Tuesday, March 25, 2008

जैसलमेर यात्रा छठी कड़ी: किले में कोला, कैफ़े और काऊ । कुछ दिलचस्‍प तस्‍वीरें ।

तरंग पर जैसलमेर की यात्रा का विवरण चल रहा है । जैसलमेर यात्रा की अब तक पांच कडि़यां हो चुकी हैं । ज़रा यहां उन कडियों के लिंक्‍स दे दिये जाएं ।

पिछली कड़ी थी पांचवीं--जिसमें हमने लोंगेवाला पोस्‍ट की शौर्यपूर्ण दास्‍तान का विवरण पढ़ा था ।

चौथी कड़ी में सीमा पर बी एस एफ के सिपाहियों के बीच की गयी रिकॉर्डिंग का‍ ब्‍यौरा था ।

तीसरी कड़ी थी--तन्‍नोट : सीमा प्रहरियों के विश्‍वास का केंद्र

दूसरी कड़ी में जैसलमेर रामगढ़ में संगीत संध्‍या का ब्‍यौरा था ।

और पहली कड़ी में था रामदेवरा का ब्‍यौरा ।

दरअसल जैसलमेर यात्रा इतने व्‍यापक अनुभवों वाली है कि इसके एक एक पहलू को अपनी इस ट्रैवल-डायरी में समेटे बिना चैन नहीं आने वाला । तो चलिए इस यात्रा डायरी को आगे बढ़ाया जाए । दरअसल जैसलमेर रामगढ़ में अपनी सारी रिकॉर्डिंग्‍स और संगीत संध्‍या करने के बाद हम निकल  पड़े जोधपुर की ओर । रामगढ़ से जोधपुरा का रास्‍ता तकरीबन चार सौ किलोमीटर का है । और हम थे अपनी विशेष बारह सीटों वाली बस में । ज़ाहिर है कि जैसलमेर रास्‍ते में पड़ने वाला था । जैसलमेर आकाशवाणी केंद्र के अधिकारियों ने पहले ही कह दिया था कि विविध-भारती की टोली चुपके से जैसलमेर पार ना करे । इसलिए हम सीधे जा पहुंचे जैसलमेर आकाशवाणी केंद्र । सुंदर सा केंद्र है ये, जोधपुरी पत्‍थरों से बना । रास्‍ते में फिर से इतनी सारी पवनचक्कियां मिलीं । जिन्‍हें बस के बोनट पर बैठकर किसी तरह मैंने अपने कैमरे में कैद कर लिया । 

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यहां से हम सीधे जैसलमेर की सरज़मीं पर जा पहुंचे । आईये जैसलमेर कि़ले पर चलने से पहले आपको बताया जाए इसका इतिहास । जैसलमेर के किले को यहां के भाटी राजपूत शासक रावल जैसल ने सन 1156 में बनवाया था । यानी आज से तकरीबन साढ़े आठ सौ साल पहले । मध्‍य युग में जैसलमेर ईरान, अरब, मिस्‍त्र और अफ्रीक़ा से व्‍यापार का एक मुख्‍य केंद्र था । दिलचस्‍प बात ये है कि इसकी पीले पत्‍थरों से बनी दीवारें दिन में तो शेर जैसे चमकीले पीले-भूरे रंग की नज़र आती हैं और शाम ढलते ही इनका रंग सुनहरा हो जाता है । इसलिये इसे सुनहरा कि़ला कहा जाता है । आपको बता दें कि महान फिल्‍मकार सत्‍यजीत रे का एक जासूसी उपन्‍यास 'शोनार किला' इसी किले की पृष्‍ठभूमि पर लिखा गया है ।  त्रिकुट पहाड़ी पर बने इस कि़ले ने कई लड़ाईयों को देखा और झेला है । तेरहवीं शताब्‍दी में अलाउद्दीन खि़लजी ने इस कि़ले पर आक्रमण कर दिया था और नौ बरस तक कि़ला उसकी मिल्कियत बना रहा । इसके बाद सन 1541 में मुग़ल बादशाह हुमायूं ने इस कि़ले पर हमला किया था ।

जैसलमेर किला दुनिया का ऐसा अकेला किला है जहां शहर की एक चौथाई जनता निवास करती है । हालांकि किसी ज़माने में पूरा जैसलमेर शहर ही इस किले के भीतर बसा हुआ था । जैसलमेर के इस किले को देखने के लिए वैसे तो दो दिन चाहिए । लेकिन हमारे पास थे दो घंटे । इसलिए बहुत सरसरी तौर पर ही हम इस कि़ले को देख सके । पर यहां के कुछ दिलचस्‍प दृश्‍य मैंने अपने कैमेरे में क़ैद करने का प्रयास किया है । जो बदलते वक्‍त के साथ किले की बदलती तस्‍वीर आपके सामने पेश करेंगे । आईये तस्‍वीरें देखें ।

ये है जैसलमेर के कि़ले का एक दृश्‍य जो पहाड़ी के नीचे से लिया गया है । जो लोग पहाड़ी पर पैदल नहीं जा सकते उन्‍हें ऑटो रिक्‍शा वाले बहुत थोड़े पैसों में अपनी कलाबाज़ी दिखाते हुए किले के भीतर ले जाते हैं । दिलचस्‍प बात ये है कि पूरा का पूरा शहर है किले में, साईबर कैफे से लेकर रेस्‍टोरेन्‍ट तक सब कुछ । और आप इसे पार करते हुए किले में टहलते हैं ।

