Wednesday, January 16, 2008

चरखी, चस्‍का और चूना

आज मन कर रहा है कि पतंगबाज़ी से जुड़ी अपनी यादें बांटी जाएं ।

मकरसंक्रांति पर मुंबई का आसमान पतंगों से गुलज़ार है । और मुझे बचपन के दिन याद आ रहे हैं । मेरा पैतृक गांव है हिन्‍डोरिया, जो दमोह से एक घंटे के रास्‍ते पर है । कहते हैं कि मशहूर चित्रकार सैयद हैदर रज़ा हमारे गांव के रास्‍ते में पड़ने वाले अमखेड़ा के रहने वाले थे । वो या उनके पुरखे । सच क्‍या है मालिक जाने या उसके 'रज़ा' जानें । ख़ैर तो पतंग को देखकर हमें याद आ गये बचपन वाले दिन । दरअसल भोपाल में बचपन बीतने की वजह से पतंग से 'नाता' तो बचपन से ही रहा था । पर अपन कुछ ज्‍यादा ही शरीफ़ किस्‍म के थे, इसलिए पतंगबाज़ी के दुस्‍साहसों से ज्‍यादा नहीं गुज़रते थे । पर जब गर्मियों की छुट्टियों में दमोह और हिन्‍डोरिया जाना होता तो वहां पतंगबाज़ी का बुंदेली रंग देखने को मिलता और हम पतंगबाज़ी के समंदर में डुबकी नहीं लगाते थे बल्कि दूर-दूर से ही उसके मज़े लिया करते थे । 

                                                                   kites

बहुत बचपन की यादों में हिन्‍डोरिया की यादें भी हैं, छोटा-सा गांव हिन्‍डोरिया, जहां गर्मियों की छुट्टियों में चाचा पतंग उड़ाते और हमसे चरखी पकड़वाते । बहुत छोटी रही होगी तब उम्र । शायद पांच छह साल । चाचा पतंगबाज़ी में दौड़ाते बहुत थे । जैसे चलो पतंग छोड़ कर आओ । या फिर जब घिर्री पकड़ते तो अकसर होता ये कि उनको दनादन ढील चाहिए पड़ती । वो डोर को हल्‍के हाथों से पकड़े रहते और मेरे हाथों में मौजूद घिर्री सायकिल के पहिए की तेज़ी से ढील छोड़ रही होती । और पतंग हिन्‍डोरिया के तालाब के ऊपर आसमान में परवाज़ कर रही होती । नज़ारा शानदार होता था अपने लिये । लेकिन हाथ में घिर्री का तेज़ घूमना हाथों पर बड़ा भारी गुज़रता था । मुझे ये भी दमोह और हिन्‍डोरिया में मैंने जीवन में पहली बार 'मांझा' बनते देखा था । चाचा ने कांच की कुछ बोतलें जमा कीं, लेई तैयार की, कांच पीसा गया और फिर एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक सफेद 'सद्दी'  को बांधा गया, अब इसके ऊपर मांझे का लेप चढ़ाया गया । ये सब बड़ी तन्‍मयता का काम होता था और चाचा के मित्र भी इसमें सहयोग करते । ठेठ बुंदेली में बातें करते और मुझ पर इसलिए हंसते कि ना तो अपन को पतंग बनाते आता है, ना मांझा बनाते और ना ही बुंदेली बोलते । हिन्‍डोरिया के उन ग्रामीण युवकों को लगता कि इन शहरी बच्‍चों का जीवन भी कोई जीवन है । अरे पांच साल के हो गये, मांझा बनाते नहीं आता, कमाल है ।

 

