Friday, April 11, 2008

नाम है पवन, भदोही से भागकर आया हूं सर ।।

पिछले अठारह बीस दिनों से घर पर रेनोवेशन का काम चल रहा है । हम ईंट गारे और व्‍हाइट सीमेन्‍ट से सराबोर हैं । अजब-ग़ज़ब अनुभव हो रहे हैं । इस तरह के अनुभवों से गुजर चुके लोग जानते हैं कि घर के रेनोवेशन या निर्माण का काम मेंढक तौलने जैसा है, इलेक्‍ट्रीशिन का इंतज़ाम करो, तो प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस का काम करने वाला ग़ायब । उसे खोजो तो पता चला कि कडि़या कहीं और काम लगाकर बैठा है । यहां मज़दूर भेज दिया हैं वो कर रहे हैं मन-मर्जी से काम । इसी तरह के भागम-भाग और अस्‍त-व्‍यस्‍त माहौल में हुए कुछ अनोखे अनुभव में से एक है पवन से मुलाक़ात ।

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हुआ ये कि हमने एक महाशय को प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस से हॉल में सजावट का काम दिया, जिनका नाम था वसंत कुमार । उत्‍तरप्रदेश के किसी इलाक़े के होते हैं ये वसंत । जिन्‍होंने थोड़ी रकम पेशगी मांगी और ग़ायब....किसी और को भेज दिया काम करने । वो आया थोड़ा काम शुरू किया और वो भी ग़ायब । फिर हम दोनों पति-पत्‍नी ने वसंत की खूब ख़बर ली और उसे ताकीद किया कि इतने दिनों में काम ख़त्‍म होना चाहिए वरना.....। तो ये वसंत माफी़ वग़ैरह का नाटक करते हुए अपना सामान लेकर पधारे । साथ में एक लड़का था । दुबला पतला । मूंछों के बाल अब आ रहे थे । उम्र पंद्रह-सोलह साल । आते ही वसंत काम में जुट गए । पहला निर्देश दिया गया इस लड़के को कि ये तसले में प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस घोले, मुंबई की भाषा में ....घमेले में माल तैयार करे । छोटू ने जिस तरह काम शुरू किया उससे मेरी समझ में आ गया कि बच्‍चा नया है । और कुछ तो गड़बड़ है ।

उस दिन ज़रा व्‍यस्‍तता रही मटेरियल वग़ैरह ख़रीदने की । लोगों को मैनेज करने की इसलिए बालक पर ध्‍यान नहीं गया । लेकिन आज जब दोपहर को कहीं से लौटे तो पाया कि ये छोटू हॉल के बीचोंबीच कुर्सी पर मस्‍ती से बैठा है । हम भी जगह बनाकर बैठ गये । जिस कमरे में प्‍लास्‍टर ऑ‍फ पेरिस का काम हो रहा हो उसकी दुर्दशा देखने जैसी होती है, फिर सनद ये कि यहां कारपेन्‍टर भी काम कर रहा है और फर्नीचर पर पॉलिश करने वाला भी । ख़ैर सब कारीगर दोपहर की सुस्‍ती में थे तो हम बालक से गपियाने बैठ गए ।

नाम पूछा तो पता चला कि ये महाशय हैं पवन कुमार मौर्य । बातों बातों में पवन कुमार ने बताया कि जब वो पहले दिन काम पर आया था और मेरी आवाज़ सुनी थी तो पहचान गया था कि मैं विविध भारती पर यूथ एक्‍सप्रेस प्रस्‍तुत करने वाला यूनुस हूं । लेकिन हिम्‍मत नहीं हुई पूछने की । पवन ने ये भी बताया कि काम के दौरान उसे एक पोस्‍टकार्ड पड़ा नज़र आया जो विविध भारती के पते पर आया था । और उसमें मेरे बारे में कुछ लिखा था । तब तो उसे पूरा यक़ीन हो गया कि मैं वही विविध भारती वाला बंदा हूं । मैंने उसके इस संशय को दूर किया और बताया कि मैं वही हूं । तो उसने सबसे पहले हाथ मिलाया और बोला- सर आपसे मिलकर हमें बहुत खुशी हुई है । हम आपके कार्यक्रम को बहुत ध्‍यान से सुनते हैं । चूंकि इसमें सामान्‍य ज्ञान की बातें होती हैं इसलिए हम उन्‍हें नोट भी करते चलते हैं । पवन का कहना था कि उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वो हमसे इस तरह मिलेगा ।