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ज़रा यहां नज़र डालिए । जैसलमेर किले की दीवार पर नन्‍हे जैसलमेर फिल्‍म का पोस्‍टर नज़र आ रहा है । जो किसी मनचले के फाड़ने के बावजूद कुछ हद तक सही-सलामत बचा है । नन्‍हे बॉबी देओल जैसलमेर की दीवारों पर भले विराजमान हैं, अरे भाई, फिल्‍म कहां गयी, किसी को कुछ पता है क्‍या ।

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ये किले के भीतर मौजूद एक मुख्‍य चौराहे पर ली गयी तस्‍वीर है । किले के भीतर मौजूद हवेली की तस्‍वीर ।

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जैसा कि मैंने कहा कि किले में पूरा शहर है, देखिए किले में दर्जी और दर्जी की चाय ।

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अगर दर्जी चाय पी सकता है तो क्‍या ठंडा नहीं पी सकता । इस चित्र का शीर्षक है-'किले में कोला'

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किले में कोला होगा, चाय होगी, दर्जी होगा तो क्‍या गौ माता नहीं होगी । चलिए गौ माता को रोटी खिलाईये और नमस्‍ते कीजिए । 'किले में काऊ'

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ये है जैसलमेर किले से शहर का विहंगम दृश्‍य । शहर कभी किले के भीतर ही हुआ करता था । अब शहर किले के भीतर भी है और बाहर भी ।

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किले में सब कुछ है । अगर ये साइन बोर्ड ठीक से पढ़ने में नहीं आ रहा है तो मैं बता दूं, इस पर लिखा है -द चाय बार: साइबर कैफे । यानी किले में काउ और किले में कोला के बाद किले में साइबर कैफे ।

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जैसलमेर और जोधपुर यात्रा की छठी कड़ी जैसलमेर किले की तस्‍वीरें लेकर आई । अगली कड़ी में थार रेगिस्‍तान में ऊंटों की सवारी

Thursday, March 20, 2008

कवि सम्‍मेलनों की विकल याद और एक दिन कविताओं भरा

तरंग पर जैसलमेर यात्रा की श्रृंखला की डोर छूट सी गयी है पर फिर से उसे तानकर जल्‍दी जल्‍दी पोस्‍टें लिखने का मन है । आज जैसलमेर से नहीं बल्कि मुंबई के एक यादगार अनुभव से उपजी है ये पोस्‍ट । कवि-सम्‍मेलन अपनी कमज़ोरी रहे हैं । बहुत छोटे थे, स्‍कूल में रहे होंगे जब दूरदर्शन पर कवि सम्‍मेलनों और मुशायरों की रिकॉर्डिंग्‍स दिखाई जाती थीं । और हम इसे अपने टेप रिकॉर्डर पर रिकॉर्ड कर लेते थे । फिर आराम से बैठकर इन कविताओं को अपनी डायरी में उतारा जाता था । ख़ासतौर पर दूरदर्शन के दिल्‍ली, लखनऊ और हैदराबाद केंद्रों के कवि सम्‍मेलन / मुशायरे बड़े आतिशी होते थे । इन्‍हीं सम्‍मेलनों में कितने कितने लोगों को सुना । शिवमंगल सिंह 'सुमन', नीरज, कुंवर बेचैन, सोम ठाकुर, बालकवि बैरागी, वीरेंद्र मिश्र, रमानाथ अवस्‍थी, कैलाश गौतम, बशीर बद्र, अहमद नसीम काज़मी, निदा फ़ाज़ली, बेकल उत्‍साही, वसीम बरेलवी, शुजा ख़ाबर, मख़मूर सईदी, राहत इंदौरी, शेरी भोपाली, सरोजनी प्रीतम, परवीन शाकिर, रफि़या शबनम आबिदी, कृष्‍ण बिहारी नूर,

.... मध्‍यप्रदेश के स्‍कूलों में चलती हिंदी की पुस्‍तक 'बाल भारती' के अलावा इन्‍हीं कवि सम्‍मेलनों और मुशायरों ने कविता की लौ लगाई । जो आगे चलकर प्रगतिशील कविता की ओर मुड़ गयी ।

कुंअर महेंद्र सिंह बेदी सहर जैसे अनगिनत कवियों और शायरों को सुना । मध्‍यप्रदेश के स्‍कूलों में चलती हिंदी की पुस्‍तक 'बाल भारती' के अलावा इन्‍हीं कवि सम्‍मेलनों और मुशायरों ने कविता की लौ लगाई । जो आगे चलकर प्रगतिशील कविता की ओर मुड़ गयी । फिर त्रिलोचन और केदारनाथ सिंह से होते हुए कविता की लौ राजेश जोशी, ज्ञानेंद्र पति और फिर बोधिसत्‍व या एकांत श्रीवास्‍तव तक पहुंच गयी । बहरहाल फिर से कवि सम्‍मेलनों की यात्रा की बातों की ओर लौटा जाए । इन कवि सम्‍मलनों और मुशायरों की यादों पर अलग से एक पोस्‍ट लिखी जायेगी । क्‍योंकि यहां पर मामला अपनी सड़क से भटक जाएगा ।