ख़ैर आगे चलकर हमने पतंग उड़ाना तो सीख लिया लेकिन पतंग या मांझा तैयार करने का काम कभी नहीं किया । शहरी बच्‍चों की तरह बाजा़र से पतंग लाते रहे और कन्‍नी बांधकर उसे उड़ाते रहे । बस । लेकिन भोपाल में पतंगबाज़ी का मज़ेदार रंग देखने को मिला । जिस भोपाल में मेरी परवरिश हुई वो आज के भोपाल जैसा नहीं था । उसमें ख़ालिस भोपाली रंग था । बड़े बड़े दरवाजों वाले हवेलीनुमा मकान, परदेदार औरतें, और पतंग के शौकीन लोग । ठहरी ठहरी सी जिंदगी । आज जैसी रफ्तार नहीं थी तब । ये गैस त्रासदी से कुछ सालों पहले की बात है । बहरहाल....भोपाल की पतंगबाज़ी में दिलचस्‍प ये था कि यहां पतंग केवल बच्‍चों, किशोरों या युवकों तक सीमित नहीं थी । यहां तो बुजुर्गवार भी पतंग उड़ाया करते थे । और वो भी कैसे । शर्तें लगाकर । मैदान में पतंगबाज़ी चल रही है । दो बुजुर्गवारों का मुक़ाबला हो रहा है । बाक़ी तमाशबीन हैं । छोटे बच्‍चे ज़रा इधर उधर के कोने पकड़कर अपनी पतंगें उड़ा रहे हैं । नौजवान दो ख़ेमों में बंट गये हैं । किसी शातिर पतंगबाज़ नौजवान ने घिर्री संभाल ली है । आंख के इशारे समझकर चरखी को संभाल रहा है । ये चरखी टू इन वन है । जी हां बीच बीच में जो चूने का चस्‍का बुजुर्गवार ले रहे हैं, वो भी तो इसी चरखी पर एक सिरे पर लगा हुआ है । जैसे ही 'मियां' को टेन्‍शन होता है, वो चूना कैसे खाते हैं ज़रा देखिए---नज़रें.........पतंग पर, हाथ सधे हुए, डोरी को संभाल रहे हैं......पेंच लड़ाने के बीच के राहत के एक दो सेकेन्‍ड हैं ये । मियां जी ने बिना देखे अपने बांये हाथ को थोड़ा फैलाया, चरखी पकड़े 'जमूरे' की समझ में आ गयी, उसने चूने वाला सिरा थोड़ा आगे कर दिया । मियां जी ने टटोलते हुए चूना चरखील से निकाला........अरे कमबखत पेंच लड़ा रहा है....दोनों हाथों डोरी पर......अंगूठे में चूना लगा है.....मियां जी ने डोरी से वैसे ही पेंच लड़ाए जैसे एक माहिर ट्रक ड्रायवर रफ्तार में ट्रक मोड़ता है । और फिर सामने वाली की पतंग को 'वो काटा'......और चूने को वो चखा........जिस बात को कहने में इतने सारे वाक्‍य का स्‍क्रीनप्‍ले लग गया.......उसमें महज़ चार पांच सेकेन्‍ड लगते थे । कहने का मतलब ये है कि 'बन्‍ने ख़ां भोपाली' पेंच लड़ाते हुए भी चूना चखने का मौक़ा निकाल लेते थे । यहां थोड़ा विषयांतर करते हुए बता दूं कि 'हॉकी का मक्‍का' कहे जाने वाले भोपाल में उस दौर के हॉकी के खिलाड़ी भी अपनी हॉकी पर थोड़ा 'चूना'  चिपकाए रहते थे । और ड्रिबल करते हुए बीच में चूना चख लेते थे । यानी ये चूना चखा, ये आगे बढ़े, चार पांच खिलाडि़यों को चकमा दिया, डी में घुसे और ये गोल.....और ये चूना......।

                                                              250px-Lahore_Basant_Festival[1]

उन दिनों के भोपाल में 'पेंच लड़ाते हुए'  हार जाने का मतलब था शान पर दाग़ लग जाना । पतंगबाज़ी का एक रंग होता है पतंग लूटना । बड़े बड़े छकड़े बनाए जाते हैं और फिर पेंचों पर नज़र रखते हुए कटी हुई पतंग को लूटने की जंग लड़ी जाती है । आमतौर पर लूटने का ये काम बच्‍चे और किशोर ही करते हैं । यही है वो रंग जिसकी वजह से हादसे भी होते हैं । मैंने अकसर देखा है कि लूटी हुई पतंग लेकर भाई लोग यूं लौटते हैं मानो पुराने ज़माने के आक्रमणकारी किसी देश को लूटकर लौट रहे हों । पचास पैसे की पतंग और दुनिया भर की जंग । आज भी पतंग लूटने के रहते हादसे होते रहते हैं । हम तो यही कामना करते हैं कि पतंग लूटने की जंग में कोई अपनी जान ना गंवाए । मकर संक्रांति के बहाने देखिए ना पतंगबाज़ी की कितनी कितनी बातें याद आ गयीं ।

5 टिप्‍पणियां :

Lavanyam - Antarman said...

वाह क्या वाक़या सुनाया है ...मज़ा आ गया !:)

और अपना देस, जोरों से याद आ गया ..चूंकि अपने यहाँ तो बर्फ ही बर्फ फ़ैली है ! :(

annapurna said...

यहां तो आसमान सूना सा लगा।

आपका चिट्ठा पर कर हमें भी बचपन याद आ गया और याद आ गए पतंगों के नाम - जीबा जो सबसे अच्छी मानी जाती और इसे बहुत उड़ाया जाता, और भी नाम है - दुल्हन जो गहरी गुलाबी या लाल रंग की होती और किनारीदार होती, अद्दा जो सबसे बड़े आकार की पतंग होती, चिन्नी जो सनसे छोटी पतंग होती और हल्का अंधेरा होने पर उड़ायी जाती लालटेन की पतंग जो पतंग में छोटी सी मोमबत्ती जोड़ कर उड़ायी जाती।

Dard Hindustani (पंकज अवधिया) said...

मजा आ गया। इस बार आप घर जाये तो बचपन वाला एलबम ले आये और कुछ तस्वीरे ऐसी पोस्ट के साथ डाले। मुझे लगता है कि छोटे युनुस के साथ इसे पढने मे ज्यादा आनन्द आयेगा। :)

Kakesh said...

आपका यह ब्लॉग काफी अच्छा लग रहा है. सारी पोस्ट पढ़ रहा हूँ ..हाँ टिप्पणीयाँ सब में नहीं दे पा रहा. आप ऎसे ही लिखते रहें..मजा आ गया.. ऎसी कई यादें हमारी भी हैं कभी लिखेंगे.

जोशिम said...

लग्गी लगाने के दिन कहाँ? (गुरू यहाँ पानी ही पानी खिचडी के दिन) - हम लोग तो मंझा बनने के लिए पुराने फ्यूज़ बल्ब सहेजते थे जिन्हें घोर एहतियात से कपड़े में लपेट के फोड़ा जाता था; लेई में मिलाने के लिए स्याही की चुराई बोतलों का कत्ले-आम भी होता था - मुर्गा चाप सद्धी सजाने को - पर पतंग बाजी जयपुर की भी ज़ोरदार होती है - मनीष

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