Sunday, April 27, 2008

बाल पत्रिका चंदामामा से जुडी हैं बचपन की यादें: साठ बरस पूरे कर चुकी है चंदामामा

कई दिनों से इस मुद्दे पर लिखना चाह रहा था । मेरी प्रिय पत्रिका 'चंदामामा' ने इस वर्ष साठ साल पूरे कर लिये । पता नहीं देश भर के अख़बारों ने इस समाचार को कितना सुर्खियों में छापा । पर मेरे लिए ये बहुत खुशी की बात है ।

इस एक ख़बर ने मुझे बचपन में बहुत दूर पहुंचा दिया । जब तेनालीराम और विक्रम वेताल की कहानियों में बड़ा रस आता था । चंदामामा ने हमें भाषाई-संस्‍कार दिये हैं । बचपन में कहानियों की भूख को शांत किया है । चंदामामा एक नई दुनिया का झरोखा बन जाती थी । इस पत्रिका का बचपन में कितना-कितना इंतज़ार रहता था । मुझे याद है कि भोपाल में अपने बहुत बचपन के दिनों में 'चंदामामा' ने बहुत साथ निभाया था । जब गर्मियों की छुट्टियां आतीं तो हम अपने मुहल्‍ले की लाइब्रेरी का सहारा लेते । ये कॉमिक्‍स लाइब्रेरी हुआ करती थी । जिसमें फैन्‍टम ( वेताल) के साथ साथ चाचा चौधरी, अमर चित्र कथा, फ्लैश गॉर्डन, राजन इकबाल वग़ैरह की कथाएं तो थीं हीं, टिन टिन, टिंकल वग़ैरह भी होती थीं । यहीं चंदामामा, चंपक और नंदन भी हुआ करती थीं । और हम सभी मित्र अलग-अलग लाईब्रेरी की सदस्‍यता लेते थे । इसका एक फ़ायदा था । सभी एक दो पत्रिकाएं किराए से लाते थे और सभी एक ही दिन में अदला-बदली कर लेते थे । आप कल्‍पना कर सकते हैं कि कितना पढ़ाकू थे, या कॉमिक्‍स और पत्रिकाओं के लती थे हम लोग । रोज़ की आधे से एक दर्जन कॉमिक्‍स और पत्रिकाएं मिलकर पढ़ी जाती थीं । पिछले गुरूवार को जब अमिताभ बच्‍चन ने 'चंदामामा' के साठ वर्ष पूरे होने पर एक विशेष अंक का विमोचन किया तो जैसे सारी पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं । इसलिए सोचा कि आज आपको चंदामामा से जुड़े कुछ तथ्‍य बता दिए जाऐं । इस पोस्‍ट में दी गयी सारी तस्‍वीरें चंदामामा से साभार हैं । ये रही 1948 में छपे चंदामामा के अंक से ली गयी एक तस्‍वीर: 

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विकीपीडिया के मुताबिक़ चंदामामा का पहला अंक जुलाई 1947 में आया था । इस पत्रिका के संपादक हैं बी. नागीरेड्डी और चक्रपाणी । इस पत्रिका को निकालने का मकसद था स्‍वतंत्रता के बाद की पीढ़ी को भारतीय परंपरा, लोकसंस्‍कृति, पौराणिक-संपदा और इतिहास से कथाओं के माध्‍यम से परिचित कराया जा सके । इस पत्रिका के संस्‍थापक नागीरेड्डी  वही बी. नागीरेड्डी हैं जिन्‍होंने 'राम और श्‍याम' और 'जूली' जैसी फिल्‍मों का निर्माण किया । इसी पत्रिका में विक्रम-वेताल श्रृंखला छपी और आगे चलकर इसे एक टी वी धारावाहिक का रूप दिया गया ।

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आरंभ में चंदामामा छह हज़ार प्रतियों के साथ तेलुगु और तमिल में ही छपती थी । तमिल में इसका नाम था 'अंबुलीमामा' । बाद में कन्‍नड़ में भी आई और सन 1949 से इसका हिंदी संस्‍करण आरंभ हुआ । 1978 से चंदामामा चौदह भारतीय भाषाओं में छपने लगी । 1984 में इसका संस्‍कृत संस्‍करण आरंभ हुआ । चंदामामा सन 1947 से 1998 तक लगातार छपती रही । लेकिन 1998 में मज़दूरों से हुए एक विवाद की वजह से इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया । एक साल बाद चंदामामा ने वापसी की और तब से ये लगातार छप रही है । 2004 में इसका संथाली संस्‍करण भी शुरू हुआ । और ये ऐसी पहली बाल पत्रिका बन गयी जो एक जनजातीय भाषा में छापी जाती है । हिंदी अंग्रेजी और तेलुगु में इसके ब्रेल संस्‍करण भी निकलते हैं । आज सारे संस्‍करणों को मिला दिया जाये तो हर महीने चंदामामा की दो लाख्‍ा प्रतियां बिक रही हैं । सबसे बड़ी बात ये है कि ये स्‍वत: स्‍फूर्त बिक्री है । चंदामामा एक भी पैसा अपने विज्ञापन में खर्च नहीं करता । हालांकि इसके संपादक प्रकाशक मानते हैं कि जितनी प्रतियां आज इसकी बिकती हैं उससे करीब चार गुना ज्‍यादा बिकने लायक़ बाजा़र भारत में है । चंदामामा की सफलता इस बात का संकेत है कि स्‍तरीय सामग्री के पाठक हर युग में उपलब्‍ध होते हैं । आज जबकि बड़े बड़े प्रकाशक पत्रिकाओं के ना चलने की दुहाई देते हैं, चंदामामा शान से चल रही है और बिना समझौते के चल रही है ।