हम आपको बताना चाहेंगे कि विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती पर अप्रैल के महीने की तीन तारीख़ के लिए एक कवि सम्‍मेलन आयोजित किया गया । जो एक बाक़ायदा कवि सम्‍मेलन नहीं था बल्कि फॉरमेट के मामले में एक नया प्रयोग था । इस कार्यक्रम का शीर्षक था--'प्‍यार की बातें प्‍यार के गीत' । मतलब ये कि कविताओं को प्रेम के दायरे में समेट दिया गया था, क्‍योंकि ये विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती पर दो महीने पहले आयोजित किये गये उस कार्यक्रम की अगली कड़ी के रूप में प्रस्‍तुत किया गया था जिसे रवि रतलामी ने यहां पर चढ़ाया है ।  

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बहरहाल ये बाक़ायदा कवि सम्‍मेलन नहीं था बल्कि परिचर्चा और कवि सम्‍मेलन के साथ साथ फिल्‍मी गीतों के ताने बाने में बुना गया एक रोचक कार्यक्रम था । जिसे हमने इस सोमवार को रिकॉर्ड कर लिया । अब इसके पोस्‍ट प्रोडक्‍शन का काम शुरू होगा और तीन अप्रैल को आप इस कार्यक्रम को पूरे तीन घंटे तक विविध भारती पर सुन सकेंगे । इस कवि सम्‍मेलन में शामिल कवि थे--बालकवि बैरागी, निदा फ़ाज़ली, कुंवर बेचैन, राहत इंदौरी और दीप्‍ती मिश्रा । मुनव्‍वर राणा को भी इसमें शामिल होना था पर उनकी फ्लाईट ही छूट गयी । और हम उन्‍हें सुनने से वंचित रह गये । कार्यक्रम के संचालन का जिम्‍मा मुझे दिया गया था । इस आयोजन में असल में क्‍या हुआ ये तो आपको रेडियो पर ही सुनना होगा । कवि सम्‍मेलन के कुल तीन दौर हुए । और साथ में कुछ बातचीत और फिल्‍मी गीत । कुल मिलाकर एक दिलचस्‍प और यादगार दिन रहा ।

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सबेरे से ही सभी कवियों के साथ मिलने बतियाने का सिलसिला रूकते रूकते चल रहा था । बैरागी जी से मुलाका़त हुई तो उन्‍हें हमने बताया कि किस तरह उनकी इन पंक्तियों ने हम जैसे छात्र-आंदोलनकारियों को ऊर्जा दी थी--

हाथों में पत्‍थर, होठों पे नारे

सड़कों पे आ गये क्‍यो जलते अंगारे

हाय राम कोई विचार तो करे

कोई इन अंगारों से प्‍यार तो करे ।।

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कुंवर बेचैन को तरन्‍नुम में सुनना बड़ा शानदार अनुभव रहा ।

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उनकी ये पंक्तियां तो बचपन से ही ज़ेहन में गूंज रही थीं ।

दिल पे मुश्किल बहुत है दिल की कहानी लिखना

जैसे बहते हुए पानी पे है पानी लिखना ।।

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निदा फ़ाज़ली दिलचस्‍प शख्सियत हैं । जिस कव‍ि सम्‍मेलन में वो मौजूद हों, उनके असर से बचना मुश्किल है । इस कार्यक्रम में उन्‍होंने कई मुद्दों पर अपनी बेबाक राय तो रखी ही साथ ही अपनी कुछ मशहूर रचनाएं भी सुनाईं । उनका एक पुराना दोहा पेश है ।

मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्‍यार

दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार ।।

और राहत..राहत इंदौरी के अशआर जलते हुए अशआर होते हैं । आतिशी शायर हैं वो । उनके दो शेर पढि़ये--

सफर की हद है वहाँ तक के कुछ निशान रहे
चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे ।
ये क्या उठाए कदम और आ गई मंज़िल
मज़ा तो तब है के पैरों में कुछ थकान रहे ।।

दीप्‍ती मिश्र को मैंने पहली बार सुना । उनका शेर पढिये ।

सारे जीवन के बदले में कुछ लम्‍हे जी लेने दो

सागर कब मांगा है हमने कुछ क़तरे पी लेने दो ।।

इस तरह सोमवार का दिन काफी यादगार रहा । बैरागी जी की मज़ाकिया चुटकियां, निदा फ़ाज़ली का संदर्भों के सहारे बातें करना और व्‍यंग्‍य बाण चलाना और कुंअर बेचैन का ख़ामोशी से काम लेना और राहत इंदौरी का अंडरप्‍ले करना । सब कुछ मज़ेदार रहा । और हां चलते चलते ये भी बता दिया जाए कि ये तमाम चित्र विविध भारती के सहायक केंद्र निदेशक महेंद्र मोदी ने खींची हैं ।

जैसलमेर यात्रा वाली श्रृंखला की अगली कड़ी शीघ्र ही । जिसमें तस्‍वीरों के सहारे जैसलमेर कि़ले का भ्रमण किया जायेगा । फिलहाल आप बताएं कि कैसे कैसे कव‍ि सम्‍मेलन आपको याद हैं ।

