Wednesday, January 16, 2008

चरखी, चस्‍का और चूना

आज मन कर रहा है कि पतंगबाज़ी से जुड़ी अपनी यादें बांटी जाएं ।

मकरसंक्रांति पर मुंबई का आसमान पतंगों से गुलज़ार है । और मुझे बचपन के दिन याद आ रहे हैं । मेरा पैतृक गांव है हिन्‍डोरिया, जो दमोह से एक घंटे के रास्‍ते पर है । कहते हैं कि मशहूर चित्रकार सैयद हैदर रज़ा हमारे गांव के रास्‍ते में पड़ने वाले अमखेड़ा के रहने वाले थे । वो या उनके पुरखे । सच क्‍या है मालिक जाने या उसके 'रज़ा' जानें । ख़ैर तो पतंग को देखकर हमें याद आ गये बचपन वाले दिन । दरअसल भोपाल में बचपन बीतने की वजह से पतंग से 'नाता' तो बचपन से ही रहा था । पर अपन कुछ ज्‍यादा ही शरीफ़ किस्‍म के थे, इसलिए पतंगबाज़ी के दुस्‍साहसों से ज्‍यादा नहीं गुज़रते थे । पर जब गर्मियों की छुट्टियों में दमोह और हिन्‍डोरिया जाना होता तो वहां पतंगबाज़ी का बुंदेली रंग देखने को मिलता और हम पतंगबाज़ी के समंदर में डुबकी नहीं लगाते थे बल्कि दूर-दूर से ही उसके मज़े लिया करते थे । 

                                                                   kites

बहुत बचपन की यादों में हिन्‍डोरिया की यादें भी हैं, छोटा-सा गांव हिन्‍डोरिया, जहां गर्मियों की छुट्टियों में चाचा पतंग उड़ाते और हमसे चरखी पकड़वाते । बहुत छोटी रही होगी तब उम्र । शायद पांच छह साल । चाचा पतंगबाज़ी में दौड़ाते बहुत थे । जैसे चलो पतंग छोड़ कर आओ । या फिर जब घिर्री पकड़ते तो अकसर होता ये कि उनको दनादन ढील चाहिए पड़ती । वो डोर को हल्‍के हाथों से पकड़े रहते और मेरे हाथों में मौजूद घिर्री सायकिल के पहिए की तेज़ी से ढील छोड़ रही होती । और पतंग हिन्‍डोरिया के तालाब के ऊपर आसमान में परवाज़ कर रही होती । नज़ारा शानदार होता था अपने लिये । लेकिन हाथ में घिर्री का तेज़ घूमना हाथों पर बड़ा भारी गुज़रता था । मुझे ये भी दमोह और हिन्‍डोरिया में मैंने जीवन में पहली बार 'मांझा' बनते देखा था । चाचा ने कांच की कुछ बोतलें जमा कीं, लेई तैयार की, कांच पीसा गया और फिर एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक सफेद 'सद्दी'  को बांधा गया, अब इसके ऊपर मांझे का लेप चढ़ाया गया । ये सब बड़ी तन्‍मयता का काम होता था और चाचा के मित्र भी इसमें सहयोग करते । ठेठ बुंदेली में बातें करते और मुझ पर इसलिए हंसते कि ना तो अपन को पतंग बनाते आता है, ना मांझा बनाते और ना ही बुंदेली बोलते । हिन्‍डोरिया के उन ग्रामीण युवकों को लगता कि इन शहरी बच्‍चों का जीवन भी कोई जीवन है । अरे पांच साल के हो गये, मांझा बनाते नहीं आता, कमाल है ।

 

