बाल पत्रिका चंदामामा से जुडी हैं बचपन की यादें: साठ बरस पूरे कर चुकी है चंदामामा
कई दिनों से इस मुद्दे पर लिखना चाह रहा था । मेरी प्रिय पत्रिका 'चंदामामा' ने इस वर्ष साठ साल पूरे कर लिये । पता नहीं देश भर के अख़बारों ने इस समाचार को कितना सुर्खियों में छापा । पर मेरे लिए ये बहुत खुशी की बात है ।
इस एक ख़बर ने मुझे बचपन में बहुत दूर पहुंचा दिया । जब तेनालीराम और विक्रम वेताल की कहानियों में बड़ा रस आता था । चंदामामा ने हमें भाषाई-संस्कार दिये हैं । बचपन में कहानियों की भूख को शांत किया है । चंदामामा एक नई दुनिया का झरोखा बन जाती थी । इस पत्रिका का बचपन में कितना-कितना इंतज़ार रहता था । मुझे याद है कि भोपाल में अपने बहुत बचपन के दिनों में 'चंदामामा' ने बहुत साथ निभाया था । जब गर्मियों की छुट्टियां आतीं तो हम अपने मुहल्ले की लाइब्रेरी का सहारा लेते । ये कॉमिक्स लाइब्रेरी हुआ करती थी । जिसमें फैन्टम ( वेताल) के साथ साथ चाचा चौधरी, अमर चित्र कथा, फ्लैश गॉर्डन, राजन इकबाल वग़ैरह की कथाएं तो थीं हीं, टिन टिन, टिंकल वग़ैरह भी होती थीं । यहीं चंदामामा, चंपक और नंदन भी हुआ करती थीं । और हम सभी मित्र अलग-अलग लाईब्रेरी की सदस्यता लेते थे । इसका एक फ़ायदा था । सभी एक दो पत्रिकाएं किराए से लाते थे और सभी एक ही दिन में अदला-बदली कर लेते थे । आप कल्पना कर सकते हैं कि कितना पढ़ाकू थे, या कॉमिक्स और पत्रिकाओं के लती थे हम लोग । रोज़ की आधे से एक दर्जन कॉमिक्स और पत्रिकाएं मिलकर पढ़ी जाती थीं । पिछले गुरूवार को जब अमिताभ बच्चन ने 'चंदामामा' के साठ वर्ष पूरे होने पर एक विशेष अंक का विमोचन किया तो जैसे सारी पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं । इसलिए सोचा कि आज आपको चंदामामा से जुड़े कुछ तथ्य बता दिए जाऐं । इस पोस्ट में दी गयी सारी तस्वीरें चंदामामा से साभार हैं । ये रही 1948 में छपे चंदामामा के अंक से ली गयी एक तस्वीर:
विकीपीडिया के मुताबिक़ चंदामामा का पहला अंक जुलाई 1947 में आया था । इस पत्रिका के संपादक हैं बी. नागीरेड्डी और चक्रपाणी । इस पत्रिका को निकालने का मकसद था स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी को भारतीय परंपरा, लोकसंस्कृति, पौराणिक-संपदा और इतिहास से कथाओं के माध्यम से परिचित कराया जा सके । इस पत्रिका के संस्थापक नागीरेड्डी वही बी. नागीरेड्डी हैं जिन्होंने 'राम और श्याम' और 'जूली' जैसी फिल्मों का निर्माण किया । इसी पत्रिका में विक्रम-वेताल श्रृंखला छपी और आगे चलकर इसे एक टी वी धारावाहिक का रूप दिया गया ।
आरंभ में चंदामामा छह हज़ार प्रतियों के साथ तेलुगु और तमिल में ही छपती थी । तमिल में इसका नाम था 'अंबुलीमामा' । बाद में कन्नड़ में भी आई और सन 1949 से इसका हिंदी संस्करण आरंभ हुआ । 1978 से चंदामामा चौदह भारतीय भाषाओं में छपने लगी । 1984 में इसका संस्कृत संस्करण आरंभ हुआ । चंदामामा सन 1947 से 1998 तक लगातार छपती रही । लेकिन 1998 में मज़दूरों से हुए एक विवाद की वजह से इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया । एक साल बाद चंदामामा ने वापसी की और तब से ये लगातार छप रही है । 