Wednesday, March 12, 2008

गागर में सागर--सागर नाहर से मुंबई में ब्‍लॉगर मीट ।

इस रविवार को एक छोटी-सी ब्‍लॉगर मीट हो गयी । तकनीकी दस्‍तक और गीतों की महफिल जैसे लोकप्रिय ब्‍लॉगों को चलाने वाले सागर चंद नाहर हैदराबाद से सूरत होते हुए अचानक केवल एक दिन के लिए मुंबई आए और अपन ने उन्‍हें बिना मिले जाने नहीं दिया । सागर से कुछ घंटों की दिलचस्‍प मुलाक़ात हुई । सागर नाहर से चैट पर और टेलीफोन पर संपर्क बना रहता है । सागर की शख्सियत की कई पहलू हैं जो दिलचस्‍प हैं । फिल्‍मी गानों के अपार संग्रह का शौक़ हो या दूसरों की मदद करने को हमेशा तत्‍पर रहने का जुनून । या फिर ब्‍लॉगिंग और कंप्‍यूटिंग से जुड़े तकनीकी पहलुओं के बारे में चुपचाप रिसर्च करते रहने और नई चीज़ों को खोज-खाजकर सबके लिए प्रस्‍तुत करने का शौक़ । सागर सचमुच गागर में सागर हैं ।

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अब आप सोच रहे होंगे कि गागर कैसे । तो इसका जवाब ये है कि आमतौर पर हमने ब्‍लॉग पर सागर की पासपोर्ट साइज़ तस्‍वीर ही देखी है । असल में भी सागर दुबले पतले हैं । लेकिन सागर की सबसे बड़ी ख़ासियत है उनका ख़ामोशा रहना । वो बहुत कम बोलते हैं । कई बार तो इतना कम बोलते हैं कि असुविधा होने लगती है । ख़ामोश रहकर काम करने की उनकी अदा कमाल की है । आज तक शायद आपको अंदाज़ा भी ना होगा-- पर इस बात को आप सबके सामने रखना ज़रूरी है रेडियोनामा की डिज़ायनिंग और उसे संभालने संवारने का काम सागर ही परदे की पीछे से करते रहे हैं  । रेडियोनामा पर सबसे कम पोस्‍टें सागर की होंगी । मुझे याद नहीं पर शायद एकाध पोस्‍ट हो भी । लेकिन कोई दिन ऐसा नहीं होता जब सागर रेडियोनामा पर ना आएं । अगर किसी पोस्‍ट में टाईपिंग की, तकनीक की या भाषा की ग़लती नज़र आई तो सागर फौरन उसे ठीक कर देते हैं । यही नहीं अगर रेडियोनामा के किसी सदस्‍य ने या रेडियोनामा से जुड़ने के इच्‍छुक किसी व्‍यक्ति ने पत्र व्‍यवहार किया, मदद मांगी तो सबसे पहले सागर हाजि़र होते हैं । मुंबई में जब मेरे घर आये सागर तो दुनिया भर की बातें हुईं । थोड़ी ब्‍लॉगिंग की बातें भी हुईं । निजी बातें भी हुईं । उन्‍होंने बताया कि जल्‍दी ही उन्‍हें ब्‍लॉगिंग करते हुए दो साल पूरे होने जा रहे हैं । मज़ेदार बात ये है कि इस पोस्‍ट के आने से पहले ही ये अवसर आ भी चुका है । ये पोस्‍ट देखिए

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बहरहाल बात चल रही थी सागर के व्‍यक्तित्‍व की । मुझ जैसे कई ब्‍लॉगर ऐसे हैं जिन्‍होंने तकनीकी समस्‍याओं के दौरान किसी ना किसी की ओर मदद के लिए देखा है । कभी रवि रतलामी, कभी श्रीश ( जो कहीं ग़ायब हैं) कभी ब्‍लॉग बुद्धि वाले विकास ने मदद करके नैया पार लगाई है । और हमें तकनीकी तौर पर थोड़ा बहुत काबिल बनाया है । सागर नाहर का शुमार भी इसी समूह में होता है । किसी भी वक्‍त उनसे संपर्क किया जाये वे तत्‍पर मिलेंगे । दिलचस्‍प बात ये है कि पुराने गानों का ज़बर्दस्‍त शौक़ है सागर को । और संग्रह भी कमाल का है । उन्‍हें अफ़सोस रहता है कि 'गीतों की महफिल' की कुछ बेमिसाल गानों वाली पोस्‍टों पर उतनी टिप्‍पणियां नहीं आईं, जितनी आनी चाहिए । लेकिन सागर गाने की जो ज़बर्दस्‍त रिसर्च कर रहे हैं वो कमाल की है । ऐसे व्‍यक्ति से मिलना बड़ा ही दिलचस्‍प रहा । ये नहीं लगा कि ये हमारी पहली मुलाक़ात है । जाते जाते सागर मुझे कुछ अनमोल गाने भी दे गये । जिन्‍हें सुनने में अभी कई दिन लग जायेंगे । ब्‍लॉगिंग की दुनिया कितनी कमाल की है,  कितनी ही दिलचस्‍प शख्सियतें मिलती हैं और फिर हमारे दायरे में शामिल हो जाती हैं । सागर नाहर को उनकी एक नई शुरूआत के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं ।

और हां जैसलमेर यात्रा वाली श्रृंखला तरंग पर जारी रहेगी ।

Thursday, March 6, 2008

जैसलमेर-यात्रा पांचवी-कड़ी: भारत पाकिस्‍तान युद्ध 1971 और लोंगेवाला-पोस्‍ट की शौर्यपूर्ण दास्‍तान ।