ख़ैर आगे चलकर हमने पतंग उड़ाना तो सीख लिया लेकिन पतंग या मांझा तैयार करने का काम कभी नहीं किया । शहरी बच्‍चों की तरह बाजा़र से पतंग लाते रहे और कन्‍नी बांधकर उसे उड़ाते रहे । बस । लेकिन भोपाल में पतंगबाज़ी का मज़ेदार रंग देखने को मिला । जिस भोपाल में मेरी परवरिश हुई वो आज के भोपाल जैसा नहीं था । उसमें ख़ालिस भोपाली रंग था । बड़े बड़े दरवाजों वाले हवेलीनुमा मकान, परदेदार औरतें, और पतंग के शौकीन लोग । ठहरी ठहरी सी जिंदगी । आज जैसी रफ्तार नहीं थी तब । ये गैस त्रासदी से कुछ सालों पहले की बात है । बहरहाल....भोपाल की पतंगबाज़ी में दिलचस्‍प ये था कि यहां पतंग केवल बच्‍चों, किशोरों या युवकों तक सीमित नहीं थी । यहां तो बुजुर्गवार भी पतंग उड़ाया करते थे । और वो भी कैसे । शर्तें लगाकर । मैदान में पतंगबाज़ी चल रही है । दो बुजुर्गवारों का मुक़ाबला हो रहा है । बाक़ी तमाशबीन हैं । छोटे बच्‍चे ज़रा इधर उधर के कोने पकड़कर अपनी पतंगें उड़ा रहे हैं । नौजवान दो ख़ेमों में बंट गये हैं । किसी शातिर पतंगबाज़ नौजवान ने घिर्री संभाल ली है । आंख के इशारे समझकर चरखी को संभाल रहा है । ये चरखी टू इन वन है । जी हां बीच बीच में जो चूने का चस्‍का बुजुर्गवार ले रहे हैं, वो भी तो इसी चरखी पर एक सिरे पर लगा हुआ है । जैसे ही 'मियां' को टेन्‍शन होता है, वो चूना कैसे खाते हैं ज़रा देखिए---नज़रें.........पतंग पर, हाथ सधे हुए, डोरी को संभाल रहे हैं......पेंच लड़ाने के बीच के राहत के एक दो सेकेन्‍ड हैं ये । मियां जी ने बिना देखे अपने बांये हाथ को थोड़ा फैलाया, चरखी पकड़े 'जमूरे' की समझ में आ गयी, उसने चूने वाला सिरा थोड़ा आगे कर दिया । मियां जी ने टटोलते हुए चूना चरखील से निकाला........अरे कमबखत पेंच लड़ा रहा है....दोनों हाथों डोरी पर......अंगूठे में चूना लगा है.....मियां जी ने डोरी से वैसे ही पेंच लड़ाए जैसे एक माहिर ट्रक ड्रायवर रफ्तार में ट्रक मोड़ता है । और फिर सामने वाली की पतंग को 'वो काटा'......और चूने को वो चखा........जिस बात को कहने में इतने सारे वाक्‍य का स्‍क्रीनप्‍ले लग गया.......उसमें महज़ चार पांच सेकेन्‍ड लगते थे । कहने का मतलब ये है कि 'बन्‍ने ख़ां भोपाली' पेंच लड़ाते हुए भी चूना चखने का मौक़ा निकाल लेते थे । यहां थोड़ा विषयांतर करते हुए बता दूं कि 'हॉकी का मक्‍का' कहे जाने वाले भोपाल में उस दौर के हॉकी के खिलाड़ी भी अपनी हॉकी पर थोड़ा 'चूना'  चिपकाए रहते थे । और ड्रिबल करते हुए बीच में चूना चख लेते थे । यानी ये चूना चखा, ये आगे बढ़े, चार पांच खिलाडि़यों को चकमा दिया, डी में घुसे और ये गोल.....और ये चूना......।

                                                              250px-Lahore_Basant_Festival[1]

उन दिनों के भोपाल में 'पेंच लड़ाते हुए'  हार जाने का मतलब था शान पर दाग़ लग जाना । पतंगबाज़ी का एक रंग होता है पतंग लूटना । बड़े बड़े छकड़े बनाए जाते हैं और फिर पेंचों पर नज़र रखते हुए कटी हुई पतंग को लूटने की जंग लड़ी जाती है । आमतौर पर लूटने का ये काम बच्‍चे और किशोर ही करते हैं । यही है वो रंग जिसकी वजह से हादसे भी होते हैं । मैंने अकसर देखा है कि लूटी हुई पतंग लेकर भाई लोग यूं लौटते हैं मानो पुराने ज़माने के आक्रमणकारी किसी देश को लूटकर लौट रहे हों । पचास पैसे की पतंग और दुनिया भर की जंग । आज भी पतंग लूटने के रहते हादसे होते रहते हैं । हम तो यही कामना करते हैं कि पतंग लूटने की जंग में कोई अपनी जान ना गंवाए । मकर संक्रांति के बहाने देखिए ना पतंगबाज़ी की कितनी कितनी बातें याद आ गयीं ।