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बहरहाल अब असली बातें शुरू हुईं । मैंने पवन से पूछा कि वो मुंबई में कब से है । तो उसने बताया कि पिछले तकरीबन एक महीने से वो यहां है । मैंने फौरन सवाल दाग़ा भागकर आए हो ना । ऊपर जो तस्‍वीर आपने देखी, ये उस सवाल के जवाब देने से पहले की उसकी तस्‍वीर है । जो मैंने अपने मोबाइल फोन से खींची है । उसने स्‍वीकार कर लिया कि वो भागकर आया है । मैंने पूछा पवन कुमार बात क्‍या है, सौतेली मां वाला मामला है या खूंखार पिता वाला या फिर प्‍यार मुहब्‍बत की कहानी है । कहीं तुम हीरो या गायक बनने तो नहीं आए हो । तो पवन मुस्‍कुराकर बोला कि नहीं साहब ऐसी बात नहीं है । हम पढ़ाई में ठीक-ठाक हैं । अच्‍छे घर के हैं । भदोही के लोहारखास गांव के हैं और पिता का नाम है श्री जल्‍लूराम मौर्या । हमारे घर में क़ालीन की फिनिशिंग का काम होता है । मैंने पूछा तो उसने बताया कि क़ालीन जब बनकर आते हैं तो उनमें काफी ग़ल‍तियां होती हैं । उसके पिता क़ालीनों की फिनिशिंग करके उन्‍हें सही रूप देते हैं । घर है अपना स्‍वयं का । आर्थिक परेशानियां भी नहीं हैं । वो विज्ञान का विद्यार्थी है, नवीं कक्षा में पढ़ता है । अगले महीने में परीक्षाएं होने वाली हैं । भदोही के कारपेट बुनकरों के विकट जीवन के बारे में पढ़ें सदासिवन की इस वेबसाइट पर

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मेरी परेशानी बढ़ती जा रही थी । मैंने उससे पूछा- अरे भई जब सब ठीक था तो भाग क्‍यूं आए । पवन ने बताया कि गांव के कुछ लड़के मुंबई घूमने आ रहे थे । उसने सोचा कि इस समय माता पिता से पूछेंगे तो अनुमति नहीं मिलेगी । इसलिए चुपके से उनके साथ हो लिया । सीधे बोरीवली पहुंचा । जो साथ में आए लड़के थे, वो गांजा-भांग पीने लगे । पवन को कुछ ठीक नहीं लगा । वो मायानगरी मुंबई में यहां-वहां भटकने लगा । मुंबई के सुदूर उपनगर विरार में एक माता जीवदानी का मंदिर है, एक दिन वहां बिता लिया । फिर कालबादेवी गया और मुंबई की ग्राम देवी- मुंबादेवी के दर्शन किए । इसी तरह और भी भटका । इस चक्‍कर में हुआ ये कि पवन की जेब में रखो डेढ़ हज़ार रूपए किसी ने पार कर लिये । इस तरह पवन का फिल्‍में देखने का और घूमने का सिलसिला रूक गया । मैंने पवन से पूछा कि उसने यहां कौन कौन सी फिल्‍में देखीं तो उसने बताया कि सैफ़ अली ख़ान की फिल्‍म रेस देखी उसने । एक भोजपुरी फिल्‍म भी देखी । और उसके प्रिय हीरो संजय दत्‍त हैं क्‍योंकि जब वो मुन्‍नाभाई बनते हैं तो उसे बहुत अच्‍छा लगता है ।

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वैसे पवन ने ये भी बताया कि उसके प्रिय हीरो तो मिथुन चक्रवर्ती हैं क्‍योंकि वो डान्‍स बहुत अच्‍छा करते हैं और वो अपने गांव में सी डी पर मिथुन की फिल्‍में बहुत देखता है । उसकी प्रिय हीरोइन माधुरी दीक्षित है और उसे अफ़सोस है कि माधुरी ने फिल्‍मों को लगभग छोड़ दिया है । बस 'आजा नच ले' में नज़र आई थी । इन दिनों पवन मुंबई की एक झोपड़ पट्टी में रहता है । जेब कटने के बाद पेट भरने के लिए उसे पैसों की जरूरत थी । ऐसे में प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस से मोल्डिंग का काम करने वाले वसंत ने उसे अपने साथ रख लिया । और वही उसे लेकर हमारे घर पर आया था । वसंत का कहना है कि पवन के नखरे बहुत हैं । और पवन का कहना है कि उससे ग़लती हो गयी जो वो घर से भाग आया वरना उसे ये काम नहीं करना पड़ता । उसके मांबाप को बता चलेगा तो वो पता नहीं क्‍या सोचेंगे । उसने मुंबई आने के बाद सबसे पहले अपने घर में फोन किया और बताया कि वो घूमने मुंबई आया है और जल्‍दी ही लौटेगा । उसके बाद से वो नियमित रूप से उनसे फोन पर बतियाता रहता है । मां बाप का कहना है कि वो जल्‍दी घर आ जाए । pavan