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बच्‍चों के लिए जिस तरह का 'कन्‍टेन्‍ट' आजकल विदेशी कार्टून नेटवर्कों या विदेशी कन्‍टेन्‍ट के सहारे चल रहे देसी नेटवर्कों के ज़रिए परोसी जा रही है उससे बच्‍चों का क्‍या हाल हो रहा है, आप अपने घर और पास पड़ोस में देख सकते हैं । चंदामामा ने पौराणिक और भारतीय कथाओं को आधार बनाया । शानदार चित्र दिये और स्‍तरीय सामग्री के सहारे अपनी सफलता को सुनिश्‍चित किया । इससे ये भी साबित होता है कि आजकल के बच्‍चे 'डिज़नी नुमा' सामग्री भले देखें लेकिन भारतीय कन्‍टेन्‍ट को नकारते नहीं हैं । जिस तरह की प्रांजल और शुद्ध हिंदी में चंदामामा अपनी कथाएं देता है उससे बच्‍चों का शब्‍द भंडार बढ़ता है । मुझे विश्‍वास है कि अन्‍य भारतीय भाषाओं में भी चंदामामा भाषाई और सामग्री की शुद्धता या स्‍तरीयता पर ज़ोर देती होगी ।

चंदामामा के साठ वर्ष पूरे होने पर अमिताभ बच्‍चन ने चंदामामा के विशेष संस्‍करण का विमोचन किया । इस दौरान उन्‍होंने क्‍या कहा, आप यहां पढ़ सकते हैं । अमिताभ का कहना था कि वे चंदामामा के बचपन से ही फैन रहे हैं । चित्र साभार जागरण याहू समाचार

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दिलचस्‍प बात ये है कि चंदामामा ने टेक्‍नॉलॉजी के हिसाब से बदलाव भी किये हैं । कुछ बड़ी कंपनियों के साथ इसका समझौता भी हुआ है । चंदामामा की वेबसाईट भी आई है और विभिन्‍न भाषाओं में इसके पुराने अंक भी डिजिटाईज़ करके उपलब्‍ध करवा दिये गये हैं । हालांकि आज जब मैंने चंदामामा पर पुराने अंक खोजने चाहे तो वो लिंक काम नहीं कर रहा था । चंदामामा की इस वेबसाईट पर मशहूर चरित्रों के आधार पर भी कहानियों को खोजा जा सकता है । जैसे अकबर बीरबल, विक्रम वेताल, गणेश, कृष्‍ण, दुष्‍टु दत्‍तु, भीम वग़ैरह ।

चंदामामा का साठ वर्ष पूरा करना हम सबके लिए प्रसन्‍नता की बात है  । हमारी प्रिय पत्रिका चंदामामा आज भी उपलब्‍ध है । मैंने इसे पढ़ने का फैसला किया है और ये भी फैसला किया है कि अब उपहार में बच्‍चों को हर कहीं यही पत्रिका भेंट की जाएगी । बल्कि कल जब अपने एक सहकर्मी से जिक्र किया तो वो बोले कि मैं आज ही जाकर चंदामामा के सारे उपलब्‍ध अंक अपने बेटे को दिलवाऊंगा । आपका क्‍या कहना है । आपकी कौन सी यादें चंदामामा से जुड़ी हैं ।

चंदामामा के संपादक बालशौरी रेड्डी से बातचीत यहां सृजनगाथा में पढि़ए ।

Monday, April 21, 2008

मल्‍टीप्‍लेक्‍स: कुछ दिलचस्‍प शब्‍‍द चित्र ।

शनिवार को मुंबई के एक मल्‍टीप्‍लेक्‍स में एक ताज़ा फिल्‍म देखी । बातें तो फिल्‍म की करनी थीं । लेकिन सिनेमाहॉल में कुछ दिलचस्‍प घटनाओं पर नज़र पड़ी । प्रस्‍तुत हैं सिनेमाहॉल के कुछ दृश्‍यों के शब्‍द-चित्र :

1. फिल्‍म शुरू होने में पंद्रह मिनिट बाक़ी हैं । मल्‍टीप्‍लेक्‍स के मुख्‍य-द्वार पर सिक्‍युरिटी ने एक बंदे को रोक रखा है । बहस जारी है । बंदे का कहना है कि ये बिस्किट और सॉफ्ट-ड्रिंक ही तो है । सिक्‍यूरिटी का कहना है कि बिस्किट not allowed है । मल्‍टीप्‍लेक्‍स में जो खाना-पीना है भीतर ही खाना-पीना है । आप चाहें तो बाहर रखिए । लौटते में लेकर जाईये । बंदा मानने को तैयार नहीं है । बहस जारी है ।

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2. हॉल के भीतर । अटेन्‍डेन्‍ट सभी को उनकी सीटें बता रहे हैं । 

निवेदन- excuse me....शायद आप मेरी सीट पर हैं ।

जवाब--नहीं नहीं ये तो हमारी ही सीट है । F-5 ही तो है ।

निवेदन-ओहो F-5 नहीं है, F-7 है । आप दो सीट आगे आ गये हैं ।

जवाब- ओह सॉरी, आईये आप बैठिये ।

निवेदन खीझ में बदल जाता है--ओफ्फो these old men...so irritating.....!!!!

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3.हॉल के भीतर । अगला दृश्‍य लड़का: 'तुमसे कहा था ना कॉर्नर सीट लो, पर तुम हो कि....'

लड़की-'खुद देखना था नेट पे...पता भी है कितनी कम सीट बाकी थीं । एक तो पहले से डिसाइड नहीं करोगे और फिर..'