Friday, January 11, 2008

ये अधूरी तमन्‍नाएं--हाय हाय हाय !!!

जिंदगी में कुछ काम हमेशा मुल्‍तवी होते रहते हैं । पता नहीं क्‍यों पिछले कुछ दिनों से वो छूटे अधूरे काम याद आ रहे हैं । शायद इसलिए कि नया साल नई शुरूआत का मौक़ा देता है और हम अपनी जिंदगी को नये सिरे से पटरी पर लाने की कोशिश भी करते हैं  । नये साल के वादे यानी new year resolution भी करते हैं । जैसे काकेश जी ने सार्वजनिक-तौर पर किये । और हम सबको प्रेरित भी किया कि मियां क्‍या कर रिए हो । बस समझ लीजिए कि हम इसीलिए जाग गये । और चेहरे पर अफ़सोस का पोस्‍टर चिपका लिया । हाथ में वो फेहरिस्‍त है जिसमें वो इरादे लिखे हैं जिन्‍हें हम पूरा नहीं कर पाए । हाय हाय हाय ।

पढ़ाई के दिनों में हम सोचते थे कि चलो गिटार सीख लिया जाए, पर माता-पिता ने कहा कि भैया पढ़ाई कर लो, गिटार सीखने के लिए तो उम्र पड़ी है । हमारा अपना ही सिक्‍का कमज़ोर था, पढ़ाई के अलावा बाक़ी सब करते थे । जहां कहीं वाद-विवाद प्रतियोगिता होती, पहुंच जाते । जहां कहीं लिखने-पढ़ने का कोई काम होता, प्रतियोगिता होती, वहां भी पहुंच जाते । कुछ ट्रॉफी वग़ैरह जीत लाते । फिर रेडियो पर बोलने की लत भी पढ़ाई के दिनों में ही लग गई थी । सो वहां समय चला जाता । कविताएं लिखना भी जारी था । पर अब अड्डेबाज़ी वाला मामला चल निकला था । मध्‍यप्रदेश के शहर छिंदवाड़ा में एक छोटा सा समूह बनाया था, कथन-समकालीन सोच और सृजन के लिए । इस समूह के ज़रिए चर्चाएं, नुक्‍कड़ नाटक और गोष्ठियों का आयोजन किया जाता । हंस, पहल, कथ्‍यरूप जैसी पत्रिकाओं में घुसे रहते । घर पर कम सड़कों, चाय की दुकानों, खेल के मैदानों और अपने टुटले टू-व्‍हीलर पर ज्‍यादा पाए जाते । चोरी से फिल्‍में देखते, जिनकी ख़बर किन्‍हीं जादूगरों  ( BSNL में कार्यरत पिताजी के मातहत फोन मैकेनिक, लाइनमैन और फोन इंस्‍पेक्‍टर जो जाने कहां कहां से हमें देख लेते थे ) के ज़रिए  मेरे घर वालों को चल जाती  । तो हम जैसे hopeless child को गिटार सीखने की इजाज़त नहीं मिली ।  होपलेस इसलिए कि कॉलेज में बंक मारने की वजह से प्रोफेसर्स चिढ़े रहते थे और पढ़ाई में दीदा ना लगने की वजह से घर वाले बोलते थे कि इस लड़के का कुछ नहीं हो सकता ।  आज भी मुंबई में धोबी तालाब वाले इलाक़े से गुज़रते हुए Furtados की साज़ों की दुकान में सजे gibson के गिटार देख लेते हैं तो आहें भरते हैं । हाय हाय हाय ।

