Tuesday, November 4, 2008

रज़्ज़ाक मियां 'रिकॉर्ड वाले' 'किताब-महल' डॉ. डी.एन.रोड फोर्ट मुंबई 400 001

किसी वजह से दो तीन दिन पहले जब चर्चगेट के इलाक़े में जाना पड़ा तो मन नहीं माना कि यूं ही लौट जाएं । दरअसल बरसों-बरस विविध-भारती के स्‍टूडियोज़ इसी इलाक़े में रहे हैं और बरसों-बरस हमने चर्चगेट और फोर्ट के इलाक़ों में मटरगश्‍ती की है । इस इलाक़े में पैदल घूमने के बड़े मज़े हैं । हर बार शहर का एक नया चेहरा नज़र आ जाता है ।

 

हालांकि आजकल जब चर्चगेट से फ्लोरा फाउंटेन की तरफ़ बढ़ें तोbooks bazaar अनायास वो किताबें बेचने वाले याद आ जाते हैं जो टेलीग्राफ़ ऑफिस की पुरातन इमारत के सामने से लेकर फ्लोरा फाउंटेन के चौराहे तक और फिर सड़क के उस पार वी.एस.एन.एल की इमारत के फुटपाथ वाले आखिरी हिस्‍‍से तक पर जमे रहते थे । अब वो नदारद हैं । हो सकता है कि कहीं रेडिमेड कपड़े बेच रहे हों-फैशन स्‍ट्रीट पर । दरअसल मुंबई की महानगर पालिका ने समझा कि पुस्‍तकों का ये बाज़ार निहायत ही बदसूरत है । शहर की सड़क पर चलने वालों के लिए दिक्‍कत है । इसकी क्‍या ज़रूरत है । और बस इस अतिक्रमण को एक झटके में साफ कर दिया गया । और बरसों से जो अड्डा था पुरानी अनुपलब्‍ध किताबों को खोजने का....वो वीरान हो गया ।

 

                         book bazar 1

books bazar 1

( ऊपर के दोनों चित्र फ्लिकर से साभार )

 

इस इलाक़े से आहें भरते हुए आगे बढ़े तो रज्‍़ज़ाक मियां की दुकान नज़र आ गई जो नवसारी बिल्डिंग के क़रीब 'किताब महल' नामक

.... विलायत खां साहब के रिकॉर्ड का कवर भी फोर्ट की सैकड़ों बरस पुरानी इमारत के अहाते में पत्‍थर पर ठुंकी कील से लटकता नज़र आयेगा ।

इमारत के अहाते में है । अगर तफ़सील से कहें तो ये वो सड़क है जो चर्चगेट से वी.टी. ( सॉरी सॉरी CST यानी छत्रपति शिवाजी टर्मिनस ) की ओर जाती है और जिसे फोर्ट कहा जाता है, वैसे सरकारी तौर पर इस सड़क को क्‍या कहा जाता है, हमें याद नहीं  था, पर रज़्ज़ाक मियां के कार्ड को देखकर याद आया कि ये तो डॉ. डी.एन.रोड है । जब से हम इस शहर में हैं रज़्ज़ाक मियां की इस दुकान से हमारा आमना सामना होता रहा है । और सिर्फ देखने दिखाने के लिए नहीं बल्कि कुछ दुर्लभ कैसेट्स भी ख़रीदें है अपन ने रज़्ज़ाक की दुकान से । वो भी उस ज़माने में जब कैसेट्स की पूछ-परख कम हो चुकी थी । इनमें से ज्‍यादातर वेस्‍टर्न इंस्‍ट्रूमेन्‍टल्‍स हैं । कुछ बंट गए यार-दोस्‍तों में ।

 

लेकिन इस बार जब रज़्ज़ाक मियां की दुकान पर खड़े हुए तो कुछ ख़रीदने का इरादा नहीं था । बस तस्‍वीरें लेनी थीं और कुछ बातें करनी थीं । रज़्ज़ाक मियां कहते हैं कि आज के ज़माने में भी रिकॉर्डों, पुराने डाक-टिकिटों और पोस्‍ट-कार्डों का संग्रह करने वालों की कमी नहीं है । कई बार रिकॉर्डों के नाम उनके लिखवा दिये जाते हैं, जिनकी खोज-बीन का सिलसिला जारी रहता है । दूसरे शहरों से भी दीवाने अपनी तलाश का सिर पकड़कर यहां तक चले आते हैं । रज़्ज़ाक मियां फोर्ट के इलाक़े में भले ही रिकॉर्ड बेचने वाले अकेले दुकानदार हों पर बंबई में ऐसे और भी ठिकाने हैं । और यहां ऐसे बेशक़ीमती नगीने आपके हाथ लग सकते हैं, जिनकी तलाश आपको बरसों बरस से रही होगी ।

