Saturday, June 14, 2008

टी बैग के सौ साल और मुंबई की चाय के अलग अलग स्‍वाद

जी हां टी-बैग का इस्‍तेमाल होते हुए सौ बरस पूरे हो गये । दिलचस्‍प बात ये हे कि ग़लती से हुआ था इसका आविष्‍कार । न्‍यूयॉर्क में थॉमस सुलिवान कॉफी बेचते थे, बढ़ती हुई क़ीमतों से परेशान थॉमस ने कॉफी की बजाय चाय बेचनी शुरू कर दी ।
जब उनके ग्राहकों को अचानक चाय की प्‍याली के साथ रेशम का एक छोटा-सा पैकेट दिया जाने लगा तो वो चक्‍कर में पड़ गए । उन्‍हें समझ में नहीं आया कि इसका किया क्‍या जाए । और ये चक्‍कर क्‍या है । बहरहाल ग्राहकों को कुछ दिन समझाना पड़ा । तब जाकर सभी को ये बात पता चल गयी । इस तरह पैसे बचाने का ये आयडिया चल निकला ।  और अमेरिका में चाय के शौकीनों ने इसे खूब आज़माया ।

 

                 teabag_used

 

सन 1930 में विलियम हरमनसन ने रेशम के कपड़े को हटाकर उसकी जगह काग़ज के पैकेट का इस्‍तेमाल शुरू किया । और बॉस्‍टन की कंपनी टेक्निकल पेपर्स कॉरपोरशन ने फाइबर पेपर के बने इस टी-बैग का पेटेन्‍ट करवा लिया ।


लेकिन टी बैग को अमेरिका से यूरोप पहुंचने में लग गयी आधी सदी  । यूरोप वालों को शुरूआत में टी बैग पसंद नहीं आया । उनका मानना था कि इस चाय  में काग़ज़ का स्‍वाद आ जाता है । बहरहाल ब्रिटेन की सबसे मशहूर टी कंपनी जोसेफ टेटली ने 1953 में इंग्‍लैन्‍ड में टी बैग्‍ा लॉन्‍च किये । साठ के दशक में केवल तीन प्रतिशत बाजा़र था टी बैग का । फिर आया टी बैग का एक नया रूप । सन 1964 में आया छिद्रयुक्‍त टी बैग । आज टेटली दो सौ मिलियन टी बैग  महज़ एक हफ्ते में बेच डालती है । इसमें छिद्रयुक्‍त इतना काग़ज होता है कि 128 फुटबॉल मैदानों को ढंका जा सकता है । आज ब्रिटेन में 130 मिलियन कप चाय पी जाती है जिसमें से छियानवे प्रतिशत चाय में टी बैग्‍स का इस्‍तेमाल होता

है ।

 

भारत के आंकड़े पता नहीं । लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आता कि हमारे देश में टी-बैग्‍स का चलन ज्‍यादा क्‍यों नहीं हो पाया ।
वैसे देखा जाये तो हमारे यहां चाय के कितने रूप हैं । हर हाथ की चाय के स्‍वाद में फ़र्क़ आ जाता है । मुंबई शहर में तो बाहर की चाय के कितने स्‍वाद हैं । जब भी चर्चगेट की ओर जाना होता है तो मैं कयानीज़ जाना नहीं भूलता । मेट्रो टॉकीज़ के सामने बना ये पारसी रेस्‍त्रां गाढ़े दूध वाली ईरानी चाय और ताजा बिस्‍किटों के लिए मशहूर है और तकरीबन सौ डेढ़ सौ सालों से बरक़रार है । अख़बारों में अकसर इसका जिक्र आता रहता है । हालांकि मुंबई में अब बहुत कम ईरान रेस्‍त्रां बचे रह गये हैं । वरना ईरानी रेस्‍त्रां हो और उसका बढि़या सा मस्‍का-पाव मिल जाये तो दिल खुश हो जाता था मुंबई वालों का ।

 

kayani rest.

 

इसके अलावा चाय का एक अलग ही स्‍वाद है खाऊ गलियों का । जिन्‍हें अब मुंबई महानगरपालिका ने अपना निशाना बनाया है । सड़कों पर ठिये लगाकर चाय बनाने वाले चाय को जमकर उबालते हैं और इसमें स्‍वाद बढ़ाने के लिए इलायची पीसकर डाल देते हैं जिससे उबली हुई काढ़े जैसी चाय थोड़ी सुहानी बन जाती है । फिर अगर आप मोहम्‍मद अली रोड या क्रॉफर्ड मार्केट जैसे इलाक़े में जाएं, तो वहां बढि़या गाढ़े दूध वाली मुसलमानी चाय मिलेगी एकदम छोटे से कप में । जिसमें नज़ाक़त की कोई जगह नहीं है । और बाक़ी नज़ाक़ती चाय तो हैं ही, जो बड़े बड़े एयर कंडीशंड रेस्‍त्राओं में मिलती है । इन जगहों पर कहीं टी बैग्‍ा का इस्‍तेमाल नहीं होता । शायद हम भारतीयों को जमकर उबाली गयी चाय पिये बिना सुकून नहीं मिलता ।

 

            tea 

चाय को लेकर आपके किस तरह के नखरे हैं ।

12 टिप्‍पणियां :

maithily said...

