Saturday, January 5, 2008

यादगार रहा मिलना युवा कवि एकांत श्रीवास्‍तव से

कल का दिन ख़ास रहा । कल विविध भारती में मुझे युवा कवि एकांत श्रीवास्‍तव का इंटरव्‍यू लेने का मौक़ा मिला । एकांत की कविताएं मैं पिछले दस पंद्रह सालों से पढ़ रहा हूं और कई दिनों से इच्‍छा थी कि इतनी संवेदनशील और बारीक कविताएं रचने वाले कवि से आमने-सामने बात करने मिले । इसलिए जब एक आयोजन में एकांत के आने की ख़बर मिली तो फ़ौरन इस मौक़े को झटक लिया ।

एकांत बेहद सादा इंसान हैं । सहज और सरल । वे छत्‍तीसगढ़ के एक छोटे-से इलाक़े राजिम से आते हैं । और उनकी ज्‍यादातर परवरिश अपनी दादी के सान्निध्‍य में हुई है । जब मैंने एकांत को बताया कि मैंने सबसे पहले उनकी वो कविताएं पढ़ी थीं जो उन्‍होंने रंगों पर लिखी थीं तो वो चौंक गये । वो उम्‍मीद नहीं कर रहे थे कि आकाशवाणी जैसे संस्‍थान में कोई इतने लंबे समय से उनकी कविताओं को पढ़ रहा है । और उन पर पैनी नज़र रखे हुए है । हां जिन लोगों ने ये कविताएं पढ़ी नहीं हैं उन्‍हें बता दूं कि एकांत श्रीवास्‍तव ने नब्‍बे के दशक की शुरूआत में रंगों पर एक पूरी श्रृंखला लिखी थी । एक कविता लाल रंग पर, एक सफ़ेद पर, तो एक काले रंग पर कविता । शायद पांच कविताएं थीं वो । कोशिश करेंगे कि 'तरंग' पर आपको वो कविताएं पढ़वाई जाएं ।

बहरहाल, एकांत ने अपने जीवन की कई अनजानी-अनछुई बातें बताईं । उन्‍होंने बताया कि शुरूआती दिनों में वो गुलशन नंदा और रानू की स्‍टाईल वाले उपन्‍यास और कहानियां लिखा करते थे । अपने उस छोटे से गांव में रहते हुए लिखने की प्रेरणा उन्‍हें अपनी दादी से मिलती रही । जिन्‍हें वो अम्‍मां कहते थे । दादी के पास उनकी परवरिश इसलिए हुई क्‍योंकि उनके माता-पिता दुर्ग में नौकरी करते थे । और उन्‍हें गांव में दादी के पास रख दिया गया था । दादी के कहने पर ही एकांत ने कविताओं पर ज़ोर देना शुरू किया । छत्‍तीसगढ़ और म.प्र. के प्रसिद्ध अखबार देशबंधु के अवकाश अंक यानी रविवारीय परिशिष्‍ट में उनकी कविताएं छपीं और वहां से उनका नाम होना शुरू

हुआ ।

मुझे एकांत की कविताओं की ख़ासियत लगती है हमारी जिंदगी से खत्‍म होती जा रही संवेदनाओं की धड़कन को पकड़ना और हमारी भाषा से ग़ायब हो चुके शब्‍दों का प्रयोग । एकांत कभी करेले बेचने वाली लड़की को अपनी कविता में बेहद प्रभावी ढंग से ले आते हैं तो कभी बग़ीचे में बरसाती दिनों में चहलक़दमी कर रही बीरबहूटी को । अदभुत है उनकी संवेदना । आज के समय में जबकि कविता में जटिलताएं बढ़ रही हैं और विचार....संवदेनाओं पर हावी हो रहे हैं, एकांत की कविताएं विचारों और सादगी या सरलता का तालमेल करती चलती हैं ।