जैसलमेर यात्रा का विवरण अब एक रोचक मोड़ पर आ गया है । और ये मोड़ है लोंगेवाला या लोंगेवाल । इस जगह का नाम हमने पहले ही बहुत सुन रखा था । दरअसल फिल्‍म 'बॉर्डर' में भी लोंगेवाल की जंग को दिखाया गया है । लेकिन फिल्‍मी-कथानक और हक़ीक़त के बीच का अंतर लंबा होता है । सीमा-सुरक्षा-बल के अधिकारियों ने हमें लोंगेवाल के बारे में जो बताया उससे इस जगह के बारे में और जानकारियां जमा करने की इच्‍छा बढ़ गयी थी । मुंबई लौटकर आने के बाद मैंने इंटरनेट पर लोंगेवाल की बारे में ज्‍यादा छानबीन की । और कुछ दिलचस्‍प बातें पता चलीं । आईये आज जानें कहानी लोंगेवाला की

विकीपीडिया पर लोंगेवाला के बारे में एक पूरा अध्‍याय मौजूद है । जिसके मुताबिक़ थार रेगिस्‍तान में लोंगेवाला की लड़ाई पांच और छह दिसंबर 1971 को लड़ी गयी थी । इस लड़ाई के दौरान 23 वीं पंजाब रेजीमेन्‍ट के 120 भारतीय सिपाहियों की एक टोली ने पाकिस्‍तानी सेना के दो से तीन हज़ार फौजियों के समूह को धूल चटा दी थी । भारतीय वायु सेना ने इस लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी ।

शायद आपको जानकारी हो कि 1971 की भारत पाकिस्‍तान लड़ाई का मुख्‍य-फोकस था सीमा का पूर्वी हिस्‍सा । पश्चिमी हिस्‍से की निगरानी सिर्फ इसलिए की जा रही थी ताकि याहया खान के नेतृत्‍व में लड़ रही पाकिस्‍तानी सेना इस इलाक़े पर क़ब्‍ज़ा करके भारत-सरकार को पूर्वी सीमा पर समझौते के लिए मजबूर ना कर दे ।

.... पाकिस्‍तान के ब्रिगेडियर तारिक मीर ने अपनी योजना पर विश्‍वास प्रकट करते हुए कहा था--इंशाअल्‍लाह हम नाश्‍ता लोंगेवाला में करेंगे, दोपहर का खाना रामगढ़ में खाएंगे और रात का खाना जैसलमेर में होगा । यानी उनकी नज़र में सारा खेल एक ही दिन में खत्‍म हो जाना था ।

1971 में नवंबर महीने के आखिरी हफ्ते में भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्‍तान के सिलहट जिले के अटग्राम  में पाकिस्‍तानी सीमा पोस्‍टों और संचार-केंद्रों पर जोरदार हमला कर दिया था ।  मुक्ति वाहिनी ने भी इसी दौरान जेसूर पर हमला कर दिया था । पाकिस्‍तानी सरकार इन हमलों से घबरा गयी थी । क्‍योंकि ये तय हो चुका था कि पूर्वी पाकिस्‍तान अब सुरक्षित नहीं रहा । पाकिस्‍तान को बंटवारे से बचाने के लिए याहया ख़ान ने  मो. अयूब ख़ान की रणनी‍ति को आज़माया  जिसके मुताबिक़ पूर्वी पाकिस्‍तान को बचाने की कुंजी थी पश्चिमी पाकिस्‍तान । उनकी कोशिश यही थी कि भारत के पश्चिमी हिस्‍से में ज्‍यादा से ज्‍यादा इलाक़े को हड़प लिया जाये ताकि जब समझौते की नौबत आए तो भारत से पाकिस्‍तान के 'नाज़ुक-पूर्वी-हिस्‍से' को छुड़ावाया जा सके ।

पाकिस्‍तान ने पंजाब और राजस्‍थान के इलाक़ों में अपने जासूस फैला रखे थे । उनकी योजना किशनगढ़ और रामगढ़ की ओर से राजस्‍थान में घुसपैठ करने की थी । पाकिस्‍तान के ब्रिगेडियर तारिक मीर ने अपनी योजना पर विश्‍वास प्रकट करते हुए कहा था--इंशाअल्‍लाह हम नाश्‍ता लोंगेवाला में करेंगे, दोपहर का खाना रामगढ़ में खाएंगे और रात का खाना जैसलमेर में होगा । यानी उनकी नज़र में सारा खेल एक ही दिन में खत्‍म हो जाना था ।

उन दिनों लोंगेवाल पोस्‍ट पर तेईसवीं पंजाब रेजीमेन्‍ट तैनात थे जिसके मुखिया थे मेजर के एस चांदपुरी बाक़ी बटालियन यहां से सत्रह किलोमीटर उत्‍तर-पूर्व में साधेवाल में तैनात थी । जैसे ही तीन दिसंबर को पाकिस्‍तानी वायुसेना ने भारत पर हमला किया, मेजर चांदपुरी ने लेफ्टीनेन्‍ट धरम वीर के नेतृत्‍व में बीस फौजियों की टोली को बाउंड्री पिलर 638 की हिफ़ाज़त के लिए गश्‍त लगाने भेज दिया । ये पिलर भारत पाकिस्‍तान की अंतर्राष्‍ट्रीय सीमा पर लगा हुआ था । इसी गश्‍त ने पाकिस्‍तानी सेना की मौजूदगी को सबसे पहले पहचाना था ।

....night vision उपकरण नहीं लगे थे इसलिए दिन का उजाला होने तक वायुसेना हमला नहीं कर सकती थी । बहरहाल दोपहर तक भारतीय हवाई हमले ने पाकिस्‍तानी सेना के चालीस टैंकों और सौ गाडि़यों को तबाह कर दिया और उसकी कमर तोड़ दी ।