लड़का- 'तुम तो बस इल्‍जाम लगाओगे, मजबूरियां नहीं समझोगी, मैं ऑफिस में कोई घास नहीं छील रहा था'

लड़की- 'अब बस भी करो मूड खराब मत करो'

लड़का- 'ओह डार्लिंग dont you know, how much I love you' ।

लड़की-ओहो क्‍या कर रहे हो, बगल वाले अंकल देख रहे हैं ।

4. हॉल के भीतर । फिल्‍म शुरू होने में दो मिनिट बाक़ी हैं ।

बच्‍चा: मम्‍मी, पॉपकॉर्न चाहिए मुझे ।

मम्‍मी: ओहो इंटरवल में खाएंगे बच्‍चे ।

बच्‍चा: मम्‍मी देखो साइड में बैठा वो लड़का, उस लड़की को kiss कर रहा है ।

मम्‍मी: छी बेटे यहां वहां मत देखो सीधे बैठो । वरना अभी घर ले चलूंगी । these people na...they are so desperate.....

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5. फिल्‍म शुरू होने से ठीक पहले । राष्‍ट्रगान का बजना शुरू । जन गण मन.......

लड़की- 'खड़े हो ना । national anthem है । सब खड़े हैं । मुझे emberess मत करवाओ ।

लड़का- ओहो dont you know..how tired I am....I respect national anthem....but i cant stand.

लड़की- तुम खड़े होते हो या नहीं.....वरना मैं ये चली ।

लड़का- ओहो लो खड़ा हो गया ।

...................जय जय जय जय हे ।।

इसके बाद फिल्‍म शुरू होती है । बाकी शब्‍दचित्र फिर कभी ।


 

Friday, April 11, 2008

नाम है पवन, भदोही से भागकर आया हूं सर ।।

पिछले अठारह बीस दिनों से घर पर रेनोवेशन का काम चल रहा है । हम ईंट गारे और व्‍हाइट सीमेन्‍ट से सराबोर हैं । अजब-ग़ज़ब अनुभव हो रहे हैं । इस तरह के अनुभवों से गुजर चुके लोग जानते हैं कि घर के रेनोवेशन या निर्माण का काम मेंढक तौलने जैसा है, इलेक्‍ट्रीशिन का इंतज़ाम करो, तो प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस का काम करने वाला ग़ायब । उसे खोजो तो पता चला कि कडि़या कहीं और काम लगाकर बैठा है । यहां मज़दूर भेज दिया हैं वो कर रहे हैं मन-मर्जी से काम । इसी तरह के भागम-भाग और अस्‍त-व्‍यस्‍त माहौल में हुए कुछ अनोखे अनुभव में से एक है पवन से मुलाक़ात ।

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हुआ ये कि हमने एक महाशय को प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस से हॉल में सजावट का काम दिया, जिनका नाम था वसंत कुमार । उत्‍तरप्रदेश के किसी इलाक़े के होते हैं ये वसंत । जिन्‍होंने थोड़ी रकम पेशगी मांगी और ग़ायब....किसी और को भेज दिया काम करने । वो आया थोड़ा काम शुरू किया और वो भी ग़ायब । फिर हम दोनों पति-पत्‍नी ने वसंत की खूब ख़बर ली और उसे ताकीद किया कि इतने दिनों में काम ख़त्‍म होना चाहिए वरना.....। तो ये वसंत माफी़ वग़ैरह का नाटक करते हुए अपना सामान लेकर पधारे । साथ में एक लड़का था । दुबला पतला । मूंछों के बाल अब आ रहे थे । उम्र पंद्रह-सोलह साल । आते ही वसंत काम में जुट गए । पहला निर्देश दिया गया इस लड़के को कि ये तसले में प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस घोले, मुंबई की भाषा में ....घमेले में माल तैयार करे । छोटू ने जिस तरह काम शुरू किया उससे मेरी समझ में आ गया कि बच्‍चा नया है । और कुछ तो गड़बड़ है ।

उस दिन ज़रा व्‍यस्‍तता रही मटेरियल वग़ैरह ख़रीदने की । लोगों को मैनेज करने की इसलिए बालक पर ध्‍यान नहीं गया । लेकिन आज जब दोपहर को कहीं से लौटे तो पाया कि ये छोटू हॉल के बीचोंबीच कुर्सी पर मस्‍ती से बैठा है । हम भी जगह बनाकर बैठ गये । जिस कमरे में प्‍लास्‍टर ऑ‍फ पेरिस का काम हो रहा हो उसकी दुर्दशा देखने जैसी होती है, फिर सनद ये कि यहां कारपेन्‍टर भी काम कर रहा है और फर्नीचर पर पॉलिश करने वाला भी । ख़ैर सब कारीगर दोपहर की सुस्‍ती में थे तो हम बालक से गपियाने बैठ गए ।

नाम पूछा तो पता चला कि ये महाशय हैं पवन कुमार मौर्य । बातों बातों में पवन कुमार ने बताया कि जब वो पहले दिन काम पर आया था और मेरी आवाज़ सुनी थी तो पहचान गया था कि मैं विविध भारती पर यूथ एक्‍सप्रेस प्रस्‍तुत करने वाला यूनुस हूं । लेकिन हिम्‍मत नहीं हुई पूछने की । पवन ने ये भी बताया कि काम के दौरान उसे एक पोस्‍टकार्ड पड़ा नज़र आया जो विविध भारती के पते पर आया था । और उसमें मेरे बारे में कुछ लिखा था । तब तो उसे पूरा यक़ीन हो गया कि मैं वही विविध भारती वाला बंदा हूं । मैंने उसके इस संशय को दूर किया और बताया कि मैं वही हूं । तो उसने सबसे पहले हाथ मिलाया और बोला- सर आपसे मिलकर हमें बहुत खुशी हुई है । हम आपके कार्यक्रम को बहुत ध्‍यान से सुनते हैं । चूंकि इसमें सामान्‍य ज्ञान की बातें होती हैं इसलिए हम उन्‍हें नोट भी करते चलते हैं । पवन का कहना था कि उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वो हमसे इस तरह मिलेगा ।