किसी कवि को लगातार पढ़ते रहना और उससे मिलने की इच्‍छा को मन में दबाए लंबे समय तक जिए चले जाना दिलचस्‍प होता है और जब अपने प्रिय कवि से मुलाक़ात हो, और केवल मुलाक़ात ही नही बल्कि बाक़ायदा इंटरव्‍यू करने का मौक़ा भी मिले तो लगता है कि बातों का सिलसिला खत्‍म ना हो तो कितना अच्‍छा हो । बातों के नये नये सिरे खुलते चले जाएं । नये नये पहलू मिलते जाएं और कवि के व्‍यक्तित्‍व और उसके कृतित्‍व में नए तरीक़े से झांकने का मौक़ा मिलता जाए । हमने फिल्‍मों से लेकर साहित्‍य और समाज से लेकर लघु‍पत्रिकाओं के भविष्‍य तक हर मुद्दे पर बातचीत की । और केवल अच्‍छा ही नहीं लगा बल्कि बहुत अच्‍छा लगा ।

एकांत के तीन कविता संग्रह आ चुके हैं--अन्‍न हैं मेरे शब्‍द, मिट्टी से कहूंगा धन्‍यवाद और बीज से फूल तक ।
उनकी एक आलोचनात्‍मक पुस्‍तक आई है--कविता का आत्‍मपक्ष । बहुत जल्‍दी उनकी एक डायरीनुमा पुस्‍तक आने वाली है, जिसकी हमें लगातार प्रतीक्षा रहेगी । आजकल एकांत
वागर्थ के संपादक हैं और कलकत्‍ता में रेलवे की नौकरी भी कर रहे हैं । एकांत पर बात हो और कविताएं ना हों ऐसा हो नहीं सकता---ये रही एकांत की तीन कविताएं जो वागर्थ में छप चुकी हैं ।

करेले बेचने आईं बच्चियां


पुराने उजाड़ मकानों में
खेतों-मैदानों में
ट्रेन की पटरियों के किनारे
सड़क किनारे घूरों में उगी हैं जो लताएं
जंगली करेले की
वहीं से तोड़कर लाती हैं तीन बच्चियां
छोटे-छोटे करेले गहरे हरे
कुछ काई जैसे रंग के
और मोलभाव के बाद तीन रुपए में
बेच जाती हैं
उन तीन रुपयों को वे बांट लेती हैं आपस में
तो उन्हें एक-एक रुपया मिलता है
करेले की लताओं को ढूंढने में
और उन्हें तोड़कर बेचने में
उन्हें लगा है आधा दिन
तो यह एक रुपया
उनके आधे दिन का पारिश्रमिक है
मेरे आधे दिन के वेतन से
कितना कम
और उनके आधे दिन का श्रम
कितना ज्या़दा मेरे आधे दिन के श्रम से
करेले बिक जाते हैं
मगर उनकी कड़ुवाहट लौट जाती है वापस
उन्हीं बच्चियों के साथ
उनके जीवन में।

लोहा


जंग लगा लोहा पांव में चुभता है
तो मैं टिटनेस का इंजेक्शन लगवाता हूं
लोहे से बचने के लिए नहीं
उसके जंग के संक्रमण से बचने के लिए
मैं तो बचाकर रखना चाहता हूं
उस लोहे को जो मेरे खून में है
जीने के लिए इस संसार में
रोज़ लोहा लेना पड़ता है
एक लोहा रोटी के लिए लेना पड़ता है
दूसरा इज्ज़त के साथ
उसे खाने के लिए
एक लोहा पुरखों के बीज को
बचाने के लिए लेना पड़ता है
दूसरा उसे उगाने के लिए
मिट्टी में, हवा में, पानी में
पालक में और खून में जो लोहा है
यही सारा लोहा काम आता है एक दिन
फूल जैसी धरती को बचाने में

रास्ता काटना*

* एकांत ने बताया कि यह कविता उन दिनों लिखी गयी जब वे विशाखापत्‍तनम में पोस्‍टेड थे, आंध्र में महिलाएं बाहर जाने वाले पुरूष का रास्‍ता काटती हैं और ये शुभ होता है ।


भाई जब काम पर निकलते हैं
तब उनका रास्ता काटती हैं बहनें
बेटियां रास्ता काटती हैं
काम पर जाते पिताओं का
शुभ होता है स्त्रियों का यों रास्ता काटना
सूर्य जब पूरब से निकलता होगा
तो निहारिकाएं काटती होंगी उसका रास्ता
ऋतुएं बार-बार काटती हैं
इस धरती का रास्ता
कि वह सदाबहार रहे
पानी गिरता है मूसलाधार
अगर घटाएं काट लें सूखे प्रदेश का रास्ता
जिनका कोई नहीं है
इस दुनिया में
हवाएं उनका रास्ता काटती हैं
शुभ हो उन सबकी यात्राएं भी
जिनका रास्ता किसी ने नहीं काटा ।