पांच दिसंबर की सुबह लेफ्टिनेन्‍ट धरमवीर को गश्‍त के दौरान सीमा पर घरघराहट की आवाज़ें सुनाई दीं । जल्‍दी ही इस बात की पुष्टि हो गयी कि पाकिस्‍तानी सेना अपने टैंकों के साथ लोंगेवाला पोस्ट की तरफ बढ़ रही है । फौरन मेजर चांदपुरी ने बटालियन के मुख्‍यालय से संपर्क करके हथियार और फौजियों की टोली को भेजने का निवेदन किया । इस समय तक लोंगेवाला पोस्‍ट पर ज्‍यादा हथियार नहीं थे । मुख्‍यालय से निर्देश मिला कि जब तक मुमकिन हो भारतीय फौजी डटे रहें, पाकिस्‍तानी सेना को आगे ना बढ़ने दिया जाए । मदद भेजी जा रही है ।

लोंगेवाला पोस्‍ट पर पहुंचने के बाद पाकिस्‍तानी टैंकों ने फायरिंग शुरू कर दी और सीमा सुरक्षा बल के पांच ऊंटों को मार गिराया । इस दौरान भारतीय फौजियों ने पाकिस्‍तान के साठ में से दो टैंकों को उड़ाने में कामयाबी हासिल कर ली । संख्‍या और हथियारों में पीछे होने के बावजूद भारतीय सिपाहियों ने हिम्‍मत नहीं हारी । सबेरा हो गया, लेकिन पाकिस्‍तानी सेना लोंगेवाल पोस्‍ट पर क़ब्‍ज़ा नहीं कर सकी । भारतीय वायुसेना के हॉकर हंटर एयरक्राफ्ट में night vision उपकरण नहीं लगे थे इसलिए दिन का उजाला होने तक वायुसेना हमला नहीं कर सकती थी । बहरहाल दोपहर तक भारतीय हवाई हमले ने पाकिस्‍तानी सेना के चालीस टैंकों और सौ गाडि़यों को तबाह कर दिया और उसकी कमर तोड़ दी । इस बीच थल-सेना की मदद भी आ पहुंची और पाकिस्‍तान को यहां से पीछे हटना पड़ा ।

विकीपीडिया के बाद अब लोंगेवाल की लड़ाई की कहानी सुनिए एयरमार्शल एम एस बावा की ज़बानी-- ये लेख भी मुझे इंटरनेटी छानबीन के बाद ही हासिल हुआ है । पढिये इसके संपादित अंशों का अनुवाद:

तीन दिसंबर 1971 को जब पाकिस्‍तानी वायुसेना ने अमृतसर, अवंतीपुर, पठानकोट, उत्‍तरलई, अंबाला, आगरा, नल और जोधपुर पर हवाई हमले कर दिए थे । पाकिस्‍तानी सेना का फोकस था लोंगेवाला पोस्‍ट पर । वो भारतीय सरज़मीं का ज्‍यादा से ज्‍यादा हिस्‍सा हड़प लेना चाहते थे । पांच दिसंबर की सुबह बेस कमान्‍डर को एक रेडियो-संदेश आया कि पाकिस्‍तानी सेना टैंकों के साथ रामगढ़ की तरफ बढ़ रही है । जितनी जल्‍दी हो सके छानबीन की जाए । भारतीय वायुसेना के पहले दो हंटर विमानों ने जब उड़ान भरी तो लोंगेवाला पर पाकिस्‍तानी सेना का हमला जारी था, हालांकि वो बहुत ज्‍यादा कामयाबी नहीं हासिल कर पाई थी । फ्लाईट लेफ्टिनेन्‍ट डी.के.दास और फ्लैग ऑफीसर आर.सी.गोसाईं अपने विमान को काफी कम ऊंचाई पर लेकर आए और पाकिस्‍तान के T-59 टैंकों पर निशाना साधा । अब लड़ाई भारतीय वायुसेना और पाकिस्‍तान तोपख़ाने के बीच थी । हमारे हवाई जांबाज़ पाकिस्‍तानी टैंकों को ध्‍वस्‍त कर रहे थे । पर पाकिस्‍तानी सेना लोंगेवाल की ओर बढ़ती चली जा रही थी । एक के बाद एक भारतीय वायुसेना के विमान उड़ान भर रहे थे और हमले कर रहे थे । आखिरकार पांच और छह दिसंबर को लगातार हमले करने के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्‍तानी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर ही दिया । पूरी कहानी यहां पढ़ें ।

लोंगेवाल की लड़ाई के अनुभव भारतीय वायुसेना के विंग कमान्‍डर कुक्‍के सुरेश ने भी लिखी है । जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं । कुल मिलाकर रामगढ़ जैसलमेर की यात्रा के दौरान भारत और पाकिस्‍तान के बीच हुई 1971 की लड़ाई के इस अध्‍याय की वो रोमांचक कहानियां सुनने मिलीं, जिनके बारे में मुझे ज्‍यादा नहीं पता था । आपको बता दें कि इस लड़ाई के ठीक एक साल बाद अपन इस दुनिया में आए थे । बहरहाल इन इलाक़ों में जाना और इनके सामरिक महत्‍त्‍व को समझना अपने आप में एक रोमांचक अनुभव रहा । आईये कुछ तस्‍वीरें दिखा दी जाएं । 

 