पवन ने बताया कि वो रेडियो बहुत सुनता है । और उसे ज्‍यादातर उद्घोषकों की आवाज़ें पसंद आती हैं । चूंकि रेडियोसखी ममता घर के काम का अवलोकन सबेरे शाम करती ही हैं दिन भर तो वो ऑफिस में होती हैं । तो बसंत को उनकी बातें सुनना अच्‍छा लगता है । उसने ये भी बताया कि कल शाम जब वो वसंत को डांट रही थीं तो उसे बहुत मज़ा आ रहा था । उसका कहना है कि ममता जी डांटती भी हैं तो लगता है कि रेडियो चल रहा है । .....सुना आपने ममता की सारी डांट का सत्‍यानाश हो गया । मेरा मतलब मुझे एक नुस्‍खा मिल गया । ममता अब मुझे भी डांटे तो मैं यही समझ लिया करूंगा कि मैं रेडियो सुन रहा हूं ।

पवन कहता है कि मुंबई आकर उसका क्‍या हाल हो गया है । पर वो खुश है उसे जिंदगी के नये अनुभव हुए हैं । उसे ये समझ में भी आया है कि घर से अनायास भागना नहीं चाहिए । उसे ये भी लगा है कि अच्‍छा हुआ कि वसंत उसे मिल गया तो वो काम करने लगा । वरना गुंडे बदमाशों की संगति में आ जाता तो क्‍या होता । जिन साथियों के साथ वो यहां आया था वो तो छोटे मोटे काम करके दारू पीने लगे हैं । पर पवन वापस लौटने के पैसे जमा कर रहा है । वो घर लौटना चाहता है । और अपनी कमाई से लौटना चाहता है । उसका कहना है कि अगले महीने परीक्षाओं से पहले वो घर लौट जाएगा और डटकर पढ़ेगा ।

पवन को हमारी शुभकामनाओं की ज़रूरत है ।

10 टिप्‍पणियां :

जोशिम said...

आपके तरंग के विषय सही में अजीब अजूबे होते हैं [ :-)] - बड़ा बहादुर / निडर होगा पवन - इस उमर में हम दस बार सोचते - उसके भागने से लौटने का कार्यक्रम समयानुसार हो जाय तो भला - रीवा में घर में कहारिन का लड़का जब पन्द्रह साल में भागा था तो पैतीस की उमर में लौटा था - यह संस्मरण बिल्कुल अलग लिखा है और बहुत ही रोचक - पढने के बाद ममता आपकी पिटाई न करें बस यही दुआ है - मनीष

डॉ. अजीत कुमार said...

आप घर के रेनोवेशन के बहाने नये नये अनुभवों से परिचित हो रहे हैं जानकर अच्छा लग रहा है.
लड़के को अच्छा साथ मिला जो वो वो पुनः घर लौटने का सपना देख सकता है, हमारी शुभकामनायें कि वो जल्दी अपने परिजनों से मिल सके और अपने सपने पूरे कर सके.
और हाँ, जो इतनी मधुर आवाज़ को सामने बैठकर सुन रहा हो उसे आनंद तो आयेगा ही भले ही वो डाँट की शक्ल में ही क्यूं न हो.
आपकी तो बस राम जी भली करें. :)

Manish said...

चलिए आपकी काउनसिलिंग काम आई। बच्चे कैसे गलत संगति से राह भटक जाते हैं ये एक अच्छा उदहारण है इसका..

सागर नाहर said...

पिटाई तो खैर आपकी होने से रही पर रेडियो सुनने को जरूर मिलेगा। :)
पवने सचमुच बहादुर है, जब गाँव लौटेगा तो मुंबई के अनुभवों के अलावा जब भी रेडियो पर आपकी आवाज सुनेगा खुश होकर सबसे कहेगा मैने इन साहब के घर में काम किया हुआ है।
बच्चे को इस लेख का एक प्रिंट आऊट जरूर दे देवें, जिंदगी भर आपको याद करेगा।

Dr.Parveen Chopra said...