 

ऐसी ही एक अधूरी-छूटी तमन्‍ना है देश-भ्रमण की । फिर कॉलेज के दिन याद आ गये । उस ज़माने में हम सोचते थे कि चलो देश घूमा जाए । पर तब पैसे नहीं हुआ करते थे । और अगर हम देश घूमते तो पढ़ाई क्‍या हमारे चाचाजी करते । पता है उस ज़माने में हमने यूथ हॉस्‍टेल एसोसिएशन की सदस्‍यता भी ले ली थी । एकाध कैम्‍प भी किया ट्रैकिंग का । पर वही सब जो गिटार के साथ हुआ वही तफरीह की तमन्‍ना के साथ भी हो गया । विविध भारती में आने के बाद यूथ हॉस्‍टल की मुंबई यूनिट का पता लगाया । मगर फिर मामला टांय टांय फिस्‍स हो गया । यहां हम साफ़ कर दें कि देश भ्रमण वाला हमारा concept ज़रा अलग है । ऐसा नहीं कि साल में महीने पंद्रह दिन के लिए निकले, चार मशहूर पर्यटन स्‍थलों पर गये और लौट आए । इसे हम कहते हैं  'पोस्‍टरी घूमना'  । घूमने का हमारा फिनॉमिना ज़रा अलग है, हम चाहते हैं कि एक बार निकलें तो ज़रा चार छह महीनों बाद ही घर लौटें, एक पूरे इलाक़े की ख़ाक छानने के बाद ही दम लें । वो भी अपने कैमेरे और डायरी के साथ । और शिमला या कुल्‍लू मनाली में नहीं बल्कि सुजानगढ़ और मंडी में जाकर रहें । हरिद्वार में नहीं बल्कि अल्‍मोड़ा में रहें । बल्कि और भी कहीं भीतर के गांव में रहने मिल जाए तो क्‍या बात है । वो कहते हैं ना कि 'सैर कर दुनिया की ग़ाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां' । पर हमारा हाल बयां करता है राजेश रेड्डी साहब का ये शेर, जो उन्‍होंने मुंबई के बारे में लिखा है --'इस शहर में आती हैं सैकड़ों पगडंडियां, यहां से बाहर निकलने का कोई रास्‍ता नहीं । कै़द मुंबई शहर की, हाय हाय हाय ।

 

एक अधूरी पूरी तमन्‍ना है दुनिया भर की फिल्‍में देखने की, जिसे थोड़ा थोड़ा मुंबई आकर पूरा किया जा सका है । जब डी वी डी वाला ज़माना नहीं था तो फिल्‍म समारोहों में पहुंच जाते थे । लाईन लगाकर थियेटर में जाना और फिर लॉटरी की तरह फिल्‍में देखना । खराब निकली तो बाहर आकर बौद्धिक जुगाली । फिर डी वी डी के ज़माने ने फिल्‍म फेस्टिवलों की आवारागर्दी पर थोड़ी सी लगाम लगाई है । नाटक देखने की तमन्‍ना तो जब भी उबाल मारती है तो हम सीधे पृथ्‍वी थियेटर या एन सी पी ए पहुंच जाते हैं । ये अलग बात है कि जब लौट रहे होते हैं तो लगता है कि काश हमारा घर पृथ्‍वी थियेटर के पड़ोस में ही होता, कमबख्‍त पच्‍चीस तीस किलोमीटर आना जाना तो नहीं पड़ता । फिर खूब सारा पढ़ने की तमन्‍ना है, जिसने हमें मुंबईया भाषा में कहें तो 'चश्‍मीश' बना दिया है । चार आंखों वाला । फिर भी पढ़ना उतना नहीं हो रहा है जितने हम पढ़ना चाहते हैं । हां मुंबई आए थे नये नये तो लोकल ट्रेनों की यात्रा में धक्‍का मुक्‍की के बीच कई किताबें पढ़ डालीं । कई कई बार पढ़ीं । ज़रा कुछेक की याद कर ली जाय । हरिया हरक्‍यूलिस की हैरानी और कसम--दोनों मनोहर श्‍याम जोशी की । निर्मल वर्मा की किताब --कव्‍वे और काला पानी । सुरेंद्र वर्मा की 'मुझे चांद चाहिए' । उदय प्रकाश की पाल गोमरा का स्‍कूटर और पीली छतरी वाली लड़की । मंटो की रचनावली । परसाई जी की कई कई किताबें । राही मासूम रज़ा की आत्‍मकथा । कृश्‍न चंदर की आत्‍मकथा--आधे सफर की पूरी कहानी । अनगिनत कविताएं । और जाने क्‍या क्‍या । लंबी फेहरिस्‍त है । धन्‍य हो लोकल ट्रेनों की यात्राएं । पढ़ते तो अब भी हैं पर ज़रा नहीं काफी कम । ये अधूरी तमन्‍नाएं और हाय हाय हाय ।