ओह कयानीज!
इसकी चाय और पेस्ट्री तो एकदम लाज़बाब होती थी. जब मैं मुम्बई में रहता था तो मेरे दिन की शुरूआत इसी रेस्तरां से होती थी.
और हां, इस रेस्तरां के मालिक का नाम भी अफलातून था. :)
मन तो कर रहा है एक बार फिर मुम्बई चला जाय.

डॉ. अजीत कुमार said...

शाम की मम्मी के हाथ की चाय के साथ चाय थैली की जानकारी. अच्छा लगा.

मीनाक्षी said...

हर तरह की चाय की चाहत हमें भी है...नाश्ते में पहली चाय जो खूब उबली हुई दूध वाली होती है.....ईरानी चाय की केतरी और कूरी तो हमेशा ओवेन के ऊपर तैयार रहती है....

Gyandutt Pandey said...

ट्विनिन्ग्स का टीबैग तो हमें भी बहुत प्रिय है। और पोस्ट झकाझक है!
सूचना/जानकारी के लिये आभार।

Raviratlami said...

हर एक का चक्कर चाय का अलग होता ही है. आपका भी मजेदार रहा.

बाकी, जो बाजू में रविज्ञान बीड़ी गॅजेट है वो सिर्फ और सिर्फ ज्ञान बीड़ी है. अतः उसे सुधार दें तो अच्छा रहेगा :)

Neeraj Rohilla said...

युनुसजी,
इस पोस्ट के बाद एक कप चाय मिल जाये तो मजा आ जाये :-)

टपरी पर खडे होकर चाय पीने का लुत्फ़ ही कुछ और है । एक मजेदार किस्सा सुनाते हैं । पिछली बार की भारत यात्रा के दौरान, मैं और दो अन्य मित्र दिल्ली में प्रिया सिनेमा के पास बनी एक नयी स्टाईल की चाय की दुकान में गये । चाय की दुकान क्या लूटने का साधन था, टाई लगाये बन्दा अंग्रेजी में आर्डर ले रहा था ।

मेरे एक मित्र बेपरवाही से बोले, तीन अदरक वाली चाय देना । बेचारा आर्डर लेने वाला सकपका गया, बोला "We have, masala Tea, that Tea, this Tea, blah blah blah.." मेरा दोस्त हंस दिया और बोला अदरक पता है ? उसे कूट के चाय में डालते हैं तो बढिया चाय बनती है, पिला पाओगे अदरक वाली चाय ।

आस पास वाले अब तक हमें ऐसे देख रहे थे जैसे हम लोग किसी और दुनिया से ठीक ठाक कपडे पहनकर दिल्ली में आ गये हैं :-)

खैर आखिर में हमें १०५ रूपये में तीन अदरक वाली चाय पीने को मिल ही गयी ।

RA said...

यूनुस,
स्वदेशी चाय जैसी चाय कोई है ही नहीं | भारत से आनें वालों से बस चाय लानें की फरमायश होती है विशेषकर Lopchu और नीलगिरी या हमारी पहाड़ी बेणीनाग की भुनी हुई चाय |

annapurna said...

ईरानी चाय तो यहाँ हैदराबाद में भी मिलती है इसके अलावा है -

1 बुर्केवाली चाय - इस चाय में ऊपर मलाई तैरती है

2 सुलेमानी चाय - डिकाशन और ब्लैक टी

हमें तो हल्की सादी चाय पसन्द है पर सर्दी के दिन हो तो अदरक और तुलसी की चाय।

श्रद्धा जैन said...

क्या बात है ग़लती से हुआ काम आज कल इतना प्रयोग हो रहा है
मगर सच कहते हैं आप जब तक चाय ना उबले मज़ा नहीं आता
आपका ये लेख काफ़ी जानकारी प्रद रहा

sanjay said...

महीने भर से नया कुछ नही.

PD said...

aji apna haal to kuchh aisaa hai ki "bandar kya jaane adrak ka svaad.."
ham to chaay pite hi nahi hain.. :)

arvind mishra said...

यह तो अच्छी जानकारी दी आपने !
यह भी जोड़ दूँ कि जापान में चाय पीना एक अनुष्ठान से कम नही है और अंग्रेजों को दूध की चाय ज्यादा पसंद है .इस मामले में हम भी अंग्रेजों से कम नही हैं

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