यूनुस जी, ज़रा इस केस में फालो-अप की बहुत ज़रूरत लग रही है। आप इंश्योर करें कि वह अपने गांव वापिस की गाड़ी शीघ्र अति शीघ्र पकड ले। लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि उसे जल्दी से जल्दी इस मायानगरी को छोड़ने से भला कौन रोक रहा है। ठीक है, वह अपने पैसे से लौटना चाहता है....उसे गांव पहुंच कर पैसे लौटाने को कह दीजिये। पिछली बार उस ने गांव कब बात की है !!
मैं भी किन चक्करों में पड़ गया हूं ...जब कि मैं यह भली भांति जानता हूं कि सामान्यतः एक बार जिस छोरे के पांव इस तरह खुल जाते हैं, उसे फिर घर कम ही सुहाता है। लेकिन क्या करें.....शुभकामनायों के सिवाय कर भी क्या सकते हैं। वैसे यूनुस भाई, आप के इसे फ्लैट का व्यू अच्छा लग रहा है.....यह कहां पर है ?
हां, उस पवन के लिये तो सुझाव यही है कि बाकी सब कुछ भूल भाल कर गांव की गाड़ी चढ़ जाने में ही बेहतरी है....अगर हो सके तो इन सारी टिप्पणीयों से भी उस का तारूफ करवा दीजिये कि उसे कौन कौन सी नसीहतें देश के कौने कौने से आई हैं।

yunus said...

प्रवीण जी मुद्दा ये है कि पवन अपने घर हर दूसरे दिन बात कर रहा है । वसंत के साथ उसने दो काम लिए हैं जिन्हें पूरा करके ही जाना चाहता है वो, एक तो मेरे ही घर का काम है, मैंने कहा भी कि भैए निकल लो, ये काम तो कोई भी कर देगा । पर वो सटक नहीं रहा है । रही बात फ्लैट की, तो ये मुंबई के बोरीवली इलाक़े में है । काम पूरा हो तो तस्वीरे दिखाता हूं ।
और शेष मित्रो, मेरी पिटाई की दुआएं अच‍छी कीं आपने । मैंने तो इत्‍ता अच्‍छा नुस्‍खा बताया पत्‍नी की बातें नज़रअंदाज करने का । आप लोग मेरे लिए ही कड़वी गोली लेकर हाजिर हैं । हे हे हे

मीनाक्षी said...

कल शाम जब वो वसंत को डांट रही थीं तो उसे बहुत मज़ा आ रहा था । उसका कहना है कि ममता जी डांटती भी हैं तो लगता है कि रेडियो चल रहा है---
ममताजी की डाँट अगर इतनी मधुर है तो मीठी बातें तो बस लाजवाब होगें..मिलने की इच्छा जाग उठी.. :)

बहुत बढिया अनुभव पढ़ने को मिले...

PD said...

मैं जब छोटा था, शायद आठवीं में पढता था, तब मेरा एक मित्र घर से भागा थ.. लगभग 8 साल के बाद लौट कर आया.. उसके भागने का कारण परीक्षा में खराब नंबर था.. जबकी उसी परीक्षा में मेरा नंबर उससे भी खराब आया था, मगर मुझे घर से पूरा सहयोग मिला था और बड़ों ने डांट कर नहीं समझा कर अच्छे से पढने को कहा..

मैं भी क्या अपनी कहानी सुनाने लग गया.. आपने उस बच्चे का अच्छा चरित्र वर्णन किया है.. उम्मीद करता हूं की जल्दी ही वो अपने घर पहूंच जाये और अपने कमाये हुये पैसे से ही पहूंचे.. और उसे भी उसके घर में पूरा सहयोग मिले, ना की डांट और मार..

अल्पना वर्मा said...

aap ke lekh aksar apdhtee hun--yah bhi padha-
[AIR or DD Lucknow se mera bhi ek rishta tha kabhi :)-jamaney beet gaye!!!!!!!!aap se mil kar yaad aa gaya]
[mere blog par aap ke comments ke baare mein--यूनुस जी,आप से १००% अंक मिल गए लगता है गोल्ड पदक मिल गया!
जल्द ही अगला गीत भी ले कर आऊंगी....कंप्यूटर पर रेकॉर्डिंग और मिक्सिंग ठीक से नहीं आती-इसलिए रेकोर्डेरे पर रेकॉर्ड करके फ़िर पी सी में सेव करती हूँ..
आभार सहित..
alpana

ganand said...

yunus jee ye janab Pawan jab wapas ghar chale jayen to hame batayiega jarur...waise kuch bhi kaha jaye mujhe thodi jalan ho rahi hai Pawan bhai se, pata hai aapko kyon, uske jagah main kyon nahi ghar se bhag ke Yunus jee ke ghar kaam karne pahucha...:-)
Bhadohi ke kalin banane wale majdooron ki kahani
yahan bhi


Sadar,
Guneshwar Anand.

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