Friday, November 28, 2008

एक कल्‍चरल मिक्‍स है लोकल-स्‍टेशन का बुकस्टॉल । कुछ तस्‍वीरें-कुछ बातें ।

मुंबई एक साथ कई स्‍तरों पर जीने वाला शहर है । ये ना केवल एक cuultural mix है, एक melting pot है बल्कि आपाधापी और कोलाहल से भरी एक भयावह भगदड़ भी है । ऐसे ही किसी दिन पिछले सप्‍ताह हम 'कहीं' से 'कहीं' पहुंचने के लिए लोकल-ट्रेन के प्‍लेटफॉर्म पर ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे । आदतन बुक-स्‍टॉल में पहुंचे, ताकि बोझिल-सफ़र को हल्‍का करने के लिए कुछ सांध्‍य-कालीन अख़बार ( जो अब सुबह से शाम तक मिलते हैं, फिर भी सांध्‍यकालीन हैं ) और कुछ पत्रिकाएं ख़रीद ली जाएं । काफी समय से मन में था कि स्‍टॉल की तस्‍वीरें आप तक पहुंचाई जाएं और बताया जाये कि किस तरह लोकल-स्‍टेशन का एक बुक-स्‍टॉल किस तरह मुंबई के कल्‍चरल-मिक्‍स की मिसाल है । तो चलिए बुक-स्‍टॉल के 'मायाजाल' से होकर गुज़रें ।

शिखंडी, डेढ़ पसली का रावण, मेरी बीवी झांसी की रानी, कब मरेगा रावण, 24 कैरेट ऑपरेशन । केशव पंडित, ओमप्रकाश शर्मा और अन्‍य भारतीय बेस्‍ट-सेलर्स । चालीस रूपये की भारी-भरकम लुगदी ।

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लुगदी के कुछ और रूप । टाइटल देखिए---ख़बरी, अनहोनी, वकीलों की जंग, पिशाच मठ, अघोरी ।

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ये टाइटल देखिए । सब साले चोर हैं । दूध ना बख्शूंगी । एक और इंकलाब । यहां आपको प्रेमचंद और टैगोर भी नहीं मिलेंगे । जो ए.एच.व्‍हीलर पर होते ही हैं ।

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इस पंक्ति में एक तरफ आपको गुजराती पत्रिकाएं नज़र आयेंगी । दूसरी तरफ ओशो टाइम्‍स, जागृत इंडिया, योग संदेश, आउटलुक प्रॉफिट, इंडिया टुडे, तहलका, क्राइम रिपोर्टर और साइंस टुडे जैसी पत्रिकाएं सजी नज़र आयेंगी । ज़ाहिर है कि सजी हैं तो इसका मतलब है इनकी डिमांड है ।

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ये तस्‍वीर इस शहर के संतुलन का संकेत है । एक तरफ 'सामना' और उसके ठीक बगल में मनी टुडे, बिज़नेस मैनेजमैन्‍ट, बिज़नेस वर्ल्‍ड, कॉरपोरेट इंडिया, बिज़नेस टुडे वग़ैरह ।

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मराठी टेबुलॉइड ।

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बिज़नेस के अखबार । जो 'नवभारत टाइम्‍स' से कई गुना ज्‍यादा बिकते हैं । नवभारत टाइम्‍स मुंबई का इकलौता 'बड़ा' हिंदी अखबार है ।

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मराठी पत्रिकाएं । गृहशोभा का दीपावली विशेषांक अभी तक डटा है । साथ में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी वाली पत्रिकाएं ।  

 

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और ये 'रोजगार सूचनाएं' भी होती हैं बुक स्‍टॉलों का हिस्‍सा ।

 

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केवल चर्चगेट के ए एच व्‍हीलर वाले बुक स्‍टॉल को छोड़ दें तो बाकी जगह आपको कोई भी साहित्यिक-पत्रिका नहीं मिलेगी । पता नहीं ये मांग का दबाव है या फिर कोई और वजह कि चर्चगेट के प्‍लेटफार्म पर अब 'कथादेश', 'हंस', 'ज्ञानोदय' वग़ैरह मिल जाती हैं । पर जितनी तेज़ी से आती हैं उतनी ही तेज़ी से ग़ायब भी हो जाती हैं । इन तस्‍वीरों से आपको अंदाज़ा लग जायेगा कि मुंबई क्‍या खरीद रहा है और क्‍या पढ़ रहा है । आप बताईये आपका शहर क्‍या पढ़ रहा है ।

4 टिप्‍पणियां :

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

एक ओम प्रकाश शर्मा थे जासूसी उपन्यास लेखक लेकिन उन्ही ने एक और ताजमहल उपन्यास लिखा था नजीर अकबराबादी पर और बहुत से दूसरे उपन्यास भी। उन के जासूसी उपन्यास भी सामाजिक होते थे और उन के पात्र भी। फिर इतने नकली ओमंप्रकाश शर्मा उग आए कि उन्हें अपने नाम के आगे जनप्रिय शब्द लगाना पड़ा। आज शायद लोग उन्हें भूल चुके हैं। लेकिन इस फुटपाथी साहित्य में उन का स्थान वहाँ से है जहाँ से दुनियां के श्रेष्ठ साहित्य से जुड़ाव शुरू होता है।

Pramod Singh said...

हूं. अच्‍छा है.

Gyan Dutt Pandey said...

पुरानी याद दिला दी - जब भी बम्बई जाता था तो इन स्टॉल्स पर ठिठकना मानो धर्म का हिस्सा था!

anitakumar said...

मेरा शहर तो वही पढ़ रहा है जो आप बता रहे हैं …।:)

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