायरी में ही दबा रह गया था। बाद में राजकपूर के बेमिसाल फिल्‍म संगममें इसे इस्‍तेमाल किया गया।

मैं अपने रेडियो-कार्यक्रमों में भी हसरत को शिद्दत से की गई मुहब्‍बतों के शायरकहता हूं। आईये उनके कुछ बेहद रूमानी गानों की बातें करें—‘आ जा रे आ ज़रा’ (फिल्‍म लव इन टोकिया’ 1966)इस गाने में वो लिखते हैं—‘देख फिजां में रंग भरा है/मेरे जिगर का ज़ख्‍़म हरा है/सीने से मेरे सिर को लगा दे/ हाथ में तेरे दिल की दवा है। फिल्‍म सुहागन’(सन 1964) का ये गाना याद कीजिए—‘तू मेरे सामने है/ तेरी ज़ुल्‍फ़ें हैं खुलीं/ तेरा आंचल है ढला/ मैं भला होश में कैसे रहूंमदनमोहन-मोहम्‍मद रफ़ी और हसरत का ख़ूबसूरत और दुर्लभ संगम है ये। और अफ़सोस का ये गाना—‘आंसू भरी हैं ये जीवन की राहें/ कोई उनसे कह दे/ हमें भूल जाएं’ (फिल्‍म परवरिश सन 1958).

हसरत फिल्‍मी-गानों में कमाल के लफ्ज़ और ग़ज़ब की मिसालें लेकर आए। जैसे ऐ नरगिस-ए-मस्‍ताना बस इतनी शिकायत है’ ( फिल्‍म आरज़ू) नरगिस-ए-मस्‍ताना के मायने हैं मस्‍त आंखों वाली। अब ज़रा इस एक्‍सप्रेशन के देखिए जिसे हम आम जिंदगी में कितना इस्‍तेमाल करते हैं--अजी रूठकर अब कहां जाईयेगा, जहां जाईयेगा हमें पाईयेगा’ (फिल्‍म-आरज़ू)। सन 1952 में आई दिलीप कुमार वाली फिल्‍म दाग़के एक गाने में तो हसरत ने जैसे कलेजा चीरकर रख दिया है—‘चांद एक बेवा की चूड़ी की तरह टूटा हुआ/ हर सितारा बेसहारा सोच में डूबा हुआ/ ग़म के बादल एक जनाज़े की तरह ठहरे हुए/ हिचकियों के साज़ पर कहता है दिल रोता हुआ....कोई नहीं मेरा इस दुनिया में/ आशियां बरबाद है
ये वो दौर है जब गानों को गीतकार से जोड़कर नहीं देखा जाता। जब गाने गीतकार की याद नहीं दिलाते। ऐसे में जैसे हसरत आसमानों के पार से एक आवाज़ दे रहे हैं—‘तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे/ जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे/ संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे। 



लोकमत समाचार मेें सोमवार 17 सितंबर 2018 को स्‍‍‍‍तंभ 'ज़रा हटके' मेें प्रका‍शित

Monday, September 10, 2018

बदल गया है सिनेमा देखने का तरीक़ा



पिछले दिनों मित्रों से बात हो रही थी फिल्‍में देखने से जुड़ी पुरानी यादों पर। सब याद कर रहे थे कि किस तरह से फिल्‍में देखना एक समय उत्‍सव हुआ करता था। ये भी याद किया गया कि किस तरह फिल्‍मों के सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ करते थे। मध्‍यप्रदेश में अस्‍सी के दशक में सार्वजनिक गणेश उत्‍सव के दौरान प्रोजेक्‍टर लगाकर फिल्‍में दिखायी जाती थीं। और लोग उन्‍हें देखने को लालायित भी रहते थे। एक मित्र ने बहुत ही महत्‍वपूर्ण बात कही। उसका कहना था कि बाक़ी तमाम फिल्‍में कब कैसे देखीं
, हमें ये भले याद ना हो, पर जो फिल्‍में सार्वजनिक प्रदर्शन के दौरान देखीं—वो याद हैं। गणेशोत्‍सव में शोलेया डॉनदेखना या फिर स्‍कूल से जब फिल्‍में दिखाने ले जाया गया तो जागृतिया चरणदास चोरया कोई और फिल्‍म देखना।