 

अब ज़रा एक फेहरस्ति पेश कर दें जल्‍दी जल्‍दी । आपको बता दें कि भोपाल में बचपन के दिनों में हमें लगा था डाकटिकिटों के संग्रह का शौक़ । यानी फिलेटली । आज भी जबलपुर वाले घर में एक ब्रीफकेस के भीतर हमारी बचपन वाली अखबारों की कटिंग और डाकटिकिटों का संग्रह रखा हुआ है । सुरक्षित । एकदम सुरक्षित । हां याद आया । स्‍कूल के दिनों में हमें माचिस की डिब्बियों के रैपर जमा करने का शौक लगा था । सैकड़ों तरह की माचिस की डिब्बियों के कवर रखे थे हमने । रूस्‍टर, चाभी और जाने क्‍या क्‍या । वो एलबम वक्‍त की किसी दरार में जा घुसा है । इसी तरह देश विदेश के सिक्‍के भी जमा किये थे हमने । फिर आया गाने जमा करने का युग । पुराने अनगिनत गानों का संग्रह है । जो लगातार बढ़ रहा है । तमन्‍ना है कि ये ख़ज़ाना और भी ज्‍यादा बढ़े । दुनिया भर के रेडियो स्‍टेशनों को सुनने का शौक़ रहा है हमें । रेडियोनामा पर इस बारे में अलग से लिखा जाएगा । आजकल ये शौक़ भी बंद पड़ा है । देश भर के अखबारों को पढ़ने की तमन्‍ना रहती है, जो धक्‍का लगा लगा कर हम पूरी कर ही लेते हैं । किसी ज़माने में आर्किटेक्‍ट बनने का सपना देखा था, प्री इंजीनियरिंग में सिलेक्‍शन ही नहीं हुआ । इंटीरियर डिज़ायनिंग का शौक़ रहा है । पर ये तमन्‍ना ठंडे बस्‍ते में है । आधी रात को बाईक पर शहर घूमने की तमन्‍ना रहती है । हां मुंबई शहर में हमने अकसर रात को शहर की ख़ाक छानी है । शहर की रात और मैं नाशादो नाकारा फिरूं, ऐ गमे दिल क्‍या करूं । इसका अपना मज़ा है, शहर के कई रूप होते हैं दिन का अलग रात का एकदम अलग । कितनी कितनी तमन्नाएं । उफ़ ये तमन्‍नाएं । ये अधूरी तमन्‍नाएं जिन्‍हें पूरा ना करने का दोष हमारा अपना है । चाहे जितने बहाने बनाएं । इस जुर्म का इक़बाल करते हैं, अपनी तरंग में रहते हैं, कभी ना कभी तो तमन्‍नाओं के बही खाते में हिसाब किताब बराबर हो ही जाएगा । बस  जि़द पकड़ लेने की बात है  । पर तब तक एक ही उपाय । हम करते रहेंगे हाय हाय हाय ।

 

 

 

 