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बहरहाल अब असली बातें शुरू हुईं । मैंने पवन से पूछा कि वो मुंबई में कब से है । तो उसने बताया कि पिछले तकरीबन एक महीने से वो यहां है । मैंने फौरन सवाल दाग़ा भागकर आए हो ना । ऊपर जो तस्‍वीर आपने देखी, ये उस सवाल के जवाब देने से पहले की उसकी तस्‍वीर है । जो मैंने अपने मोबाइल फोन से खींची है । उसने स्‍वीकार कर लिया कि वो भागकर आया है । मैंने पूछा पवन कुमार बात क्‍या है, सौतेली मां वाला मामला है या खूंखार पिता वाला या फिर प्‍यार मुहब्‍बत की कहानी है । कहीं तुम हीरो या गायक बनने तो नहीं आए हो । तो पवन मुस्‍कुराकर बोला कि नहीं साहब ऐसी बात नहीं है । हम पढ़ाई में ठीक-ठाक हैं । अच्‍छे घर के हैं । भदोही के लोहारखास गांव के हैं और पिता का नाम है श्री जल्‍लूराम मौर्या । हमारे घर में क़ालीन की फिनिशिंग का काम होता है । मैंने पूछा तो उसने बताया कि क़ालीन जब बनकर आते हैं तो उनमें काफी ग़ल‍तियां होती हैं । उसके पिता क़ालीनों की फिनिशिंग करके उन्‍हें सही रूप देते हैं । घर है अपना स्‍वयं का । आर्थिक परेशानियां भी नहीं हैं । वो विज्ञान का विद्यार्थी है, नवीं कक्षा में पढ़ता है । अगले महीने में परीक्षाएं होने वाली हैं । भदोही के कारपेट बुनकरों के विकट जीवन के बारे में पढ़ें सदासिवन की इस वेबसाइट पर

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मेरी परेशानी बढ़ती जा रही थी । मैंने उससे पूछा- अरे भई जब सब ठीक था तो भाग क्‍यूं आए । पवन ने बताया कि गांव के कुछ लड़के मुंबई घूमने आ रहे थे । उसने सोचा कि इस समय माता पिता से पूछेंगे तो अनुमति नहीं मिलेगी । इसलिए चुपके से उनके साथ हो लिया । सीधे बोरीवली पहुंचा । जो साथ में आए लड़के थे, वो गांजा-भांग पीने लगे । पवन को कुछ ठीक नहीं लगा । वो मायानगरी मुंबई में यहां-वहां भटकने लगा । मुंबई के सुदूर उपनगर विरार में एक माता जीवदानी का मंदिर है, एक दिन वहां बिता लिया । फिर कालबादेवी गया और मुंबई की ग्राम देवी- मुंबादेवी के दर्शन किए । इसी तरह और भी भटका । इस चक्‍कर में हुआ ये कि पवन की जेब में रखो डेढ़ हज़ार रूपए किसी ने पार कर लिये । इस तरह पवन का फिल्‍में देखने का और घूमने का सिलसिला रूक गया । मैंने पवन से पूछा कि उसने यहां कौन कौन सी फिल्‍में देखीं तो उसने बताया कि सैफ़ अली ख़ान की फिल्‍म रेस देखी उसने । एक भोजपुरी फिल्‍म भी देखी । और उसके प्रिय हीरो संजय दत्‍त हैं क्‍योंकि जब वो मुन्‍नाभाई बनते हैं तो उसे बहुत अच्‍छा लगता है ।

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वैसे पवन ने ये भी बताया कि उसके प्रिय हीरो तो मिथुन चक्रवर्ती हैं क्‍योंकि वो डान्‍स बहुत अच्‍छा करते हैं और वो अपने गांव में सी डी पर मिथुन की फिल्‍में बहुत देखता है । उसकी प्रिय हीरोइन माधुरी दीक्षित है और उसे अफ़सोस है कि माधुरी ने फिल्‍मों को लगभग छोड़ दिया है । बस 'आजा नच ले' में नज़र आई थी । इन दिनों पवन मुंबई की एक झोपड़ पट्टी में रहता है । जेब कटने के बाद पेट भरने के लिए उसे पैसों की जरूरत थी । ऐसे में प्‍लास्‍टर ऑफ पेरिस से मोल्डिंग का काम करने वाले वसंत ने उसे अपने साथ रख लिया । और वही उसे लेकर हमारे घर पर आया था । वसंत का कहना है कि पवन के नखरे बहुत हैं । और पवन का कहना है कि उससे ग़लती हो गयी जो वो घर से भाग आया वरना उसे ये काम नहीं करना पड़ता । उसके मांबाप को बता चलेगा तो वो पता नहीं क्‍या सोचेंगे । उसने मुंबई आने के बाद सबसे पहले अपने घर में फोन किया और बताया कि वो घूमने मुंबई आया है और जल्‍दी ही लौटेगा । उसके बाद से वो नियमित रूप से उनसे फोन पर बतियाता रहता है । मां बाप का कहना है कि वो जल्‍दी घर आ जाए । pavan

पवन ने बताया कि वो रेडियो बहुत सुनता है । और उसे ज्‍यादातर उद्घोषकों की आवाज़ें पसंद आती हैं । चूंकि रेडियोसखी ममता घर के काम का अवलोकन सबेरे शाम करती ही हैं दिन भर तो वो ऑफिस में होती हैं । तो बसंत को उनकी बातें सुनना अच्‍छा लगता है । उसने ये भी बताया कि कल शाम जब वो वसंत को डांट रही थीं तो उसे बहुत मज़ा आ रहा था । उसका कहना है कि ममता जी डांटती भी हैं तो लगता है कि रेडियो चल रहा है । .....सुना आपने ममता की सारी डांट का सत्‍यानाश हो गया । मेरा मतलब मुझे एक नुस्‍खा मिल गया । ममता अब मुझे भी डांटे तो मैं यही समझ लिया करूंगा कि मैं रेडियो सुन रहा हूं ।