अब एक अच्‍छी ख़बर भी देता चलूं कि एकांत श्रीवास्‍तव से हुई इस बातचीत को विविध भारती से आगे चलकर 'हमारे मेहमान' कार्यक्रम में प्रसारित किया जायेगा । इसकी सूचना आपको रेडियोनामा के ज़रिए जरूर दी जाएगी ।

6 टिप्‍पणियां :

Sanjeet Tripathi said...

बधाई महानदी की माटी में पले बढ़े इस कवि से मुलाकात होने पर!
कहतें हैं महानदी जब उफनती है तो दर्शनीय होती है। एकांत जब अपने एकांत मे होकर रचते हैं तो उनके अंदर का उफान उनके शब्दों से झलकता है।
लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि एकांत के इस उफान में क्रुद्धता नही दिखती । लगता है कि उनके शब्द अगर कागज़ पर न उतरे होते तो एकांत को खासा बेचैन कर चुके होते हालांकि कागज़ पर उतरने के बाद भी वे शब्द उन्हे बेचैन किए रहते ही होंगे।
खैर!!
एकांत साहब को हमारा सलाम पहुंचे।
आपका शुक्रिया!

annapurna said...

एकान्त जी से मिल कर अच्छा लगा। कविताएं भी अच्छी है। क्यों न ये इंटरव्यू रेडियोनामा पर सुना जाए !

Anonymous said...

श्री एकान्त की कविताये पढ़ना और ये जानना कि वह वागर्थ से संबंधित है, रोचक है। वागर्थ का साहित्यिक स्तर और रचनाओं का चयन भी अनूठा लगता है।
आभार युनुस.

Manish said...

शुक्रिया इस मुलाकात के बारे में लिखने का । अच्छी लगी एकांत जी की कविताएँ

डॉ.श्रीकृष्ण राऊत said...

प्यारे युनुस भाई,
आप किसी कवी से मुलाक़ात करवाते है, तो वह सिर्फ मुलाक़ात नही होती। उस मे शामील आपकी टीप्पणी हमे उस कवी की खू़बीयो से सहज परिचित करवाती है। जैसे-
‘मुझे एकांत की कविताओं की ख़ासियत लगती है हमारी जिंदगी से खत्‍म होती जा रही संवेदनाओं की धड़कन को पकड़ना और हमारी भाषा से ग़ायब हो चुके शब्‍दों का प्रयोग।... अदभुत है उनकी संवेदना । आज के समय में जबकि कविता में जटिलताएं बढ़ रही हैं और विचार....संवदेनाओं पर हावी हो रहे हैं, एकांत की कविताएं विचारों और सादगी या सरलता का तालमेल करती चलती हैं।’
अदभुत संवेदना के कवी एकांत श्रीवास्तवजी को
मेरा प्रणाम और आपका बहुत बहुत शुक्रिया।
कवी एकांत श्रीवास्तवजी ने इजाज़त दी तो उनकी कुछ कविताओ का मराठी अनुवाद करना चाह्ता हूँ।
क्रुपया उनका ई-मेल बताए।
- डॉ.श्रीकृष्ण राऊत

GAJANAN RATHOD said...

मै एकांत जी (प्रदीप श्रीवास्तव जी) के गाँव के समीप का रहने वाला हूँ . एकांत जी से मेरा परिचय मेरे बड़े भ्राता के माध्यम से रहा है. उनकी अनेक कविताये पढने और खुद एकांत जी के माध्यम से सुनने तक का सौभाग्य मुझे मिल चुका है. ये तो पता था की एकांत जी लाजवाब कवी हैं . आपका लेख "यादगार रहा मिलना युवा कवि एकांत श्रीवास्‍तव से" पढ़कर
कुछ धुंधली सी यादे तजा हो गयी. आपकी लेखनी की प्रखरता भी इस लेख से जान पाया. शुभेच्छा...

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