वो सात दिन

नये साल का पहला हफ्ता बड़ा ही परेशान कर देने वाला रहाहुआ यूं कि बकौल एम टी एन एल हमारे एरिया के एक्‍सचेन्‍ज में मेजर फाल्‍ट गयायानी घर का नेट कनेक्‍शन ऐसा सोया कि जागने का नाम ही नहीं ले रहाथायही वजह थी कि मैं पिछले एक हफ्ते से चिट्ठों की दुनिया में झांक भी नहीं पायाऔर जरूरी ईमेल देखनेऔर भेजने के लिए भी साईबर कैफे का सहारा लेना पड़ा

ये पूरा सप्‍ताह त्रासद रहात्रासद इसलिए क्‍योंकि सोचा ये था कि अब लगातार चिट्ठाकारी की जाएगी, कम से कम पढ़ने का काम तो ज़ोरों पर चलाया जाएगाइन सात दिनों में मुझे समझ में आया कि संचार के ये साधन अब हमारा नशा बनते जा रहे हैंएक ज़माने में इंटरनेट के बिना काम चल जाता थाफिर हफ्ते में एकाध बार मेल करने के दिन आएफिर दिन रात इंटरनेट पर रहने का ज़माना चला आयाऐसे में टेक्निकल फाल्‍ट तुरंत ज़मीन पर ला पटकते हैंआप बेकरार होते हैं कि सब जल्‍दी ठीक हो जाए, पर इस देश के टेलीफोन विभाग को तो आप जानते ही हैं नाबिना धक्‍का दिये काम नहीं करता

दिलचस्‍प
बात ये रही कि महानगर टेलीफोन निगम के उनींदे कर्मचारी और अधिकारी रोज़ाना दिलासा देते रहे किआज ठीक हो जायेगा, कल ठीक हो जायेगालेकिन जब बर्दाश् की सीमा पार हो गयी तो कल मैंने महानिदेशक ब्रॉडबैन्‍ड को फोन लगाया और उन्‍हें बताया कि उनके विभाग में कितना गैर पेशेवर रूख हैतबजाकर सारे के सारे नींद से जागेअपने आप घर के फोन और मोबाईल खनखनाने लगे, नरमी से बातें की जाने लगीं और दोपहर दो बजे तक ब्रॉडबैन्‍ड फिर से जागृत हो गया

पर अधिकारियों के टेलीफोन कॉल का सिलसिला रात तक जारी रहाहर व्‍यक्ति यही पूछ रहा था कि क्‍या समस्‍या थी, हमसे कहते, शिकायत दर्ज कराई थी क्‍या । क्‍या सर आपने तो ऊपर शिकायत कर दीबताईये कि हमारे देश के 'निगम' इस अंदाज़ में काम कर रहे हैंमज़ेदार बात ये है कि फाल्‍ट था बिल्डिंग के नीचे लगे बॉक्‍स में । अब लाइनमैन क्‍यों जहमत करेऔर साहब लोग क्‍यों उस पर दबाव डालें

बहरहाल जब तक नेट ठीक है, ठीक है, वरना क्‍या पता कब हफ्ते दस दिन के लिए सो जाएकोई विकल्‍प भी तो नहीं है भाईचलिए आप भी अपने कड़वे अनुभव बताईये हम सुन रहे हैं
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Saturday, January 5, 2008

यादगार रहा मिलना युवा कवि एकांत श्रीवास्‍तव से

कल का दिन ख़ास रहा । कल विविध भारती में मुझे युवा कवि एकांत श्रीवास्‍तव का इंटरव्‍यू लेने का मौक़ा मिला । एकांत की कविताएं मैं पिछले दस पंद्रह सालों से पढ़ रहा हूं और कई दिनों से इच्‍छा थी कि इतनी संवेदनशील और बारीक कविताएं रचने वाले कवि से आमने-सामने बात करने मिले । इसलिए जब एक आयोजन में एकांत के आने की ख़बर मिली तो फ़ौरन इस मौक़े को झटक लिया ।

