जैसलमेर यात्रा: तीसरा भाग-- सीमा-प्रहरियों के विश्वास का केंद्र--तन्नोट
जैसा कि आप जानते हैं कि तरंग पर इन दिनों फ़रवरी के प्रथम सप्ताह में हुई मेरी जैसलमेर यात्रा की कहानी चल रही है । पिछली पोस्ट में मैंने आपको बताया कि किस तरह से हमने सीमा सुरक्षा बल की रामगढ़ चौकी पर स्थल रिकॉर्डिंग की और साथ में एक संगीत-संध्या भी आयोजित की ।
....दुश्मन जो देखे बुरी नज़र से आंखें निकाल लाएंगे.....तिरंगा प्यारा देश का हर जगह फहराएंगे ।।
अगला दिन काफी रोमांचक था । सोचा ये गया था कि इस दिन हमारी दो टीमों भारत-पाकिस्तान सीमा पर बनी सीमा सुरक्षा बल की पोस्टों पर जाकर वहां तैनात प्रहरियों से बातें करेंगी । सो सुबह-सवेरे नाश्ता करके हम सीमा सुरक्षा बल की टोली के साथ निकल पड़े । सबसे पहले रास्ते में हमारी गाडियां रूकीं इंदिरा गांधी नहर पर जाकर । सीमा सुरक्षा बल के अधिकारियों ने हमें बताया कि इंदिरा गांधी नहर परियोजना ने राजस्थान के बंजर में फूल खिला दिये हैं । हरियाली की पूरी पट्टी तैयार हो गयी है इस नहर परियोजना के आसपास । भारत का शायद दूसरा सबसे बड़ा जिला है जैसलमेर । और इंदिरा गांधी नहर परियोजना जैसलमेर में काफी बदलाव ला रही है । ![]()
यहां से आगे बढ़ने पर रणऊ नामक एक गांव से ठीक पहले एक पेड़ आया । हमें बताया गया कि जिस किसी को भी मोबाइल पर अपने ज़रूरी कॉल करने हों, फौरन कर लिये जाएं । क्योंकि यहां से आगे दिन भर नेटवर्क नहीं मिलने वाला है । हम पाकिस्तान की सीमा के क़रीब पहुंचने वाले हैं ।
रणऊ में ही एक स्थान पर फौजियों के पानी का टैंकर गांव में पानी पहुंचा रहा था । विविध भारती की टोली की महिलाओं को जो शरारत सूझी वो आपके सामने है ।
इन्हें पहचानिए । सबसे बांई ओर हमारी शरीके-हयात और विविध भारती की उद्घोषिका रेडियोसखी ममता सिंह, फिर शकुंतला पंडित और सबसे दाहिनी तरफ कमलेश पाठक ।
यहां से थोड़ा आगे बढ़ने पर माता का एक मंदिर नज़र आया, जिसे बी.एस.एफ. के लोग ही संभालते हैं । इस तस्वीर में देखिए-मंदिर की दीवार पर ये पंक्तियां लिखीं हैं-
दुश्मन जो देखे बुरी नज़र से आंखें निकाल लाएंगे
तिरंगा प्यारा देश का हर जगह फहराएंगे ।।
यहां से हमें भारत पाकिस्तान की सीमा पर बनी पोस्टों पर जाना था । जिसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया जा सकता । अगली पोस्ट में उस अनुभव की चर्चा 'इशारों' इशारों में की जाएगी । फिलहाल तन्नोट की गौरवा गाथा सुनिए, तन्नोट इस इलाक़े की ऐसी जगह है जहां सिविलियनों को जाने की इजाज़त है । दरअसल यहां देवी का एक विख्यात मंदिर है ।
फौजियों का कहना है कि सन 1965 की लड़ाई में यहां एक ज़बर्दस्त चमत्कार हुआ था । इसे फौजी देवी दुर्गा का चमत्कार मानते हैं । तन्नोट की इसी जगह पर पाकिस्तानी फौजियों की विशाल टोली ने तीन ओर से भारतीय सिपाहियों को घेर लिया था । जैसलमेर शहर यहां से तकरीबन एक सौ तीस किलोमीटर दूर था । मदद पहुंचने में तीन दिन लगने वाले थे । भारतीय फौजियों ने इस मंदिर में डेरा डाल रखा था । दिलचस्प बात ये है कि पाकिस्तानियों ने तकरीबन तीन हज़ार गोलियों और मोर्टार की बारिश कर दी तन्नोट के इस मंदिर पर । लेकिन इनमें से एक भी कोई नुकसान नहीं कर पाई । हां केवल एक गोली ऐसी थी जिसने एक ऊंट को धराशाई कर दिया था । फौजी मानते हैं कि ये सब तन्नोट राय देवी की कृपा थी । कैसे गोलियों और मोर्टार की इस बारिश का कोई असर नहीं हुआ--इस सवाल के आगे वैज्ञानिक-तर्क भी ख़ामोश नज़र आते हैं । आप सोचेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है । देखिए इस तस्वीर में, तन्नोट के मंदिर में उस गोला-बारूद को सजाकर रखा गया है । यहां 1965 की जंग में शामिल फौजियों की तस्वीरें भी लगी हुई हैं ।
जीवन में पहली बार मैंने ऐसा मंदिर देखा जिसे सीमा सुरक्षा बल के लोग ही संभालते हैं । भारत-पाक सीमा पर जाने से पहले जल्दी में मोबाईल कैमेरे से खींची गयी इस तस्वीर को देखिए, तस्वीर की क्वालिटी भले ठीक ना हो लेकिन यहां आप देखेंगे कि वर्दी में फौजी हारमोनियम पर संभाले भजन गा रहे हैं । मंदिर का पुजारी भी बी.एस.एफ. के स्टाफ़ में से ही है ।
यहां फौजियों का तांता लगा रहता है । राजस्थान के इस मुश्किल हिस्से में तैनात फौजी तन्नोट में माता के इस मंदिर को बहुत मानते हैं । उनका कहना है कि माता के रहते उनका बाल भी बांका नहीं हो सकता । यहां वो और उनकी टोली सुरक्षित है । यहां की एक ख़ासियत है जनता के बीच प्रचलित एक मान्यता । कहते हैं कि तन्नोट माता के दरबार में अपनी मन्नत मांगते हुए एक रूमाल बांध देना चाहिए । आपकी इच्छा ज़रूर पूरी होती है । देखिए लोगों ने किस तरह रूमालों का अंबार लगा रखा है ।
इस मंदिर के ठीक सामने तन्नोट विजय स्मारक भी है । सीमा सुरक्षा बल और सेना के लिए इसका अपना महत्त्व है । ये रहीं तन्नोट विजय स्मारक की तस्वीरें ।
अगली पोस्ट में पढि़ये भारत-पाकिस्तान सीमा पर फौजियों से हुई बातचीत के दिलचस्प अनुभव । और उसके बाद होगी लोंगेवाल-बॉर्डर-पोस्ट की शौर्य-गाथा ।
पिछली पोस्ट पर विकास का कहना था कि यात्रा-विवरण की पोस्टें लंबी हो रही हैं, ज़रा छोटी कीजिए । दिक्कत ये है कि एक बार में अगर एक अध्याय निपटाना है और वो भी तस्वीरों के साथ, तो इतनी लंबाई तो हो ही जाएगी । इस बारे में आपका क्या कहना है ।