2004 में इसका संथाली संस्करण भी शुरू हुआ । और ये ऐसी पहली बाल पत्रिका बन गयी जो एक जनजातीय भाषा में छापी जाती है । हिंदी अंग्रेजी और तेलुगु में इसके ब्रेल संस्करण भी निकलते हैं । आज सारे संस्करणों को मिला दिया जाये तो हर महीने चंदामामा की दो लाख्ा प्रतियां बिक रही हैं । सबसे बड़ी बात ये है कि ये स्वत: स्फूर्त बिक्री है । चंदामामा एक भी पैसा अपने विज्ञापन में खर्च नहीं करता । हालांकि इसके संपादक प्रकाशक मानते हैं कि जितनी प्रतियां आज इसकी बिकती हैं उससे करीब चार गुना ज्यादा बिकने लायक़ बाजा़र भारत में है । चंदामामा की सफलता इस बात का संकेत है कि स्तरीय सामग्री के पाठक हर युग में उपलब्ध होते हैं । आज जबकि बड़े बड़े प्रकाशक पत्रिकाओं के ना चलने की दुहाई देते हैं, चंदामामा शान से चल रही है और बिना समझौते के चल रही है ।
बच्चों के लिए जिस तरह का 'कन्टेन्ट' आजकल विदेशी कार्टून नेटवर्कों या विदेशी कन्टेन्ट के सहारे चल रहे देसी नेटवर्कों के ज़रिए परोसी जा रही है उससे बच्चों का क्या हाल हो रहा है, आप अपने घर और पास पड़ोस में देख सकते हैं । चंदामामा ने पौराणिक और भारतीय कथाओं को आधार बनाया । शानदार चित्र दिये और स्तरीय सामग्री के सहारे अपनी सफलता को सुनिश्चित किया । इससे ये भी साबित होता है कि आजकल के बच्चे 'डिज़नी नुमा' सामग्री भले देखें लेकिन भारतीय कन्टेन्ट को नकारते नहीं हैं । जिस तरह की प्रांजल और शुद्ध हिंदी में चंदामामा अपनी कथाएं देता है उससे बच्चों का शब्द भंडार बढ़ता है । मुझे विश्वास है कि अन्य भारतीय भाषाओं में भी चंदामामा भाषाई और सामग्री की शुद्धता या स्तरीयता पर ज़ोर देती होगी ।
चंदामामा के साठ वर्ष पूरे होने पर अमिताभ बच्चन ने चंदामामा के विशेष संस्करण का विमोचन किया । इस दौरान उन्होंने क्या कहा, आप यहां पढ़ सकते हैं । अमिताभ का कहना था कि वे चंदामामा के बचपन से ही फैन रहे हैं । चित्र साभार जागरण याहू समाचार
दिलचस्प बात ये है कि चंदामामा ने टेक्नॉलॉजी के हिसाब से बदलाव भी किये हैं । कुछ बड़ी कंपनियों के साथ इसका समझौता भी हुआ है । चंदामामा की वेबसाईट भी आई है और विभिन्न भाषाओं में इसके पुराने अंक भी डिजिटाईज़ करके उपलब्ध करवा दिये गये हैं । हालांकि आज जब मैंने चंदामामा पर पुराने अंक खोजने चाहे तो वो लिंक काम नहीं कर रहा था । चंदामामा की इस वेबसाईट पर मशहूर चरित्रों के आधार पर भी कहानियों को खोजा जा सकता है । जैसे अकबर बीरबल, विक्रम वेताल, गणेश, कृष्ण, दुष्टु दत्तु, भीम वग़ैरह ।
चंदामामा का साठ वर्ष पूरा करना हम सबके लिए प्रसन्नता की बात है । हमारी प्रिय पत्रिका चंदामामा आज भी उपलब्ध है । मैंने इसे पढ़ने का फैसला किया है और ये भी फैसला किया है कि अब उपहार में बच्चों को हर कहीं यही पत्रिका भेंट की जाएगी । बल्कि कल जब अपने एक सहकर्मी से जिक्र किया तो वो बोले कि मैं आज ही जाकर चंदामामा के सारे उपलब्ध अंक अपने बेटे को दिलवाऊंगा । आपका क्या कहना है । आपकी कौन सी यादें चंदामामा से जुड़ी हैं ।
चंदामामा के संपादक बालशौरी रेड्डी से बातचीत यहां सृजनगाथा में पढि़ए ।