एकांत बेहद सादा इंसान हैं । सहज और सरल । वे छत्‍तीसगढ़ के एक छोटे-से इलाक़े राजिम से आते हैं । और उनकी ज्‍यादातर परवरिश अपनी दादी के सान्निध्‍य में हुई है । जब मैंने एकांत को बताया कि मैंने सबसे पहले उनकी वो कविताएं पढ़ी थीं जो उन्‍होंने रंगों पर लिखी थीं तो वो चौंक गये । वो उम्‍मीद नहीं कर रहे थे कि आकाशवाणी जैसे संस्‍थान में कोई इतने लंबे समय से उनकी कविताओं को पढ़ रहा है । और उन पर पैनी नज़र रखे हुए है । हां जिन लोगों ने ये कविताएं पढ़ी नहीं हैं उन्‍हें बता दूं कि एकांत श्रीवास्‍तव ने नब्‍बे के दशक की शुरूआत में रंगों पर एक पूरी श्रृंखला लिखी थी । एक कविता लाल रंग पर, एक सफ़ेद पर, तो एक काले रंग पर कविता । शायद पांच कविताएं थीं वो । कोशिश करेंगे कि 'तरंग' पर आपको वो कविताएं पढ़वाई जाएं ।

बहरहाल, एकांत ने अपने जीवन की कई अनजानी-अनछुई बातें बताईं । उन्‍होंने बताया कि शुरूआती दिनों में वो गुलशन नंदा और रानू की स्‍टाईल वाले उपन्‍यास और कहानियां लिखा करते थे । अपने उस छोटे से गांव में रहते हुए लिखने की प्रेरणा उन्‍हें अपनी दादी से मिलती रही । जिन्‍हें वो अम्‍मां कहते थे । दादी के पास उनकी परवरिश इसलिए हुई क्‍योंकि उनके माता-पिता दुर्ग में नौकरी करते थे । और उन्‍हें गांव में दादी के पास रख दिया गया था । दादी के कहने पर ही एकांत ने कविताओं पर ज़ोर देना शुरू किया । छत्‍तीसगढ़ और म.प्र. के प्रसिद्ध अखबार देशबंधु के अवकाश अंक यानी रविवारीय परिशिष्‍ट में उनकी कविताएं छपीं और वहां से उनका नाम होना शुरू

हुआ ।

मुझे एकांत की कविताओं की ख़ासियत लगती है हमारी जिंदगी से खत्‍म होती जा रही संवेदनाओं की धड़कन को पकड़ना और हमारी भाषा से ग़ायब हो चुके शब्‍दों का प्रयोग । एकांत कभी करेले बेचने वाली लड़की को अपनी कविता में बेहद प्रभावी ढंग से ले आते हैं तो कभी बग़ीचे में बरसाती दिनों में चहलक़दमी कर रही बीरबहूटी को । अदभुत है उनकी संवेदना । आज के समय में जबकि कविता में जटिलताएं बढ़ रही हैं और विचार....संवदेनाओं पर हावी हो रहे हैं, एकांत की कविताएं विचारों और सादगी या सरलता का तालमेल करती चलती हैं ।

किसी कवि को लगातार पढ़ते रहना और उससे मिलने की इच्‍छा को मन में दबाए लंबे समय तक जिए चले जाना दिलचस्‍प होता है और जब अपने प्रिय कवि से मुलाक़ात हो, और केवल मुलाक़ात ही नही बल्कि बाक़ायदा इंटरव्‍यू करने का मौक़ा भी मिले तो लगता है कि बातों का सिलसिला खत्‍म ना हो तो कितना अच्‍छा हो । बातों के नये नये सिरे खुलते चले जाएं । नये नये पहलू मिलते जाएं और कवि के व्‍यक्तित्‍व और उसके कृतित्‍व में नए तरीक़े से झांकने का मौक़ा मिलता जाए । हमने फिल्‍मों से लेकर साहित्‍य और समाज से लेकर लघु‍पत्रिकाओं के भविष्‍य तक हर मुद्दे पर बातचीत की । और केवल अच्‍छा ही नहीं लगा बल्कि बहुत अच्‍छा लगा ।