पवन कहता है कि मुंबई आकर उसका क्‍या हाल हो गया है । पर वो खुश है उसे जिंदगी के नये अनुभव हुए हैं । उसे ये समझ में भी आया है कि घर से अनायास भागना नहीं चाहिए । उसे ये भी लगा है कि अच्‍छा हुआ कि वसंत उसे मिल गया तो वो काम करने लगा । वरना गुंडे बदमाशों की संगति में आ जाता तो क्‍या होता । जिन साथियों के साथ वो यहां आया था वो तो छोटे मोटे काम करके दारू पीने लगे हैं । पर पवन वापस लौटने के पैसे जमा कर रहा है । वो घर लौटना चाहता है । और अपनी कमाई से लौटना चाहता है । उसका कहना है कि अगले महीने परीक्षाओं से पहले वो घर लौट जाएगा और डटकर पढ़ेगा ।

पवन को हमारी शुभकामनाओं की ज़रूरत है ।

Tuesday, April 8, 2008

पालीवालों के प्राचीन-रहस्‍यमय गांव कुलधरा की तस्‍वीरें और इतिहास ।

तरंग पर मैं अपनी जैसलमेर यात्रा की डायरी लिख रहा हूं । जो लगातार अनियमित होती जा रही है । निजी और पेशेवर जिंदगी की व्‍यस्‍तताएं उस तरह का सुकून नहीं दे पा रही हैं जिनमें एक एक लम्‍हे को याद करके डायरी पर उतारा जा सके । पिछली पोस्‍ट थी जैसलमेर के किले के बारे में । जिसमें मैंने आपको बताया था कि किस तरह सारा शहर किले में बसा है ।

अब आपको बता दूं कि हड़बड़ी में जैसलमेर का किला देखने के बाद हम सीमा सुरक्षा बल के जैसलमेर परिसर में पहुंचे और वहां युद्ध में विधवा हुई स्त्रियों तथा फौजियों के परिवार की अन्‍य महिलाओं की रिकॉर्डिंग की गयी । चूंकि महिलाओं की तादाद ज्‍यादा थी इसलिए सखियों के अलावा हमें भी..यानी हम पुरूषों को भी इस कार्यक्रम का संचालन करना पड़ गया । बहरहाल । यहां से एक बहुत ही अहम ठिकाना था हमारा और वो था कुलधरा । कुलधरा पालीवालों का गांव था और पता नहीं क्‍या हुआ कि एक दिन अचानक यहां फल-फूल रहे पालीवाल अपनी इस सरज़मीं को छोड़कर अन्‍यत्र चले गये । उसके बाद से कुलधरा पर कोई बस नहीं सका । कोशिशें हुईं पर नाकाम हो गयीं । कुलधरा के अवशेष आज भी विशेषज्ञों और पुरातत्‍वविदों के अध्‍ययन का केंद्र हैं । कई मायनों में पालीवालों ने कुलधरा को वैज्ञानिक आधार पर विकसित किया था । इसलिए आज मैं आपको कुलधरा के इतिहास के बारे में तो बताऊंगा की साथ ही उसके अनमोल तस्‍वीरें भी दिखलाऊंगा ।

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कुलधरा जैसलमेर से तकरीबन अठारह किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है । सबने कहा था कि जैसलमेर जाएं तो कुलधरा जरूर जाना । कहते हैं कि पालीवाल समुदाय के इस इलाक़े में चौरासी गांव थे और ये उनमें से एक था । मेहनती और रईस पालीवाल ब्राम्‍हणों की कुलधार शाखा ने सन 1291 में तकरीबन छह सौ घरों वाले इस गांव को बसाया था । पालीवालों का नाम दरअसल इसलिए पड़ा क्‍योंकि वो राजस्‍थान के पाली इलाक़े के रहने वाले  थे । पालीवाल ब्राम्‍हण होते हुए भी बहुत ही उद्यमी समुदाय था । अपनी बुद्धिमत्‍ता, अपने कौशल और अटूट परिश्रम के रहते पालीवालों ने धरती पर सोना उगाया था । हैरत की बात ये है कि पाली से कुलधरा आने के बाद पालीवालों ने रेगिस्‍तानी सरज़मीं के बीचोंबीच इस गांव को बसाते हुए खेती पर केंद्रित समाज की परिकल्‍पना की थी । रेगिस्‍तान में खेती । पालीवालों के समृद्धि का रहस्‍य था जिप्‍सम की परत वाली ज़मीन को पहचानना और वहां पर बस जाना । पालीवाल अपनी वैज्ञानिक सोच, प्रयोगों और आधुनिकता की वजह से उस समय में भी इतनी तरक्‍की कर पाए थे ।

पालीवाल समुदाय आमतौर पर खेती और मवेशी पालने पर निर्भर रहता था । और बड़ी शान से जीता था । इतिहास के झरोखों में आगे झांकने से पहले ज़रा कुछ तस्‍वीरों पर एक नज़र डाल लीजिए । कुलधरा के मुख्‍य द्वार पर अपने गाइड के इंतज़ार में बैठे हम तरंगित ।

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कुलधरा के मुख्‍य द्वार पर बंजारा समुदाय का एक वृद्ध बटलोई में खिचड़ी पका रहा था । और पास में बैटरी से चलने वाला रेडियो चल रहा था । हमारे क्‍लीनर ने उसे बताया कि विविध भारती की टोली कुलधरा देखने आई है । और एक फोटो-सेशन हो गया उस बंजारे के साथ । इस तस्‍वीर में बांईं ओर अशोक सोनावने, फिर हम 'तरंगित', महाशय 'बंजारे', 'जिप्‍सी' कमल शर्मा और फिर 'रेडियोसखी' ममता सिंह ।

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दोपहर-ऐ-इंतज़ार में क्‍या क्‍या ना कर बैठे । कभी बस के भीतर लेटे, कभी बस की छत पर बैठे ।