 

मैं आपको बता दूं कि पुराने रिकॉर्ड प्‍लेयर्स भी बाज़ार में बड़ी तादाद में उपलब्‍ध रहते हैं । ख़ासकर चोर-बाज़ार में । इसके अलावा एक बड़ी ज़रूरत रिकॉर्ड कलेक्‍टर्स को रहती है स्‍टाइलस की । यानी उस सुई की, जिसके ज़रिये रिकॉर्ड 'बजते' हैं  । ये सारी चीज़ें इस तरह के ओने-कोने की दुकानों, फुटपाथों या गुमठियों पर बिक रही हैं । जबलपुर के गुरंदी मार्केट में मैंने कई कई बार पुरानी फिल्‍मों के रिकॉर्ड बिकते देखे । एल.पी.भी और ई.पी. भी ।

 

बहरहाल..रज़्ज़ाक मियां की दुकान पर जहां 'नैट किंग कोल', मौजूद हैं तो दूसरी तरफ़ 'बड़े गुलाम अली खां' भी हैं । शिव-हरि की जोड़ी की जुगलबंदी के पुराने हसीन रिकॉर्ड भी यहां मिलेंगे तो विलायत खां साहब के रिकॉर्ड का कवर भी फोर्ट की सैकड़ों बरस पुरानी इमारत के अहाते में पत्‍थर पर ठुंकी कील से लटकता नज़र आयेगा । और हिंदी की पुरानी फिल्‍मों के ऐसे ऐसे रिकॉर्ड कि आप अश अश कर उठें । अपने मोबाइल से खींचीं गयीं तस्‍वीरें पेश हैं रज़्ज़ाक साहब की दुकान की । साथ ही उनके विजिटिंग कार्ड को स्‍कैन करके पेश किया जा रहा है ताकि कभी ज़रूरत हो तो आपमें से कोई संपर्क कर सके । हां यहां रज़्ज़ाक़ मियां जैसे लोग तभी तक जिंदा है जब तक शहर को शंघाई बनाने वाली ताक़तों को बदसूरत नहीं लग रहे हैं । हो सकता है कि किसी दिन बुक-ज़ोन की तरह इनको भी खदेड़ दिया जाये ।

 

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        record collector

 

वैसे चलते-चलते ये बात भी बता दूं कि ख़ास तौर पर ये पोस्‍ट बैंगलोर के हमारे मित्र शिरीष कोयल की नज़र है । जो साहिर लुधियानवी के शुरूआत से लेकर आखिर तक सारे गाने जमा कर रहे हैं । साहिर के कुछ अनमोल गाने अभी तक उनकी पहुंच से बाहर हैं । आप उनकी मदद कर सकें तो अच्‍छा है ।

4 टिप्‍पणियां :

मीत said...

बहुत अच्छी पोस्ट युनुस भाई.

साहिर का नाम सुन के रहा नहीं गया ... मेरे भी वो सबसे पसंदीदा शायर / गीतकार हैं .... कुछ गाने जो नहीं मिले हैं अब तक शिरीष जी को उनकी एक लिस्ट कहीं से जुगाड़ करें ... शायद हम पढने वालों के पास से खुछ निकल आए.

PD said...

युनुस जी, आज आपकी निगाहों से मुंबई के इलाकों को घूम आये हैं.. एक बार मुंबई आने दिजिये, फिर आपके साथ घूमेंगे.. :)

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बहुत खुशी हुई रज़्ज़ाक मियाँ की दुकान के बारे मेँ पढकर और चित्रोँ को देखकर
"साहिर " साह्'ब के गीत सदा जहन मेँ गूँजते रहेँगेँ --
पुरानी दुकाने बहुत महत्त्वपूर्ण काम करतीँ हैँ -
फोर्ट और चर्चगेट का इलाका याद आ गया और मुम्बई भी !!
बहुत स्नेह के साथ ,
- लावण्या

Harshad Jangla said...

यूनुसभाई
अति रोचक और महत्वपूर्ण लेख | मै बम्बई में पचास से अधिक साल रहा हूँ और यह इलाका कई बार छान मारा है | फुटपाथ से कई बार पुस्तकें खरीदी है | आज का maahol तो कुछ बदल सा गया है |
धन्यवाद |
-हर्षद जांगला
एटलांटा , युएसए

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