एकांत के तीन कविता संग्रह आ चुके हैं--अन्‍न हैं मेरे शब्‍द, मिट्टी से कहूंगा धन्‍यवाद और बीज से फूल तक ।
उनकी एक आलोचनात्‍मक पुस्‍तक आई है--कविता का आत्‍मपक्ष । बहुत जल्‍दी उनकी एक डायरीनुमा पुस्‍तक आने वाली है, जिसकी हमें लगातार प्रतीक्षा रहेगी । आजकल एकांत
वागर्थ के संपादक हैं और कलकत्‍ता में रेलवे की नौकरी भी कर रहे हैं । एकांत पर बात हो और कविताएं ना हों ऐसा हो नहीं सकता---ये रही एकांत की तीन कविताएं जो वागर्थ में छप चुकी हैं ।

करेले बेचने आईं बच्चियां


पुराने उजाड़ मकानों में
खेतों-मैदानों में
ट्रेन की पटरियों के किनारे
सड़क किनारे घूरों में उगी हैं जो लताएं
जंगली करेले की
वहीं से तोड़कर लाती हैं तीन बच्चियां
छोटे-छोटे करेले गहरे हरे
कुछ काई जैसे रंग के
और मोलभाव के बाद तीन रुपए में
बेच जाती हैं
उन तीन रुपयों को वे बांट लेती हैं आपस में
तो उन्हें एक-एक रुपया मिलता है
करेले की लताओं को ढूंढने में
और उन्हें तोड़कर बेचने में
उन्हें लगा है आधा दिन
तो यह एक रुपया
उनके आधे दिन का पारिश्रमिक है
मेरे आधे दिन के वेतन से
कितना कम
और उनके आधे दिन का श्रम
कितना ज्या़दा मेरे आधे दिन के श्रम से
करेले बिक जाते हैं
मगर उनकी कड़ुवाहट लौट जाती है वापस
उन्हीं बच्चियों के साथ
उनके जीवन में।

लोहा


जंग लगा लोहा पांव में चुभता है
तो मैं टिटनेस का इंजेक्शन लगवाता हूं
लोहे से बचने के लिए नहीं
उसके जंग के संक्रमण से बचने के लिए
मैं तो बचाकर रखना चाहता हूं
उस लोहे को जो मेरे खून में है
जीने के लिए इस संसार में
रोज़ लोहा लेना पड़ता है
एक लोहा रोटी के लिए लेना पड़ता है
दूसरा इज्ज़त के साथ
उसे खाने के लिए
एक लोहा पुरखों के बीज को
बचाने के लिए लेना पड़ता है
दूसरा उसे उगाने के लिए
मिट्टी में, हवा में, पानी में
पालक में और खून में जो लोहा है
यही सारा लोहा काम आता है एक दिन
फूल जैसी धरती को बचाने में

रास्ता काटना*

* एकांत ने बताया कि यह कविता उन दिनों लिखी गयी जब वे विशाखापत्‍तनम में पोस्‍टेड थे, आंध्र में महिलाएं बाहर जाने वाले पुरूष का रास्‍ता काटती हैं और ये शुभ होता है ।


भाई जब काम पर निकलते हैं
तब उनका रास्ता काटती हैं बहनें
बेटियां रास्ता काटती हैं
काम पर जाते पिताओं का
शुभ होता है स्त्रियों का यों रास्ता काटना
सूर्य जब पूरब से निकलता होगा
तो निहारिकाएं काटती होंगी उसका रास्ता
ऋतुएं बार-बार काटती हैं
इस धरती का रास्ता
कि वह सदाबहार रहे
पानी गिरता है मूसलाधार
अगर घटाएं काट लें सूखे प्रदेश का रास्ता
जिनका कोई नहीं है
इस दुनिया में
हवाएं उनका रास्ता काटती हैं
शुभ हो उन सबकी यात्राएं भी
जिनका रास्ता किसी ने नहीं काटा ।

अब एक अच्‍छी ख़बर भी देता चलूं कि एकांत श्रीवास्‍तव से हुई इस बातचीत को विविध भारती से आगे चलकर 'हमारे मेहमान' कार्यक्रम में प्रसारित किया जायेगा । इसकी सूचना आपको रेडियोनामा के ज़रिए जरूर दी जाएगी ।

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