बार्डर पिलर 638 जो अब एक स्‍मारक है ।

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लोंगेवाल-युद्ध का स्‍मारक, जिस पर इस लड़ाई में हिस्‍सा लेने वाले सभी सैनिकों के नाम लिखे हैं । और रूडयार्ड किपलिंग की ये उक्ति भी लिखी है:

HOW BETTER CAN A MAN DIE THAN FACING FEARFUL ODDS FOR THE ASHES OF HIS FATHERS AND TEMPLES OF HIS GODS: KIPLING

WE REMEMBER

 

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168 फील्‍ड रेजीमेन्‍ट युद्ध सम्‍मान लोंगेवाला ।

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इस श्रृंखला की अन्‍य कडि़यां--

1.पहला भाग--रामदेवरा

2.दूसरा भाग--रामगढ़ में संगीत-संध्‍या

3.तीसरा भाग-सीमा प्रहरियों के विश्‍वास का केंद्र तन्‍नोट

4.चौथा भाग-सीमा, सिपाही और सनसनी

अपनी प्रतिक्रियाएं बताते रहिए । अगली कड़ी में की जाएगी थार रेगिस्‍तान में ऊंटों की सैर ।

Sunday, March 2, 2008

जैसलमेर यात्रा चौथी कड़ी--सीमा, सिपाही और सनसनी.....

तरंग पर इन दिनों मैं अपनी जैसलमेर यात्रा का ब्‍यौरा लिख रहा हूं । जैसलमेर-जोधपुर की ये यात्रा अनुभवों से इतनी संपन्‍न रही है कि अभी दो दिन पहले मैं सोच रहा था कि ये श्रृंखला तो बड़ी लंबी हो जाएगी । क्‍या लंबी श्रृंखलाओं में रस बना रहता है । इस माथापच्‍ची को सिर झटककर इसलिए भी भुला दिया कि मैं स्‍वयं अपनी इस यात्रा का डॉक्‍यूमेन्‍टेशन कर लेना चाहता हूं ताकि सनद रहे । स्‍मृति पर समय की दूसरी परतों के चढ़ने से पहले अच्‍छा है कि उनका बैकअप ले लिया जाए । Happy

आपको याद होगा कि पिछली कड़ी में हम तन्‍नोट तक पहुंच गये थे । अब यहां से भारत-पाक सीमा की ओर जाना है । फिर हम लोंगेवाल में रची गयी भारतीय सेना की शौर्य गाथा को दोहराएंगे ।

.... दो सगे मुल्कों के बीच एक सरहद है....ढेर सारी जि़द है....अपार राजनीति है...नफ़रत है...और साझा संस्कृंति की बीच कंटीली बाड़ है...।

अपनी इस कड़ी में मैं भारत पाक सीमा पर बनी सीमा सुरक्षा बल की उन पोस्‍टों के नाम नहीं दे रहा हूं जहां हम गए थे । आज तकरीबन एक महीने बाद भी रोमांच का वो अहसास बिल्‍कुल वैसा का वैसा है, जो भारत-पाक सीमा पर जाने पर हुआ था । फिर ये भी लगा कि जहां सिविलियन्‍स नहीं जा सकते, वहां अपने काम के सिलसिले में जा पहुंचना हमारा सौभाग्‍य ही तो था ।

भारत-पाकिस्‍तान की सीमा को लेकर मुझे हमेशा से तकलीफ़ होती रही है । अफ़सोस है कि इतिहास की करवट ने इस विशाल देश के दो टुकड़े कर दिये और सरहद के उस पार वाला हिस्‍सा हमारे लिए एक कहानी बनकर रह गया । मुझे याद है कि बचपन से ही मैं अपने परिवार में दादाजी के भाई के विभाजन के वक्‍त पाकिस्‍तान चले जाने की कहानियां सुना करता था । दादी बताती थीं कि कैसे मेरे पैतृक गांव हिन्‍डोरिया से मेरे परदादा सभी को लेकर विभाजन के दौरान जबलपुर चले गये थे । वहां से एक भाई पाकिस्‍तान की ओर चले गये और बाक़ी सभी अपने गांव लौट आए । इसके अगले साल मेरे पिताजी का जन्‍म हुआ । अस्‍सी के दशक में हमारे ख़ानदान के उस हिस्‍से से कुछ लोग भारत के दौरे पर आए । बड़ी दिलचस्‍प यादें हैं वो...मेरी पीढ़ी के लोग थे । ख़ानदान की दो शाखाओं के लोग...एक दूसरे से अपरिचित । कौतुहल से इस देस-परदेस को देखते । मिथुन चक्रवर्ती को मिथन पुकारते...उसकी फिल्‍मों के फैन । हालांकि उसके बाद हमारा ज्‍यादा संपर्क नहीं रहा । एक सपना है उस ओर जाकर उन तमाम लोगों से मिलने का ।

जब मैं रामगढ़ में भारत-पाकिस्‍तान की सीमा पर गया तो उस कंटीली बाड़ को देखकर पहला अहसास यही हुआ कि यहां से वो शहर कुछ ही घंटों की दूरी पर होगा । लेकिन दो सगे मुल्‍कों के बीच एक सरहद है....ढेर सारी जि़द है....अपार राजनीति है...नफ़रत है...और साझा संस्‍कृति की बीच कंटीली बाड़ है...। बहरहाल......इस दास्‍तान से बाहर आता हूं और आपको दिखाता हूं एकदम सरहद पर लहराता तिरंगा.... 