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दरअसल हमारे गाइड पेशे से टीचर और लेखक हैं और आकाशवाणी जैसलमेर के सौजन्‍य से वो हमारे लिए जैसलमेर शहर से पधार रहे थे इसलिए उनके इंतज़ार में इतने पापड़ बेलने पड़े हमें । पालीवालों के इतिहास के बारे में ज्‍यादातर जानकारी हमारे गाइड महोदय ने ही दी है और बाक़ी जानकारियां आपके इस तरंगित लेखक ने इंटरनेटी छानबीन से जमा की हैं । अब तक मैंने आपको बताया कि पालीवाल खेती और मवेशियों पर निर्भर रहते थे और इन्‍हीं से समृद्धि अर्जित करते थे । दिलचस्‍प बात ये है कि रेगिस्‍तान में पालीवालों ने सतह पर बहने वाली पान या ज़मीन पर मौजूद पानी का सहारा नहीं लिया । बल्कि रेत में मौजूद पानी का इस्‍तेमाल किया । पालीवाल ऐसी जगह पर गांव बसाते थे जहां धरती के भीतर जिप्‍सम की परत हो । जिप्‍सम की परत बारिश के पानी को ज़मीन में अवशोषित होने से रोकती और इसी पानी से पालीवाल खेती करते । और ऐसी वैसी नहीं बल्कि जबर्दस्‍त फसल पैदा करते । पालीवालों के जल-प्रबंधन की इसी तकनीक ने थार रेगिस्‍तान को इंसानों और मवेशियों की आबादी या तादाद के हिसाब से दुनिया का सबसे सघन रेगिस्‍तान बनाया । पालीवालों ने ऐसी तकनीक विकसित की थी कि बारिश का पानी रेत में गुम नहीं होता था बल्कि एक खास गहराई पर जमा हो जाता था ।

कुलधरा की वास्‍तुकला के बारे में हमारे गाइड ने कुछ दिलचस्‍प तथ्‍य बताए । उनका कहना था कि कुलधरा में दरवाज़ों पर ताला नहीं लगता था । गांव का मुख्‍य-द्वार और गांव के घरों के बीच बहुत लंबा फ़ासला था । लेकिन ध्‍वनि-प्रणाली ऐसी थी कि मुख्‍य-द्वार से ही क़दमों की आवाज़ गांव तक पहुंच जाती थी । दूसरी बात उन्‍होंने ये बताई कि गांव के तमाम घर झरोखों के ज़रिए आपस में जुड़े थे इसलिए एक सिरे वाले घर से दूसरे सिरे तक अपनी बात आसानी से पहुंचाई जा सकती थी । घरों के भीतर पानी के कुंड, ताक और सीढि़यां कमाल के हैं । कहते हैं कि इस कोण में घर बनाए गये थे कि हवाएं सीधे घर के भीतर होकर गुज़रती थीं । कुलधरा के ये घर रेगिस्‍तान में भी वातानुकूलन का अहसास देते थे । 

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ऐसा उन्नत और विकसित गांव एक दिन अचानक खाली कैसे हो गया । ये एक रहस्‍य ही है ।

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कहते हैं कि जैसलमेर की राजा सालम सिंह को कुलधरा की समृद्धि बर्दाश्‍त नहीं हो रही थी । उसने कुलधरा के बाशिंदों पर भारी कर/टैक्‍स लगा दिये थे । पालीवालों का तर्क था कि चूंकि वो ब्राम्‍हण हैं इसलिए वो ये कर नहीं देंगे । जिसे राजा ने ठुकरा दिया । ये बात स्‍वाभिमानी पालीवालों को हज़म नहीं हुई और मुखियाओं के विमर्श के बाद उन्‍होंने इस सरज़मीं से जाने का फैसला कर लिया । इस संबंध में एक कथा और है । कहते हैं कि जैसलमेर के दिलफेंक दीवान को कुलधरा की एक लड़की पसंद आ गयी थी । ये बात पालीवालों को बर्दाश्‍त नहीं हुई और रातों रात वो यहां से हमेशा हमेशा के लिए चले गये । अब सच क्‍या है ये जानना वाक़ई बेहद मुश्किल है । लेकिन कुलधरा के इस वीरान खंडहर में घूमकर मुझे बहुत अजीब- सा लगा । इन घरों, चबूतरों, अटारियों को देखकर पता नहीं क्‍यों ऐसा लग रहा था कि अभी कोई महिला सिर पर गगरी रखे निकल पड़ेगी या कोई बूढ़-बुजुर्ग चबूतरे पर हुक्‍का गुड़गुड़ाता दिखेगा । बच्‍चे धूल मिट्टी में लिपटे खेलते नज़र आएंगे । पगड़ी लगाए पालीवाल अपने खेतों पर निकल रहे होंगे । पर सच ये है कि सदियों से पालीवालों का ये गांव पूरी तरह से वीरान है ।

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कुलधरा के बारे में एक बात और कहनी है । कुलधरा अभी भी चर्चित पर्यटन-स्‍थल नहीं है । जब हम वहां पहुंचे तो दक्षिण की एक फिल्‍म यूनिट अपनी चर्चित पौराणिक फिल्‍म की शूटिंग कर रही थी । एक बंदा राक्षस बना था जिसने अपनी तस्‍वीरें खिंचाने से इंकार कर दिया । लेकिन विविध भारती के लोगों से बातचीत करके उसे बड़ा मज़ा आया । हमें ये भी पता चला कि कुछ विदेशी पर्यटक यहां इस उम्‍मीद में आते हैं कि पालीवालों ने जो सोना यहां दबा रखा था शायद वो उन्‍हें मिल जायेगा । इसलिए कुलधरा में जगह जगह खुदाई हुई पड़ी है । इसके अलावा शायद चोरी छिपे या घोषित रूप से यहां से पत्‍थरों को खींचकर निकाला जा रहा है और शहर के निर्माण स्‍थलों में इस्‍तेमाल किया जा रहा है । ऐसे वीरान गांवों को देखकर मन बेचैन हो जाता है । शायद कुलधरा का सही डॉक्‍यूमेन्‍टेशन हो सके और सरकार इसे एक पुरातात्‍विक धरोहर का दर्जा दिलवा पाए । अफ़सोस के पालीवालों के वैज्ञानिक रहस्‍य कुलधरा के अवशेषों के साथ ही गुम हो जाएंगे ।