कमाल की बात ये है कि फिल्‍में पहले की तुलना में ज़्यादा बनने लगी हैं। फिल्‍में देखने के मौक़े भी बढ़ गये हैं। सिंगल स्‍क्रीन थियेटर की जगह अब बहुधा मल्‍टीप्‍लेक्‍स ने ले ली है। पहले की तरह अब फिल्‍में के टिकिट ब्‍लैक नहीं होते। लेकिन इसके बावजूद फिल्‍में देखने का वो उत्‍साह
, फिल्‍मों का वो कौतुहल, वो ललक कम से कमतर होती चली जा रही है। आज फिल्‍में देखना उस तरह उत्‍सव नहीं रह गया है। वरना एक समय था जब दूरदर्शन के श्‍वेत-श्‍याम दौर में भी रविवार की शाम की फिल्‍म के लिए पूरा परिवार एकदम मुस्‍तैदी से तैयार रहता था। बढिया खाना पहले तैयार कर लिया जाता था। बच्‍चे अपने हिस्‍से की पढ़ाई भी पहले ही खत्‍म कर लेते थे। और फिर सब काले-सफेद रंगों में फिल्‍म बड़े चाव से देखते थे।

सवाल ये है कि अब ऐसा क्‍या बदल गया है। जहां तक मुझे लगता है, सूचना की तेज़ आंधी ने फिल्‍मों के बारे में ज़रूरत से ज्‍यादा जानकारियां हम तक लाना शुरू कर दी है। एक माध्‍यम के रूप में सिनेमा से जुड़ा जो कौतुहल का तत्‍व था—उसे छोटे परदे पर चौबीस घंटे चलने वाले मूवी चैनल्स ने ख़त्‍म कर दिया है। इसके अलावा अब ये भी है कि पायरेटेड वीडियो का एक लंबा दौर आया है। जब उधर फिल्‍म रिलीज़ हुई—इधर लोगों के पास उसका वीडियो आया। मल्‍टीप्‍लेक्‍स में फिल्‍में देखना महंगा होता चला गया, बहुधा मध्‍यवर्ग के ‍लिए उसका खर्च उठाना भी मुश्किल हुआ है। सिनेमा देखने के वैकल्‍पिक साधन भी आते चले गये हैं। अकसर चैनल्‍स पर कुछ महीने बाद बीतों दिनों की हिट फिल्‍म दिखा दी जाती है।

इसके अलावा एक और बड़ा बदलाव टीवी और सिनेमा देखने के हमारे तरीक़े में आया है। वो है स्‍मार्ट टीवी का आना। या एप्‍लीकेशन के ज़रिये सिनेमा देखने का इंतज़ाम। अब अमेजन प्राइम
, नेट फ्लिक्‍स, ऑल्‍ट बालाजी, इरोज़ नाउ, जियो सिनेमा, हॉट-स्‍टार, स्‍पूल जैसे एक दर्जन एप्‍लीकेशन मौजूद हैं। इनमें से कुछ मुफ्त हैं जबकि कुछ के लिए आपको सालाना या प्रति फिल्‍म पैसे चुकाने पड़ सकते हैं। जो ज्‍यादा टेक्‍नो पीढ़ी है वो कोडी जैसे ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर की मदद लेती है और स्‍ट्रीमिंग के ज़रिए चलते फिरते फिल्‍में देखती है। मुंबई या अन्‍य शहरों में चारों तरफ देखिए, नई पीढ़ी कानों में हेडफोन लगाए मोबाइल पर फिल्‍में देखती पायी जायेगी। बदल गया है हमारे समय का सिनेमा देखने का तरीक़ा।   


लोकमत समाचार मेंं बीते सोमवार 3 सितंबर 2018 को कॉलम 'ज़रा हटके' में प्रकाशित। 

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