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सीमा पर पहुंचते ही हमें अजीब-सी सनसनी का अहसास हुआ । ये भी लगा कि किन मुश्किल हालात में सीमा सुरक्षा बल के सिपाही सीमाओं की हिफ़ाज़त करते हैं । इस पोस्‍ट के युवा-कमांडर ने हमें यहां की कार्यप्रणाली के बारे में बताया । यहीं पर पैंतालीस फुट ऊंचा ये वॉच-टावर भी था, जिस पर चढ़ने का लोभ-संवरण मैं और मेरे कुछ इंजीनियर नहीं कर पाए । इस पर चढ़ने के बाद कुछ नज़र नहीं आया सिवाय बंजर सरज़मीं के । दोनों तरफ़ वीराना...कहते हैं कि ऐसे हालात में सीमा-सुरक्षा-बल के सिपाही रायफल और रेडियो के सहारे अपना समय काटते हैं ।

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यहां गर्मियों में तापमान तकरीबन पचास डिग्री सेल्सियस और सर्दियों में दो डिग्री सेल्सियस से भी कम हो जाता है । ज़रूरत का हर सामान दूर से लाना पड़ता है । यानी दिक्‍कतें ही दिक्‍कतें । अपनी आम जिंदगी में कभी हमें ये अहसास भी नहीं होता कि हम जिस बेफिक्री से अपना जीवन जीते हैं, देश का कामकाज चलता है, उसमें कहीं ना कहीं इन सिपाहियों का ज़बर्दस्‍त योगदान है । इन सिपाहियों से बातें करना एक दिव्‍य-अनुभव था ।

.... ख़ानदान की दो शाखाओं के लोग...एक दूसरे से अपरिचित । कौतुहल से इस देस-परदेस को देखते । मिथुन चक्रवर्ती को मिथन पुकारते...उसकी फिल्मों के फैन ...।

हम आपको बता दें कि यहां हमने इन फौजियों के साथ 'जयमाला संदेश' और 'मनचाहे गीत' कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग की । 'जयमाला संदेश' का कन्‍सेप्‍ट है फौजियों के संदेश उनके परिवार वालों के नाम और उनके परिवार वालें के संदेश फौजियों के नाम । और 'मनचाहे गीत' का कंसेप्‍ट तो आप जानते ही हैं--फ़रमाईशी फिल्‍मी गीत । यहां कोई मणिपुर का था, तो कोई उड़ीसा का, कोई बंगाल का तो कोई झारखंड, बिहार, राजस्‍थान, म.प्र., कर्नाटक और तमिलनाडु का । दिलचस्‍प थीं इन फौजियों की फ़रमाईशें । मैं हमेशा से कहता हूं कि कौन सा गाना किसे और किस तरह रिलेट करे कह नहीं सकते । ज़रूरी नहीं है कि मशहूर फिल्‍में और उनके गीत ही लोगों पर असर डालें । ज्‍यादातर फ़रमाईशें थीं कम मशहूर फिल्‍मों की--जैसे 'सैनिक', 'पाले खां', 'जान' जैसी फिल्‍मों के गीत । किसी ने अपनी फेवरेट हीरोईन करीना कपूर बताई तो किसी ने बताया कि उन्‍हें सन्‍नी देओल पसंद हैं क्‍योंकि वो दमदार हीरो हैं ।

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साल में एक या दो बार छुट्टियों में घर जाना, परिवार को याद करते हुए गाने गाना, चिट्ठियों की बजाय महीने में एक बार फोन पर बातें करना...कितनी कितनी बातें बताई गयीं हमें । ये वो लोग थे जिनके लिए विविध भारती सबसे ज्‍यादा महत्‍त्‍वपूर्ण थी, जिन्‍होंने हमसे सबसे ज्‍यादा प्‍यार किया । और जो हमें देखकर फूले नहीं समाए । मेरे कैमेरे की नज़र से देखिए उन ऊंटों को जिन पर सीमा सुरक्षा बल के प्रहरी सरहद पर गश्‍त लगाते हैं । 

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सीमा-सुरक्षा-चौकी पर जाकर रिकॉर्डिंग करने के इस दिव्‍य अनुभव को शायद शब्‍दों में ठीक ठीक नहीं उतारा जा सकता । आज एक महीने बाद भी जब-तब ज़ेहन में उस अनुभव की छबियां तैर जाती हैं ।

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पिछली पोस्‍ट पर 'विखंडित' जी की टिप्‍पणी थी जिसमें उन्‍होंने तन्‍नोट के पास रेत की टीले और तन्‍नोट मंदिर में घूमते मीठा खाने के शौकीन काले बकरे का जिक्र था । लंबी होती पोस्‍ट की वजह से ये तस्‍वीरें ग़ायब कर दी थीं । लीजिए ये रहीं वो तस्‍वीरें--- 

इस बकरे ने ममता से अच्‍छी दोस्‍ती कर ली और लगातार उसके पीछे पीछे घूमता रहा ।  

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और ये उस टीले से इलाक़े का जायज़ा लेते हम....

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अगली कड़ी में पढि़ये लोंगेवाल की शौर्यगाथा ।

इस श्रृंखला की अन्‍य कडि़यां--

1.पहला भाग--रामदेवरा

2.दूसरा भाग--रामगढ़ में संगीत-संध्‍या

3.तीसरा भाग-सीमा प्रहरियों के विश्‍वास का केंद्र तन्‍नोट

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