Thursday, April 3, 2008

आज कवि सम्‍मेलन के अखाड़े में बैरागी, निदा, राहत और कुंवर बेचैन साथ में और उनके साथ मैं तरंगित ।

तरंग पर वैसे तो जैसलमेर यात्रा की डायरी का अगला भाग लिखा जाना चाहिए था । लेकिन आज मैं विषय को ज़रा बदल रहा हूं । मुद्दा ये है कि विविध भारती की अपनी नौकरी में रोज़ाना ही नित नए अनुभव होते हैं । लेकिन कुछ दिनों पहले हमने दो बड़े आयोजन किये और इन दोनों आयोजनों के अनुभव एकदम अलग रहे । इन्‍हीं में से एक आयोजन की कहानी आज आपके सामने रखी जा रही है ।

विविध-भारती की स्‍वर्ण-जयंती के मौक़े पर हर महीने की तीन तारीख़ को हो रहे हैं विशेष-आयोजन । और इन आयोजनों ने हमें कुछ दिलचस्‍प अनुभव कराए हैं  । जैसे पिछले कई महीनों से हमारे एक महत्‍त्‍वाकांक्षी कार्यक्रम की योजना तैयार की जा रही थी । जिसका नाम रखा गया था--'प्‍यार की बातें, प्‍यार के गीत' । ये एक कवि-सम्‍मेलन होता, लेकिन कोरा कवि सम्‍मेलन करें तो विविध भारती कैसी । इसलिए सोचा गया कि इस कवि सम्‍मेलन में विविध भारती के मिज़ाज का तड़का लगाया जाये । कवियों से कुछ मुद्दों पर बहस की जाए और उनके प्रिय गीतों पर भी बात की जाए, उन गीतों को भी सुनवाया जाए । तो कुल मिलाकर ज़बर्दस्‍त माथापच्‍ची की गयी । और तब जाकर एक स्‍वरूप तैयार हुआ । कार्यक्रम की जिम्‍मेदारी सौंपी गयी आपके इस दोस्‍त यूनुस खान को । अब ज़रा कवियों की सूची भी तो देख लीजिए । तय हुआ कि दिल्‍ली से पद्मा सचदेव को बुलाया जाये जो कभी विविध भारती में उद्घोषिका रही हैं तो बातों का रस और बढ़ जाएगा । लेकिन पद्मा जी नहीं आ सकीं ।

दूसरा नाम मेरी फ़रमाईश पर मुनव्‍वर राणा का तय किया गया । उन्‍होंने आने की स्‍वीकृति भी दे दी । और फिर ऐन कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग के दिन मुनव्‍वर भाई की फ्लाईट छूट गयी । जब हम उनका इंतज़ार अपने दफ्तर में कर रहे थे उस वक्‍त वो कलकत्‍ता से फ़ोन करके माज़रत चाह रहे थे कि वो इस बार नहीं आ सके तो क्‍या । अगली बार तशरीफ़ लायेंगे । मैंने जब एक दिन पहले बोधिसत्‍व को फोन करके मुनव्‍वर राणा की बातें की तो उन्‍होंने कहा कि वो मुनव्‍वर राणा को सुनने के लिए ज़रूर आयेंगे । हालांकि उन्‍होंने मुनव्‍वर राणा को पहले भी सुन रखा है । मुझ अज्ञानी को बोधिसत्‍व ने मुनव्‍वर भाई की कुछ पुस्‍तकों के नाम भी बताए । और उनके शेर भी सुनाए । और हां इस बात का वादा भी किया कि अगर मैं उनके घर आ जाऊं तो मुझे वो पुस्‍तकें पढ़ने को दी जा सकती हैं । यानी मुनव्‍वर राणा की पुस्‍तकों को हासिल करने के लिए अपन जल्‍दी ही बोधिसत्‍व के घर जा धमकने वाले हैं । फिलहाल आईये मुनव्‍वर राणा के कुछ शेर सुने जाएं, मेरा मतलब पढे जाएं । रेडियो की आदत जो लगी है, मुझे लगा मैं सुनवा ही डालूंगा । पढिये पढिये ।

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊं

माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं

कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर

ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं

सोचता हूं तो छलक उठती हैं मेरी आँखें

तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊं ।।

तो भई मुनव्‍वर भाई की किस्‍मत, चाहत और आमद ने दग़ा दे दिया । इसलिए उन्‍हें पहली बार सुनने से हम रह गये वंचित । हां तो मैं आपको बता रहा था कि कौन कौन से शायर और कवि इस कार्यक्रम में शामिल किये जाने थे । इसके बाद उन लोगों के नाम लूंगा, जिनके बारे में तय किया गया और वो आए भी । बालकवि बैरागी । बचपन से कवि सम्‍मेलनों में दद्दा बालकवि बैरागी को सुना है । स्‍कूल के दिनों में आरक्षण की आंधी चली तो हम सब भड़क उठे और तब बालकवि बैरागी की ये कविता हमारा नारा बन गये ।

हाथों में पत्‍थर होठों पे नारे

सड़कों पे आ गये क्‍यों जलते अंगारे

हाय राम कोई विचार तो करे

कोई इन अंगारों से प्‍यार तो करे ।

बालकवि जी आये तो मैंने उनके पैर छुए और फिर उन्‍हें याद दिलाया कि हमने इस कविता के सहारे बहुत आग फूंकी है अपने बचपन में । बालकवि बैरागी का सेन्‍स ऑफ ह्यूमर कमाल का है । उन्‍होंने तुरंत टांग खींची, तो यूनुस तुमको क्‍या लगता है कि तुम्‍हारा बचपन ख़त्‍म हा गया है । फिर तो ठहाकों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो चलता ही रहा । एक से एक किस्‍से सुनाए बैरागी जी ने । ब्‍लॉगिंग में थोड़े दिनों के लिए चमके उनके अनुज और हमारे मित्र भाई विष्‍णु बैरागी की भी चर्चा निकली । जाने कितनी कितनी बातें उन्‍होंने सुनाई । जिनमें संगीतकार जयदेव की यादें भी थीं । मुंबई फिल्‍म उद्योग से जुड़े किस्‍से भी थे और राजनीति के किस्‍से भी । इस उम्र में भी बालकवि बैरागी हम सबसे ज्‍यादा जोशीले और तरोताज़ा नज़र आए ।

राहत इंदौरी को बहुत खोजा और तब जाकर उन्‍हें इस कार्यक्रम के लिए राज़ी किया गया । वो आए भी । कुछ फिल्‍मों में उनके लिखे गीत हमें बहुत ज्‍यादा पसंद रहे हैं । राहत भाई के पढ़ने की अदा कमाल की है । कई कई मुशायरों में उन्‍हें सुना है और उनकी आग की तपिश अच्‍छी लगती है । पेश है उनका शेर ।

देवियां पहुंची ही थीं बाल बिखराए हुए

देवता मंदिर से निकले और पुजारी हो गये ।

कुछ और शेर

चेहरों की धूप आंखों की गहराई ले गया

आईना सारे शहर की बीनाई ले गया ।।

डूबे हुए जहाज़ का क्‍या तबसरा करें

ये हादसा तो सोच की गहराई ले गया ।।

झूठे क़सीदे लिखे गये उसकी शान में

जो मोतियों से छीन के सच्‍चाई ले गया ।।

निदा फ़ाज़ली हमारे समय के एक महत्‍त्‍वपूर्ण शायर हैं । उनके दोहे मुझे लंबे अरसे से पसंद रहे हैं । निदा साहब भी तशरीफ़ लाये और कई कई मुद्दों पर उन्‍होंने अपने बेबाक राय रखी । कमाल की बात ये थी कि निदा हों या बालकवि बैरागी या फिर राहत, इन तीनों का ताल्‍लुक फिल्‍मी गीतों से रहा है । तीनों ने ही फिल्‍मों में भी लिखा है । इसलिए इससे जुड़ी यादें तो आती ही रहीं इस कार्यक्रम में । जिस कार्यक्रम में इतने हेवीवेट कवि हों उसका संचालन कितनी बड़ी चुनौती होगी इसका अंदाज़ा आप लगा ही सकते हैं । मन:स्थिति बनाने और तैयारियों को अंजाम देने के लिए अंतत: एक ही दिन मिला और उसमें अच्‍छा खासा सरो-सामां जमा कर लिया । और हम मैदाने जंग में डट गये । चलिए निदा साहब की कुछ पंक्तियां सुन लीजिए--

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबाँ होती है दिल होते हैं
अपने घर की दर-ओ-दीवार सजा कर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढा़ कर देखो

कुंवर बेचैन को आप सभी ने सुना होगा । इस कवि सम्‍मेलन में उन्‍हें भी बुलाया गया था । और अगर आज कव‍ि सम्‍मेलन के बाद उसकी ईमानदार विवेचना करूं तो सबसे ज्‍यादा छिपे रूस्‍तम कुंवर बेचैन ही निकले । ख़ामोशी से हर दौर में महफिल को उन्‍होंने लूटा । मुझे उनकी ये पंक्तियां याद आ रही हैं---

दिल में मुश्किल बहुत है दिल की कहानी लिखना

जैसे बहते हुए पानी को है पानी लिखना ।।

या फिर ये पंक्तियां:

अंकगणित-सी सुबह है मेरी

बीजगणित-सी शाम

रेखाओं में खिंची हुई है

मेरी उम्र तमाम।

भोर-किरण ने दिया गुणनफल

दुख का, सुख का भाग

जोड़ दिए आहों में आँसू

घटा प्रीत का फाग

प्रश्नचिह्न ही मिले सदा से

मिला न पूर्ण विराम ।

दीप्‍ती मिश्र मुंबई की युवा कवियित्री हैं । उनकी कविताएं मुझे याद नहीं हैं इसलिए माफी चाहता हूं कि यहां उनकी पंक्तियां नहीं दे पा रहा हूं । वो भी इस कव‍ि सम्‍मेलन में शामिल थीं । आईये इस आयोजन की तस्‍वीरें भी आपको दिखा दी जाएं ।

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इस कवि सम्‍मेलन से जुड़ी कई यादें और हैं । जैसे मौक़ा बेमौक़ा लगभग सभी ने एक दूसरे की चुटकी ली । निदा फ़ाज़ली जैसे धाकड़ चुटकीबाज़ को वक्‍त वक्‍त पर बालकवि बैरागी जी ने बहुत खींचा । और एक भी मौक़ा नहीं छोड़ा । राहत इंदौरी के क़रीब जाना और उनकी जिंदगी की कहानी को सुनना समझना अच्‍छा था । कुंअर बेचैन बेहद मौन और शर्मीले नज़र आए लेकिन जब कविता सुनाने की बारी आई तो लगा कि वे अचानक बदल गये हैं । दिन भर के इस आयोजन ने जिंदगी के एक दिन को यादगार बना दिया ।

अब इस पोस्‍ट की बॉटम लाइन: ये रिकॉर्डिंग सत्रह मार्च को की गयी थी । और इसका प्रसारण आज दिन में ढाई बजे से शाम साढ़े पांच बजे के बीच विविध भारती पर किया जायेगा । हम तो तरंगित हो लिए अब आप सुनिएगा और बताईयेगा कविता की तरंगों ने आपको कितना तरंगित किया । 

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